अपनों की कीमत
“भाभी… इतनी महँगी साड़ी लेने की क्या जरूरत है? पिछले महीने ही तो आपने नई साड़ी खरीदी थी। यह साड़ी भी बहुत अच्छी है, लेकिन इसकी कीमत देखिए… इतने पैसों में तो घर की कई जरूरी चीजें आ सकती हैं।”
रमा ने अपनी जेठानी कविता को समझाते हुए कहा।
कविता ने साड़ी को अपने सामने फैलाया और आईने में खुद को देखते हुए मुस्कुराकर कहा, “रमा, तुम भी न… तुम्हें हर चीज में बचत ही दिखाई देती है। जिंदगी में थोड़ा अपने लिए खर्च करना भी सीखो। हर समय पैसे बचाने के बारे में सोचते रहना अच्छी बात नहीं है।”
रमा ने शांत स्वर में कहा, “भाभी, मैं अपने लिए खर्च करने के खिलाफ नहीं हूँ। बस इतना मानती हूँ कि जरूरत और दिखावे में अंतर समझना चाहिए। आज पैसा है, कल परिस्थितियाँ बदल भी सकती हैं।”
कविता ने हँसते हुए कहा, “मेरी चिंता मत करो। मेरे पति अरुण अच्छी कमाई करते हैं। घर में किसी चीज की कमी नहीं है। जब भगवान ने दिया है तो खुलकर खर्च करने में कैसी परेशानी?”
रमा ने कुछ नहीं कहा।
वह जानती थी कि कविता को समझाना आसान नहीं था।
कविता और रमा देवरानी-जेठानी थीं। दोनों एक ही घर में अलग-अलग हिस्सों में रहती थीं। रिश्तों में कोई बड़ी कड़वाहट नहीं थी, लेकिन दोनों की सोच में बहुत अंतर था।
कविता के पति अरुण का कारोबार अच्छा चल रहा था। घर में सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी। महँगे कपड़े, गहने, नया फर्नीचर, महँगे मोबाइल और बाहर खाना—कविता को इन सबका बहुत शौक था।
उसे अपनी संपन्नता पर गर्व भी था।
वह अक्सर अपनी सहेलियों के सामने अपने नए सामान की चर्चा करती और मन ही मन खुश होती कि उसके पास दूसरों से ज्यादा है।
रमा का जीवन बिल्कुल अलग था।
उसके पति मोहन सरकारी नौकरी करते थे। आमदनी ठीक थी, लेकिन बहुत ज्यादा नहीं। रमा हर खर्च सोच-समझकर करती। वह बच्चों की छोटी-छोटी जरूरतें पूरी करती, मगर बिना जरूरत पैसे खर्च करने से बचती।
रमा की बेटी आराध्या पढ़ने में बहुत होशियार थी।
एक दिन आराध्या ने अपनी माँ से कहा, “माँ, मेरी सहेली के पास नया मोबाइल आया है। मेरा मोबाइल काफी पुराना हो गया है। क्या मुझे भी नया मोबाइल मिल सकता है?”
रमा ने बेटी के चेहरे को देखते हुए पूछा, “बेटी, तुम्हारा मोबाइल खराब हो गया है क्या?”
आराध्या ने सिर हिलाकर कहा, “नहीं माँ, अभी तो ठीक चलता है।”
रमा मुस्कुराई और बोली, “तो फिर अभी नया मोबाइल लेने की जरूरत नहीं है। जब जरूरत होगी, तब जरूर लेंगे।”
आराध्या कुछ क्षण चुप रही।
फिर उसने कहा, “ठीक है माँ। मैं समझ गई।”
पास बैठी कविता ने दोनों की बात सुन ली थी।
कविता ने आराध्या से कहा, “बेटी, तुम्हारी माँ बहुत बचत करती है। आजकल बच्चों के पास अच्छे फोन होना जरूरी है। तुम भी अपनी माँ से जिद किया करो।”
आराध्या ने विनम्रता से कहा, “चाची, माँ जो ठीक समझती हैं, वही करती हैं। मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं है।”
कविता एक पल के लिए चुप हो गई।
रमा ने बेटी की ओर गर्व से देखा।
कुछ देर बाद कविता ने रमा से कहा, “तुम अपनी बेटी को बहुत ज्यादा सीधा बना रही हो। आज के जमाने में थोड़ा दिखावा भी जरूरी है।”
रमा ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “भाभी, मैं चाहती हूँ कि मेरी बेटी की पहचान उसके कपड़ों और सामान से नहीं, बल्कि उसकी मेहनत और उसके व्यवहार से हो।”
कविता ने हल्की हँसी के साथ कहा, “तुम्हारी बातें तुम्हीं जानो।”
उसी घर में कविता का बेटा रोहन भी रहता था।
रोहन को अपनी माँ से पैसे माँगने की आदत थी।
एक दिन रोहन ने कहा, “माँ, मुझे पाँच हजार रुपये चाहिए।”
कविता ने पूछा, “किसलिए?”
रोहन ने सहजता से कहा, “दोस्तों के साथ बाहर जाना है।”
कविता ने बिना ज्यादा पूछताछ किए पैसे निकालकर उसके हाथ में रख दिए।
“ले बेटा। दोस्तों के सामने कभी यह मत कहना कि तुम्हारे पास पैसे नहीं हैं।”
रोहन मुस्कुराते हुए बोला, “माँ, आप सबसे अच्छी हैं।”
रमा यह सब देख रही थी।
उसने धीरे से कविता से कहा, “भाभी, बच्चों को पैसे देना गलत नहीं है, लेकिन उन्हें पैसे की कीमत समझाना भी जरूरी है।”
कविता ने तुरंत जवाब दिया, “रमा, मेरे बेटे को किसी चीज की कमी नहीं होने दूँगी। आखिर पैसे किस दिन काम आएँगे?”
रमा ने गंभीर स्वर में कहा, “भाभी, पैसा जरूरत के समय काम जरूर आता है, लेकिन अगर बच्चे को मेहनत की आदत न हो तो वही पैसा उसके लिए नुकसान भी बन सकता है।”
कविता ने बात टालते हुए कहा, “तुम अपने बच्चों को अपनी तरह पालो, मैं अपने बच्चों को अपनी तरह पालूँगी।”
रमा चुप हो गई।
लेकिन उसके मन में एक चिंता जरूर उठी।
उसे डर था कि कहीं रोहन को मिलने वाली सुविधाएँ उसकी मेहनत करने की इच्छा ही न छीन लें।
और समय ने जल्द ही यह साबित कर दिया कि रमा की चिंता बेवजह नहीं थी।
आराध्या अपनी पढ़ाई में लगातार मेहनत करती रही।
वह जानती थी कि उसके माता-पिता ने उसकी पढ़ाई के लिए बहुत कुछ छोड़ा है। इसलिए वह उनकी उम्मीदों को कभी टूटने नहीं देना चाहती थी।
जब भी उसे किसी विषय में परेशानी होती, वह अपनी माँ से कहती, “माँ, मुझे यह समझ नहीं आ रहा।”
रमा उसे प्यार से समझाते हुए कहती, “बेटी, मेहनत से कभी मत घबराना। आज जो मुश्किल लग रहा है, वही कल तुम्हारी ताकत बनेगा।”
आराध्या माँ की बात दिल से मानती।
दूसरी तरफ रोहन का ध्यान पढ़ाई से लगातार हटता जा रहा था।
वह दोस्तों के साथ घूमता, महँगे कपड़े पहनता और मोबाइल पर घंटों समय बिताता।
अरुण ने एक बार बेटे को समझाते हुए कहा, “रोहन, पढ़ाई को लेकर थोड़ा गंभीर हो जाओ। पैसा हमेशा साथ नहीं रहता, लेकिन शिक्षा जिंदगी भर साथ रहती है।”
रोहन ने लापरवाही से जवाब दिया, “पापा, आप चिंता मत कीजिए। जब जरूरत होगी, आप मेरे लिए कोई अच्छा कॉलेज देख लेंगे।”
अरुण बेटे को देखते रह गए।
कविता ने भी बेटे को समझाने की कोशिश की, लेकिन उसने कभी उसे अनुशासन में नहीं रखा था। इसलिए उसकी बातें रोहन पर ज्यादा असर नहीं करती थीं।
समय बीतता गया।
बारहवीं की परीक्षा का परिणाम आया।
आराध्या ने बहुत अच्छे अंकों से परीक्षा पास की।
मोहन ने बेटी का परिणाम देखकर भावुक होकर कहा, “बेटी, आज तुमने हमारा सिर गर्व से ऊँचा कर दिया।”
आराध्या ने पिता के पैर छूते हुए कहा, “पापा, आपकी मेहनत और माँ के संस्कारों के बिना मैं यहाँ तक नहीं पहुँच सकती थी।”
रमा की आँखें भर आईं।
वहीं रोहन के अंक बहुत कम आए।
कविता ने परिणाम देखते हुए कहा, “कोई बात नहीं बेटा। आगे की पढ़ाई अच्छे कॉलेज से कर लेना।”
रोहन ने राहत की साँस लेते हुए कहा, “माँ, मुझे पता था कि आप मुझे संभाल लेंगी।”
कविता ने बेटे के सिर पर हाथ फेर दिया।
लेकिन उसे क्या पता था कि जिंदगी जल्द ही उसकी अपनी परीक्षा लेने वाली थी।
आराध्या का दाखिला अच्छे कॉलेज में हो गया।
वह पढ़ाई के साथ-साथ छात्रवृत्ति के लिए भी मेहनत करने लगी।
उधर रोहन के महँगे कॉलेज में दाखिले की तैयारी चल रही थी।
तभी अचानक अरुण के कारोबार में भारी नुकसान हो गया।
जिस व्यापार को वह वर्षों से संभाल रहे थे, उसमें लगातार घाटा होने लगा। बाजार में पैसा फँस गया और कर्ज बढ़ता चला गया।
एक दिन अरुण ने कविता से कहा, “कविता, अब हमें खर्चों पर नियंत्रण रखना होगा।”
कविता ने चिंतित होकर पूछा, “लेकिन हुआ क्या है? अभी तो सब ठीक चल रहा था।”
अरुण ने भारी आवाज में कहा, “कारोबार में बहुत बड़ा नुकसान हो गया है। कुछ लोगों ने हमारा पैसा नहीं लौटाया। बैंक का कर्ज भी बढ़ गया है।”
कविता कुछ देर तक पति का चेहरा देखती रही।
उसे पहली बार महसूस हुआ कि जिस पैसे पर उसे इतना गर्व था, वह कितना अस्थिर था।
उसने अपनी अलमारी खोली।
महँगी साड़ियों की कतार, नए कपड़े, गहने और वह सारा सामान जिसे उसने कभी जरूरत से ज्यादा कीमत देकर खरीदा था—आज उसे देखकर उसका मन भारी हो गया।
उसे रमा की कही बात याद आई।
“आज पैसा है, कल परिस्थितियाँ बदल भी सकती हैं।”
कविता की आँखें नम हो गईं।
कुछ दिनों बाद घर के खर्च कम कर दिए गए।
कविता को अपने कई गहने बेचने पड़े।
रोहन के हाथ में मिलने वाला जेबखर्च भी बंद कर दिया गया।
रोहन ने नाराज होकर माँ से कहा, “माँ, अचानक आप इतनी कंजूसी क्यों करने लगीं? पहले तो आप कभी किसी चीज के लिए मना नहीं करती थीं।”
कविता ने दुखी होकर कहा, “बेटा, अब हमारे हालात पहले जैसे नहीं रहे।”
रोहन ने गुस्से में कहा, “तो इसमें मेरी क्या गलती है?”
कविता ने कुछ नहीं कहा।
उसके पास कोई जवाब नहीं था।
गलती रोहन की कम और उसकी अपनी ज्यादा थी।
उसने बेटे को जरूरत से ज्यादा दिया था, लेकिन जरूरत के समय खुद खड़े होना नहीं सिखाया था।
कुछ दिनों बाद रोहन ने दोस्तों से पैसे उधार लेने शुरू कर दिए।
जब कविता को यह पता चला तो उसका दिल बैठ गया।
उसने बेटे से कहा, “रोहन, दूसरों से उधार लेकर अपनी जरूरतें पूरी मत करो। जितना है, उसी में रहना सीखो।”
रोहन ने पहली बार माँ की आँखों में चिंता देखी।
वह कुछ नहीं बोला।
उधर आराध्या अपनी पढ़ाई में लगातार आगे बढ़ रही थी।
उसने कभी घर की आर्थिक स्थिति को अपनी पढ़ाई के रास्ते में नहीं आने दिया।
एक दिन रमा ने बेटी से कहा, “बेटी, जिंदगी में चाहे कितनी भी सुविधाएँ मिलें, मेहनत करना मत छोड़ना।”
आराध्या ने कहा, “जी माँ।”
रमा ने आगे कहा, “और एक बात याद रखना… कभी किसी इंसान को उसके कपड़ों, घर या पैसों से छोटा मत समझना।”
आराध्या ने माँ की बात ध्यान से सुनी।
उसे पता नहीं था कि उसकी माँ की यही सीख आगे चलकर उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी ताकत बनने वाली थी।
समय किसी के लिए रुकता नहीं।
आराध्या ने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली।
उसने मेहनत के दम पर एक बड़ी कंपनी में नौकरी हासिल कर ली।
जब उसे नियुक्ति-पत्र मिला तो सबसे पहले उसने अपनी माँ रमा के हाथ में वह पत्र रखा।
रमा ने पत्र पढ़ा और उसकी आँखों में खुशी के आँसू आ गए।
रमा ने बेटी को गले लगाते हुए कहा, “बेटी, आज मेरी सारी मेहनत सफल हो गई।”
आराध्या ने माँ से कहा, “माँ, आपने मुझे कभी महँगी चीजों का लालच नहीं दिया। आपने मुझे मेहनत करना सिखाया। आज जो कुछ मिला है, वह आपकी सीख की वजह से मिला है।”
मोहन ने भावुक होकर बेटी के सिर पर हाथ रखा और कहा, “हमें तुम पर बहुत गर्व है।”
कुछ ही दिनों बाद आराध्या को नौकरी के लिए दूसरे शहर जाना था।
सामान पैक हो चुका था।
रमा अपनी बेटी के कपड़ों को देखते हुए बार-बार उन्हें ठीक कर रही थी। उसके हाथ काम कर रहे थे, लेकिन मन बेटी के जाने की कल्पना से भर आया था।
आराध्या ने माँ को देखकर कहा, “माँ, आप रो क्यों रही हैं? मैं नौकरी के लिए जा रही हूँ, हमेशा के लिए थोड़ी जा रही हूँ।”
रमा ने मुस्कुराते हुए अपनी आँखें पोंछीं और कहा, “माँ का मन है बेटी… बेटी कितनी भी बड़ी हो जाए, उसे विदा करते समय आँखें नम हो ही जाती हैं।”
फिर रमा ने बेटी का हाथ पकड़कर कहा, “आराध्या, एक बात हमेशा याद रखना।”
आराध्या ने पूछा, “क्या माँ?”
रमा ने कहा, “पहली तनख्वाह हाथ में आए तो यह मत सोचना कि अब तुम दूसरों से बड़ी हो गई हो। पैसा इंसान को बड़ा नहीं बनाता। पैसा तो आज है, कल नहीं भी हो सकता।”
आराध्या चुपचाप माँ की बात सुनती रही।
रमा ने आगे कहा, “जिस कंपनी में काम करोगी, वहाँ अपने से बड़े अधिकारी का सम्मान करना, लेकिन अपने से छोटे कर्मचारी को कभी छोटा मत समझना। तुम्हारे साथ सफाई करने वाला हो, चाय देने वाला हो या तुम्हारे साथ काम करने वाला कोई साधारण कर्मचारी—सबसे सम्मान से बात करना।”
आराध्या की आँखें नम हो गईं।
उसने कहा, “जी माँ, मैं आपकी हर बात याद रखूँगी।”
रमा ने बेटी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटी, अच्छी नौकरी मिलना बड़ी बात नहीं है। अच्छा इंसान बने रहना बड़ी बात है।”
आराध्या ने माँ के पैर छुए।
मोहन ने बेटी को गले लगाते हुए कहा, “जहाँ रहना, खुश रहना और अपने संस्कारों को कभी मत भूलना।”
आराध्या ने कहा, “जी पापा।”
वह कैब में बैठ गई।
कैब धीरे-धीरे घर से दूर जाने लगी।
रमा और मोहन काफी देर तक उसे जाते हुए देखते रहे।
कुछ दूरी पर कविता भी खड़ी थी।
उसकी आँखों के सामने कई साल पुराने दृश्य घूमने लगे।
उसे याद आया कि किस तरह उसने रमा की सादगी का मजाक उड़ाया था।
उसे याद आया कि उसने अपने बेटे को बिना मेहनत के पैसे दिए थे।
उसे याद आया कि रमा बार-बार कहती थी—
“बच्चों को पैसे से ज्यादा शिक्षा और संस्कार दीजिए।”
कविता की आँखों से आँसू बहने लगे।
उसने अपने बेटे रोहन की ओर देखा।
रोहन अब पहले जैसा नहीं रहा था। हालात ने उसे भी बहुत कुछ सिखा दिया था। वह छोटे-छोटे काम सीखने और अपनी पढ़ाई पूरी करने की कोशिश कर रहा था।
कविता ने मन ही मन कहा, “काश! मैंने भी अपने बेटे को सिर्फ सुविधाएँ देने के बजाय मेहनत करना सिखाया होता। काश! मैंने पैसे को अपनी ताकत समझने के बजाय शिक्षा और संस्कार को अपनी असली पूँजी माना होता।”
रमा उसके पास आई।
कविता ने आँसू पोंछते हुए कहा, “रमा, तुम सही कहती थीं। मैंने बहुत देर से समझा कि पैसा सब कुछ नहीं होता।”
रमा ने प्यार से कहा, “भाभी, देर हुई है, लेकिन सब खत्म नहीं हुआ। जब इंसान अपनी गलती समझ लेता है, तभी बदलाव की शुरुआत होती है।”
कविता ने रमा का हाथ पकड़ लिया।
उसने कहा, “अब मैं रोहन को सिर्फ पैसे नहीं दूँगी। उसे अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाऊँगी।”
रमा मुस्कुराई और बोली, “यही सबसे बड़ी बात है।”
कविता ने दूर जाती हुई कैब की ओर देखा।
उसकी आँखों में पछतावा भी था और एक नई उम्मीद भी।
उस दिन उसे पहली बार समझ आया कि घर में रखे महँगे सामान, गहने और पैसा इंसान को अमीर नहीं बनाते। असली अमीरी तो उस शिक्षा, संस्कार और अच्छे व्यवहार में होती है, जिसे इंसान अपनी अगली पीढ़ी को देकर जाता है।
पैसा सच में हाथ का मैल है—आज है तो कल नहीं भी हो सकता।
लेकिन अच्छे संस्कार और शिक्षा ऐसी पूँजी हैं, जो परिस्थितियाँ बदल जाने के बाद भी इंसान का साथ नहीं छोड़तीं।

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