उम्र की शाम
सुबह की हल्की धूप खिड़की के पर्दों से छनकर कमरे में आ रही थी।
रसोई से चाय की खुशबू पूरे घर में फैल रही थी।
मीता ने दो कप चाय बनाई और एक कप लेकर धीरे-धीरे जगत बाबू के कमरे की ओर बढ़ी।
दरवाजा थोड़ा खुला हुआ था।
उसने अंदर झाँका तो जगत बाबू बिस्तर पर चुपचाप लेटे हुए थे। एक बाँह आँखों पर रखी थी।
मीता कुछ पल दरवाजे पर खड़ी उन्हें देखती रही।
वह पिछले कुछ दिनों से अपने ससुर में आया यह बदलाव देख रही थी।
पहले सुबह छह बजे से पहले ही उनकी आवाज पूरे घर में सुनाई देने लगती थी।
कभी अखबार के पन्ने पलटने की आवाज आती, कभी रेडियो पर पुराने गीत बजते और कभी वह बरामदे में बैठकर किसी पड़ोसी से हँसते हुए बातें करते दिखाई देते।
लेकिन अब...
वह घंटों कमरे में चुपचाप बैठे रहते।
मीता ने धीरे से आवाज दी।
“पापा... चाय।”
जगत बाबू ने कोई जवाब नहीं दिया।
मीता ने पास जाकर फिर कहा,
“पापा...”
वह अचानक चौंककर उठ बैठे।
उन्होंने जल्दी से आँखें पोंछीं और मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोले,
“अरे... मीता! तुम कब आई?”
मीता ने चाय का कप उनकी ओर बढ़ाते हुए कहा,
“अभी आई हूँ। लेकिन आप तो ऐसे लेटे हैं जैसे रात भर सोए ही नहीं।”
जगत बाबू ने नजरें चुराते हुए चाय का कप हाथ में ले लिया और धीमे से बोले,
“नहीं... ऐसी कोई बात नहीं है।”
मीता ने उनकी तरफ देखा और पास पड़ी कुर्सी खींचकर बैठ गई।
“पापा, एक बात पूछूँ?”
जगत बाबू ने चाय की चुस्की लेते हुए उसकी ओर देखा और बोले,
“पूछो बिटिया।”
मीता ने चिंतित स्वर में कहा,
“जब से आप रिटायर हुए हैं, आप बहुत बदल गए हैं।”
जगत बाबू चुप रहे।
“पहले आप सुबह उठते ही अखबार लेकर बरामदे में बैठ जाते थे। शर्मा अंकल आते थे तो घंटों बहस करते थे। कभी राजनीति, कभी क्रिकेट और कभी मोहल्ले की सड़क...”
जगत बाबू के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।
मीता ने आगे कहा,
“लेकिन अब न अखबार में मन लगता है, न टीवी में, न किसी से बात करने में। आखिर बात क्या है?”
“कुछ नहीं बिटिया,” जगत बाबू ने नजरें झुकाते हुए कहा।
“पापा, मुझे बहू मत समझिए... बेटी समझकर बताइए,” मीता ने उनका हाथ थामते हुए प्यार से कहा।
जगत बाबू ने उसकी तरफ देखा।
कुछ पल तक वह कुछ बोल नहीं पाए।
फिर धीमी आवाज में बोले,
“क्या बताऊँ मीता?”
“जो मन में है, पापा। मुझसे कहिए।” मीता ने प्यार से उनका हाथ थामते हुए कहा।
उन्होंने गहरी साँस ली।
“नौकरी में था तो जिंदगी की अपनी एक रफ्तार थी। सुबह तैयार होना, ऑफिस जाना, कर्मचारियों से मिलना, काम देखना... कोई परेशानी लेकर आता था तो समाधान निकालना... किसी को डाँटना, किसी की मदद करना...”
वह थोड़ी देर रुके।
“तब लगता था कि मैं जरूरी हूँ।”
मीता चुपचाप सुनती रही।
“ऑफिस में लोग मेरी बात सुनते थे। मेरी राय पूछते थे। सम्मान मिलता था। घर लौटता था तो शारदा दरवाजे पर मिल जाती थी।”
उनकी आवाज भर्रा गई।
“अब शारदा भी नहीं है।”
कमरे में कुछ पल के लिए बिल्कुल शांति छा गई।
मीता ने धीरे से उनका हाथ पकड़ लिया।
जगत बाबू बोले,
“नौकरी चली गई... शारदा चली गई... बच्चे अपनी जिंदगी में व्यस्त हैं। शरीर पहले जैसा साथ नहीं देता। सुबह उठकर सोचता हूँ कि आज क्या करना है... फिर शाम हो जाती है।”
उन्होंने खिड़की के बाहर देखते हुए कहा,
“कभी-कभी लगता है कि अब जिंदगी में बचा ही क्या है?”
मीता की आँखें भी नम हो गईं।
लेकिन उसने खुद को संभाला।
वह कुर्सी से उठकर उनके सामने बैठ गई।
“पापा,” मीता ने प्यार से कहा।
“हाँ?” जगत बाबू ने उसकी ओर देखते हुए पूछा।
“आपसे एक बात कहूँ?” मीता ने संकोच से कहा।
“कहो,” जगत बाबू ने धीमी आवाज में जवाब दिया।
“आप बहुत गलत सोच रहे हैं,” मीता ने गंभीरता से कहा।
जगत बाबू ने आश्चर्य से उसे देखा।
मीता बोली,
“आप कहते हैं कि नौकरी खत्म हो गई, इसलिए जिंदगी खत्म हो गई। मम्मी नहीं हैं, इसलिए खुशियाँ खत्म हो गईं। शरीर ढल रहा है, इसलिए आगे कुछ नहीं बचा।”
वह मुस्कुराई।
“लेकिन पापा... आपने यह कब तय कर लिया कि जिंदगी का मतलब सिर्फ नौकरी और जिम्मेदारियाँ हैं?”
जगत बाबू चुप रहे।
“आपने पूरी जिंदगी दूसरों के लिए काम किया। बच्चों को पढ़ाया, घर बनाया, मम्मी का साथ दिया, रिश्तेदारों की मदद की। अब पहली बार जिंदगी ने आपको थोड़ा समय दिया है तो आप उसे दुख में क्यों खर्च कर रहे हैं?”
जगत बाबू उसकी तरफ देखते रहे।
मीता ने कहा,
“शाम का समय दिन का अंत जरूर होता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि शाम खूबसूरत नहीं होती।”
वह मुस्कुराई।
“शाम में ही तो आसमान सबसे सुंदर रंग बदलता है। शाम में ही घरों के दीये जलते हैं। शाम में ही लोग काम से लौटकर परिवार के साथ बैठते हैं।”
जगत बाबू के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।
मीता ने कहा,
“तो आपकी जिंदगी में भी शाम आई है पापा... लेकिन यह अंत की शाम नहीं है। यह तो आपके अपने लिए जीने की शाम है।”
जगत बाबू कुछ नहीं बोले।
मीता ने अचानक पूछा,
“वैसे पापा... एक बात बताइए।”
“क्या?”
जगत बाबू ने उसकी ओर देखते हुए कहा।
“वो पुराना हारमोनियम कहाँ है?”
मीता ने उत्सुकता से पूछा।
जगत बाबू चौंक गए।
जगत बाबू ने हैरानी से उसकी ओर देखा और बोले,
“हारमोनियम?”
मीता मुस्कुराते हुए बोली,
“हाँ।”
जगत बाबू ने पूछा,
“क्यों?”
मीता ने सहजता से जवाब दिया,
“बस यूँ ही... ऐसे ही पूछ रही हूँ।”
जगत बाबू कुछ पल सोचते रहे, फिर बोले,
“अलमारी के ऊपर रखा है शायद।”
मीता तुरंत उठी।
“अच्छा!”
वह कमरे से बाहर निकल गई।
जगत बाबू उसे जाते हुए देखते रहे।
कुछ देर बाद बाहर से उसकी आवाज आई,
“अरे बाप रे!”
जगत बाबू ने पूछा, “क्या हुआ?”
मीता हँसते हुए बोली, “इतनी धूल!”
जगत बाबू हँस पड़े।
“कहा था न, उसे रहने दो।”
मीता हारमोनियम लेकर कमरे में आई।
उसने उसे मेज पर रखा और कपड़े से साफ करने लगी।
“पापा, आपने बताया था न कि शादी से पहले आप बहुत अच्छा हारमोनियम बजाते थे?”
जगत बाबू ने मुस्कुराते हुए कहा,
“अच्छा नहीं... बहुत अच्छा बजाता था।”
“ओहो!”
मीता ने आँखें बड़ी कर लीं।
मीता ने आँखें बड़ी करते हुए कहा, “इतना घमंड?”
“घमंड नहीं, सच है,” जगत बाबू हँसते हुए बोले।
मीता ने मुस्कुराकर कहा, “तो फिर आज परीक्षा होगी।”
जगत बाबू ने हैरानी से पूछा, “मेरी?”
“जी,” मीता ने शरारत से कहा।
जगत बाबू ने सिर हिलाया।
जगत बाबू ने हारमोनियम की ओर देखते हुए धीमी आवाज में कहा,
“अब उँगलियाँ पहले जैसी नहीं रहीं।”
मीता मुस्कुराई और प्यार से बोली,
“उँगलियाँ नहीं रही होंगी, लेकिन दिल तो वही है न?”
यह बात सीधे उनके दिल में उतर गई।
उन्होंने धीरे से हारमोनियम अपनी ओर खींचा।
कुछ देर तक उसकी कुंजियों को देखते रहे।
फिर एक कुंजी दबाई।
कमरे में एक हल्की सी धुन गूँजी।
जगत बाबू की आँखें अचानक नम हो गईं।
“यह वही हारमोनियम है,” उन्होंने धीमे से कहा।
“मम्मी जी के साथ बजाते थे?”
उन्होंने सिर हिलाया।
“शारदा गाती थी... मैं बजाता था।”
मीता ने मुस्कुराते हुए कहा,
“फिर आज भी बजाइए।”
जगत बाबू कुछ पल हारमोनियम को देखते रहे। उनकी आँखों में पुरानी यादें उतर आईं। फिर भारी आवाज में बोले,
“उसके बिना... फिर मन ही नहीं करता।”
वह रुक गए।
मीता ने धीरे से कहा,
“मम्मी जी को संगीत पसंद था न?”
जगत बाबू ने कुछ पल चुप रहने के बाद धीमे से कहा,
“बहुत पसंद था बेटा।”
मीता ने प्यार से उनकी ओर देखते हुए पूछा,
“फिर उनकी याद में आपने संगीत बजाना क्यों छोड़ दिया?”
जगत बाबू ने कोई जवाब नहीं दिया।
मीता मुस्कुराई।
“आज शाम को घर में छोटी सी महफिल होगी।”
जगत बाबू ने हैरानी से उसकी ओर देखा और पूछा, “कौन आएगा?”
मीता ने सहजता से जवाब दिया, “जो भी आपको प्यार करता है।”
जगत बाबू कुछ सोचते हुए बोले, “लेकिन तैयारी?”
मीता ने तुरंत कहा, “वह मेरी जिम्मेदारी।”
जगत बाबू ने पूछा, “रवि?”
मीता मुस्कुराई और बोली, “उसे भी मैं समझा दूँगी।”
जगत बाबू ने पहली बार खुलकर मुस्कुराया।
“तुम सच में बहुत जिद्दी हो।”
मीता हँसते हुए बोली,
“आपकी बहू हूँ पापा... कुछ तो आपके बेटे की तरह जिद्दी होना ही पड़ेगा।”
दोनों हँस पड़े।
शाम होते-होते घर का माहौल ही बदल गया।
मीता ने बरामदे में कुर्सियाँ लगाईं।
रसोई में पकौड़े तलने शुरू किए।
रवि ऑफिस से लौटा तो दरवाजे पर ही रुक गया।
“माँ...”
फिर उसे याद आया कि माँ तो अब नहीं थीं।
उसने आवाज बदली,
“मीता! यह सब क्या हो रहा है?”
मीता रसोई से बाहर आई।
“आज पापा की संगीत सभा है।”
रवि ने आश्चर्य से पूछा,
“क्या?”
मीता ने हँसते हुए कहा,
“हाँ।”
रवि ने अंदर कमरे की ओर देखते हुए पूछा,
“लेकिन पापा?”
मीता ने मुस्कुराकर जवाब दिया,
“वही तो मुख्य कलाकार हैं।”
रवि कुछ बोल पाता, उससे पहले अंदर से हारमोनियम की आवाज सुनाई दी।
वह कमरे में गया।
जगत बाबू हारमोनियम के सामने बैठे थे।
कई साल बाद उनकी उँगलियाँ उसी पुराने आत्मविश्वास से सुरों पर चल रही थीं।
रवि दरवाजे पर खड़ा रह गया।
“पापा...”
जगत बाबू ने सिर उठाया।
“आ गया?”
रवि ने कमरे और बरामदे की ओर देखते हुए पूछा,
“पापा, आप... यह सब क्या कर रहे हैं?”
जगत बाबू ने मुस्कुराकर मीता की ओर इशारा किया और हँसते हुए बोले,
“तुम्हारी पत्नी ने मजबूर किया है।”
मीता ने दूर से कहा,
“झूठ बोल रहे हैं!”
रवि हँस पड़ा।
थोड़ी देर में शर्मा अंकल, वर्मा जी और पास-पड़ोस के दो-तीन पुराने मित्र भी आ गए।
बरामदे में चाय रखी गई।
पकौड़ों की खुशबू फैल गई।
फिर शर्मा अंकल बोले,
“जगत, बहुत साल हो गए तुम्हें गाते सुने।”
जगत बाबू मुस्कुराए।
“आज मेरी बहू ने पुरानी बीमारी फिर से जगा दी।”
मीता बोली,
“बीमारी नहीं पापा... इलाज।”
सब हँस पड़े।
जगत बाबू ने हारमोनियम पर हाथ रखा।
कुछ क्षण आँखें बंद कीं।
फिर एक पुराना गीत शुरू किया।
उनकी आवाज पहले थोड़ी काँपी।
लेकिन कुछ पंक्तियों के बाद आवाज में वही पुरानी मिठास लौट आई।
मीता चुपचाप उन्हें देखती रही।
रवि की आँखें भी भर आईं।
उसे पहली बार महसूस हुआ कि उसके पिता सिर्फ उसके पिता नहीं थे।
उनकी भी अपनी एक दुनिया थी।
अपने सपने थे।
अपनी पसंद थी।
अपना संगीत था।
और शायद वह दुनिया जिम्मेदारियों के नीचे कहीं दब गई थी।
गीत खत्म हुआ तो कुछ पल तक कोई नहीं बोला।
फिर शर्मा अंकल ने तालियाँ बजाईं।
बाकी सभी भी तालियाँ बजाने लगे।
जगत बाबू मुस्कुराए।
उनकी आँखों में आँसू थे।
लेकिन इस बार वे आँसू दुख के नहीं थे।
मीता उनके पास जाकर बोली,
“कैसा लगा?”
उन्होंने धीरे से कहा,
“बहुत समय बाद लगा कि मैं अभी जिंदा हूँ।”
मीता की आँखें नम हो गईं।
उस रात खाना खाने के बाद रवि अपने पिता के कमरे में गया।
“पापा।”
“हाँ बेटा,” जगत बाबू ने उसकी ओर देखते हुए जवाब दिया।
रवि कुछ पल चुपचाप अपने पिता को देखता रहा। फिर मुस्कुराते हुए बोला,
“आज आपने बहुत अच्छा गाया।”
जगत बाबू के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
“तुम्हें पसंद आया?” उन्होंने उत्सुकता से पूछा।
“बहुत,” रवि ने तुरंत कहा।
कुछ देर चुप रहने के बाद रवि बोला,
“पापा... मुझे माफ कर दीजिए।”
जगत बाबू ने चौंककर पूछा,
“किस बात के लिए?”
उन्होंने पूछा।
रवि ने नजरें झुका लीं।
“मैं समझ ही नहीं पाया कि आप अकेले हो रहे हैं।”
जगत बाबू ने बेटे के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा,
“अरे... इसमें तुम्हारी क्या गलती?”
रवि की आवाज भर्रा गई।
“मैं अपने काम में इतना व्यस्त हो गया कि मैंने कभी बैठकर आपसे पूछा ही नहीं कि आपका दिन कैसे गुजरता है।”
जगत बाबू ने बेटे के कंधे पर हाथ रखा।
“बेटा, जिंदगी सबकी अपनी परेशानियों से भरी है।”
रवि ने धीरे से कहा,
“लेकिन अब ऐसा नहीं होगा, पापा।”
रवि ने कहा,
“हम हर रविवार शाम को साथ बैठेंगे।”
जगत बाबू ने मुस्कुराते हुए पूछा,
“और अगर मैं न बैठा तो?”
रवि हँसते हुए बोला,
“तो मीता आपको पकड़कर ले आएगी।”
दरवाजे के बाहर खड़ी मीता तुरंत बोली,
“बिल्कुल!”
तीनों हँस पड़े।
अगले दिन से जगत बाबू की जिंदगी धीरे-धीरे बदलने लगी।
सुबह वह फिर अखबार पढ़ने लगे।
दोपहर में पुराने मित्रों को फोन करने लगे।
कभी किसी बच्चे को मुफ्त में गणित पढ़ा देते।
कभी पड़ोस के बुजुर्गों के साथ बैठते।
और हर रविवार शाम उनके घर में संगीत की छोटी सी महफिल होने लगी।
कभी कोई भजन गाता।
कभी कोई पुराना गीत।
कभी चाय के साथ सिर्फ बातें होतीं।
लेकिन जगत बाबू अब अकेले नहीं बैठते थे।
एक दिन मीता ने उनसे पूछा,
“पापा, अब जिंदगी कैसी लगती है?”
जगत बाबू ने मुस्कुराकर कहा,
“पहले लगता था जिंदगी की शाम आ गई है।”
“अब?”
उन्होंने हारमोनियम पर हाथ फेरते हुए कहा,
“अब लगता है... शाम तो आई है, लेकिन साथ में बहुत सारे दीपक भी लेकर आई है।”
मीता मुस्कुराई।
जगत बाबू ने आगे कहा,
“मैं समझ गया हूँ कि रिटायरमेंट नौकरी से होता है, जिंदगी से नहीं।”
मीता ने पूछा, “और अकेलापन?”
जगत बाबू ने कहा, “वह भी हमेशा दूसरों के चले जाने से नहीं आता।”
उन्होंने मीता की तरफ देखा।
“कभी-कभी हम खुद अपनी दुनिया के दरवाजे बंद कर लेते हैं।”
मीता ने धीरे से कहा,
“और उन्हें खोलने के लिए?”
जगत बाबू मुस्कुराए।
“किसी एक मीता जैसी बहू की जरूरत होती है।”
“अच्छा!”
मीता ने नकली गुस्सा दिखाया।
“तो अब सारी जिम्मेदारी मेरी?”
जगत बाबू हँस पड़े।
“नहीं बिटिया... अब मेरी जिम्मेदारी मेरी है।”
उन्होंने हारमोनियम खोला।
“आज शाम कौन सा गीत सुनोगी?”
मीता ने मुस्कुराकर कहा,
“जो मम्मी जी को पसंद था।”
जगत बाबू कुछ पल चुप रहे।
फिर उनकी आँखों में एक चमक आई।
उन्होंने हारमोनियम पर उँगलियाँ रखीं और धीरे-धीरे सुर छेड़ दिए।
बरामदे में बैठी मीता चाय बनाने चली गई।
रसोई में पकौड़ों की खुशबू फैलने लगी।
बाहर शाम उतर रही थी।
आसमान सुनहरा हो रहा था।
और उस घर में, जहाँ कभी एक बूढ़े आदमी को लगता था कि उसकी जिंदगी खत्म हो चुकी है...
वहीं अब हर शाम एक नया गीत जन्म लेने लगा था।
क्योंकि उम्र की शाम जिंदगी का अंत नहीं होती।
कभी-कभी वही शाम इंसान को पहली बार अपने लिए जीना सिखाती है।

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