माँ तो माँ होती है
जिस माँ ने जन्म नहीं दिया, उसी ने माँ होने का हर फर्ज निभाया...
“मैं तुमसे शादी करने के लिए तैयार हूँ, राजेश… लेकिन मेरी एक शर्त है।”
कमरे में बैठे राजेश ने सामने बैठी सुनीता की ओर देखा।
सुनीता की आँखों में गंभीरता थी।
राजेश ने धीरे से पूछा, “कैसी शर्त?”
सुनीता ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा, “तुम्हारा बेटा मोहित… वह मेरे लिए सिर्फ तुम्हारा बेटा नहीं रहेगा। अगर मैं इस घर में आऊँगी, तो वह मेरा बेटा होगा। मैं नहीं चाहती कि उसे कभी यह महसूस हो कि उसकी माँ इस दुनिया में नहीं है।”
राजेश की आँखें नम हो गईं।
उसने धीरे से कहा, “सुनीता, मोहित अभी सिर्फ आठ महीने का है। उसकी माँ उसे जन्म देने के बाद ही हमें छोड़कर चली गई। मैंने उसे अपनी गोद में उठाकर जितना रोया है, उतना शायद जिंदगी में कभी नहीं रोया। लेकिन मैं जानता हूँ कि एक पिता माँ की कमी पूरी नहीं कर सकता।”
सुनीता ने उसकी बात बीच में ही रोक दी।
“तो फिर मुझसे एक वादा कीजिए।”
“क्या?”
“मोहित को कभी यह मत बताइएगा कि मैं उसकी सौतेली माँ हूँ।”
राजेश कुछ पल तक उसे देखता रहा।
फिर उसने अपना हाथ आगे बढ़ाकर कहा, “वादा।”
सुनीता ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“और एक बात…”
“हाँ?”
“घर में कोई भी उसे मेरे बारे में ऐसी बात नहीं बताएगा, जिससे उसके मन में यह सवाल उठे कि मैं उसकी असली माँ नहीं हूँ।”
राजेश ने सिर हिला दिया।
“मैं सबको समझा दूँगा।”
कुछ दिनों बाद राजेश और सुनीता की शादी हो गई।
सुनीता जब पहली बार दुल्हन बनकर उस घर में आई, तो उसकी नजर सबसे पहले पालने में सो रहे छोटे से मोहित पर पड़ी।
वह धीरे-धीरे उसके पास गई।
मोहित नींद में कुनमुनाया।
सुनीता ने उसे गोद में उठा लिया।
उस छोटे से बच्चे ने नींद में ही अपना चेहरा सुनीता के सीने से लगा दिया।
सुनीता की आँखों से आँसू निकल पड़े।
उसने उसके माथे को चूमते हुए कहा,
“आज से तू मेरा बेटा है।”
उस दिन सुनीता ने केवल राजेश की पत्नी बनने का रिश्ता नहीं अपनाया था।
उसने एक माँ बनने की जिम्मेदारी अपने दिल से स्वीकार की थी।
समय धीरे-धीरे बीतता गया।
मोहित बड़ा होने लगा।
सुनीता उसके लिए सुबह सबसे पहले उठती।
उसका दूध बनाती।
उसे नहलाती।
स्कूल के लिए तैयार करती।
रात में उसके साथ बैठकर पढ़ाती।
जब मोहित बीमार पड़ता, तो सुनीता पूरी रात उसके सिरहाने बैठी रहती।
एक बार मोहित को तेज बुखार हो गया।
राजेश ने कहा, “सुनीता, तुम थोड़ी देर सो जाओ। मैं बैठता हूँ।”
सुनीता ने बच्चे के माथे पर पानी की पट्टी रखते हुए कहा,
“आप पिता हैं, राजेश… लेकिन मैं माँ हूँ। माँ को अपने बच्चे का बुखार देखकर नींद नहीं आती।”
राजेश चुप हो गया।
उसने उस रात पहली बार महसूस किया कि सुनीता ने मोहित को केवल अपनाया नहीं था, बल्कि उसके साथ अपना पूरा जीवन जोड़ दिया था।
मोहित जब स्कूल जाने लगा तो एक दिन उसने अपनी कॉपी पर लिखे सवाल का जवाब सुनीता से पूछा।
“माँ, यह कैसे होगा?”
सुनीता मुस्कुराई।
“पहले खुद कोशिश कर।”
मोहित ने कोशिश की, लेकिन उत्तर गलत हो गया।
वह नाराज होकर बोला, “मुझसे नहीं होगा।”
सुनीता ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
“बेटा, गलती होने से कोई छोटा नहीं होता। कोशिश छोड़ देने से इंसान छोटा हो जाता है।”
मोहित ने फिर कोशिश की।
इस बार उत्तर सही था।
वह खुशी से उछल पड़ा।
“माँ! हो गया!”
सुनीता की आँखें चमक उठीं।
उसने कहा,
“मैंने कहा था न, मेरा बेटा कर सकता है।”
मोहित ने दौड़कर उसे गले लगा लिया।
राजेश दरवाजे पर खड़ा यह दृश्य देख रहा था।
उसने मन ही मन कहा,
“हे भगवान, मेरी जिंदगी में इससे अच्छी माँ मेरे बेटे के लिए नहीं आ सकती थी।”
वर्ष बीतते गए।
मोहित कॉलेज जाने लगा।
अब वह अपनी माँ का बहुत ध्यान रखता था।
सुबह घर से निकलने से पहले कहता,
“माँ, दवा खा लेना।”
शाम को लौटते हुए पूछता,
“माँ, आज आपने खाना खाया था या फिर मेरा इंतजार करती रहीं?”
सुनीता हँसकर कहती,
“तू बड़ा हो गया है या मेरी माँ बन गया है?”
मोहित मुस्कुराकर कहता,
“आपने मुझे पाला है, तो थोड़ा अधिकार तो बनता है।”
माँ-बेटे का रिश्ता देखकर पड़ोस की महिलाएँ भी कहतीं,
“ऐसा बेटा भाग्य वालों को मिलता है।”
लेकिन सुनीता हमेशा कहती,
“नहीं, मुझे ऐसा बेटा मिला है, इसलिए मैं भाग्यशाली हूँ।”
समय ने एक और मोड़ लिया।
मोहित की नौकरी लग गई।
घर में खुशी का माहौल था।
कुछ ही महीनों बाद उसकी शादी की बात चलने लगी।
एक दिन रिश्तेदारों की मौजूदगी में मोहित की शादी की तारीख तय हो गई।
सुनीता की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था।
वह शादी की तैयारियों में दिन-रात लगी रहती।
कभी कपड़ों की खरीदारी करती।
कभी रिश्तेदारों की सूची बनाती।
कभी बहू के लिए गहने देखती।
राजेश हँसकर कहता,
“इतना उत्साह तो शायद मोहित को भी नहीं है।”
सुनीता मुस्कुराकर कहती,
“माँ का बेटा शादी करता है तो माँ को खुशी होगी ही।”
शादी से कुछ दिन पहले घर में पूजा रखी गई।
सभी रिश्तेदार इकट्ठा हुए।
पंडित जी पूजा की तैयारी कर रहे थे।
तभी राजेश की दूर की रिश्तेदार कमला बुआ ने अचानक कहा,
“अरे सुनीता, पूजा में मोहित की माँ के नाम से भी तो साड़ी और कुछ कपड़े रखे जाएंगे न?”
सुनीता के हाथ वहीं रुक गए।
कमरे में अचानक खामोशी छा गई।
मोहित भी वहीं खड़ा था।
उसने आश्चर्य से पूछा,
“बुआजी, मेरी माँ के नाम से?”
कमला बुआ ने सहजता से कहा,
“हाँ बेटा, तुम्हारी माँ के नाम से।”
मोहित ने तुरंत सुनीता की ओर देखा।
“लेकिन मेरी माँ तो ये हैं।”
उसके इतना कहते ही कमरे में बैठे सभी लोगों के चेहरे उतर गए।
सुनीता के हाथ काँपने लगे।
मोहित उसकी ओर बढ़ा।
“माँ, बुआजी किसकी बात कर रही हैं?”
सुनीता ने खुद को संभालते हुए उसके सिर पर हाथ रखा।
“बेटा, बुआजी पूजा की पुरानी परंपरा की बात कर रही हैं। बस इतनी सी बात है।”
मोहित ने कमला बुआ की ओर देखा।
फिर सुनीता की ओर।
उसने धीरे से कहा,
“लेकिन मेरी माँ तो आप ही हैं।”
सुनीता ने उसे गले लगा लिया।
“हाँ बेटा… मैं हूँ।”
उसने यह बात तो कह दी, लेकिन उसके भीतर डर बैठ गया।
उसे लगा कि तीस साल से संभालकर रखा हुआ एक सच कहीं उसके बेटे को उससे दूर न कर दे।
मोहित की शादी धूमधाम से हो गई।
वह अपनी पत्नी रिया को लेकर घर आया।
सुनीता ने नई बहू का स्वागत ऐसे किया जैसे कोई अपनी बेटी को घर में ला रही हो।
रिया भी कुछ ही दिनों में सुनीता से बहुत घुल-मिल गई।
एक दिन रिया ने सुनीता से कहा,
“माँ, आप मोहित का इतना ध्यान रखती हैं कि मुझे तो लगता है वह आज भी आपके लिए वही छोटा बच्चा है।”
सुनीता हँस पड़ी।
“माँ के लिए बेटा कभी बड़ा नहीं होता।”
रिया ने मुस्कुराकर कहा,
“सच कहा आपने।”
लेकिन शादी के कुछ ही समय बाद राजेश की तबीयत अचानक खराब रहने लगी।
पहले कमजोरी हुई।
फिर डॉक्टर ने जाँच के बाद बताया कि उन्हें गंभीर बीमारी है और लंबे इलाज की जरूरत पड़ेगी।
मोहित टूट गया।
वह पिता के इलाज के लिए हर संभव कोशिश करने लगा।
सुनीता दिन-रात अस्पताल के चक्कर लगाने लगी।
एक रात अस्पताल में राजेश ने मोहित को अपने पास बुलाया।
“बेटा…”
“जी पापा।”
“अगर कभी मैं…”
राजेश की आवाज रुक गई।
मोहित ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।
“पापा, ऐसी बातें मत कीजिए।”
राजेश की आँखों में आँसू आ गए।
“बस मेरी एक बात मानना।”
“कहिए।”
“अपनी माँ का हमेशा ध्यान रखना।”
मोहित ने कहा,
“आपको मुझे यह कहने की जरूरत नहीं है। माँ मेरे लिए सबसे जरूरी हैं।”
राजेश ने आँखें बंद कर लीं।
लेकिन उसके दिल में वर्षों से दबा एक सच करवट ले रहा था।
कुछ दिनों बाद डॉक्टर ने राजेश को घर पर आराम करने की सलाह दी।
एक दोपहर राजेश ने मोहित से कहा,
“बेटा, ऊपर वाली अलमारी से मेरी पुरानी फाइल निकाल देना।”
मोहित कमरे में गया।
उसने अलमारी खोली।
फाइल निकालते समय ऊपर रखा एक पुराना डिब्बा नीचे गिर गया।
डिब्बे के साथ एक फोटो फ्रेम भी नीचे गिरा।
काँच टूट गया।
मोहित ने झुककर तस्वीर उठाई।
तस्वीर में एक युवा महिला थी।
उसकी गोद में छोटा सा बच्चा था।
मोहित कुछ पल तक तस्वीर को देखता रहा।
फिर कमरे में आकर उसने पूछा,
“पापा…”
राजेश ने उसकी ओर देखा।
मोहित ने तस्वीर आगे कर दी।
“ये कौन हैं?”
राजेश के चेहरे का रंग उड़ गया।
उसकी आँखें भर आईं।
मोहित ने फिर पूछा,
“पापा, ये कौन हैं?”
राजेश के पास अब कोई जवाब नहीं था।
तीस साल से छुपा हुआ सच आज उसके सामने खड़ा था।
उसने काँपती आवाज में कहा,
“बेटा… यह तुम्हारी जन्म देने वाली माँ है।”
मोहित के हाथ से तस्वीर छूटते-छूटते बची।
वह कुछ पल तक बिल्कुल चुप रहा।
फिर उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
“तो… माँ?”
राजेश चुप रहा।
मोहित की आवाज काँप गई।
“पापा, मेरी माँ कौन है?”
राजेश ने सिर झुका लिया।
“जिसे तू माँ कहकर तीस साल से बुलाता आया है… वह सुनीता ही है।”
मोहित की आँखें भर आईं।
वह तुरंत सुनीता के कमरे की ओर भागा।
सुनीता पूजा की थाली सजा रही थी।
मोहित ने उसके पास जाकर तस्वीर उसके सामने रख दी।
“माँ…”
सुनीता के हाथ से थाली गिर गई।
मोहित ने रोते हुए पूछा,
“माँ, क्या यह सच है?”
सुनीता की आँखों से आँसू बहने लगे।
उसने कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन आवाज नहीं निकली।
मोहित ने उसके दोनों हाथ पकड़ लिए।
“बोलिए माँ… यह झूठ है न?”
सुनीता रो पड़ी।
“बेटा…”
“नहीं माँ! मुझे बताइए कि यह झूठ है।”
सुनीता ने उसे सीने से लगा लिया।
मोहित बच्चे की तरह रोने लगा।
“आपने मुझे क्यों नहीं बताया?”
सुनीता उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली,
“क्योंकि मैं डरती थी कि कहीं सच जानकर तू मुझे माँ कहना बंद न कर दे।”
मोहित और जोर से रो पड़ा।
“मैं आपको कैसे माँ कहना बंद कर सकता हूँ?”
सुनीता ने कहा,
“मैंने तुझे जन्म नहीं दिया बेटा… लेकिन तूने मुझे माँ होने का अधिकार दिया। तेरी पहली साँस से लेकर आज तक मैंने तुझे अपने बच्चे की तरह नहीं, अपने बच्चे से भी बढ़कर चाहा है।”
मोहित कुछ नहीं बोल पाया।
वह सुनीता की गोद में सिर रखकर फूट-फूटकर रोता रहा।
कुछ देर बाद उसने सिर उठाया।
“माँ, एक बात पूछूँ?”
“पूछ बेटा।”
“क्या आपने मेरी वजह से अपना बच्चा नहीं किया था?”
सुनीता की आँखें भर आईं।
“हाँ।”
मोहित स्तब्ध रह गया।
सुनीता बोली,
“मैं चाहती थी कि तेरे दिल में कभी यह सवाल न आए कि मेरे और तेरे बीच कोई फर्क है। इसलिए मैंने अपनी जिंदगी की सारी खुशियाँ तेरे नाम कर दीं।”
मोहित की आँखों से आँसू बहते रहे।
“माँ… आपने मुझे पाने के लिए अपना सब कुछ खो दिया।”
सुनीता ने मुस्कुराकर कहा,
“नहीं बेटा। मैंने कुछ नहीं खोया। मुझे तू मिल गया था।”
तभी पीछे से राजेश की आवाज आई।
“मोहित…”
मोहित ने मुड़कर देखा।
राजेश की आँखों में पश्चाताप था।
“बेटा, मुझे माफ कर दे। मैंने सोचा था सच छुपाकर मैं तुम्हें दुख से बचा रहा हूँ।”
मोहित कुछ पल पिता को देखता रहा।
फिर उनके पास जाकर उनके पैर पकड़ लिए।
“पापा, गलती आपकी नहीं थी।”
राजेश रो पड़ा।
“लेकिन मैंने तुमसे तुम्हारी सच्चाई छुपाई।”
मोहित ने कहा,
“आपने मुझे सच्चाई देर से बताई… लेकिन माँ ने मुझे पूरी जिंदगी सच में प्यार दिया है।”
उसने सुनीता की ओर देखा।
“मेरे लिए माँ वही हैं जिन्होंने मेरे बचपन की रातें जागकर काटीं, मेरी पहली स्कूल ड्रेस तैयार की, मेरी हर हार पर मुझे संभाला, मेरी हर जीत पर सबसे ज्यादा खुशी मनाई और आज भी मेरे लिए दुआ करती हैं।”
सुनीता की आँखों से आँसू बह रहे थे।
मोहित उसके पास गया और उसके पैरों में बैठ गया।
“माँ, अगर दुनिया मुझसे पूछे कि मेरी माँ कौन है, तो मैं सिर्फ आपका नाम लूँगा।”
सुनीता ने उसे उठाकर गले लगा लिया।
अगले दिन मोहित ने घर में सब रिश्तेदारों को बुलाया।
कमला बुआ भी आईं।
मोहित उनके सामने खड़ा हुआ।
उसने कहा,
“बुआजी, कुछ दिन पहले आपने पूजा में मेरी माँ के नाम से कपड़े रखने की बात कही थी।”
कमला बुआ चुप रहीं।
मोहित ने कहा,
“तब मैं आपकी बात समझ नहीं पाया था। आज समझ गया हूँ।”
कमला बुआ ने सिर झुका लिया।
मोहित ने सुनीता का हाथ पकड़ लिया।
“लेकिन मैं एक बात साफ करना चाहता हूँ। जिसने मुझे जन्म दिया, वह मेरी जन्मदात्री हैं और मैं उनका सम्मान हमेशा करूँगा। लेकिन जिसने मुझे जीना सिखाया, जिसने मेरे लिए अपनी जिंदगी बदल दी, जिसने मुझे कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि मैं अकेला हूँ… वह मेरी माँ हैं।”
घर में सन्नाटा था।
मोहित की आवाज भर्रा गई।
“माँ सिर्फ वह नहीं होती जो बच्चे को जन्म देती है। माँ वह भी होती है जो बच्चे को अपना जीवन दे देती है।”
रिया आगे बढ़ी और सुनीता के गले लग गई।
“माँ, आज से मुझे भी आपसे एक बात सीखनी है।”
सुनीता ने पूछा,
“क्या?”
रिया ने कहा,
“माँ बनना जन्म देने से नहीं, दिल से होता है।”
सुनीता की आँखें भर आईं।
राजेश ने हाथ जोड़कर ऊपर देखा।
उसके चेहरे पर वर्षों बाद सुकून था।
कुछ महीनों बाद राजेश की तबीयत पहले से बेहतर होने लगी।
एक शाम पूरा परिवार छत पर बैठा था।
मोहित ने अपनी माँ के हाथ में चाय का कप रखते हुए कहा,
“माँ, अब आप आराम किया करो।”
सुनीता मुस्कुराई।
“क्यों?”
“क्योंकि अब आपकी सेवा करने की बारी मेरी है।”
सुनीता ने पूछा,
“और अपनी पत्नी की?”
मोहित हँस पड़ा।
“आप दोनों मेरी माँ हैं… एक ने मुझे जन्म दिया, दूसरी ने मुझे जीवन दिया।”
रिया ने मुस्कुराकर कहा,
“और मैं?”
मोहित ने मजाक में कहा,
“आप दोनों की शिकायतें सुनने के लिए हैं।”
सब हँस पड़े।
सुनीता ने मोहित के सिर पर हाथ रखा।
उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन इस बार वे दुख के नहीं थे।
वह मन ही मन बोली,
“भगवान, मैंने तुझे जन्म नहीं दिया था… लेकिन तूने मेरी ममता को कभी अधूरा नहीं होने दिया।”
मोहित ने माँ की गोद में सिर रख दिया।
तीस साल पहले जिस बच्चे को सुनीता ने पहली बार अपनी गोद में उठाकर अपना बेटा माना था, आज वही बेटा दुनिया के सामने उसे अपनी माँ कहकर गर्व कर रहा था।
रिश्ते खून से बन सकते हैं, लेकिन उन्हें सच्चा प्यार ही बनाता है।
और माँ…
माँ वह नहीं जो केवल बच्चे को जन्म दे, माँ वह है जो बच्चे के लिए खुद को भूल जाए।

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