उम्र नहीं, खुशियां जरूरी हैं

 

Elderly Indian couple enjoying a joyful family moment with their son and granddaughter at home


“सुनिए जी, एक बात कहूं?” रमा जी ने अपने पति की ओर देखते हुए कहा।


“हां, बोलो। इतनी गंभीर आवाज में क्यों पूछ रही हो?” शंकर जी ने अखबार से नजर हटाकर पूछा।


“मेरा बहुत मन कर रहा है कि हम दोनों कहीं घूमने चलें।”


“कहीं घूमने?” शंकर जी ने हैरानी से पूछा।


“हां। शहर से बाहर नहीं जाना है। बस किसी अच्छे से होटल में खाना खाएंगे, थोड़ी देर पार्क में बैठेंगे और लौटते समय मंदिर भी चले जाएंगे।”


शंकर जी ने चश्मा ठीक करते हुए कहा, “तुम्हें अचानक घूमने का शौक कैसे जाग गया?”


रमा जी मुस्कुराकर बोलीं, “अचानक नहीं जागा। बहुत दिनों से मन में है। बस कह नहीं पा रही थी।”


“तो पहले क्यों नहीं कहा?”


“क्योंकि मुझे पता था कि आप यही कहेंगे कि अब हमारी उम्र घूमने-फिरने की नहीं रही।”


शंकर जी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “और गलत भी क्या कह रहा हूं? उम्र देखो अपनी। बासठ की हो गई हो।”


रमा जी ने तुरंत जवाब दिया, “और आप अड़सठ के होकर भी ऐसे बोल रहे हैं जैसे पूरे घर का हिसाब-किताब अभी भी बीस साल का लड़का संभाल रहा हो।”


शंकर जी हंस पड़े।


“अरे, मैं मजाक नहीं कर रही,” रमा जी ने थोड़ा रूठते हुए कहा, “सच में मेरा मन है कहीं जाने का।”


“रमा, अब ये सब अच्छा नहीं लगता।”


“क्या अच्छा नहीं लगता?”


“पति-पत्नी इस उम्र में घूमने जाएं, होटल में बैठकर खाना खाएं, पार्क में हाथ पकड़कर चलें... लोग क्या कहेंगे?”


रमा जी कुछ पल उन्हें देखती रहीं।


फिर धीरे से बोलीं, “लोग क्या कहेंगे, यही सोचते-सोचते तो हमारी आधी जिंदगी निकल गई।”


शंकर जी चुप हो गए।


रमा जी ने उनकी तरफ देखते हुए कहा, “जब बच्चों की पढ़ाई थी, तब हमने कहा कि बच्चे बड़े हो जाएं तो घूमेंगे। बच्चे बड़े हुए तो उनकी नौकरी और शादी की चिंता आ गई। उनकी शादी हो गई तो पोते-पोतियों की जिम्मेदारी आ गई। अब बच्चे अपने-अपने जीवन में व्यस्त हैं। तो क्या हम अपनी जिंदगी की छोटी-छोटी खुशियां भी छोड़ दें?”


शंकर जी ने अखबार मोड़कर मेज पर रख दिया।


“तुम भी ना, बात को कहां से कहां ले जाती हो।”


“क्योंकि आप मेरी बात समझते ही नहीं हैं।”


“मैं तुम्हारी बात समझता हूं।”


“तो फिर चलिए ना।”


“नहीं।”


“क्यों?”


“बस नहीं जाना।”


“एक बार पूछ तो लीजिए कि मैं कहां ले जाना चाहती हूं।”


“जहां भी ले जाना चाहती हो, मैं नहीं जाऊंगा।”


रमा जी ने मुंह फुलाते हुए कहा, “ठीक है। फिर मैं अकेली चली जाऊंगी।”


शंकर जी चौंककर बोले, “अकेली?”


“हां। अब मैं इतनी भी बूढ़ी नहीं हुई कि अपने घर से बाहर अकेली न जा सकूं।”


“रमा!”


“क्या हुआ?”


“तुम सच में नाराज हो गई?”


“नाराज नहीं हूं। बस सोच रही हूं कि अगर जिंदगी के इस पड़ाव पर भी अपनी खुशी के लिए किसी की अनुमति लेनी पड़े, तो फिर जिंदगी में अपने लिए बचा ही क्या?”


इतने में कमरे के बाहर से आवाज आई।


“मम्मी, पापा... आप दोनों किस बात पर बहस कर रहे हैं?”


रमा जी और शंकर जी ने दरवाजे की तरफ देखा।


उनका बेटा रोहित खड़ा था।


रोहित की उम्र लगभग पैंतीस साल थी। उसकी पत्नी पूजा और उनकी बारह साल की बेटी काव्या भी इसी घर में रहते थे। रोहित अपने पिता की छोटी-सी दुकान संभालता था, जबकि पूजा घर और परिवार को संभालती थी।


रोहित ने कमरे में आते हुए पूछा, “क्या हुआ?”


रमा जी ने तुरंत कहा, “कुछ नहीं हुआ बेटा।”


शंकर जी बोले, “तुम्हारी मां का मन घूमने जाने का है।”


रोहित मुस्कुराते हुए बोला, “तो इसमें समस्या क्या है?”


शंकर जी ने उसकी तरफ देखा और कहा, “तुम भी अपनी मां की तरफ से बोलोगे?”


“मैं किसी की तरफ से नहीं बोल रहा पापा। मैं तो बस इतना पूछ रहा हूं कि मम्मी घूमना चाहती हैं तो उन्हें क्यों नहीं ले जा रहे?”


शंकर जी ने कहा, “अरे बेटा, हमारी उम्र देखो। अब इस उम्र में पति-पत्नी ऐसे घूमते अच्छे थोड़ी लगते हैं।”


रोहित ने तुरंत कहा, “पापा, किस किताब में लिखा है कि उम्र बढ़ने के साथ खुशियां मनाना बंद कर देना चाहिए?”


शंकर जी चुप हो गए।


रोहित ने मुस्कुराकर कहा, “आपको याद है जब मेरी शादी हुई थी?”


“हां, तो?”


“तब आपने ही कहा था कि जिंदगी में सिर्फ जिम्मेदारियां मत निभाना, कभी-कभी अपनी पसंद के लिए भी समय निकालना।”


शंकर जी ने कुछ नहीं कहा।


रमा जी धीरे से मुस्कुरा दीं।


रोहित ने आगे कहा, “आज वही बात मैं आपको याद दिला रहा हूं।”


शंकर जी बोले, “तुम लोगों को तो बस अपनी मां की इच्छा पूरी करनी है।”


रोहित ने हंसते हुए कहा, “बिल्कुल करनी है।”


“और अगर मैं नहीं गया तो?”


“तो मम्मी मेरे साथ चली जाएंगी।”


रमा जी ने तुरंत कहा, “नहीं बेटा, तुम्हें क्यों परेशान करूं?”


रोहित ने कहा, “मम्मी, इसमें परेशानी कैसी? आप मेरी मां हैं। आपके साथ बाहर खाना खाने में मुझे खुशी होगी।”


शंकर जी ने थोड़ा नाराज होकर कहा, “हां, जाओ तुम दोनों। मुझे अकेला छोड़ दो।”


रोहित ने मुस्कुराते हुए कहा, “पापा, आप अकेले थोड़ी रहेंगे। मैं काव्या को आपके पास छोड़ दूंगा।”


इतने में बाहर से काव्या की आवाज आई।


“दादाजी, मैं आपके साथ रहूंगी तो आप मुझे मोबाइल भी नहीं देंगे।”


सब हंस पड़े।


शंकर जी ने कहा, “तू भी अपनी दादी की तरफ है?”


काव्या कमरे में आते हुए बोली, “मैं किसी की तरफ नहीं हूं दादाजी। मैं बस ये कह रही हूं कि दादी घूमने जाना चाहती हैं तो उन्हें जाने दीजिए।”


रमा जी ने काव्या को अपने पास बुलाकर प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा।


“मेरी समझदार बच्ची।”


शंकर जी ने कहा, “हां, अब इस घर में मेरी कोई नहीं सुनता।”


रमा जी ने मुस्कुराकर कहा, “आपकी सुनते हैं, लेकिन आपकी जिद नहीं सुनते।”


रोहित हंसते हुए बोला, “पापा, एक काम कीजिए। आप भी हमारे साथ चलिए।”


शंकर जी ने तुरंत कहा, “नहीं।”


“ठीक है।”


“इतनी जल्दी मान गए?”


“आप नहीं चलना चाहते तो कोई बात नहीं। हम दोनों जाएंगे।”


शंकर जी ने भौंहें सिकोड़ते हुए पूछा, “तुम दोनों?”


“हां।”


“और मैं?”


रोहित ने हंसते हुए कहा, “आपने खुद कहा कि नहीं जाना।”


शंकर जी कुछ बोलते-बोलते रुक गए।


रमा जी चुपचाप अपने पति का चेहरा देखने लगीं।


शंकर जी ने आखिरकार कहा, “अच्छा, अगर मैं चला भी गया तो लोग क्या कहेंगे?”


काव्या ने तुरंत कहा, “दादाजी, लोग वही कहेंगे जो आप उन्हें कहने देंगे।”


कमरे में फिर हंसी गूंज उठी।


शंकर जी ने काव्या को घूरते हुए कहा, “बहुत बड़ी हो गई है तू।”


काव्या ने हंसकर कहा, “आपसे तो छोटी ही हूं।”


शंकर जी भी अपनी हंसी रोक नहीं पाए।


रमा जी ने धीरे से कहा, “तो चलिए ना।”


शंकर जी ने कुछ पल सोचा और बोले, “ठीक है।”


रमा जी की आंखों में तुरंत चमक आ गई।


“सच?”


“हां, लेकिन एक शर्त है।”


“क्या?”


“बहुत देर तक बाहर नहीं रहेंगे।”


“मंजूर है।”


“और बहुत महंगा खाना नहीं खाएंगे।”


“वो भी मंजूर है।”


“और...”


रमा जी ने मुस्कुराकर पूछा, “अब और क्या?”


शंकर जी बोले, “तुम मेरे साथ ही चलोगी। बेटे के साथ अकेले नहीं।”


रमा जी खिलखिलाकर हंस पड़ीं।


“अरे वाह! अभी तक तो आपको अपनी उम्र की चिंता थी।”


“उम्र की चिंता अब भी है।”


“तो?”


“लेकिन अपनी पत्नी को बेटे के साथ भेजने की चिंता उससे ज्यादा है।”


रोहित ने सिर पकड़ते हुए कहा, “पापा, आप दोनों की नोकझोंक तो आज भी बिल्कुल नई शादी वाले पति-पत्नी जैसी है।”


काव्या ने तुरंत कहा, “दादाजी, अब जल्दी तैयार हो जाइए। नहीं तो दादी फिर से अपनी जिद शुरू कर देंगी।”


शंकर जी ने उठते हुए कहा, “हां-हां, जा रहा हूं।”


रमा जी ने पूछा, “कहां?”


“तैयार होने।”


“इतनी जल्दी?”


शंकर जी बोले, “कहीं ऐसा न हो कि तुम लोग मुझे छोड़कर सच में चले जाओ।”


रोहित और रमा जी एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा दिए।


कुछ ही देर बाद शंकर जी तैयार होकर बाहर आए।


रमा जी उन्हें देखते ही हंस पड़ीं।


“इतनी जल्दी तैयार हो गए?”


शंकर जी ने कहा, “क्यों? अच्छा नहीं लग रहा?”


“बहुत अच्छे लग रहे हैं।”


“तो फिर हंस क्यों रही हो?”


“क्योंकि अभी कुछ देर पहले यही आदमी कह रहा था कि इस उम्र में बाहर घूमना अच्छा नहीं लगता।”


शंकर जी ने धीरे से कहा, “बात घूमने की नहीं थी।”


“फिर?”


“बात ये थी कि इतने सालों से मैंने अपनी खुशी को हमेशा बच्चों की खुशी के पीछे रखा। अब आदत हो गई है।”


रमा जी की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।


उन्होंने पति की तरफ देखा।


“तो आज एक दिन अपनी खुशी को भी आगे रख दीजिए।”


शंकर जी ने पत्नी की ओर देखा और मुस्कुराकर बोले, “आज रख दी।”


तीनों घर से निकल गए।


रास्ते में रोहित गाड़ी चला रहा था। पीछे की सीट पर रमा जी और शंकर जी बैठे थे।


रमा जी खिड़की से बाहर देखते हुए बोलीं, “देखिए, कितने साल हो गए इस सड़क पर ऐसे साथ बैठकर निकले हुए।”


शंकर जी ने कहा, “हां।”


“याद है हमारी शादी के बाद पहली बार आप मुझे मेले में लेकर गए थे?”


“मुझे सब याद है।”


“तब आपने मेरे लिए चूड़ियां खरीदी थीं।”


“और तुमने कहा था कि मुझे कुछ नहीं चाहिए।”


रमा जी मुस्कुराईं, “तब भी मैंने झूठ बोला था।”


शंकर जी हंस पड़े।


रोहित पीछे से दोनों की बातें सुन रहा था।


उसे पहली बार महसूस हुआ कि उसके माता-पिता सिर्फ उसके माता-पिता नहीं हैं।


उनकी अपनी भी एक दुनिया थी।


कुछ अधूरे सपने थे।


कुछ छोटी-छोटी इच्छाएं थीं।


कुछ ऐसी यादें थीं जिन्हें उन्होंने बच्चों की जिम्मेदारियों के नीचे दबा दिया था।


होटल पहुंचने के बाद रमा जी ने मेन्यू उठाया।


“आप क्या खाएंगे?”


शंकर जी बोले, “जो तुम खाओगी।”


रमा जी ने कहा, “आज कोई डाइट नहीं।”


“ठीक है।”


“आज मिठाई भी खाएंगे।”


“ठीक है।”


“और आइसक्रीम भी।”


“इतना सब?”


“क्यों? उम्र हो गई तो स्वाद भी भूल जाएं?”


शंकर जी ने मुस्कुराकर कहा, “नहीं। आज तुम्हारी सारी फरमाइश पूरी होगी।”


रोहित दूर बैठकर माता-पिता को देख रहा था।


उसके चेहरे पर एक अलग ही खुशी थी।


खाना खत्म होने के बाद रमा जी ने कहा, “रोहित, एक फोटो खींच दो।”


रोहित ने मोबाइल निकाला।


“पापा, मम्मी के पास बैठिए।”


शंकर जी थोड़ा संकोच करते हुए बोले, “अरे रहने दो।”


रमा जी ने उनका हाथ पकड़ लिया।


“बैठिए ना।”


शंकर जी बैठ गए।


रोहित ने फोटो खींच ली।


फिर काव्या को भेजने के लिए एक और फोटो खींची।


कुछ ही मिनट बाद काव्या का संदेश आया।


“दादाजी-दादी, आप दोनों बहुत प्यारे लग रहे हो।”


शंकर जी ने संदेश पढ़ा और चुपचाप मुस्कुराने लगे।


रमा जी ने पूछा, “क्या हुआ?”


उन्होंने फोन रमा जी की तरफ बढ़ाते हुए कहा, “काव्या ने लिखा है कि हम प्यारे लग रहे हैं।”


रमा जी ने मुस्कुराकर कहा, “तो मान गए ना कि उम्र सिर्फ संख्या है?”


शंकर जी ने उनकी तरफ देखते हुए कहा, “आज मान गया।”


रात को घर लौटने के बाद शंकर जी ने अपनी पुरानी अलमारी खोली।


रमा जी ने पूछा, “क्या ढूंढ रहे हैं?”


उन्होंने अंदर से एक पुराना डिब्बा निकाला।


डिब्बे में कुछ पुरानी तस्वीरें थीं।


उन्होंने एक तस्वीर रमा जी के हाथ में रख दी।


रमा जी तस्वीर देखते ही चुप हो गईं।


तस्वीर में दोनों बहुत युवा थे।


शादी के कुछ महीनों बाद की तस्वीर थी।


रमा जी की आंखें नम हो गईं।


“आपने इसे संभालकर रखा था?”


शंकर जी ने कहा, “हां।”


“क्यों?”


“क्योंकि इसमें वो रमा है जो हमेशा कुछ न कुछ करने का सपना देखा करती थी।”


रमा जी ने धीमे स्वर में पूछा, “और अब?”


शंकर जी ने उनका हाथ पकड़कर कहा, “अब वही रमा फिर से जीना शुरू करेगी।”


रमा जी की आंखों से आंसू निकल आए।


“आपको पता है, मेरी सबसे बड़ी इच्छा क्या है?”


“क्या?”


“मैं चाहती हूं कि हम बुढ़ापे को बोझ की तरह नहीं, जिंदगी का सबसे शांत और खूबसूरत हिस्सा बनाकर जिएं।”


शंकर जी ने सिर हिलाया।


“और मैं चाहता हूं कि अब हमारे बच्चों को हमारी चिंता कम और हमारी खुशी ज्यादा दिखाई दे।”


तभी दरवाजे पर रोहित खड़ा दिखाई दिया।


उसने माता-पिता की बातें सुन ली थीं।


वह अंदर आया और बोला, “पापा, एक बात कहूं?”


“हां।”


“आप दोनों ने हमारे लिए पूरी जिंदगी लगा दी। अब हमारी बारी है कि हम आपको आपकी छोटी-छोटी खुशियां लौटाएं।”


रमा जी ने बेटे को गले लगा लिया।


शंकर जी ने भी रोहित के कंधे पर हाथ रख दिया।


उसी समय काव्या दौड़ती हुई कमरे में आई।


“दादाजी!”


“क्या हुआ?”


“अगली बार मैं भी आपके साथ मूवी देखने चलूंगी।”


शंकर जी मुस्कुराकर बोले, “क्यों?”


काव्या ने कहा, “क्योंकि अब मुझे डर है कि आप दोनों अकेले घूमने निकल गए तो मुझे पीछे छोड़ देंगे।”


सब हंस पड़े।


शंकर जी ने अपनी पत्नी की ओर देखा।


“रमा, अगली बार कहां चलना है?”


रमा जी ने मुस्कुराकर कहा, “जहां आप कहें।”


“नहीं।”


“क्यों?”


“अब जहां तुम कहोगी, वहीं चलेंगे।”


रमा जी की आंखें फिर नम हो गईं।


उन्होंने धीरे से कहा, “फिर तो बहुत जगह जाना बाकी है।”


शंकर जी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “जिंदगी बाकी है तो जगहें भी बहुत हैं।”


और उस दिन के बाद उस घर में एक छोटी-सी परंपरा शुरू हो गई।


हर महीने परिवार का एक दिन सिर्फ खुशियों के नाम होता।


कभी फिल्म देखने जाते, कभी पार्क में बैठते, कभी बाहर खाना खाते, कभी मंदिर चले जाते और कभी बिना किसी खास वजह के बस लंबी ड्राइव पर निकल जाते।


शंकर जी अब भी कभी-कभी कहते, “इस उम्र में ये सब अच्छा लगता है क्या?”


और रमा जी हंसकर जवाब देतीं,


“जब दिल में खुशी बची हो, तो उम्र कभी रास्ते में नहीं आती।”


फिर शंकर जी भी मुस्कुराकर कहते,


“तो चलो, आज फिर कहीं चलते हैं।”


क्योंकि उन्होंने देर से सही, लेकिन एक जरूरी बात समझ ली थी—


बच्चों के बड़े हो जाने के बाद माता-पिता की जिंदगी खत्म नहीं होती।


जिम्मेदारियां कम होने के बाद उन्हें भी अपने लिए जीने का अधिकार होता है।


खुश रहने के लिए जवानी जरूरी नहीं होती, बस साथ देने वाला अपना इंसान और दिल में थोड़ी-सी खुशी जरूरी होती है।


और शायद जिंदगी की सबसे खूबसूरत बात यही है कि उम्र चाहे जितनी बढ़ जाए, अगर साथ में अपना कोई हो तो छोटी-सी सैर भी यादगार बन जाती है।



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