दहेज के तराजू में तौली गई बहू
"जिस बहू को ससुराल में उसके संस्कारों से नहीं, बल्कि मायके से आए सामान से तौला जाता था, एक दिन उसी बहू की असली कीमत पूरे परिवार के सामने आने वाली थी।"
सीमा जब शादी करके अमित के घर आई थी, तब उसके माता-पिता ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार बेटी को विदा किया था। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी की जमा पूंजी बेटी की शादी में लगा दी थी, लेकिन फिर भी वह सामान नहीं दे पाए थे जिसकी उम्मीद उसके ससुराल वालों ने मन में लगा रखी थी।
सीमा के ससुर गोपाल प्रसाद शहर में एक छोटा-सा व्यापार करते थे। उनकी पत्नी कमला देवी घर की मुखिया थीं। उनका बड़ा बेटा अमित था और छोटा बेटा रोहित।
शादी के बाद सीमा ने घर को अपना समझकर हर जिम्मेदारी निभानी शुरू कर दी।
वह सुबह उठकर घर का काम करती, सास-ससुर के लिए चाय बनाती, नाश्ता तैयार करती और सबकी जरूरतों का ध्यान रखती।
लेकिन उसकी मेहनत किसी को दिखाई नहीं देती थी।
कमला देवी की नजर हमेशा इस बात पर रहती कि सीमा अपने मायके से क्या लेकर आई है।
एक दिन कमला देवी ने रिश्तेदारी से आई एक महिला के सामने कहा,
"बहन, आजकल के लोग भी न जाने कैसी शादियां करते हैं। हमारी बहू के मायके वालों ने तो बस रस्म पूरी कर दी।"
वह महिला सीमा की तरफ देखने लगी।
सीमा ने सिर झुका लिया।
कमला देवी ने आगे कहा,
"हमने तो सोचा था कि कम से कम एक गाड़ी तो देंगे। लेकिन वहां तो बेटी की शादी करके ही अपनी जिम्मेदारी खत्म समझ ली।"
सीमा ने कुछ नहीं कहा।
उसने धीरे से चाय का कप सामने रखा और वापस रसोई में चली गई।
रसोई के एक कोने में जाकर उसने अपनी आंखों के आंसू पोंछे।
उसने खुद से कहा,
"मां-पापा ने जितना किया, अपनी क्षमता से ज्यादा किया। मैं उनके दिए हुए संस्कारों को कैसे छोटा होने दूं?"
लेकिन दुख सिर्फ सास के तानों का नहीं था।
अमित भी अक्सर अपनी मां की बातों पर चुप रहता।
एक दिन कमला देवी ने अमित से कहा,
"तुम्हारे छोटे भाई की शादी होगी तो देखना, ऐसी बहू लाऊंगी जो अपने साथ घर की हालत बदल दे।"
अमित ने कुछ नहीं कहा।
सीमा पास खड़ी थी।
उसने पति की ओर देखा, लेकिन अमित ने नजरें फेर लीं।
वह चुपचाप वहां से चली गई।
समय बीतता गया।
सीमा ने कभी किसी से शिकायत नहीं की।
ससुर की दवा खत्म होती तो वह खुद बाजार से लेकर आती।
सास के घुटनों में दर्द होता तो रात में उनके पैरों में तेल लगाती।
अमित काम से देर से आता तो उसके लिए खाना गर्म करके रखती।
फिर भी कमला देवी को सीमा में सिर्फ एक कमी दिखाई देती थी—दहेज की कमी।
कुछ वर्षों बाद रोहित की शादी तय हुई।
लड़की का नाम नेहा था।
नेहा एक संपन्न परिवार से थी।
शादी की तैयारियां शुरू हुईं तो कमला देवी के चेहरे पर अलग ही चमक दिखाई देने लगी।
वह रिश्तेदारों से कहतीं,
"इस बार भगवान ने मेरी सुन ली। छोटी बहू बड़े घर से आ रही है।"
शादी के बाद जब नेहा अपने मायके से विदा होकर ससुराल पहुंची तो उसके साथ कई गाड़ियां भी आईं।
एक नई कार, महंगा फर्नीचर, इलेक्ट्रॉनिक सामान, सोने के गहने और बहुत-सा सामान देखकर घर के लोग हैरान रह गए।
कमला देवी खुशी से सामान देखने लगीं।
उन्होंने पड़ोसियों से कहा,
"देखा आपने? छोटी बहू के मायके वालों ने हमारी इज्जत रख ली।"
गोपाल प्रसाद भी गर्व से बोले,
"आज समझ आया कि बेटी की शादी अच्छे घर में करने का मतलब क्या होता है।"
सीमा चुपचाप खड़ी थी।
कमला देवी ने उसकी ओर देखकर कहा,
"हर बहू अपने साथ कुछ न कुछ लेकर आती है। किसी के पास देने को होता है और किसी के पास सिर्फ बातें।"
सीमा ने सिर झुका लिया।
अमित सब सुन रहा था, लेकिन फिर भी कुछ नहीं बोला।
नेहा ने सीमा के चेहरे पर छाई उदासी देख ली।
उसने धीरे से सीमा का हाथ पकड़ लिया।
नेहा बोली,
"भाभी, आप बुरा मत मानिए।"
सीमा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
"तुम्हारी कोई गलती नहीं है।"
नेहा ने पूछा,
"लेकिन मां ऐसा क्यों कहती हैं?"
सीमा ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा,
"क्योंकि उन्हें लगता है कि इंसान की कीमत उसके साथ आए सामान से तय होती है।"
नेहा ने सीमा की ओर देखा।
उसे पहली बार समझ आया कि इस घर में वर्षों से क्या चल रहा था।
लेकिन उसे यह नहीं पता था कि आने वाले दिनों में वही दहेज इस परिवार के लिए सबसे बड़ा सवाल बनने वाला है।
क्योंकि कुछ ही दिनों बाद गोपाल प्रसाद के व्यापार में ऐसा नुकसान होने वाला था, जिससे पूरे परिवार की नींव हिलने वाली थी।
और तब पता चलने वाला था कि घर को संभालने की असली ताकत आखिर किसके पास है।
रोहित और नेहा की शादी को कुछ महीने बीत चुके थे।
नेहा अपने ससुराल में धीरे-धीरे घुलने-मिलने लगी थी।
कमला देवी अब भी अपनी छोटी बहू के मायके की तारीफ करती रहती थीं।
कभी कार की बात होती, कभी गहनों की।
वह रिश्तेदारों से कहतीं,
"मेरी छोटी बहू तो लक्ष्मी बनकर आई है।"
सीमा यह सब सुनती और चुप रहती।
लेकिन नेहा को अब सीमा के प्रति होने वाला भेदभाव अच्छा नहीं लगता था।
एक दिन नेहा ने कमला देवी से कहा,
"मां, भाभी भी तो घर के लिए बहुत कुछ करती हैं।"
कमला देवी ने तुरंत जवाब दिया,
"घर का काम करना कोई एहसान नहीं है। बहू का काम ही होता है घर संभालना।"
नेहा चुप हो गई।
लेकिन उसे पहली बार एहसास हुआ कि इस घर में सीमा की मेहनत को कभी सम्मान नहीं मिला।
इसी बीच गोपाल प्रसाद के व्यापार में परेशानी शुरू हो गई।
एक बड़ा सौदा अचानक रद्द हो गया।
जिस व्यक्ति को उन्होंने बड़ी रकम उधार दी थी, उसने पैसे लौटाने से मना कर दिया।
गोपाल प्रसाद ने व्यापार बचाने के लिए बैंक से कर्ज लिया था।
लेकिन नुकसान लगातार बढ़ता गया।
एक दिन अमित ने पिता से पूछा,
"पिताजी, दुकान का काम इतना खराब कैसे हो गया?"
गोपाल प्रसाद ने परेशान होकर कहा,
"कुछ फैसले गलत हो गए बेटा। सोचा था नुकसान जल्दी पूरा हो जाएगा, लेकिन बात बिगड़ती चली गई।"
रोहित भी चिंतित था।
उसने पूछा,
"अब क्या होगा?"
गोपाल प्रसाद ने कोई जवाब नहीं दिया।
कुछ दिनों बाद बैंक की नोटिस घर पहुंच गई।
गोपाल प्रसाद के हाथ कांपने लगे।
कमला देवी ने घबराकर पूछा,
"क्या हुआ?"
गोपाल प्रसाद ने कागज उनकी ओर बढ़ाते हुए कहा,
"अगर कर्ज की रकम नहीं चुकाई तो बैंक घर और दुकान पर कार्रवाई कर सकता है।"
कमला देवी के चेहरे का रंग उड़ गया।
जिस घर में कुछ समय पहले दहेज की कार देखकर गर्व किया जा रहा था, उसी घर में अब खर्च चलाना मुश्किल हो रहा था।
कमला देवी को अचानक अपनी छोटी बहू का मायका याद आया।
उन्होंने रोहित से कहा,
"बेटा, नेहा के पिताजी से बात करो। आखिर उनके पास इतनी संपत्ति है। अगर वह हमारी मदद कर दें तो यह परेशानी दूर हो सकती है।"
रोहित ने नेहा की तरफ देखा।
नेहा ने कहा,
"मैं पिताजी से बात कर सकती हूं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि वह व्यापार का कर्ज उठाएंगे।"
कमला देवी ने तुरंत कहा,
"क्यों नहीं उठाएंगे? आखिर उनकी बेटी इसी घर में है।"
रोहित ने ससुर से बात की।
लेकिन वहां से साफ जवाब मिला।
नेहा के पिता ने कहा,
"बेटा, शादी के समय हमने अपनी क्षमता के अनुसार सब कुछ दिया था। व्यापार में होने वाले नुकसान की जिम्मेदारी अब हमारी नहीं है।"
रोहित चुप हो गया।
घर लौटकर उसने सारी बात बता दी।
कमला देवी को बहुत बुरा लगा।
उन्होंने गुस्से में कहा,
"इतना सब देने का क्या फायदा, जब मुसीबत में बेटी के ससुराल वालों का साथ नहीं दे सकते?"
सीमा पास खड़ी थी।
उसने धीरे से कहा,
"मांजी, शायद दहेज और मदद में फर्क होता है। शादी में दिया गया सामान किसी रिश्ते की गारंटी नहीं होता।"
कमला देवी ने उसकी ओर देखा।
वह कुछ बोलतीं, उससे पहले गोपाल प्रसाद ने कहा,
"अभी बहस का समय नहीं है। हमें कर्ज चुकाने का रास्ता ढूंढना होगा।"
लेकिन रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था।
एक-एक करके घर का सामान बिकने लगा।
व्यापार बंद होने की नौबत आ गई।
अमित की नौकरी से आने वाली रकम भी घर चलाने में खत्म हो जाती।
रोहित भी परेशान था।
नेहा ने अपने कुछ गहने देने की बात कही, लेकिन कमला देवी ने मना कर दिया।
उन्होंने कहा,
"शादी में जो मिला है, वह तुम्हारा है। उसे मत बेचो।"
सीमा सब देख रही थी।
लेकिन वह अब भी चुप थी।
एक रात अमित ने सीमा से कहा,
"मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या करूं। पिताजी ने जिंदगी भर मेहनत की और अब सब कुछ खत्म होने वाला है।"
सीमा ने शांत स्वर में कहा,
"सब कुछ खत्म नहीं हुआ है।"
अमित ने पूछा,
"तुम्हें ऐसा क्यों लगता है?"
सीमा ने कहा,
"क्योंकि जब तक इंसान के पास मेहनत करने की ताकत है, तब तक सब कुछ खत्म नहीं होता।"
अमित ने पहली बार अपनी पत्नी की आंखों में अलग तरह का आत्मविश्वास देखा।
उसने पूछा,
"तुम कुछ जानती हो क्या?"
सीमा ने जवाब नहीं दिया।
वह अपने कमरे में गई और अलमारी खोली।
अलमारी के नीचे रखे एक पुराने बैग को बाहर निकाला।
उसमें कुछ कागज और एक फाइल रखी थी।
सीमा ने फाइल हाथ में ली और कुछ पल उसे देखती रही।
फिर उसने गहरी सांस ली।
वह जानती थी कि अब वह राज छिपाकर रखने का समय खत्म हो चुका है।
लेकिन उसे यह भी पता था कि जब यह फाइल पूरे परिवार के सामने खुलेगी, तब शायद कुछ लोगों को अपने पुराने व्यवहार पर शर्म आएगी।
सीमा हाथ में फाइल लेकर कमरे में आई।
गोपाल प्रसाद, कमला देवी, अमित, रोहित और नेहा सभी वहीं बैठे थे।
गोपाल प्रसाद ने परेशान होकर पूछा,
"सीमा, इस समय यह फाइल क्यों लाई हो?"
सीमा ने फाइल उनके सामने रखते हुए कहा,
"पिताजी, इसे एक बार देख लीजिए।"
गोपाल प्रसाद ने फाइल खोली।
पहले पन्ने पर कुछ निवेश से जुड़े दस्तावेज थे।
दूसरे पन्ने पर बैंक की रसीदें थीं।
फिर एक छोटे व्यवसाय से जुड़े कागज थे।
गोपाल प्रसाद एक-एक कागज देखते गए।
उनके चेहरे पर हैरानी बढ़ती गई।
उन्होंने पूछा,
"यह सब क्या है?"
सीमा ने कहा,
"मैंने पिछले कुछ वर्षों से थोड़ा-थोड़ा पैसा बचाया था। घर के खर्च से जो रकम बचती थी, उसे मैंने निवेश किया। साथ ही घर बैठे एक छोटा ऑनलाइन काम भी शुरू किया था।"
अमित हैरान रह गया।
उसने पूछा,
"तुमने मुझे कभी बताया क्यों नहीं?"
सीमा ने उसकी तरफ देखकर कहा,
"जब इस घर में मेरी बात की कीमत ही नहीं थी, तब मैं अपनी जमा पूंजी की बात किससे करती?"
अमित के पास कोई जवाब नहीं था।
सीमा ने आगे कहा,
"मैंने यह पैसा इसलिए नहीं बचाया था कि किसी को नीचा दिखा सकूं। मैंने बस इतना सोचा था कि अगर कभी परिवार पर मुसीबत आए तो किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े।"
गोपाल प्रसाद की आंखें नम हो गईं।
उन्होंने कांपती आवाज में पूछा,
"इसमें कितने पैसे हैं?"
सीमा ने रकम बताई।
कमरे में बैठे सभी लोग स्तब्ध रह गए।
वह रकम इतनी थी कि बैंक का बड़ा हिस्सा चुकाया जा सकता था और व्यापार को दोबारा शुरू करने के लिए भी कुछ पैसा बच सकता था।
कमला देवी की आंखों से आंसू निकल पड़े।
वह सीमा के पास आईं और बोलीं,
"बेटी, हमने तुम्हें हमेशा कम समझा।"
सीमा ने कहा,
"मांजी, मुझे दुख इस बात का नहीं था कि आपने मुझे कम समझा। दुख इस बात का था कि आपने मेरे माता-पिता को उनके दिए हुए सामान से कम समझा।"
कमला देवी रोने लगीं।
उन्होंने कहा,
"मैंने तुम्हें कितनी बार ताने दिए। तुम्हारे मायके को छोटा समझा। छोटी बहू के दहेज को देखकर तुम्हें सबके सामने अपमानित किया।"
सीमा ने शांत स्वर में कहा,
"मांजी, वह सब बातें मुझे याद हैं। लेकिन मैं उन्हें लेकर जिंदगी भर नाराज नहीं रहना चाहती।"
गोपाल प्रसाद ने सिर झुका लिया।
उन्होंने कहा,
"हमने सोचा था कि दहेज से घर की इज्जत बढ़ती है। आज समझ आया कि घर की इज्जत सामान से नहीं, इंसानों से होती है।"
रोहित ने भी सीमा के सामने हाथ जोड़ दिए।
वह बोला,
"भाभी, मैंने भी कभी आपके लिए आवाज नहीं उठाई। मुझे माफ कर दीजिए।"
सीमा ने उसे रोकते हुए कहा,
"रिश्तों में माफी मांगना जरूरी है, लेकिन उससे ज्यादा जरूरी है कि वही गलती दोबारा न हो।"
नेहा ने सीमा का हाथ पकड़ लिया।
उसने कहा,
"भाभी, आज मुझे समझ आया कि किसी घर में बहू दहेज लेकर नहीं, अपना पूरा जीवन लेकर आती है।"
अमित की आंखें भर आईं।
वह सीमा के पास आया और बोला,
"सीमा, मैंने सबसे बड़ी गलती की। जब मां तुम्हें ताने देती थीं, तब मुझे तुम्हारे साथ खड़ा होना चाहिए था। लेकिन मैं चुप रहा।"
सीमा ने कहा,
"चुप रहना भी कई बार गलत बात का साथ देना होता है।"
अमित ने सिर झुका लिया।
अगले दिन सीमा ने अपनी जमा पूंजी का कुछ हिस्सा निकालकर गोपाल प्रसाद का कर्ज चुकाने में मदद की।
बाकी रकम से व्यापार को दोबारा शुरू किया गया।
गोपाल प्रसाद ने इस बार व्यापार का तरीका बदल दिया।
कुछ महीनों की मेहनत के बाद उनका काम फिर से चलने लगा।
लेकिन उस घर में सबसे बड़ा बदलाव आर्थिक नहीं था।
अब कमला देवी जब भी किसी शादी में जातीं तो दहेज की चर्चा करने के बजाय एक ही बात कहतीं,
"बेटी के माता-पिता से सामान मत मांगिए। बेटी को सम्मान दीजिए। अगर वह संस्कार और प्यार लेकर आपके घर आती है तो उससे बड़ा दहेज कोई नहीं।"
एक दिन पड़ोस की एक महिला ने कमला देवी से पूछा,
"आपकी बड़ी बहू तो शादी में ज्यादा सामान लेकर नहीं आई थी। फिर भी आप उसकी इतनी तारीफ क्यों करती हैं?"
कमला देवी ने मुस्कुराकर कहा,
"क्योंकि अब मुझे समझ आया है कि मेरी बहू खाली हाथ नहीं आई थी। वह अपने साथ ईमानदारी, मेहनत, संस्कार और पूरे परिवार को संभालने का हुनर लेकर आई थी। खाली तो हमारी सोच थी।"
सीमा दरवाजे के पास खड़ी यह बात सुन रही थी।
उसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन इस बार वे आंसू दुख के नहीं थे।
वे उस सम्मान के थे जिसका इंतजार उसने वर्षों तक किया था।
गोपाल प्रसाद ने परिवार के सभी सदस्यों से कहा,
"आज से इस घर में किसी बहू की कीमत उसके मायके से आए सामान से नहीं आंकी जाएगी। और अगर कोई ऐसा करेगा तो सबसे पहले मैं उसका विरोध करूंगा।"
कमला देवी ने सीमा को अपने पास बुलाया।
उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा,
"बेटी, तुमने हमारा घर बचाया ही नहीं, हमारी सोच भी बचा ली।"
सीमा मुस्कुराई और बोली,
"घर तभी बचता है मांजी, जब उसमें रहने वाले लोग एक-दूसरे का सम्मान करना सीख जाते हैं।"
उस दिन उस घर में कोई महंगी कार नहीं आई थी।
कोई सोने का हार नहीं आया था।
कोई लाखों रुपये का दहेज नहीं आया था।
लेकिन उस घर में पहली बार सम्मान आया था।
और शायद यही किसी भी बहू का सबसे बड़ा अधिकार है।
सीख:
दहेज से घर में सामान आ सकता है, लेकिन सुख नहीं। पैसा रिश्ते खरीद सकता है, लेकिन अपनापन नहीं। किसी बेटी को उसके मायके की हैसियत से नहीं, उसके संस्कार और इंसानियत से पहचानिए। क्योंकि कभी-कभी जिसे हम सबसे कम समझते हैं, वही मुश्किल वक्त में हमारे पूरे परिवार का सबसे बड़ा सहारा बन जाता है।

Post a Comment