माँ की कीमत

 

Emotional Indian mother-in-law and daughter-in-law reconciling in a warm family home, symbolizing forgiveness, respect, and family love.


कमरे में रिया की हंसी गूंज रही थी। हाथ में मोबाइल लिए वह अपनी सहेली नेहा से बातें करते हुए बार-बार खिलखिला रही थी।


रिया के चेहरे पर एक अजीब-सा आत्मविश्वास था। उसे लग रहा था कि उसने अपनी जिंदगी का बहुत बड़ा जुगाड़ कर लिया है।


फोन के दूसरी तरफ नेहा उसकी बातें सुन रही थी।


नेहा ने हंसते हुए पूछा,

“अच्छा ये बता, तेरी सास अब हमेशा तेरे साथ ही रहेंगी क्या?”


रिया ने तुरंत जवाब दिया,

“रहेंगी क्यों नहीं? मैंने इतनी आसानी से उन्हें यहां बुलाया थोड़ी है।”


“मतलब?”


रिया ने आवाज थोड़ी धीमी की और फिर हंसते हुए बोली,


“अरे पगली, मेरी सास को यहां लाने के पीछे भी तो एक वजह है।”


नेहा चुप हो गई।


रिया ने कुर्सी पर आराम से पैर फैलाते हुए कहा,


“तुझे पता है ना, मेरे दोनों बच्चे अभी छोटे हैं। एक को स्कूल छोड़ना, दूसरे को संभालना, ऊपर से घर का काम। मैंने सोचा अगर कोई मेड रखूंगी तो कम से कम छह-सात हजार रुपये महीने जाएंगे।”


“फिर?”


“फिर क्या? मैंने अपने पति से कहा कि मम्मी जी अकेली रहती हैं, पापाजी के जाने के बाद उनका मन भी नहीं लगता होगा। उन्हें हमारे पास बुला लेते हैं।”


नेहा बोली,

“तो तूने सच में उनके अकेलेपन के बारे में सोचा था?”


रिया जोर से हंस पड़ी।


“तू भी ना! मुझे अपने घर की चिंता थी, उनके अकेलेपन की नहीं।”


नेहा कुछ पल चुप रही।


रिया ने आगे कहा,


“लेकिन मैंने बात ऐसी बनाई कि अमित को लगा मैं बहुत बड़ी त्याग की मूर्ति हूं। मैंने कहा—‘मम्मी जी अकेली हैं, उन्हें हमारे पास ही रहना चाहिए। आखिर वह हमारी मां हैं।’”


दोनों सहेलियां हंसने लगीं।


रिया ने कहा,


“और देख, मेरा प्लान कितना बढ़िया चला। मम्मी जी आईं और मेरी आधी परेशानी खत्म।”


नेहा ने उत्सुकता से पूछा,

“कैसे? ऐसा क्या हो गया?”


रिया ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया,

“खाना वही बनाती हैं। बच्चों को वही संभालती हैं। सब्जियां साफ कर देती हैं। कपड़े तह कर देती हैं। कभी-कभी घर में झाड़-पोंछ भी कर देती हैं।”


नेहा ने कहा,


“लेकिन रिया, अगर उन्हें कभी पता चल गया कि तू उन्हें इसीलिए लाई थी?”


रिया ने बेफिक्री से कहा,


“उन्हें क्यों पता चलेगा?”


फिर रिया ने अपनी बात समझाते हुए कहा,

“मैं उनके सामने इतनी मीठी बातें करती हूं कि उन्हें लगता है मैं उन्हें बहुत चाहती हूं।”


रिया हंसते हुए बोली,

“जब खाना बनाती हैं तो मैं कहती हूं—‘मम्मी जी, आपके हाथ के खाने का कोई मुकाबला नहीं।’”


फिर वह थोड़ा और मुस्कुराई और बोली,

“और जब बच्चों को संभालती हैं तो मैं कहती हूं—‘आपके रहते मुझे कितनी मदद मिल जाती है।’”


रिया ने बेफिक्र अंदाज में जवाब दिया,

“हां, बस दो मीठे शब्द बोल दो और इंसान खुश। फिर वह खुशी-खुशी अपना काम करता रहता है।”


नेहा ने धीरे से कहा,


“लेकिन तू सच में उनसे प्यार नहीं करती?”


रिया ने कुछ पल सोचा और फिर बोली,


“प्यार?”


उसके चेहरे पर हल्की हंसी आई।


“देख नेहा, रिश्ते अपनी जगह हैं और जिंदगी अपनी जगह। सास हैं, सम्मान देती हूं। लेकिन इसका मतलब ये थोड़ी है कि मैं अपनी पूरी जिंदगी उनकी सेवा में लगा दूं।”


रिया ने थोड़ी देर रुककर अपनी बात आगे बढ़ाई,

“मेरे अपने बच्चे हैं, मेरा पति है और मेरी अपनी जिंदगी है। मैं अपनी जिंदगी को सिर्फ सास की सेवा में थोड़ी लगा सकती हूं।”


फिर रिया ने बेफिक्री से कहा,

“और फिर मेरी सास को भी तो खाना बनाने का शौक है। उन्हें खाना बनाना अच्छा लगता है, तो मैं उन्हें जबरदस्ती तो नहीं करवा रही हूं।”


नेहा हंसते हुए बोली,


“अच्छा, ये बात भी है।”


रिया ने कहा,


“और तू सोच, अगर मैं उन्हें यहां नहीं लाती तो वह मेरी जेठानी पूजा के पास चली जातीं।”


“पूजा तो वैसे भी बहुत अच्छी बहू बनने का नाटक करती है।”


नेहा ने पूछा,


“लेकिन उसकी अभी-अभी तो जुड़वां बच्चे हुए हैं ना?”


“हां।”


रिया ने हंसकर कहा,


“इसीलिए तो मैं कहती हूं, मेरी किस्मत अच्छी है। उसके पास पहले ही दो छोटे बच्चे हैं। अगर मम्मी जी उसके घर रहतीं तो वह उनसे सारे काम करवाती और खुद आराम करती।”


“अब मेरी सास मेरे पास हैं तो मेरी मौज है।”


रिया की आवाज में गर्व साफ झलक रहा था।


“और सुन, अगले हफ्ते किटी पार्टी है। मैंने नई साड़ी भी खरीदी है। मम्मी जी बच्चों को संभाल लेंगी तो मैं आराम से तैयार होकर जाऊंगी।”


नेहा बोली,


“वाह! तूने तो पूरा इंतजाम कर लिया।”


रिया हंसते हुए बोली,


“और क्या! जिंदगी में थोड़ा दिमाग लगाना चाहिए।”


उसी समय बाहर से बर्तन रखने की हल्की आवाज आई।


रिया ने ध्यान नहीं दिया।


वह अभी भी फोन पर ही थी।


“अच्छा नेहा, अब फोन रखती हूं। मम्मी जी बाथरूम में गई हैं। आती ही होंगी। मुझे उनसे चाय बनवानी है।”


नेहा ने मजाक में कहा,


“बेचारी तेरी सास!”


रिया हंसते हुए बोली,


“बेचारी नहीं, मेरे लिए तो भगवान का भेजा हुआ इंतजाम हैं।”


इतना कहकर उसने फोन काट दिया।


लेकिन जैसे ही वह कुर्सी से उठी और पीछे पलटी—


उसके चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।


दरवाजे पर उसकी सास शारदा देवी खड़ी थीं।


उनके हाथ में एक कपड़ा था।


शायद वह कपड़े सुखाकर वापस कमरे में रखने आई थीं।


लेकिन उनके चेहरे पर वह सहज मुस्कान नहीं थी, जो हर दिन रिया को देखते ही आ जाती थी।


उनकी आंखें स्थिर थीं।


बहुत शांत।


इतनी शांत कि रिया को उस खामोशी से डर लगने लगा।


रिया कुछ बोल नहीं पाई।


“मम्मी जी...”


शारदा देवी ने उसकी ओर देखा।


“हां बहू।”


“आप... कब आईं?”


“काफी देर पहले।”


रिया के गले में जैसे शब्द अटक गए।


“आपने... मेरी बातें सुनीं?”


शारदा देवी ने सिर हिला दिया।


“हां।”


रिया का चेहरा लाल हो गया।


वह तुरंत सफाई देने लगी।


“मम्मी जी, वो मैं तो बस नेहा से मजाक कर रही थी।”


शारदा देवी ने कहा,


“इतना लंबा मजाक?”


रिया चुप हो गई।


शारदा देवी ने धीरे से पूछा,


“क्या सच में मैं तुम्हारे लिए इतनी उपयोगी हूं?”


रिया घबरा गई। उसने तुरंत सफाई देते हुए कहा,

“मम्मी जी, मैंने ऐसा नहीं कहा...”


शारदा देवी ने उसकी बात बीच में ही रोक दी और शांत लेकिन दुखी स्वर में बोलीं,

“कहा है बहू।”


उनकी आवाज में गुस्सा नहीं था।


बस दर्द था।


“तुमने कहा कि मैं मेड के पैसे बचाती हूं।”


रिया ने सिर झुका लिया।


“तुमने कहा कि मैं बच्चों को संभालती हूं इसलिए तुम्हें बाहर जाने की चिंता नहीं रहती।”


रिया की आंखों में आंसू आ गए।


“तुमने कहा कि मैं खाना बनाती हूं, सब्जियां साफ करती हूं और घर के छोटे-छोटे काम कर देती हूं, इसलिए तुम्हारी जिंदगी आसान हो गई है।”


शारदा देवी ने कुछ पल रुककर कहा,


“लेकिन तुमने एक बात नहीं कही।”


रिया ने उनकी तरफ देखा।


“क्या?”


“तुमने यह नहीं कहा कि मैं तुम्हारी मां हूं।”


रिया के पास कोई जवाब नहीं था।


शारदा देवी ने पास रखी कुर्सी खींची और बैठ गईं।


उनके हाथ हल्के-हल्के कांप रहे थे।


“बैठो बहू।”


रिया चुपचाप सामने बैठ गई।


शारदा देवी ने कहा,


“आज तुम्हारी सारी बातें सुनकर मुझे अपने पिछले कुछ महीनों की बहुत सारी बातें याद आ रही हैं।”


कुछ पल रुकने के बाद शारदा देवी ने भर्राई हुई आवाज में कहा,

“जब पहली बार तुमने मुझे यहां आने के लिए कहा था, मुझे लगा था कि मेरी बहू मुझे अपने पास बुला रही है।”


शारदा देवी ने अपनी आंखों के आंसू पोंछते हुए कहा,

“मुझे लगा था कि पति के जाने के बाद शायद मैं अकेली हो गई हूं, इसलिए बेटे का घर ही अब मेरा सहारा है।”


फिर उन्होंने रिया की ओर देखकर कहा,

“तुमने उस दिन मुझसे कहा था—‘मम्मी जी, आप अकेली क्यों रहेंगी? हमारे साथ रहिए। आपका अपना घर है।’”


उनकी आंखें नम हो गईं।


“मैंने तुम्हारी बात पर विश्वास कर लिया।”


रिया रोने लगी।


शारदा देवी ने कहा,


“तुम्हें याद है, पहले दिन मैं यहां आई थी तो तुमने मेरे पैर छुए थे?”


रिया ने सिर हिला दिया।


“तुमने कहा था—‘मम्मी जी, अब आप बिल्कुल चिंता मत करना। मैं आपको बेटी की तरह रखूंगी।’”


“मैंने भी सोचा था कि शायद मुझे बेटी मिल गई।”


कुछ क्षण के लिए कमरे में सन्नाटा छा गया।


फिर शारदा देवी बोलीं,


“बहू, मैं तुम्हें दोष नहीं दे रही कि तुमने मुझसे काम करवाया।”


उन्होंने कुछ पल रुककर रिया की तरफ देखा और फिर बोलीं,

“मैंने जो किया, अपने मन से किया।”


शारदा देवी ने हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा,

“मुझे खाना बनाना पसंद है।”


फिर उन्होंने कहा,

“बच्चों के साथ समय बिताना भी मुझे बहुत पसंद है।”


उनकी आवाज में अपनापन था। वह आगे बोलीं,

“घर में हाथ बंटाना भी मुझे अच्छा लगता है।”


लेकिन अगले ही पल उनकी आंखें भर आईं। उन्होंने धीमी आवाज में कहा,

“लेकिन बहू, जब यही सब मेरे प्यार की जगह मेरी कीमत बन जाए, तब बहुत दर्द होता है।”


रिया के आंसू लगातार बह रहे थे।


“मम्मी जी, मुझे माफ कर दीजिए।”


शारदा देवी ने उसकी तरफ देखा।


“तुमने कहा कि मेरी वजह से तुम्हारी मेड के पैसे बच जाते हैं।”


“तुम्हें पता है बहू, एक मां ने अपने बच्चों को पालने में कितने पैसे खर्च किए होंगे?”


रिया ने सिर उठा लिया।


शारदा देवी ने रिया की ओर देखते हुए कहा,

“कभी हिसाब नहीं रखा।”


उन्होंने भावुक होकर कहा,

“मां ने कभी अपने बच्चों से नहीं कहा कि मैंने तुम्हारे लिए इतना किया, अब तुम मुझे इतने पैसे दो।”


फिर दर्द भरी आवाज में बोलीं,

“लेकिन तुमने मेरी कीमत सात हजार रुपये की मेड के हिसाब से लगा दी।”


रिया फूट-फूटकर रो पड़ी।


शारदा देवी ने अपनी आंखें पोंछीं।


“मुझे पैसे नहीं चाहिए बहू।”


“मुझे आराम भी नहीं चाहिए।”


“मैं तो आज भी काम कर सकती हूं।”


“मुझे सिर्फ सम्मान चाहिए।”


उन्होंने धीमी आवाज में कहा,


“जब मैं तुम्हारे लिए खाना बनाऊं तो मेरे हिस्से में दो प्यार भरे शब्द आ जाएं।”


“जब मैं बच्चों को संभालूं तो मुझे यह महसूस हो कि मैं उनकी दादी हूं, मुफ्त की आया नहीं।”


“जब मैं घर में कुछ करूं तो मुझे यह न लगे कि मैं अपने रहने का किराया चुका रही हूं।”


रिया ने हाथ जोड़ दिए।


“मम्मी जी, मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई।”


शारदा देवी उठ खड़ी हुईं।


“गलती?”


रिया ने उनकी ओर देखा।


शारदा देवी ने कहा,

“हां।”


शारदा देवी बोलीं,

“गलती तब होती है जब इंसान अनजाने में किसी को चोट पहुंचा दे।”


शारदा देवी ने दुखी होकर कहा,

“तुमने तो अपनी सहेली के सामने हंसते-हंसते मेरी पूरी जिंदगी का मजाक बना दिया।”


रिया बिल्कुल चुप हो गई।


शारदा देवी कमरे से बाहर जाने लगीं।


दरवाजे तक पहुंचकर वह रुक गईं।


पीछे मुड़े बिना बोलीं,


“एक बात और बहू।”


रिया ने उनकी तरफ देखा।


“तुमने आज मेरे पति की मौत का भी मजाक बना दिया।”


रिया का दिल जैसे धड़कना भूल गया।


“तुमने कहा—‘अच्छा हुआ पापाजी नहीं रहे, वरना दोनों रहते तो मेरी सास सिर्फ उनकी सेवा करतीं।’”


“क्या तुम्हें पता है, तुम्हारे ससुर के जाने के बाद मैंने कितनी रातें अकेले रोकर काटी हैं?”


“जिस आदमी के साथ मैंने अपनी जिंदगी के चालीस साल बिताए, उसके जाने का दुख मेरे लिए कोई सुविधा नहीं था।”


“वह मेरी जिंदगी का आधा हिस्सा थे।”


शारदा देवी की आंखों से आंसू बह निकले।


“तुम्हें उनकी मौत से मेरी जिम्मेदारियां कम होती दिखाई दीं।”


“मुझे उनके जाने से अपनी जिंदगी खाली दिखाई दी थी।”


रिया की आंखें भर आईं।


शारदा देवी ने कहा,


“तुम्हारी जेठानी पूजा ने कभी मुझे अपने घर में जगह देने के लिए मेरे काम का हिसाब नहीं लगाया।”


“उसके घर में दो छोटे बच्चे हैं। खुद की जिंदगी मुश्किल है।”


“फिर भी उसने मुझसे कहा था—‘मम्मी जी, आपका मन जहां करे, आप रहिए। आप किसी एक बेटे की जिम्मेदारी नहीं हैं। आप दोनों बेटों की मां हैं।’”


“उसने कभी यह नहीं कहा कि मैं उसके घर रहूंगी तो उसके काम आऊंगी।”


शारदा देवी ने गहरी सांस ली।


“और मैंने सोचा था कि मेरी दोनों बहुएं अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों मुझे अपना समझती हैं।”


“आज पता चला कि मैं कितनी गलत थी।”


रिया जमीन की ओर देखती रही।


शारदा देवी अपने कमरे में चली गईं।


दरवाजा बंद हो गया।


रिया वहीं बैठी रह गई।


कुछ देर बाद उसे अंदर से सामान खिसकने की आवाज सुनाई दी।


रिया का दिल घबराने लगा।


वह धीरे-धीरे उठी।


दरवाजे तक गई।


अंदर देखा तो शारदा देवी एक बैग में अपने कपड़े रख रही थीं।


रिया घबरा गई।


“मम्मी जी... आप क्या कर रही हैं?”


शारदा देवी ने बिना उसकी ओर देखे कहा,


“जा रही हूं बहू।”


रिया घबराकर बोली,

“कहां?”


शारदा देवी ने शांत स्वर में कहा,

“अपने बड़े बेटे के घर।”


रिया की आंखें फैल गईं।


“लेकिन... अभी?” रिया घबराकर बोली।


“हां।” शारदा देवी ने शांत स्वर में जवाब दिया।


“मम्मी जी, मेरी बात का इतना बुरा मत मानिए।” रिया ने हाथ जोड़ते हुए कहा।


शारदा देवी ने कपड़े तह करते हुए कहा,


“बुरा तो मुझे पहले ही लग चुका है।”


“अब सिर्फ फैसला करना बाकी था।”


उन्होंने अलमारी से अपने पति की एक पुरानी तस्वीर निकाली।


कुछ क्षण उसे देखती रहीं।


फिर तस्वीर को अपने बैग में रख लिया।


रिया दरवाजे पर खड़ी उन्हें देखती रही।


उसे पहली बार एहसास हो रहा था कि जिस इंसान को वह अपने घर की सुविधा समझ रही थी, वह अब उसके घर से जा रहा था।


और इस बार शायद उसे रोकना इतना आसान नहीं होगा।


शारदा देवी ने बैग बंद किया।


फिर रिया की तरफ देखकर बोलीं,


“बहू, तुम्हें मेरी जरूरत थी।”


“लेकिन मुझे तुम्हारे घर में सिर्फ सम्मान की जरूरत थी।”


“और जिस घर में सम्मान नहीं मिले, वहां रोटी भी गले से नीचे नहीं उतरती।”


रिया की आंखों से आंसू बह निकले।


वह उनके पैरों में गिर गई।


“मम्मी जी... मुझे छोड़कर मत जाइए।”


शारदा देवी ने उसके सिर पर हाथ रखा।


“मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जा रही बहू।”


“मैं बस अपने आत्मसम्मान को लेकर जा रही हूं।”


और यही बात रिया के दिल में तीर की तरह उतर गई।


क्योंकि उसे पहली बार समझ आया—


किसी अपने को घर में रखना और किसी अपने को दिल में जगह देना, दोनों एक बात नहीं होती।


शारदा देवी अपना बैग लेकर दरवाजे की ओर बढ़ीं।


लेकिन उन्हें क्या पता था कि उनके जाने के बाद रिया की जिंदगी में ऐसा बदलाव आने वाला है, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी...




शारदा देवी अपना छोटा-सा बैग उठाकर कमरे से बाहर निकलीं।


रिया कुछ कदम पीछे-पीछे चल रही थी।


उसके मुंह से बार-बार एक ही बात निकल रही थी—


“मम्मी जी, मुझे माफ कर दीजिए।”


लेकिन शारदा देवी इस बार नहीं रुकीं।


उन्होंने अपने कमरे के दरवाजे पर एक नजर डाली।


यही वह कमरा था जिसमें उन्होंने पिछले कई महीनों में न जाने कितनी रातें गुजारी थीं।


यहीं बैठकर वह बच्चों के कपड़े तह करती थीं।


यहीं बैठकर कभी अपने पति की पुरानी तस्वीर देखा करती थीं।


और इसी कमरे में बैठकर उन्होंने कई बार रिया के लिए मन ही मन भगवान से प्रार्थना की थी।


“मेरी बहू को हमेशा खुश रखना।”


आज उसी कमरे से वह खाली हाथ नहीं, बल्कि टूटे हुए दिल के साथ जा रही थीं।


रिया ने उनका बैग पकड़ने की कोशिश की।


“मम्मी जी, मैं ले चलती हूं।”


शारदा देवी ने धीरे से कहा,


“नहीं बहू, रहने दो।”


“मैं अपना सामान खुद उठा सकती हूं।”


रिया के हाथ वहीं रुक गए।


इतने में अमित घर आ गया।


उसने मां को हाथ में बैग लिए देखा तो उसके चेहरे का रंग बदल गया।


“मां?”


शारदा देवी ने उसकी ओर देखा।


“आ गए बेटा?”


अमित जल्दी से उनके पास आया।


“आप बैग लेकर कहां जा रही हैं?”


शारदा देवी ने कहा,


“सुमित के घर।”


अमित ने तुरंत रिया की तरफ देखा।


रिया की आंखें झुकी हुई थीं।


अमित समझ गया कि कुछ बहुत बड़ा हुआ है।


“मां, आप कहीं नहीं जाएंगी।”


शारदा देवी ने मुस्कुराकर कहा,


“क्यों बेटा?”


“क्योंकि यह आपका घर है।”


शारदा देवी कुछ पल चुप रहीं।


फिर बोलीं,


“बेटा, घर सिर्फ दीवारों और सामान से नहीं बनता।”


“घर वहां होता है जहां इंसान को लगे कि उसका होना किसी के लिए बोझ नहीं है।”


अमित की आंखें भर आईं।


“मां, रिया से गलती हो गई है।”


शारदा देवी ने शांत स्वर में जवाब दिया,

“मैं जानती हूं।”


अमित ने फिर कहा,

“उसे अपनी गलती का एहसास भी है।”


शारदा देवी ने हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा,

“यह भी जानती हूं।”


अमित कुछ क्षण चुप रहा। फिर बेचैनी से मां से पूछ बैठा,

“फिर आप क्यों जा रही हैं?”


शारदा देवी ने बेटे के सिर पर हाथ रखा।


“क्योंकि बेटा, कुछ बातें सिर्फ ‘माफ कर दो’ कह देने से खत्म नहीं होतीं।”


“दिल को थोड़ा समय चाहिए होता है।”


अमित चुप हो गया।


शारदा देवी ने कहा,


“मैं तुमसे नाराज नहीं हूं।”


फिर रिया की ओर देखकर बोलीं,

“मैं रिया से भी नफरत नहीं करती।”


कुछ पल चुप रहने के बाद उन्होंने कहा,

“लेकिन आज पहली बार मुझे अपने बारे में सोचना है।”


रिया रोते हुए उनके पास आई।


“मम्मी जी, मैं आपके बिना नहीं रह पाऊंगी।”


शारदा देवी ने उसकी तरफ देखा।


“बहू, तुम रह लोगी।”


“जिस तरह मैंने तुम्हारे बिना रहना सीख लिया, तुम भी सीख जाओगी।”


रिया का दिल बैठ गया।


“लेकिन मैं सच में बदल जाऊंगी।”


शारदा देवी ने कहा,


“बदलना मेरे लिए मत।”


“अपने लिए बदलना।”


“और अगर कभी मुझे वापस बुलाना तो यह सोचकर मत बुलाना कि मैं बच्चों को संभाल लूंगी या घर का काम कर दूंगी।”


“मुझे तब बुलाना जब तुम्हें लगे कि तुम्हारे घर में मेरी जगह एक मां की है।”


इतना कहकर शारदा देवी दरवाजे की ओर बढ़ीं।


अमित ने उनका बैग उठाया।


“मैं आपको छोड़कर आता हूं।”


शारदा देवी ने मना नहीं किया।


रिया वहीं खड़ी रह गई।


दरवाजा बंद हुआ।


और पहली बार उसे अपना घर बहुत बड़ा और बहुत खाली लगा।



अमित मां को लेकर बड़े भाई सुमित के घर पहुंचा।


दरवाजा पूजा ने खोला।


मां को देखते ही वह समझ गई कि कुछ हुआ है।


“मम्मी जी?”


शारदा देवी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,


“पूजा बेटा, कुछ दिन तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं।”


पूजा ने तुरंत उनका हाथ पकड़ लिया।


“कुछ दिन क्यों?”


“जब तक आपका मन करे, रहिए।”


सुमित भी कमरे से बाहर आ गया।


मां को देखकर उसके चेहरे पर चिंता आ गई।


“मां, सब ठीक है?”


शारदा देवी ने कहा,


“हां बेटा।”


लेकिन सुमित अपनी मां को अच्छी तरह जानता था।


उसने उनकी आंखों में छिपा दर्द पढ़ लिया।


“मां, सच बताइए।”


शारदा देवी ने सिर हिलाया।


“बेटा, अभी कुछ मत पूछ।”


सुमित ने चुपचाप मां का बैग उठा लिया।


पूजा ने उनके लिए पानी लाकर दिया।


फिर बोली,


“मम्मी जी, आप आराम कीजिए। मैं आपके लिए खाना लगाती हूं।”


शारदा देवी ने कहा,


“मैं बना देती हूं।”


पूजा तुरंत बोली,


“नहीं मम्मी जी।”


शारदा देवी ने हैरानी से पूछा,

“क्यों बहू?”


पूजा मुस्कुराते हुए उनके पास बैठ गई और बोली,

“क्योंकि आज आप सिर्फ मां हैं।”


शारदा देवी हल्का-सा हंसते हुए बोलीं,

“बहू, मैं तो काम करके ही बैठती हूं। खाली बैठना मुझे अच्छा नहीं लगता।”


पूजा मुस्कुराई।


“तो आज मेरी बात मानकर आराम करके देखिए।”


शारदा देवी की आंखों में नमी आ गई।


उन्हें अचानक रिया की कही बात याद आई—


“मेरी सास मेरे लिए किसी लॉटरी से कम नहीं हैं।”


और पूजा की बात सुनकर मन में दूसरी आवाज आई—


“आप सिर्फ मां हैं।”


दो वाक्यों में कितना अंतर था।



उधर रिया घर में अकेली बैठी थी।


अमित भी मां को छोड़कर लौट आया था।


उसने घर में कदम रखा तो रिया उसके सामने आकर खड़ी हो गई।


“मम्मी जी चली गईं?”


अमित ने कोई जवाब नहीं दिया।


वह सीधे अपने कमरे में चला गया।


रिया पीछे-पीछे गई।


“अमित...”


अमित ने पलटकर उसकी ओर देखा और पूछा,

“क्या?”


रिया की आंखों में आंसू आ गए। उसने भर्राई हुई आवाज में कहा,

“मुझसे गलती हो गई।”


अमित ने कहा,


“मुझे पता है।”


रिया ने आंसू पोंछते हुए पूछा,

“क्या मां वापस आएंगी?”


अमित ने कुछ क्षण चुप रहने के बाद कहा,

“मुझे नहीं पता।”


रिया की आंखों में डर उतर आया।


“तुम मुझसे नाराज हो?”


अमित कुछ देर चुप रहा।


फिर बोला,


“रिया, नाराजगी तुमसे नहीं, तुम्हारी सोच से है।”


रिया ने सिर झुका लिया।


“तुम्हें पता है मां ने तुम्हारे बारे में कभी मेरे सामने एक बुरा शब्द नहीं कहा?”


अमित ने आगे कहा,

“जब भी मैं मां से कहता था कि रिया काम में बहुत थक जाती है, मां हमेशा तुम्हारा पक्ष लेती थीं। कहती थीं—‘बहू अभी छोटी है, बच्चों को संभालते-संभालते थक जाती होगी।’”


अमित की आंखें नम हो गईं।


उसने कुछ पल रुककर फिर कहा,

“जब तुम देर से घर आती थीं, तब भी मां कभी तुम्हारे बारे में शिकायत नहीं करती थीं। उल्टा मुझसे कहती थीं—‘उसे आराम करने दो, दिनभर घर और बच्चों में लगी रहती है।’”


अमित ने भावुक होकर कहा,

“और जब तुम बीमार हुई थीं, तब तुम्हें याद भी नहीं होगा कि मां पूरी रात तुम्हारे सिरहाने बैठी रही थीं।”


रिया रोने लगी।


अमित ने कहा,


“और तुमने उनकी कीमत क्या लगाई?”


रिया के पास कोई जवाब नहीं था।



अगले दिन रिया ने खुद घर संभालने की कोशिश की।


बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना था।


एक बच्चा रो रहा था।


दूसरा अपनी किताब नहीं ढूंढ पा रहा था।


रसोई में गैस पर दूध चढ़ा हुआ था।


फोन लगातार बज रहा था।


अमित को ऑफिस के लिए देर हो रही थी।


रिया एक साथ सब संभालने की कोशिश कर रही थी।


अचानक दूध उबलकर नीचे गिर गया।


बच्चे जोर-जोर से रोने लगे।


रिया परेशान होकर चिल्ला पड़ी,


“बस करो!”


फिर अचानक उसे अपनी ही आवाज सुनाई दी।


उसे याद आया—


जब बच्चे रोते थे तो शारदा देवी कभी उन पर नहीं चिल्लाती थीं।


वह उन्हें गोद में उठाकर कहती थीं,


“रो मत बेटा, दादी है ना।”


रिया कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत हो गई।


उसने बच्चों को देखा।


फिर उसकी आंखों से आंसू बह निकले।


“दादी है ना...”


वह बुदबुदाई।


लेकिन आज दादी घर में नहीं थीं।



रिया ने उस दिन पहली बार पूरा खाना खुद बनाया।


दाल कुछ ज्यादा नमकीन थी।


रोटी गोल नहीं बनी।


सब्जी थोड़ी जल गई।


लेकिन उसे उस खाने से ज्यादा अपनी सास के हाथों का साधारण खाना याद आ रहा था।


वह अक्सर खाना खाते समय कह देती थी,


“मम्मी जी, आज नमक थोड़ा ज्यादा हो गया है।”


और शारदा देवी हंसकर कहती थीं,


“अगली बार कम कर दूंगी।”


लेकिन आज रिया को एहसास हुआ कि खाना सिर्फ नमक और मसालों से स्वादिष्ट नहीं होता।


उसमें प्यार भी मिला होता है।


उसने प्लेट में थोड़ा खाना रखा और शारदा देवी की खाली कुर्सी की ओर देखते हुए बैठ गई।


कुछ सेकंड बाद वह उठी।


खाना वापस रसोई में रख दिया।


उसका मन ही नहीं हुआ।



इधर पूजा ने शारदा देवी को खाना परोसा।


“मम्मी जी, थोड़ा और लीजिए।”


शारदा देवी ने हाथ से मना करते हुए कहा,

“बस बेटा।”


पूजा ने उनकी थाली की ओर देखते हुए चिंता से पूछा,

“आपने इतना कम खाया?”


शारदा देवी ने धीमी आवाज में जवाब दिया,

“भूख नहीं है।”


पूजा ने धीरे से पूछा,


“मम्मी जी, क्या रिया से कुछ हुआ है?”


शारदा देवी ने उसकी तरफ देखा।


“तुम्हें कैसे पता?”


पूजा हल्की-सी मुस्कुराई और बोली,

“मां के चेहरे पर लिखी बात बेटी पढ़ लेती है।”


शारदा देवी की आंखें भर आईं।


उन्होंने पूरी बात पूजा को बता दी।


पूजा कुछ देर चुप रही।


फिर बोली,


“मम्मी जी, रिया ने गलत किया है।”


शारदा देवी ने सिर हिलाया।


“हां।”


पूजा ने उनका हाथ पकड़ते हुए कहा,

“लेकिन उसे अपनी गलती सुधारने का एक मौका जरूर दीजिएगा।”


शारदा देवी ने पूछा,


“तुम मुझे वापस भेजना चाहती हो?”


पूजा मुस्कुराई।


शारदा देवी ने कुछ पल चुप रहने के बाद धीरे से जवाब दिया,

“नहीं बेटा।”


पूजा ने हैरानी से पूछा,

“तो फिर आप क्या चाहती हैं, मम्मी जी?”


शारदा देवी ने गहरी सांस ली और बोलीं,

“मैं चाहती हूं कि जब मैं वापस जाऊं तो अपने मन से जाऊं।”


पूजा चुपचाप उनकी ओर देखने लगी।


शारदा देवी ने अपनी आंखों में आए आंसुओं को पोंछते हुए कहा,

“और मैं तभी वापस जाऊंगी, जब मुझे यह महसूस होगा कि वहां मेरी जरूरत ही नहीं, बल्कि मेरी इज्जत भी है।”


शारदा देवी ने पूजा का हाथ पकड़ लिया।


“तुम बहुत समझदार हो।”


पूजा हंस दी।


“मम्मी जी, मैं भी बहू हूं।”


“बस फर्क इतना है कि मैं आपको काम करने वाली नहीं, अपने परिवार की सबसे बड़ी सदस्य समझती हूं।”


शारदा देवी ने उसे गले लगा लिया।



कुछ दिन बीत गए।


रिया हर दिन अपनी सास को फोन करने की सोचती, लेकिन उसे डर लगता।


एक दिन उसने हिम्मत करके फोन किया।


“मम्मी जी?”


दूसरी तरफ से शारदा देवी की शांत आवाज आई,

“हां बहू।”


रिया ने कुछ पल चुप रहने के बाद पूछा,

“आपकी तबीयत कैसी है?”


शारदा देवी ने सहजता से जवाब दिया,

“ठीक हूं।”


रिया ने फिर धीरे से पूछा,

“आपने खाना खाया?”


शारदा देवी ने कहा,

“हां, खा लिया।”


दोनों के बीच खामोशी छा गई।


रिया ने धीरे से कहा,


“मम्मी जी... घर बहुत खाली लगता है।”


शारदा देवी ने पूछा,


“काम ज्यादा हो गया?”


रिया की आंखें भर आईं।


“नहीं।”


“तो?”


रिया बोली,


“आपके बिना घर खाली लगता है।”


दूसरी तरफ कुछ पल सन्नाटा रहा।


शारदा देवी ने कहा,


“बहू, घर में सामान कम होने से घर खाली नहीं लगता।”


“कभी-कभी किसी अपने के चले जाने से लगता है।”


रिया रो पड़ी।


“मैं आपको वापस लाना चाहती हूं।”


शारदा देवी ने शांत आवाज में कहा,


“अभी नहीं बहू।”


“क्यों?”


“क्योंकि मुझे लगता है कि तुम्हें अभी अपने मन से मेरे साथ कुछ दिन बिताने की जरूरत है।”


रिया समझ नहीं पाई।


शारदा देवी ने कहा,


“जब तुम मुझे मेरे काम से नहीं, मेरे रिश्ते से याद करोगी, तब मैं खुद आ जाऊंगी।”


फोन कट गया।


रिया काफी देर तक बैठी रही।


फिर उसने अपने मोबाइल में एक पुराना वीडियो खोला।


वीडियो में उसके दोनों बच्चे शारदा देवी की गोद में बैठे थे।


शारदा देवी उन्हें कहानी सुना रही थीं।


एक बच्चा हंसते हुए कह रहा था,


“दादी, आप हमारे साथ हमेशा रहना।”


शारदा देवी हंसकर कह रही थीं,


“दादी कहीं नहीं जाएगी।”


वीडियो देखते-देखते रिया फूट-फूटकर रोने लगी।


“दादी कहीं नहीं जाएगी...”


उसने मोबाइल सीने से लगा लिया।


लेकिन अब दादी जा चुकी थीं।



कुछ दिनों बाद एक ऐसी घटना हुई जिसने रिया को अंदर तक हिला दिया।


उसका छोटा बेटा अचानक तेज बुखार में तपने लगा।


रिया घबरा गई।


वह उसे डॉक्टर के पास लेकर गई।


डॉक्टर ने दवा लिखी और कहा,


“बच्चे को समय पर दवा देना और रात में ध्यान रखना।”


रिया बच्चे को लेकर घर आई।


रात को बच्चा बार-बार रोने लगा।


रिया उसके पास बैठी रही।


दवा दी।


पानी पिलाया।


माथे पर पट्टी रखी।


लेकिन बच्चा बार-बार एक ही बात कह रहा था,


“दादी को बुलाओ...”


रिया का दिल टूट गया।


“दादी यहां नहीं हैं बेटा।”


बच्चे ने आंखें बंद करते हुए कहा,


“दादी होतीं तो मुझे गोद में लेतीं।”


रिया के पास कोई जवाब नहीं था।


वह उठकर दूसरे कमरे में गई।


अलमारी खोली।


शारदा देवी की एक पुरानी साड़ी बाहर निकाली।


उस साड़ी में अब भी हल्की-सी वही खुशबू थी।


रिया ने उसे सीने से लगा लिया।


और पहली बार उसे समझ आया—


कुछ लोग घर में काम नहीं करते, वे घर में अपनी मौजूदगी से सुकून भरते हैं।


उस रात रिया ने एक फैसला किया।


वह अगले दिन शारदा देवी के पास जाएगी।


लेकिन इस बार उन्हें वापस लाने के लिए नहीं।


उनसे सच में माफी मांगने के लिए।


उसे नहीं पता था कि शारदा देवी उसे माफ करेंगी या नहीं।


लेकिन वह पहली बार अपनी सास को पाने नहीं, अपने रिश्ते को बचाने जा रही थी।


और शायद इसी मुलाकात में उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा सच उसके सामने आने वाला था...



रिया ने अगले दिन अपना काम जल्दी-जल्दी निपटाया।


बच्चों को तैयार किया। पति अमित को फोन करके बताया कि वह सुमित भैया के घर जा रही है।


अमित ने पूछा,


“अकेली जाओगी?”


रिया ने कहा,


“हां।”


अमित ने चिंतित होकर पूछा, “मां से बात करने?”


रिया कुछ पल चुप रही।


फिर बोली,


“हां... लेकिन इस बार उन्हें वापस लाने की जिद नहीं करूंगी।”


अमित ने पूछा,


“तो?”


रिया की आवाज भर्रा गई।


“बस उनके सामने बैठकर दिल की बात कहूंगी।”


अमित ने कुछ नहीं कहा।


बस इतना बोला,


“जाओ रिया। शायद मां तुम्हारा इंतजार कर रही हों।”



रिया जब सुमित के घर पहुंची तो दरवाजे पर पूजा मिली।


रिया को देखते ही पूजा मुस्कुराई।


“आओ रिया।”


रिया ने झिझकते हुए पूछा,


“मम्मी जी हैं?”


पूजा ने प्यार से जवाब दिया,

“हां रिया, मम्मी जी अपने कमरे में हैं।”


रिया कुछ कदम आगे बढ़ी, फिर रुक गई।


उसे अचानक डर लगने लगा।


कुछ दिन पहले तक वह इसी घर में सहजता से आती-जाती थी।


आज उसे लग रहा था जैसे वह किसी परीक्षा देने आई हो।


पूजा ने उसका हाथ पकड़ लिया।


“डर क्यों रही हो?”


रिया की आंखें भर आईं।


“क्योंकि मुझे पता नहीं मम्मी जी मुझे माफ करेंगी या नहीं।”


पूजा ने कहा,


“माफी मांगने वाला इंसान अगर सच में बदल गया हो, तो मां का दिल ज्यादा देर नाराज नहीं रह सकता।”


रिया ने धीरे से सिर हिलाया।


वह कमरे में गई।


शारदा देवी पलंग पर बैठी थीं और हाथ में अपने पति की पुरानी तस्वीर लिए हुए थीं।


रिया दरवाजे पर खड़ी रही।


शारदा देवी ने उसे देख लिया।


“आओ बहू।”


रिया धीरे-धीरे उनके पास गई।


कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन आवाज नहीं निकली।


फिर अचानक वह उनके पैरों में बैठ गई।


“मम्मी जी... मुझे माफ कर दीजिए।”


शारदा देवी ने तुरंत उसके कंधे पर हाथ रखा।


“उठो बहू।”


लेकिन रिया उठी नहीं।


“नहीं मम्मी जी।”


“आज मुझे बोलने दीजिए।”


“उस दिन आपने मुझे बहुत कुछ कहा, लेकिन मैं जानती हूं कि आपने उससे भी ज्यादा सहा।”


“मैंने आपकी जिंदगी के इतने सालों का अपमान कुछ शब्दों में कर दिया।”


“मैंने आपके प्यार को आपके काम से तौल दिया।”


“मैंने यह तक कह दिया कि आप मेरे लिए मेड के पैसे बचाने का जरिया हैं।”


शारदा देवी की आंखें नम हो गईं।


रिया ने कहा,


“मम्मी जी, उस दिन अगर मैं अपनी सहेली से झूठ बोलती, तो शायद मुझे इतना दुख नहीं होता।”


“लेकिन मैंने जो कहा था, वह सच था।”


“मेरे मन में सच में ऐसी ही सोच आ गई थी।”


“और इसी बात की मुझे सबसे ज्यादा शर्म आती है।”


शारदा देवी ने धीरे से कहा,


“बहू, अपनी गलती स्वीकार करने में बहुत हिम्मत लगती है।”


रिया ने आंसू पोंछे।


“मुझे लगा था कि आप मेरे घर के काम आती हैं।”


“लेकिन अब समझ आया कि आप मेरे घर में प्यार लाती थीं।”


“मुझे लगता था कि आप बच्चों को संभालती हैं तो मेरा काम बचता है।”


“लेकिन अब समझ आया कि बच्चों को सिर्फ संभालना और उन्हें दादी का प्यार देना, दोनों अलग बातें हैं।”


“मुझे लगता था कि आप खाना बनाती हैं तो मुझे आराम मिलता है।”


“लेकिन अब समझ आया कि आपके हाथ के खाने में सिर्फ मसाले नहीं, आपका प्यार मिला होता था।”


शारदा देवी चुपचाप सुनती रहीं।


रिया ने उनका हाथ पकड़ लिया।


“मम्मी जी, मुझे उस दिन की एक बात सबसे ज्यादा चुभती है।”


“कौन सी?”


“जब आपने कहा था कि आपको रोटी से ज्यादा सम्मान चाहिए।”


शारदा देवी ने उसकी तरफ देखा।


रिया बोली,


“उस दिन मुझे लगा था कि आप गुस्से में कह रही हैं।”


“लेकिन अब समझ आया कि आप सच कह रही थीं।”


“जिस इंसान ने पूरी जिंदगी परिवार के लिए गुजार दी हो, उसे बुढ़ापे में अगर अपने ही घर में अपनी कीमत साबित करनी पड़े, तो उससे बड़ा दुख क्या होगा?”


शारदा देवी की आंखों से आंसू बह निकले।


उन्होंने रिया को अपने पास बैठा लिया।


“बहू, मैं तुमसे नाराज जरूर थी।”


“लेकिन तुमसे नफरत कभी नहीं कर पाई।”


रिया उनके कंधे से लग गई।


“क्यों?”


शारदा देवी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,


“क्योंकि मां अपने बच्चे की गलती से दुखी होती है, लेकिन उसके सुधरने की उम्मीद कभी नहीं छोड़ती।”


रिया फूट-फूटकर रो पड़ी।



तभी शारदा देवी ने अपने पास रखी एक पुरानी डायरी उठाई।


“बहू, तुम्हें कुछ दिखाना है।”


उन्होंने डायरी खोली।


कई पन्नों पर तारीखें लिखी थीं।


रिया ने पूछा,


“ये क्या है?”


शारदा देवी ने कहा,


“कुछ बातें लिखती थी।”


एक पन्ने पर लिखा था—


‘आज रिया बहुत थकी हुई थी। बच्चों को मैंने संभाल लिया। भगवान से प्रार्थना है कि मेरी बहू हमेशा खुश रहे।’


दूसरे पन्ने पर लिखा था—


‘आज रिया की तबीयत खराब थी। रात में उसके सिर पर तेल लगाया। काश, मेरी बेटी होती तो भी मैं यही करती।’


एक और पन्ने पर लिखा था—


‘आज रिया किटी पार्टी में गई थी। बच्चे मेरे पास बहुत खुश थे। भगवान उसे हमेशा खुश रखे।’


रिया के हाथ कांपने लगे।


“मम्मी जी... आपने ये सब लिखा था?”


शारदा देवी ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया,

“हां बहू, मैंने ही लिखा था।”


रिया ने हैरानी से पूछा,

“लेकिन क्यों मम्मी जी?”


शारदा देवी ने रिया की आंखों में देखते हुए कहा,

“क्योंकि मैं तुम्हें अपनी बेटी मानती थी।”


रिया ने डायरी बंद कर दी।


उसके पास अब रोने के अलावा कुछ नहीं था।


वह शारदा देवी के गले लग गई।


“मम्मी जी, मैं आपकी बेटी बनने के लायक नहीं थी।”


शारदा देवी ने कहा,


“बेटी बनने के लिए लायक होना जरूरी नहीं होता।”


“बस दिल में जगह होनी चाहिए।”


रिया ने कहा,


“अब मेरे दिल में आपके लिए हमेशा जगह रहेगी।”



उसी समय बाहर से पूजा की आवाज आई,


“मम्मी जी, चाय रख दूं?”


शारदा देवी ने कहा,


“हां बेटा।”


रिया ने तुरंत कहा,


“मैं बनाती हूं।”


पूजा ने मुस्कुराकर कहा,


“आज तुम बनाओगी?”


रिया ने हंसते हुए कहा,


“हां।”


वह रसोई में गई।


चाय बनाई।


कप लेकर वापस आई।


सबने साथ बैठकर चाय पी।


रिया बार-बार शारदा देवी को देख रही थी।


उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि कुछ ही महीने पहले वह इसी महिला को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रही थी।


और आज वही महिला उसे बिना कोई सवाल पूछे फिर से अपनी बेटी की तरह अपने पास बैठाए थी।



चाय के बाद रिया ने कहा,


“मम्मी जी, मेरे साथ घर चलिए।”


शारदा देवी ने पूछा,


“क्यों?”


रिया मुस्कुराई।


“क्योंकि मेरा घर आपका इंतजार कर रहा है।”


“बच्चे भी।”


फिर उसने धीरे से कहा,


“और मैं भी।”


शारदा देवी ने कहा,


“लेकिन इस बार एक बात याद रखना।”


“क्या?”


“मैं तुम्हारे घर वापस जाऊंगी, लेकिन तुम्हारे काम करने के लिए नहीं।”


रिया ने तुरंत कहा,


“आपको कोई काम नहीं करना पड़ेगा।”


शारदा देवी हल्का-सा मुस्कुराईं और बोलीं,

“और अगर मैं अपनी इच्छा से काम करूं?”


रिया ने उनका हाथ पकड़ते हुए कहा,

“तो भी मैं आपको कभी काम वाली की नजर से नहीं देखूंगी। आप मेरी सास हैं, मेरे बच्चों की दादी हैं और मेरे लिए परिवार का सबसे जरूरी हिस्सा हैं।”


शारदा देवी मुस्कुरा दीं।


“और अगर कभी मैं खाना नहीं बनाना चाहूं?”


रिया ने मुस्कुराकर जवाब दिया,

“तो उस दिन मैं खाना बनाऊंगी।”


शारदा देवी ने अगला सवाल किया,

“अगर बच्चों को नहीं संभालना चाहूं?”


रिया ने तुरंत कहा,

“तो मैं संभालूंगी।”


शारदा देवी ने प्यार से उसकी ओर देखते हुए पूछा,

“अगर कभी मेरा मन सिर्फ बैठकर टीवी देखने का हो?”


रिया हंसते हुए बोली,


“तो आप टीवी देखिएगा और मुझे भी अपने पास बैठाइएगा।”


शारदा देवी की आंखों में चमक आ गई।


“तब चलती हूं।”


रिया ने तुरंत उनके पैर छू लिए।



जब दोनों घर पहुंचीं तो बच्चे दरवाजे की तरफ दौड़े।


“दादी!”


शारदा देवी ने दोनों बच्चों को अपनी बाहों में भर लिया।


बच्चे उनसे लिपट गए।


“दादी, आप कहां चली गई थीं?”


शारदा देवी ने उन्हें चूमते हुए कहा,


“दादी तो यहीं थी।”


छोटे बच्चे ने मासूमियत से पूछा,


“फिर घर क्यों नहीं थीं?”


शारदा देवी कुछ बोल नहीं पाईं।


रिया ने बच्चे को अपनी गोद में लिया और कहा,


“दादी को हमसे नाराजगी हो गई थी।”


बच्चे ने तुरंत पूछा,


“किससे?”


रिया ने शारदा देवी की ओर देखा।


“मुझसे।”


शारदा देवी ने रिया की ओर देखा।


रिया ने कहा,


“लेकिन अब सब ठीक है।”


बच्चे ने खुश होकर कहा,


“अब दादी कहीं नहीं जाएंगी ना?”


शारदा देवी ने रिया की तरफ देखा।


रिया ने आगे बढ़कर उनका हाथ पकड़ लिया।


“नहीं।”


“अब दादी कहीं नहीं जाएंगी।”



कुछ दिनों बाद रिया ने अपनी वही सहेली नेहा को फोन किया।


नेहा ने पूछा,


“अरे, तेरी सास वापस आ गईं?”


रिया ने मुस्कुराकर कहा,


“हां।”


“फिर तो तेरी मौज हो गई होगी।”


रिया कुछ पल चुप रही।


फिर बोली,


“नहीं नेहा।”


“अब मेरी मौज नहीं हुई।”


“अब मेरा घर पूरा हुआ है।”


नेहा चुप हो गई।


रिया ने आगे कहा,


“जिस इंसान को मैं कभी अपने काम की चीज समझती थी, आज वही मेरे लिए परिवार की सबसे जरूरी सदस्य है।”


“मुझे समझ आ गया है कि किसी बुजुर्ग की कीमत उसके काम से नहीं होती।”


“वह खाना बनाए तो उसकी कीमत नहीं बढ़ती।”


“वह आराम करे तो उसकी कीमत कम नहीं होती।”


“वह बच्चों को संभाले तो वह आया नहीं बन जाती।”


“और अगर वह कुछ न करे, सिर्फ घर में बैठी रहे, तब भी वह उतनी ही कीमती है।”


नेहा ने धीरे से कहा,


“रिया, तू सच में बदल गई है।”


रिया मुस्कुराई।


“क्योंकि मुझे बहुत देर से समझ आया कि मां की कीमत कभी काम से नहीं लगाई जाती।”



शारदा देवी अब पहले की तरह घर के छोटे-मोटे काम कर लेती थीं।


लेकिन रिया ने उनकी जिम्मेदारियां बांट दी थीं।


कभी वह खुद खाना बनाती।


कभी अमित रसोई में हाथ बंटाता।


बच्चों की पढ़ाई रिया खुद करवाती।


और अगर शारदा देवी अपने मन से कुछ बना देतीं तो रिया सबसे पहले उनके पास जाकर कहती,


“मम्मी जी, आपने बहुत अच्छा बनाया।”


शारदा देवी हंसकर कहतीं,


“सच?”


रिया जवाब देती,


“हां, और ये बात मैं दिल से कह रही हूं।”


एक दिन शारदा देवी ने पूछा,


“बहू, तुम्हें मेरी पुरानी बात याद है?”


“कौन सी?”


“मैंने कहा था कि मुझे खाना नहीं, सम्मान चाहिए।”


रिया ने मुस्कुराकर कहा,


“अब समझ गई हूं।”


“क्या?”


रिया ने उनका हाथ पकड़कर कहा,


“रोटी पेट भरती है।”


“लेकिन सम्मान दिल भरता है।”


शारदा देवी ने बहू को अपने सीने से लगा लिया।



इस कहानी की सबसे बड़ी सीख यही है—


घर में रहने वाला बुजुर्ग अगर आपके बच्चों को संभालता है, खाना बनाता है या घर के छोटे-मोटे काम करता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह आपके घर में अपने रहने की कीमत चुका रहा है।


वह अगर कुछ करता है तो अक्सर प्यार से करता है, मजबूरी से नहीं।


इसलिए उसके काम का हिसाब मत रखिए।


उसके साथ बिताए समय का हिसाब रखिए।


क्योंकि पैसा देकर नौकर रखा जा सकता है, खाना बनवाया जा सकता है, बच्चों की देखभाल करवाई जा सकती है।


लेकिन—


मां का हाथ सिर पर रखने के लिए कोई पैसा काफी नहीं होता।


बुजुर्गों को उम्र के आखिरी पड़ाव पर सबसे ज्यादा जरूरत दवा की नहीं, अपनेपन की होती है।


और कभी किसी अपने को यह मत महसूस होने दीजिए कि—


“मैं इस घर में इसलिए हूं क्योंकि मैं काम आती हूं।”


उसे महसूस होने दीजिए—


“मैं इस घर में इसलिए हूं क्योंकि मैं इस परिवार का हिस्सा हूं।”


क्योंकि जिस दिन घर के बुजुर्ग यह महसूस करने लगें कि उनकी जरूरत सिर्फ उनके काम तक है, उस दिन घर में लोग तो बहुत होते हैं...


लेकिन परिवार खत्म हो जाता है।



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