बेटी के संस्कार
जिस बेटी को माँ का दर्द नहीं दिखा, वह बहू बनकर क्या निभाएगी?
“मुझे लड़की बहुत पसंद है, लेकिन शादी से पहले मैं उसके घर को एक बार अपनी आँखों से देखना चाहता हूँ।”
राकेशचंद्र जी ने अपने बेटे विवेक से यह बात कही तो विवेक ने मुस्कुराकर कहा, “पिताजी, आपने लड़की को देखा है, परिवार को भी देखा है। फिर इतनी चिंता क्यों कर रहे हैं?”
राकेशचंद्र जी ने गंभीर होकर जवाब दिया, “बेटा, शादी सिर्फ दो लोगों का रिश्ता नहीं होती। शादी दो परिवारों को जोड़ती है। लड़की का स्वभाव, उसके संस्कार और अपने माता-पिता के प्रति उसका व्यवहार बहुत कुछ बताता है।”
राकेशचंद्र जी शहर के जाने-माने अधिवक्ता थे। उम्र लगभग साठ वर्ष थी। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी मेहनत और ईमानदारी से बिताई थी। उनकी पत्नी सुशीला देवी घर को संभालती थीं और उनका बेटा विवेक एक अच्छी नौकरी करता था।
विवेक के लिए रिश्ता सीमा नाम की लड़की का आया था। सीमा पढ़ी-लिखी, सुंदर और अच्छे परिवार से थी। उसके पिता महेशचंद्र जी सरकारी विभाग से सेवानिवृत्त थे। परिवार की आर्थिक स्थिति भी ठीक थी।
रिश्ता लेकर आए लोगों ने सीमा की बहुत तारीफ की थी।
“हमारी बेटी बहुत समझदार है।”
“घर के सभी लोगों का सम्मान करती है।”
“बड़ों की सेवा करना जानती है।”
“बहुत शांत स्वभाव की है।”
इन बातों से राकेशचंद्र जी को भी लड़की पसंद आई थी।
लेकिन उनके मन में एक बात थी।
वह अपनी होने वाली बहू को केवल सुंदर और पढ़ी-लिखी नहीं देखना चाहते थे। वह चाहते थे कि उनके घर आने वाली लड़की रिश्तों की कीमत समझे।
उन्होंने महेशचंद्र जी से कहा था, “समधी जी, मुझे आपकी बेटी पसंद है। लेकिन मैं चाहता हूँ कि शादी से पहले मैं आपके घर दो-तीन बार बिना किसी खास तैयारी के आऊँ। मैं आपके परिवार को सामान्य रूप में देखना चाहता हूँ।”
महेशचंद्र जी हँसकर बोले, “इसमें पूछने की क्या बात है? आपका घर है, जब मन करे आइए।”
राकेशचंद्र जी ने मुस्कुराकर कहा, “बस यही अपनापन चाहिए।”
राकेशचंद्र जी पहली बार महेशचंद्र जी के घर पहुँचे।
दरवाजे पर सीमा की छोटी बहन पायल बैठी मोबाइल चला रही थी। कमरे में सीमा का छोटा भाई रोहित टीवी देख रहा था।
राकेशचंद्र जी ने पूछा, “बेटा, पापा घर पर हैं?”
रोहित ने टीवी से नजर हटाए बिना कहा, “जी, अंदर होंगे।”
राकेशचंद्र जी अंदर गए।
वहाँ उन्होंने देखा कि सीमा की माँ कमला देवी रसोई में अकेली खाना बना रही थीं।
कमला देवी ने उन्हें देखते ही कहा, “अरे समधी जी! आप अचानक आ गए? मुझे खबर भी नहीं हुई।”
राकेशचंद्र जी बोले, “मैं बस महेशचंद्र जी से मिलने चला आया था। आप अपना काम कीजिए।”
कमला देवी ने जल्दी से चाय बनाई और उनके सामने रख दी।
राकेशचंद्र जी ने चाय पीते हुए घर को ध्यान से देखा।
सीमा सोफे पर बैठी अपने फोन में व्यस्त थी।
उसने राकेशचंद्र जी को देखा और उठकर नमस्ते जरूर किया।
राकेशचंद्र जी ने मुस्कुराकर कहा, “खुश रहो बेटी।”
सीमा फिर बैठ गई।
कमला देवी रसोई में भाग-दौड़ करती रहीं।
कभी गैस पर रखी सब्जी देखतीं, कभी आटा गूँथतीं, कभी पानी भरतीं।
राकेशचंद्र जी ने पूछा, “बहन जी, घर में कोई आपकी मदद नहीं करता?”
कमला देवी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “अरे नहीं-नहीं, बच्चे हैं। पढ़ाई और दूसरे काम में लगे रहते हैं। मैं कर लेती हूँ।”
राकेशचंद्र जी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
कुछ देर बाद वह महेशचंद्र जी से मिलकर अपने घर लौट आए।
घर पहुँचते ही सुशीला देवी ने पूछा, “कैसा लगा परिवार?”
राकेशचंद्र जी ने कहा, “परिवार ठीक लगा। लेकिन मैंने एक बात देखी।”
सुशीला देवी ने पूछा, “क्या?”
राकेशचंद्र जी बोले, “घर में कमला जी अकेली काम कर रही थीं और बाकी लोग अपने-अपने काम में लगे थे।”
सुशीला देवी ने कहा, “हो सकता है उस दिन घर में काम ज्यादा रहा हो।”
राकेशचंद्र जी ने सिर हिलाया।
“हो सकता है। इसलिए मैंने कुछ तय नहीं किया।”
कुछ सप्ताह बीत गए।
राकेशचंद्र जी एक जरूरी कागज देने के बहाने फिर महेशचंद्र जी के घर पहुँचे।
दरवाजा पायल ने खोला।
“अंकल, पापा अंदर हैं।”
राकेशचंद्र जी अंदर चले गए।
उन्होंने देखा कि कमला देवी हाथ में झाड़ू लेकर पूरे घर की सफाई कर रही थीं।
एक कमरे में रोहित किताब खोलकर बैठा था, लेकिन उसके सामने मोबाइल चल रहा था।
पायल बालों में तेल लगा रही थी।
और सीमा अपने कमरे में बिस्तर पर आराम से सो रही थी।
राकेशचंद्र जी कुछ पल वहीं खड़े रहे।
कमला देवी ने उन्हें देखकर झाड़ू एक तरफ रख दी।
“अरे समधी जी, आप फिर आ गए?”
राकेशचंद्र जी बोले, “हाँ बहन जी, महेशचंद्र जी से कुछ जरूरी बात करनी थी।”
कमला देवी ने कहा, “आप बैठिए, मैं उन्हें बुलाती हूँ।”
राकेशचंद्र जी ने कहा, “आप रहने दीजिए। मैं खुद चला जाता हूँ।”
महेशचंद्र जी आए और दोनों कुछ देर बातें करते रहे।
कमला देवी ने सबके लिए खाना लगाया।
राकेशचंद्र जी ने देखा कि खाना परोसने से लेकर पानी देने तक का काम कमला देवी ही कर रही थीं।
सीमा कुछ देर बाद कमरे से बाहर आई।
उसने कहा, “माँ, मेरे लिए खाना कमरे में रख देना।”
कमला देवी ने कहा, “बेटी, यहीं बैठकर खा ले।”
सीमा ने जवाब दिया, “माँ, मुझे सिर में दर्द है। मैं कमरे में खा लूँगी।”
कमला देवी ने उसकी बात मान ली।
राकेशचंद्र जी चुपचाप सब देखते रहे।
खाना खाने के बाद उन्होंने महेशचंद्र जी से कहा, “मैं चलता हूँ।”
महेशचंद्र जी बोले, “इतनी जल्दी?”
राकेशचंद्र जी ने मुस्कुराकर कहा, “कुछ काम भी है।”
वह घर लौट आए।
सुशीला देवी ने फिर पूछा, “आज क्या देखा?”
राकेशचंद्र जी कुछ क्षण चुप रहे।
फिर बोले, “आज भी कमला जी ही पूरे घर का काम कर रही थीं।”
सुशीला देवी ने कहा, “सीमा शायद बीमार होगी।”
राकेशचंद्र जी बोले, “हाँ, हो सकता है।”
फिर उन्होंने बात वहीं खत्म कर दी।
कुछ दिनों बाद राकेशचंद्र जी को एक और काम से महेशचंद्र जी के घर जाना पड़ा।
इस बार उन्होंने किसी को पहले से सूचना नहीं दी।
घर का दरवाजा खुला था।
उन्होंने अंदर प्रवेश किया तो देखा कि कमला देवी फर्श पर बैठकर कपड़े धो रही थीं।
उनके हाथ साबुन से लाल हो चुके थे।
पास में कपड़ों का बड़ा ढेर रखा था।
पायल टीवी देख रही थी।
रोहित अपने दोस्तों से फोन पर बात कर रहा था।
और सीमा आईने के सामने बैठकर अपने नाखूनों पर नेलपेंट लगा रही थी।
राकेशचंद्र जी दरवाजे के पास खड़े होकर कुछ देर तक सब देखते रहे।
कमला देवी ने उन्हें देखा तो घबराकर उठने की कोशिश की।
“अरे समधी जी! आप कब आए?”
राकेशचंद्र जी ने कहा, “आप बैठी रहिए बहन जी। हाथ मत धोइए।”
कमला देवी ने कपड़े एक तरफ रख दिए।
सीमा ने भी राकेशचंद्र जी को देखा और उठकर नमस्ते किया।
राकेशचंद्र जी ने पूछा, “बेटी, तुम्हारी माँ कपड़े धो रही हैं?”
सीमा ने सहजता से कहा, “जी अंकल, माँ को आदत है घर का काम करने की।”
राकेशचंद्र जी ने पूछा, “तुम मदद नहीं करती?”
सीमा थोड़ी असहज हुई।
फिर बोली, “करती हूँ अंकल, लेकिन आज थोड़ा तैयार होना था।”
राकेशचंद्र जी ने उसके हाथों की तरफ देखा।
“अच्छा।”
उन्होंने आगे कुछ नहीं कहा।
महेशचंद्र जी आए।
उन्होंने राकेशचंद्र जी का स्वागत किया।
कुछ देर बातचीत हुई।
राकेशचंद्र जी ने चाय पी और वापस अपने घर चले गए।
रास्ते भर उनके चेहरे पर गंभीरता थी।
घर पहुँचकर सुशीला देवी ने पूछा, “क्या हुआ? आज बहुत परेशान लग रहे हो।”
राकेशचंद्र जी कुर्सी पर बैठ गए।
उन्होंने कहा, “सुशीला, मैंने फैसला कर लिया है।”
सुशीला देवी ने पूछा, “कैसा फैसला?”
राकेशचंद्र जी बोले, “विवेक और सीमा का रिश्ता हमें आगे नहीं बढ़ाना चाहिए।”
सुशीला देवी कुछ पल चुप रहीं।
फिर उन्होंने पूछा, “लेकिन क्यों? लड़की तो पढ़ी-लिखी है, सुंदर है और परिवार भी अच्छा है।”
राकेशचंद्र जी ने शांत स्वर में कहा, “मुझे सुंदर पत्नी नहीं चाहिए, मुझे विवेक के लिए समझदार जीवनसाथी चाहिए।”
सुशीला देवी बोलीं, “लेकिन केवल इस वजह से रिश्ता तोड़ना ठीक है क्या?”
राकेशचंद्र जी ने कहा, “मैंने सीमा को एक दिन नहीं, तीन अलग-अलग मौकों पर देखा है।”
“पहली बार उसकी माँ खाना बना रही थीं और वह आराम से बैठी थी।”
“दूसरी बार उसकी माँ घर में झाड़ू लगा रही थीं और सीमा सो रही थी।”
“तीसरी बार उसकी माँ कपड़े धो रही थीं और सीमा अपने नाखून सजा रही थी।”
सुशीला देवी ने कहा, “लेकिन हो सकता है सीमा से कभी-कभी ही काम कराया जाता हो।”
राकेशचंद्र जी बोले, “मुझे काम करने वाली बहू नहीं चाहिए। मैं घर में नौकरानी भी नहीं ढूँढ़ रहा हूँ।”
“मुझे तो केवल इतनी उम्मीद है कि अगर किसी दिन घर की माँ थकी हुई हो, तो बेटी खुद उठकर कहे—‘माँ, आप बैठो, मैं कर देती हूँ।’”
“जो बेटी अपनी माँ की थकान नहीं समझती, वह शादी के बाद किसी दूसरी औरत की थकान कितनी समझेगी?”
सुशीला देवी चुप हो गईं।
राकेशचंद्र जी ने आगे कहा, “मुझे सबसे ज्यादा दुख इस बात का है कि कमला जी ने शायद अपनी बेटी को बहुत प्यार दिया। लेकिन उस प्यार में उन्होंने उसे जिम्मेदारी सिखाना भूल गईं।”
अगले दिन राकेशचंद्र जी ने महेशचंद्र जी को फोन किया।
“समधी जी, मुझे आपसे एक जरूरी बात करनी है।”
महेशचंद्र जी ने पूछा, “जी, कहिए।”
राकेशचंद्र जी ने कहा, “हम यह रिश्ता आगे नहीं बढ़ा पाएँगे।”
महेशचंद्र जी को जैसे विश्वास ही नहीं हुआ।
“लेकिन अचानक ऐसा क्या हो गया?”
राकेशचंद्र जी ने कहा, “अचानक कुछ नहीं हुआ। मैंने तीन बार आपके घर जाकर एक ही बात देखी।”
महेशचंद्र जी ने चिंतित होकर पूछा, “क्या बात?”
राकेशचंद्र जी बोले, “आपकी पत्नी घर का पूरा काम करती हैं। लेकिन आपकी बेटी उनके साथ खड़ी नहीं होती।”
महेशचंद्र जी कुछ देर चुप रहे।
फिर उन्होंने कहा, “आप कहना क्या चाहते हैं?”
राकेशचंद्र जी ने शांत स्वर में कहा, “मैं यह नहीं कह रहा कि बहू को घर के सारे काम करने चाहिए। मैं सिर्फ इतना कह रहा हूँ कि उसे घर के काम और रिश्तों की जिम्मेदारी समझनी चाहिए।”
“अगर मेरी पत्नी किसी दिन बीमार पड़े और बहू कहे कि यह मेरा काम नहीं है, तो मेरा घर कैसे चलेगा?”
“अगर आपकी बेटी अपनी माँ के हाथों की थकान नहीं देख पा रही, तो वह मेरी पत्नी की थकान कैसे देखेगी?”
महेशचंद्र जी की आवाज धीमी हो गई।
“आपको लगता है मेरी बेटी संस्कारी नहीं है?”
राकेशचंद्र जी ने कहा, “मैं आपकी बेटी को बुरा नहीं कह रहा। मैं कह रहा हूँ कि शायद हमने बेटियों को अधिकार तो बहुत दिए, लेकिन जिम्मेदारी सिखाना भूल गए।”
महेशचंद्र जी ने फोन रख दिया।
उन्होंने सीमा को अपने कमरे में बुलाया।
“सीमा, राकेशचंद्र जी ने रिश्ता मना कर दिया है।”
सीमा के चेहरे का रंग बदल गया।
“क्या?”
कमला देवी भी वहीं खड़ी थीं।
सीमा ने पूछा, “क्यों?”
महेशचंद्र जी ने कहा, “उन्होंने कहा कि उन्होंने तुम्हें तीन बार देखा और तीनों बार तुम्हारी माँ को घर का काम करते देखा।”
सीमा ने तुरंत कहा, “तो इसमें मेरी क्या गलती है? माँ तो हमेशा से काम करती आई हैं।”
कमला देवी ने बेटी की ओर देखा।
उनकी आँखें भर आईं।
महेशचंद्र जी ने कहा, “यही बात तो हमें समझनी होगी बेटी।”
सीमा ने पूछा, “क्या?”
महेशचंद्र जी बोले, “तुम्हारी माँ हमेशा से काम करती आई हैं, इसलिए क्या तुम्हें उनकी थकान दिखाई देना बंद हो गई?”
सीमा चुप हो गई।
कमला देवी ने पहली बार अपनी बेटी से कहा, “बेटी, मैंने तुम्हें कभी काम करने के लिए मजबूर नहीं किया।”
“जब तुम छोटी थीं, मैं कहती थी कि पढ़ाई करो, मैं कर लूँगी।”
“जब तुम कॉलेज गईं, मैं कहती थी कि तुम थककर आई हो, आराम कर लो।”
“जब तुम्हारी नौकरी लगी, मैंने कहा कि बाहर का काम मुश्किल है, घर मैं संभाल लूँगी।”
“लेकिन शायद मेरी यही गलती थी।”
सीमा ने माँ की तरफ देखा।
कमला देवी की आँखों से आँसू निकल रहे थे।
“मैंने तुम्हें प्यार तो बहुत दिया, लेकिन तुम्हें यह नहीं सिखाया कि माँ का प्यार लेने के साथ माँ का हाथ पकड़ना भी जरूरी होता है।”
सीमा कुछ नहीं बोल सकी।
उस रात सीमा अपने कमरे में अकेली बैठी थी।
उसे पहली बार अपने घर की छोटी-छोटी बातें याद आने लगीं।
जब वह स्कूल से आती थी तो माँ उसके लिए खाना गर्म करती थीं।
जब उसके कपड़े गंदे होते थे तो माँ उन्हें धोती थीं।
जब वह परीक्षा की तैयारी करती थी तो माँ कमरे में चुपचाप चाय रख जाती थीं।
जब वह नौकरी से थककर लौटती थी तो माँ उसके लिए खाना परोसकर कहती थीं, “पहले खाना खा ले बेटी।”
लेकिन उसने कभी नहीं पूछा था—
“माँ, आप थक गई हैं क्या?”
उसने कभी यह नहीं कहा था—
“माँ, आप बैठो, मैं कर देती हूँ।”
सीमा की आँखों से आँसू बहने लगे।
उसने खुद से कहा, “मैंने माँ को माँ समझा ही नहीं। मैंने उन्हें घर की व्यवस्था समझ लिया।”
अगले दिन उसने माँ के पास जाकर कहा, “माँ।”
कमला देवी ने पूछा, “क्या हुआ बेटी?”
सीमा ने माँ के हाथ पकड़ लिए।
“माँ, मुझे माफ कर दो।”
कमला देवी घबरा गईं।
“अरे, हुआ क्या?”
सीमा रोते हुए बोली, “आपने मेरे लिए पूरी जिंदगी काम किया और मैंने कभी आपका हाथ नहीं बँटाया।”
कमला देवी ने बेटी को गले लगा लिया।
सीमा बोली, “माँ, मैं बहुत बड़ी गलती कर रही थी।”
कमला देवी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “गलती समझ आ जाए तो इंसान बदल सकता है।”
उस दिन से सीमा ने घर के काम को बोझ की तरह देखना बंद कर दिया।
वह माँ के साथ रसोई में जाने लगी।
कमला देवी ने कहा, “तू रहने दे बेटी, मैं कर लूँगी।”
सीमा मुस्कुराकर बोली, “नहीं माँ, अब आप अकेले नहीं करेंगी।”
वह कभी सब्जी काटती, कभी रोटी बनाती, कभी कपड़े तह करती।
एक दिन उसने माँ के हाथों में तेल लगाया।
कमला देवी ने कहा, “यह सब करने की जरूरत नहीं है।”
सीमा ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “माँ, जरूरत तो आपको मेरी थी, लेकिन मुझे समझ बहुत देर से आई।”
कुछ ही दिनों में घर का माहौल बदल गया।
पायल भी अपनी बहन को देखकर काम में हाथ बँटाने लगी।
रोहित ने भी घर के छोटे-मोटे काम करने शुरू कर दिए।
महेशचंद्र जी दूर खड़े होकर सब देखते और सोचते रहते।
उन्हें महसूस हुआ कि बच्चों को जिम्मेदारी सिखाने का कोई सही समय नहीं होता। जिस दिन समझ आए, उसी दिन से शुरुआत कर देनी चाहिए।
कुछ महीनों बाद एक दिन राकेशचंद्र जी महेशचंद्र जी के घर पहुँचे।
इस बार उन्हें देखकर कमला देवी रसोई से बाहर आईं।
लेकिन उनके हाथ में झाड़ू नहीं थी।
सीमा उनके साथ खड़ी थी।
राकेशचंद्र जी ने मुस्कुराकर पूछा, “कैसी हैं बहन जी?”
कमला देवी ने कहा, “अब तो बहुत अच्छी हूँ।”
राकेशचंद्र जी ने सीमा की ओर देखा।
सीमा ने सिर झुका लिया।
राकेशचंद्र जी ने पूछा, “क्या हुआ बेटी?”
सीमा की आँखों में आँसू आ गए।
“अंकल, आपने मेरा रिश्ता तोड़कर शायद मेरे जीवन का सबसे बड़ा सबक दिया।”
राकेशचंद्र जी ने कहा, “मैंने तुम्हारा रिश्ता नहीं तोड़ा था बेटी, मैंने तुम्हें खुद को समझने का मौका दिया था।”
सीमा बोली, “मैं पहले सोचती थी कि घर का काम करना छोटी बात है। अब समझ आया कि घर संभालना काम से ज्यादा जिम्मेदारी है।”
राकेशचंद्र जी ने कहा, “और एक बात याद रखना। बहू बनना सिर्फ रसोई में काम करना नहीं है।”
सीमा ने ध्यान से उनकी बात सुनी।
उन्होंने आगे कहा, “बहू बनने का मतलब है रिश्तों को समझना, बुजुर्गों की जरूरत महसूस करना, पति का साथ देना, घर के छोटे-बड़े लोगों का सम्मान करना और जरूरत पड़ने पर अपना हाथ आगे बढ़ाना।”
“लेकिन यह जिम्मेदारी सिर्फ बेटियों की नहीं है।”
“बेटों को भी यही सिखाना जरूरी है कि घर केवल पत्नी की जिम्मेदारी नहीं होता।”
महेशचंद्र जी ने सहमति में सिर हिलाया।
“आप बिल्कुल सही कह रहे हैं।”
राकेशचंद्र जी ने कहा, “मैं चाहता हूँ कि मेरे घर की बहू मेरे साथ-साथ मेरे बेटे को भी जिम्मेदार बनाए।”
विवेक, जो पास ही खड़ा था, मुस्कुराकर बोला, “पिताजी, मैं समझ गया।”
राकेशचंद्र जी ने उसकी ओर देखकर कहा, “याद रखना बेटा, पत्नी को घर का काम सिखाने से पहले खुद घर का काम करना सीखना।”
विवेक ने कहा, “जी पिताजी।”
कुछ समय बाद वही रिश्ता फिर जुड़ गया।
लेकिन इस बार सीमा पहले वाली सीमा नहीं थी।
विवेक ने उससे कहा, “तुम्हें मेरे घर में किसी को खुश करने के लिए खुद को बदलने की जरूरत नहीं है।”
सीमा ने कहा, “मैं किसी को खुश करने के लिए नहीं बदल रही विवेक। मैं सिर्फ यह सीख रही हूँ कि रिश्तों में अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी होती है।”
विवेक मुस्कुराया।
“और मैं भी सीख रहा हूँ कि घर चलाना सिर्फ पत्नी का काम नहीं है।”
सीमा ने कहा, “यही बात मुझे सबसे अच्छी लगी।”
उनकी शादी सादगी से हुई।
विदाई के समय कमला देवी अपनी बेटी को गले लगाकर रो रही थीं।
सीमा ने माँ के कान में कहा, “माँ, आपने मुझे बहुत कुछ दिया है। अब मेरी बारी है आपको कुछ लौटाने की।”
कमला देवी ने आँसू पोंछते हुए कहा, “बेटी, माँ को बेटी से कुछ वापस नहीं चाहिए। बस इतना चाहती हूँ कि जहाँ भी रहना, रिश्तों की कद्र करना।”
सीमा ने कहा, “आपने देर से सही, लेकिन मुझे सबसे जरूरी चीज सिखा दी।”
शादी के बाद सीमा अपने ससुराल पहुँची।
वहाँ उसने देखा कि सुशीला देवी रसोई में काम कर रही थीं।
सीमा ने तुरंत उनके हाथ से बेलन ले लिया।
“माँ जी, आप बैठिए। आज खाना मैं बनाऊँगी।”
सुशीला देवी ने कहा, “नहीं बेटी, नई-नई आई हो। आराम करो।”
सीमा मुस्कुराई।
“माँ जी, आराम तो मैं मायके में बहुत कर चुकी हूँ। अब आपके साथ घर संभालना सीखना है।”
सुशीला देवी की आँखें भर आईं।
उन्होंने सीमा को गले लगा लिया।
राकेशचंद्र जी दरवाजे के पास खड़े यह दृश्य देख रहे थे।
विवेक ने धीरे से पूछा, “पिताजी, अब आपको अपनी पसंद पर भरोसा है?”
राकेशचंद्र जी मुस्कुराए।
“मुझे अपनी पसंद से ज्यादा उस सीख पर भरोसा है जो इस लड़की ने अपने जीवन में अपनाई है।”
विवेक ने पूछा, “आपने रिश्ता मना करके इतना बड़ा जोखिम क्यों लिया था?”
राकेशचंद्र जी ने कहा, “क्योंकि बेटा, शादी जीवन भर का फैसला है। केवल सुंदर चेहरा देखकर घर नहीं बसता।”
“घर तब बसता है जब दोनों तरफ के लोग एक-दूसरे की थकान समझें।”
“जिस घर में केवल एक व्यक्ति काम करता रहे और बाकी लोग केवल अधिकार माँगते रहें, वहाँ धीरे-धीरे रिश्ते थक जाते हैं।”
“और जिस घर में हर कोई कहे—‘तुम थक गए हो, अब मैं कर देता हूँ’, वहाँ प्यार अपने आप बढ़ता है।”
समय बीतता गया।
सीमा अपने ससुराल में सभी का सम्मान करती थी।
लेकिन वह केवल काम करने वाली बहू नहीं बनी।
उसने विवेक को भी घर के कामों में बराबर साथ देना सिखाया।
कभी विवेक माँ के लिए दवा लाता, कभी पिता के कागज व्यवस्थित करता, कभी रसोई में सीमा की मदद करता।
एक दिन सुशीला देवी ने सीमा से कहा, “बेटी, तुम्हारे आने के बाद घर बदल गया।”
सीमा ने मुस्कुराकर कहा, “माँ जी, घर मैंने नहीं बदला। मैंने बस वही सीखा है जो मेरी माँ ने मुझे देर से सिखाया।”
सुशीला देवी ने पूछा, “क्या?”
सीमा ने कहा, “रिश्ते केवल लेने से नहीं, निभाने से मजबूत होते हैं।”
राकेशचंद्र जी बरामदे में बैठे यह बात सुन रहे थे।
उन्होंने विवेक को पास बुलाया।
“बेटा, आज मुझे एक बात समझ आई।”
विवेक ने पूछा, “क्या पिताजी?”
राकेशचंद्र जी बोले, “हम अक्सर कहते हैं कि हमें अच्छी बहू चाहिए।”
“लेकिन कोई यह नहीं सोचता कि जिस घर से बहू आएगी, वहाँ उसे क्या सिखाया गया है।”
“हम कहते हैं कि बेटा बूढ़े माता-पिता को छोड़ गया।”
“लेकिन यह भी देखना चाहिए कि बेटे और बहू दोनों को बचपन से अपने बुजुर्गों की जिम्मेदारी के बारे में क्या सिखाया गया था।”
“हम कहते हैं कि बहू घर नहीं संभालती।”
“लेकिन यह भी पूछना चाहिए कि क्या हमने बेटे को घर संभालना सिखाया?”
“हम कहते हैं कि बच्चे संस्कारी नहीं रहे।”
“लेकिन संस्कार केवल भाषण देने से नहीं आते। बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने घर में रोज देखते हैं।”
विवेक ने सिर झुकाकर कहा, “आप सही कहते हैं पिताजी।”
राकेशचंद्र जी मुस्कुराए।
“इसलिए बेटा, बेटियों को केवल अच्छे घर में भेजने की तैयारी मत करो। उन्हें ऐसा इंसान बनने की तैयारी कराओ जो किसी भी घर को प्यार और समझदारी से अपना बना सके।”
कहानी की सीख:
बेटी को केवल पढ़ाना, सजाना और उसकी हर इच्छा पूरी करना ही माता-पिता की जिम्मेदारी नहीं है।
उसे यह भी सिखाना जरूरी है कि घर के बुजुर्गों की थकान कैसे समझी जाती है, अपने लोगों का हाथ कैसे बँटाया जाता है और रिश्तों में अधिकार के साथ जिम्मेदारी कैसे निभाई जाती है।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि बेटी को केवल इसलिए घर के सारे काम सिखाए जाएँ कि वह भविष्य में बहू बनकर सबकी सेवा करती रहे।
बेटी को जिम्मेदार बनाइए, बेटे को भी जिम्मेदार बनाइए।
उसे यह सिखाइए कि घर में काम करने वाला व्यक्ति छोटा नहीं होता और काम से बचने वाला बड़ा नहीं बन जाता।
माँ अगर पूरे दिन घर संभालती है तो बेटी उसका हाथ बँटाए।
पिता अगर परिवार के लिए मेहनत करते हैं तो बेटा उनकी जिम्मेदारियाँ समझे।
और जब बच्चे बड़े होकर अपना घर बसाएँ, तो पति-पत्नी दोनों एक-दूसरे का सहारा बनें।
क्योंकि अच्छे संस्कार का मतलब केवल बहू का सबकी सेवा करना नहीं है।
अच्छे संस्कार का असली मतलब है—जिसे हमारी जरूरत हो, उसकी जरूरत समझ लेना।
जिस घर में बेटी अपनी माँ की थकान समझना सीख जाती है, वह आगे चलकर एक संवेदनशील पत्नी और बहू बन सकती है।
और जिस घर में बेटा अपने माता-पिता की जिम्मेदारी समझना सीखता है, वह एक अच्छा पति और बेटा बन सकता है।
बहू अच्छी चाहिए तो बेटी को संस्कार दीजिए, लेकिन बेटा अच्छा चाहिए तो उसे भी वही संस्कार दीजिए।
आखिर घर किसी एक के त्याग से नहीं,
सबके सहयोग से घर बनता है।

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