बहू नहीं, बेटी

 

Emotional Indian daughter-in-law hugging her mother-in-law during a family birthday celebration


“नेहा, तुमने फिर मां के लिए काम वाली रख दी?”


रोहित ने घर में कदम रखते ही पूछा।


नेहा ने रसोई से बाहर आते हुए कहा, “हां रोहित, क्यों?”


रोहित ने धीमे स्वर में कहा, “मां को शायद अच्छा नहीं लगा।”


नेहा कुछ पल चुप रही। फिर उसने कहा, “मैंने उनके आराम के लिए रखी है। उनसे काम करवाने के लिए नहीं।”


रोहित ने कहा, “मैं जानता हूं। लेकिन तुम मां को थोड़ा समय दो। उन्हें आदत है सब कुछ अपने हाथ से करने की।”


नेहा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “समय तो मैं उन्हें जितना चाहिए दूंगी। बस मैं यह नहीं देख सकती कि जिस हाथ ने इतने साल पूरे परिवार को संभाला, वही हाथ अब दर्द में भी काम करता रहे।”


रोहित ने नेहा की तरफ देखा और कुछ नहीं कहा।


उसे अपनी पत्नी की बात समझ आ रही थी।


लेकिन वह यह भी जानता था कि उसकी मां के मन में नेहा को लेकर एक अनजाना डर था।


सावित्री देवी ने जिंदगी का अधिकांश हिस्सा एक छोटे से शहर में गुजारा था। पढ़ाई के नाम पर वह मुश्किल से दसवीं तक पहुंच पाई थीं। उसके बाद शादी हुई, बच्चे हुए और घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियों में उनकी अपनी इच्छाएं कहीं पीछे छूट गईं।


उन्होंने अपने पति शंकरलाल और बेटे रोहित के लिए पूरी जिंदगी लगा दी थी।


उन्हें घर के हर कोने की आदत थी।


कौन सा मसाला किस डिब्बे में है, किस बर्तन में दाल अच्छी बनती है, किस दिन कौन सा सामान बाजार से लाना है—इन छोटी-छोटी चीजों में ही उन्हें अपने होने का एहसास मिलता था।


इसलिए जब उनके बेटे की शादी एक पढ़ी-लिखी, नौकरी करने वाली लड़की नेहा से तय हुई, तो उनके मन में खुशी से ज्यादा डर पैदा हो गया।


उनकी पड़ोसन कमला ने ही उस डर को और बढ़ा दिया था।


कमला ने कहा था, “सावित्री, पढ़ी-लिखी बहू है। नौकरी भी करती है। ऐसी लड़कियां आजकल किसी की सुनती नहीं हैं। संभलकर रहना।”


सावित्री देवी ने उस समय हंसकर कहा था, “मेरी बहू ऐसी नहीं होगी।”


लेकिन कमला के शब्द मन में घर कर गए थे।


उन्हें डर लगने लगा था कि कहीं शादी के बाद नेहा घर की जिम्मेदारियां अपने हाथ में लेकर उन्हें किनारे न कर दे।


और यही डर धीरे-धीरे गलतफहमी बन गया।


नेहा की शादी बहुत धूमधाम से हुई।


वह जब पहली बार घर में आई तो उसने सबसे पहले सावित्री देवी के पैर छुए।


नेहा ने कहा, “मम्मी जी, आज से यह घर सिर्फ आपका नहीं, मेरा भी है। बस मुझे बेटी की तरह समझकर मेरी गलतियां बता दीजिएगा।”


सावित्री देवी ने मुस्कुराने की कोशिश करते हुए कहा, “हां बेटा, घर संभालना आसान नहीं होता।”


नेहा ने तुरंत कहा, “आपने इतने साल संभाला है, अब मैं आपसे सीखूंगी।”


यह सुनकर सावित्री देवी के चेहरे पर पहली बार सच्ची मुस्कान आई।


लेकिन उनका डर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।


शादी के कुछ दिन बाद नेहा ने घर की रसोई देखी।


सामान बिखरा हुआ था। मसालों के डिब्बे पुराने हो चुके थे। कुछ चीजों की तारीख निकल चुकी थी।


नेहा ने कहा, “मम्मी जी, अगर आप कहें तो मैं रसोई थोड़ा व्यवस्थित कर दूं?”


सावित्री देवी ने तुरंत कहा, “नहीं बेटा, मुझे पता है किस चीज को कहां रखना है।”


नेहा ने मुस्कुराकर कहा, “ठीक है मम्मी जी।”


वह चुप हो गई।


अगले दिन नेहा ने देखा कि सावित्री देवी भारी आटे की बोरी उठाने की कोशिश कर रही थीं।


नेहा दौड़कर उनके पास गई।


नेहा ने कहा, “मम्मी जी, आप रहने दीजिए। मैं उठा देती हूं।”


सावित्री देवी ने बोरी छोड़ते हुए कहा, “मुझे इतनी भी उम्र नहीं हुई है कि मैं एक बोरी नहीं उठा सकती।”


नेहा पीछे हट गई।


उसने महसूस किया कि उसकी मदद भी शायद उसकी सास को अपने अधिकार में दखल जैसी लग रही है।


उस दिन के बाद नेहा ने एक बात समझ ली।


सावित्री देवी को मदद से ज्यादा भरोसे की जरूरत थी।


एक महीने बाद नेहा ने घर में काम करने वाली रख दी।


सावित्री देवी नाराज हो गईं।


सावित्री देवी ने कहा, “मैंने तुमसे कितनी बार कहा है कि मुझे किसी की जरूरत नहीं है।”


नेहा ने शांत स्वर में कहा, “मम्मी जी, जरूरत आपको नहीं, मुझे है।”


सावित्री देवी चौंक गईं।


सावित्री देवी ने पूछा, “तुम्हें किस बात की जरूरत है?”


नेहा ने कहा, “आपके आराम की। क्योंकि अगर आप बीमार पड़ गईं तो मुझे खुद पर बहुत गुस्सा आएगा।”


सावित्री देवी कुछ नहीं बोलीं।


उस दिन पहली बार उनके मन में बहू को लेकर बनी दीवार में एक छोटी सी दरार पड़ी।


लेकिन फिर कमला आ गई।


कमला ने पूछा, “सावित्री, सुना है बहू ने काम वाली रख ली?”


सावित्री देवी ने कहा, “हां, उसने अपनी मर्जी से रख ली।”


कमला ने धीरे से कहा, “मैंने कहा था न, आजकल की बहुएं धीरे-धीरे घर अपने हाथ में ले लेती हैं।”


सावित्री देवी ने कोई जवाब नहीं दिया।


लेकिन कमला के जाने के बाद उनके मन में फिर वही विचार घूमने लगा।


उन्हें नेहा की हर बात में अपना अधिकार कम होता हुआ दिखाई देने लगा।


एक दिन नेहा ने सावित्री देवी को साड़ी पहनते हुए देखा।


उसने प्यार से कहा, “मम्मी जी, आप पर यह साड़ी बहुत अच्छी लग रही है। लेकिन अगर आप चाहें तो मैं आपको साड़ी पहनने का एक दूसरा तरीका बताऊं? आप पर और भी सुंदर लगेगा।”


सावित्री देवी ने कहा, “नहीं, मुझे इसी तरह पहनना आता है।”


नेहा ने हंसकर कहा, “मैंने तो बस इसलिए कहा क्योंकि आप पर अच्छा लगेगा।”


सावित्री देवी ने कोई जवाब नहीं दिया।


लेकिन उनके मन में बात बैठ गई।


उन्हें लगा कि बहू उनकी साड़ी पहनने तक का तरीका बदलना चाहती है।


उस रात उन्होंने शंकरलाल से कहा, “आपको नहीं लगता कि नेहा मुझे धीरे-धीरे बदलना चाहती है?”


शंकरलाल ने कहा, “तुम बेकार की बातें सोचती हो। लड़की तुम्हारा सम्मान करती है।”


सावित्री देवी बोलीं, “आपको कुछ समझ नहीं आता। पढ़ी-लिखी है। नौकरी करती है। उसे लगता होगा कि मैं गंवार हूं।”


शंकरलाल ने कहा, “अगर उसे ऐसा लगता तो वह तुम्हारे लिए इतना कुछ क्यों करती?”


सावित्री देवी चुप हो गईं।


लेकिन मन का डर इतनी आसानी से कहां जाता है।


एक दिन नेहा ने यूं ही पूछ लिया, “मम्मी जी, आपका जन्मदिन कब आता है?”


सावित्री देवी ने कहा, “मेरा जन्मदिन?”


नेहा ने मुस्कुराकर कहा, “हां, आपका।”


सावित्री देवी कुछ पल सोचती रहीं।


फिर बोलीं, “पता नहीं बेटा। मैंने कभी मनाया नहीं।”


नेहा ने आश्चर्य से पूछा, “आपको अपनी जन्मतिथि भी याद नहीं?”


सावित्री देवी ने मुस्कुराकर कहा, “मेरे बाबूजी कहते थे कि गांधीजी के जन्मदिन के आसपास मेरा जन्म हुआ था। बस इतना ही पता है।”


नेहा ने पूछा, “कौन सी तारीख?”


सावित्री देवी ने कहा, “दो अक्टूबर। बाबूजी कहते थे कि देश गांधीजी का जन्मदिन मनाता है और उसी दिन उनकी बेटी भी इस दुनिया में आई थी।”


नेहा हंस पड़ी।


नेहा ने कहा, “तो फिर इस बार आपका जन्मदिन जरूर मनाएंगे।”


सावित्री देवी ने तुरंत कहा, “नहीं-नहीं, इन सब चीजों की जरूरत नहीं है। जन्मदिन मनाने की मेरी उम्र नहीं रही।”


नेहा ने कहा, “मम्मी जी, खुशी मनाने की कोई उम्र नहीं होती।”


सावित्री देवी ने बात टाल दी।


लेकिन नेहा ने नहीं टाली।


उसने चुपचाप रोहित से बात की।


नेहा ने रोहित से कहा, “तुम्हें पता है मम्मी जी का जन्मदिन कभी नहीं मनाया गया।”


रोहित ने कहा, “हां, मां को इन सब चीजों का शौक नहीं है।”


नेहा ने कहा, “शौक नहीं है या कभी किसी ने पूछा ही नहीं?”


रोहित अचानक चुप हो गया।


उस सवाल का उसके पास कोई जवाब नहीं था।


नेहा ने कहा, “इस बार मम्मी का जन्मदिन हम ऐसे मनाएंगे कि उन्हें जिंदगी भर याद रहे।”


रोहित मुस्कुराया।


उसने कहा, “ठीक है।”


नेहा ने कहा, “लेकिन मम्मी को बिल्कुल पता नहीं चलना चाहिए।”


रोहित ने कहा, “पक्का।”


नेहा ने घर में किसी को कुछ नहीं बताया।


उसने अपनी सास के लिए एक सुंदर साड़ी खरीदी।


रोहित ने केक का ऑर्डर दिया।


शंकरलाल ने भी पहली बार अपनी पत्नी के लिए चुपचाप एक छोटा सा उपहार खरीदा।


जन्मदिन से एक दिन पहले नेहा ने घर को सजाना शुरू किया।


सावित्री देवी ने पूछा, “इतनी सजावट क्यों कर रही हो?”


नेहा ने कहा, “बस ऐसे ही मम्मी जी। मन किया तो कर दिया।”


सावित्री देवी ने कहा, “बहुत पैसे खर्च मत करना।”


नेहा ने मुस्कुराकर कहा, “आपकी बहू को खर्च करना आता है, मम्मी जी।”


सावित्री देवी फिर चुप हो गईं।


रात के बारह बजते ही नेहा ने रोहित और शंकरलाल को इशारा किया।


तीनों धीरे से सावित्री देवी के कमरे के बाहर पहुंचे।


नेहा ने दरवाजा खटखटाया।


सावित्री देवी ने पूछा, “कौन है?”


नेहा ने कहा, “मम्मी जी, दरवाजा खोलिए।”


सावित्री देवी ने दरवाजा खोला।


दरवाजा खुलते ही तीनों ने एक साथ कहा—


“हैप्पी बर्थडे, मम्मी!”


सावित्री देवी कुछ समझ ही नहीं पाईं।


उनकी आंखों के सामने केक था।


कमरे में छोटी-छोटी लाइटें लगी थीं।


रोहित ने कहा, “मां, आज आपकी बेटी ने आपको पहली बार जन्मदिन की शुभकामना दी है।”


सावित्री देवी की आंखें भर आईं।


उन्होंने नेहा की तरफ देखा।


सावित्री देवी ने पूछा, “तुम्हें याद था?”


नेहा ने कहा, “आपने बताया था न मम्मी जी।”


सावित्री देवी के हाथ कांपने लगे।


उन्होंने धीरे से कहा, “मुझे लगा था तुम मेरी बातें बस सुनती हो।”


नेहा ने उनका हाथ पकड़ते हुए कहा, “मैं आपकी बातें सुनती नहीं हूं मम्मी जी, संभालकर रखती हूं।”


केक काटा गया।


शंकरलाल ने अपनी पत्नी को पहला टुकड़ा खिलाया।


शंकरलाल ने कहा, “सावित्री, तुम्हारा जन्मदिन शायद पहली बार हम इतने अच्छे से मना रहे हैं। मुझे माफ करना।”


सावित्री देवी की आंखों से आंसू निकल पड़े।


उन्होंने कहा, “आपने कभी पूछा ही नहीं कि मुझे क्या अच्छा लगता है।”


रोहित ने मां के पैर छूते हुए कहा, “मां, मुझे भी माफ कर देना।”


सावित्री देवी ने बेटे को उठाकर गले लगा लिया।


फिर नेहा ने लाल रंग का एक छोटा डिब्बा उनके हाथ में रखा।


नेहा ने कहा, “मम्मी जी, यह आपके लिए है। अभी खोलिए।”


सावित्री देवी ने डिब्बा खोला।


अंदर एक सुंदर सोने की अंगूठी थी।


वह अंगूठी देखते ही सावित्री देवी ने डिब्बा बंद कर दिया।


सावित्री देवी ने कहा, “नहीं बेटा, मैं यह नहीं ले सकती। इतनी महंगी चीज क्यों खरीदी?”


नेहा ने कहा, “यह महंगी नहीं है मम्मी जी।”


सावित्री देवी ने कहा, “सोने की चीज महंगी ही होती है।”


नेहा ने उनकी उंगली में अंगूठी पहनाते हुए कहा, “इसकी कीमत सोने से नहीं है। इसकी कीमत उस प्यार से है जो आपने मुझे दिया है।”


सावित्री देवी ने अचानक नेहा को गले लगा लिया।


वह बहुत देर तक रोती रहीं।


फिर उन्होंने कहा, “नेहा, मुझे तुमसे एक बात कहनी है।”


नेहा ने पूछा, “क्या हुआ मम्मी जी?”


सावित्री देवी बोलीं, “मैं तुमसे डरती थी।”


नेहा हैरान रह गई।


सावित्री देवी ने कहा, “मुझे लगता था कि तुम पढ़ी-लिखी हो, नौकरी करती हो, इसलिए एक दिन मेरे बेटे और घर दोनों को अपने हिसाब से चलाने लगोगी। मुझे डर था कि मैं इस घर में बेकार हो जाऊंगी।”


नेहा की आंखें भी नम हो गईं।


उसने कहा, “मम्मी जी, आप इस घर में बेकार कैसे हो सकती हैं? आपने तो इस घर की नींव रखी है।”


सावित्री देवी ने रोते हुए कहा, “लेकिन मैंने तुम्हारी हर अच्छी बात में भी गलत मतलब निकाल लिया।”


नेहा ने कहा, “आप मां हैं। मां को अपनी जगह खोने का डर हो जाए तो वह हर बदलाव से डरने लगती है।”


सावित्री देवी ने नेहा का चेहरा अपने हाथों में लेते हुए कहा, “नहीं बेटा। गलती मेरी थी।”


फिर उन्होंने एक बात कही जिसने कमरे में मौजूद सभी लोगों को चौंका दिया।


सावित्री देवी ने कहा, “लेकिन आज मैं तुम्हें भी एक उपहार देना चाहती हूं।”


नेहा ने पूछा, “मेरे लिए?”


सावित्री देवी कमरे की अलमारी के पास गईं।


उन्होंने एक पुराना कपड़े का बैग निकाला।


बैग खोलकर उन्होंने कुछ कागज नेहा के हाथ में रखे।


नेहा ने कागज देखे तो हैरान रह गई।


वे सावित्री देवी की पुरानी दसवीं कक्षा की अंकतालिका और कुछ पुराने प्रमाणपत्र थे।


नेहा ने पूछा, “मम्मी जी, आपने ये सब संभालकर रखा था?”


सावित्री देवी ने कहा, “हां। जिंदगी ने मुझे आगे पढ़ने का मौका नहीं दिया। लेकिन मन में हमेशा इच्छा थी।”


नेहा की आंखों से आंसू बहने लगे।


सावित्री देवी ने कहा, “तुमने मेरे जन्मदिन को यादगार बनाया है। अब मैं चाहती हूं कि तुम मेरी अधूरी पढ़ाई पूरी करवाओ।”


नेहा ने उन्हें कसकर गले लगा लिया।


नेहा ने कहा, “मैं वादा करती हूं मम्मी जी, अब आपकी पढ़ाई कभी अधूरी नहीं रहेगी।”


रोहित मुस्कुराते हुए बोला, “तो फिर मां की पढ़ाई शुरू?”


सावित्री देवी ने कहा, “हां बेटा। लेकिन इस बार सिर्फ किताबें नहीं पढ़ूंगी।”


रोहित ने पूछा, “और क्या करोगी मां?”


सावित्री देवी ने मुस्कुराकर कहा, “तुम दोनों को भी पढ़ाऊंगी कि रिश्तों को शक से नहीं, भरोसे से संभाला जाता है।”


सबकी आंखों में आंसू थे, लेकिन चेहरों पर मुस्कान थी।


कुछ महीने बाद सावित्री देवी ने अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू कर दी।


नेहा ने उनके लिए किताबें खरीदीं।


रोहित ने ऑनलाइन पढ़ाई का इंतजाम किया।


शंकरलाल ने हर किसी से गर्व से कहा, “मेरी पत्नी फिर से पढ़ रही है।”


जिस पड़ोसन कमला ने कभी सावित्री देवी के मन में बहू को लेकर डर पैदा किया था, वही एक दिन उनके घर आई।


कमला ने पूछा, “सावित्री, बहू से तुम्हारी पटती है?”


सावित्री देवी मुस्कुराईं।


उन्होंने कहा, “बहू से नहीं, बेटी से पटती है।”


कमला ने कहा, “तुम्हें तो डर था कि पढ़ी-लिखी बहू घर अपने हाथ में ले लेगी।”


सावित्री देवी ने नेहा की तरफ देखकर कहा, “हां, डरती थी। लेकिन अब समझ आया कि पढ़ी-लिखी बहू घर छीनती नहीं, अगर संस्कार अच्छे हों तो घर के उन लोगों को भी आगे बढ़ाती है जिन्हें जिंदगी ने पीछे छोड़ दिया।”


नेहा ने कहा, “और अगर सास समझदार हो तो बहू को भी मां का प्यार मिलता है।”


सावित्री देवी ने मुस्कुराकर कहा, “मुझे बहू नहीं मिली थी नेहा… मुझे वह बेटी मिली थी जो मेरी उम्र नहीं, मेरे मन को समझ सकी।”


उस दिन सावित्री देवी ने अपनी पुरानी अंगूठी उतारी और नेहा की उंगली में पहना दी।


नेहा ने कहा, “मम्मी जी, यह क्या कर रही हैं?”


सावित्री देवी ने कहा, “यह मेरी मां ने मुझे दी थी। मैंने सोचा था इसे अपनी बेटी को दूंगी।”


नेहा ने भावुक होकर पूछा, “आपकी बेटी को?”


सावित्री देवी ने नेहा का हाथ पकड़कर कहा, “हां। और अब मुझे अपनी बेटी मिल गई है।”


नेहा की आंखों से आंसू बह निकले।


सावित्री देवी ने उसके माथे को चूमते हुए कहा—


“तू मेरे घर की बहू बनकर आई थी नेहा, लेकिन जिस दिन तूने मेरी भूली हुई जन्मतिथि याद रखी, उसी दिन तू मेरे दिल में बेटी बनकर बस गई।”


और उस दिन पहली बार सावित्री देवी को लगा कि किसी रिश्ते को मजबूत करने के लिए एक जैसा पढ़ा-लिखा होना जरूरी नहीं।


जरूरी यह है कि सामने वाले के मन में छिपे डर को समझने की कोशिश की जाए।


क्योंकि कभी-कभी जिस इंसान से हमें सबसे ज्यादा डर लगता है, वही इंसान हमारी जिंदगी का सबसे खूबसूरत सहारा बन जाता है।



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