बहू की जिम्मेदारी

 

Emotional Indian family reconciliation between a mother-in-law and daughter-in-law in a traditional home


जिस बहू को घर की जिम्मेदारी समझाने वाली सास ने एक दिन उसी बहू के सामने हाथ जोड़ दिए....


“बहू, यह घर है, कोई सराय नहीं कि जब मन हुआ आई और जब मन हुआ चली गई।”


विमला देवी की कड़क आवाज सुनकर नेहा दरवाजे पर ही रुक गई।


उसके हाथ में एक छोटा सा बैग था और चेहरे पर थकान साफ दिखाई दे रही थी।


नेहा ने धीरे से बैग नीचे रखा और अपनी सास की तरफ देखकर पूछा, “मम्मी जी, मैंने ऐसा क्या कर दिया?”


विमला देवी ने गुस्से में कहा, “क्या कर दिया? तुम्हें अपने घर की कोई चिंता है भी या नहीं? तुम्हारे ससुर जी की दवा खत्म हो गई, तुम्हारे पति अभी तक खाना खाए बिना बैठे हैं, बच्चे स्कूल से लौटकर तुम्हें ढूंढ रहे हैं और तुम पता नहीं कहां घूमती रहती हो।”


नेहा ने कुछ कहना चाहा, लेकिन तभी उसका पति रोहित कमरे से बाहर आया।


रोहित ने नेहा को देखते हुए कहा, “नेहा, मां सही कह रही हैं। तुमने फोन पर कहा था कि एक घंटे में घर आ जाओगी। चार घंटे हो गए।”


नेहा ने थके हुए स्वर में कहा, “मैं घूमने नहीं गई थी, रोहित।”


रोहित ने नाराज होकर पूछा, “तो फिर कहां गई थीं?”


नेहा ने कुछ पल चुप रहकर कहा, “अस्पताल।”


विमला देवी ने व्यंग्य करते हुए पूछा, “अब किसका अस्पताल? मायके में किसी को जरा सी छींक आए तो हमारी बहू अपना घर छोड़कर वहां पहुंच जाती है।”


नेहा ने शांत स्वर में कहा, “मां की तबीयत खराब थी।”


विमला देवी ने तुरंत कहा, “तुम्हारी मां की तबीयत तो हर महीने खराब हो जाती है।”


नेहा ने अपनी आंखों में आए आंसू रोकते हुए कहा, “मम्मी जी, मेरी मां अकेली रहती हैं। पिताजी को गए तीन साल हो गए। उनका ध्यान रखने वाला मेरे अलावा कोई नहीं है।”


विमला देवी ने कहा, “और हमारा ध्यान रखने वाला कौन है? क्या हम तुम्हारे लिए कोई नहीं हैं?”


नेहा ने उनकी तरफ देखकर कहा, “आप मेरे लिए बहुत मायने रखती हैं, मम्मी जी। लेकिन मेरी मां भी मेरी जिम्मेदारी हैं।”


रोहित ने बीच में कहा, “नेहा, जिम्मेदारी की बात मत करो। शादी के बाद सबसे पहली जिम्मेदारी पति और ससुराल की होती है।”


नेहा ने रोहित की ओर देखा।


“रोहित, क्या शादी के बाद बेटी होना खत्म हो जाता है?”


रोहित चुप हो गया।


नेहा ने आगे कहा, “क्या शादी के बाद मेरी मां मेरी मां नहीं रहतीं?”


विमला देवी ने कहा, “बेटी हो, लेकिन हर बात की एक सीमा होती है।”


नेहा ने धीरे से पूछा, “सीमा किसकी, मम्मी जी? बेटी की या मां की?”


विमला देवी के पास कोई जवाब नहीं था।


नेहा ने अपना बैग उठाया और कमरे में चली गई।


उस रात उसने किसी से कोई बहस नहीं की।


बच्चों को खाना खिलाया।


ससुर जी की दवा दी।


रोहित के लिए खाना लगाया।


सास के पैर दबाए।


और फिर चुपचाप अपने कमरे में चली गई।


रोहित कमरे में आया तो देखा नेहा बिस्तर पर बैठी अपनी मां की दवाइयों की पर्ची देख रही थी।


रोहित ने पूछा, “डॉक्टर ने क्या कहा?”


नेहा ने कहा, “मां का ब्लड प्रेशर बहुत बढ़ गया था। डॉक्टर ने कुछ जांचें लिखी हैं।”


रोहित ने पूछा, “कितने पैसे लगेंगे?”


नेहा ने कहा, “अभी पता नहीं।”


रोहित ने कुछ देर सोचा और फिर कहा, “नेहा, तुम अपनी मां की मदद कर सकती हो, लेकिन हर बार मुझे बताए बिना वहां मत जाया करो।”


नेहा ने कहा, “ठीक है।”


रोहित ने कहा, “और हां, मां को समझा दो कि बार-बार तुम्हें परेशान न करें।”


नेहा ने उसकी ओर देखा।


“रोहित, मां मुझे परेशान नहीं करतीं। वह मुझे बुलाती भी नहीं हैं। मैं खुद जाती हूं।”


रोहित ने पूछा, “क्यों?”


नेहा की आंखें भर आईं।


“क्योंकि जब कोई इंसान अकेला हो जाता है ना, तो उसे बीमारी से ज्यादा अकेलेपन की जरूरत होती है।”


रोहित ने कोई जवाब नहीं दिया।


नेहा ने लाइट बंद कर दी।


लेकिन दोनों की आंखों में नींद नहीं थी।



नेहा की शादी को सात साल हो चुके थे।


शादी के बाद वह इसी घर में आई थी।


विमला देवी शुरू में उससे बहुत प्यार करती थीं।


वह कहा करती थीं, “नेहा, तू बहू नहीं बेटी बनकर रहना।”


नेहा ने भी उस बात को दिल से लगा लिया था।


उसने कभी सास-ससुर को अपने माता-पिता से अलग नहीं समझा।


विमला देवी की दवाइयां वह खुद लाती।


ससुर जी के लिए डॉक्टर की तारीख याद रखती।


रोहित ऑफिस से लौटे तो उसके लिए चाय बनाती।


दोनों बच्चों की पढ़ाई देखती।


और इन सबके साथ अपनी नौकरी भी करती।


वह सुबह घर से निकलने से पहले पूरा घर व्यवस्थित करती और ऑफिस से लौटने के बाद फिर घर के काम में लग जाती।


लेकिन पिछले कुछ समय से विमला देवी का व्यवहार बदल गया था।


उन्हें लगता था कि नेहा अपनी मां के प्रति ज्यादा जिम्मेदार है।


एक दिन विमला देवी ने पड़ोस की शारदा से कहा था—


“मेरी बहू को बस अपनी मां की पड़ी रहती है।”


यह बात नेहा ने सुन ली थी।


लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया।


उसे पता था कि जवाब देने से रिश्ते ठीक नहीं होते।


रिश्ते समझने से ठीक होते हैं।



कुछ दिन बाद नेहा की मां सुशीला का फोन आया।


“बेटी, तू परेशान मत होना। अब मेरी तबीयत ठीक है।”


नेहा ने पूछा, “मां, डॉक्टर ने जो जांच लिखी थी, वह करवाई?”


सुशीला ने कहा, “नहीं बेटी।”


नेहा ने चिंता से पूछा, “क्यों?”


सुशीला ने कहा, “इतने पैसे खर्च करने की जरूरत नहीं है। दवा से ठीक हो जाऊंगी।”


नेहा ने कहा, “मां, आप हमेशा पैसों की चिंता क्यों करती हैं?”


सुशीला हंसकर बोलीं, “बेटी, मां को अपनी बेटी की चिंता करनी चाहिए। बेटी को मां की नहीं।”


नेहा की आंखें भर आईं।


उसने कहा, “मां, आप मेरी चिंता मत किया करो। बस अपना ध्यान रखा करो।”


सुशीला ने कहा, “ठीक है बेटी।”


फोन कट गया।


नेहा देर तक मोबाइल को देखती रही।


उसे अपनी मां की आवाज में छिपी परेशानी साफ सुनाई दे रही थी।


उसने उसी दिन ऑफिस से छुट्टी लेने का फैसला किया।


लेकिन वह जानती थी कि घर में इसे लेकर फिर बात होगी।


और वही हुआ।


जब उसने विमला देवी को बताया कि वह अगले दिन मां के पास जाएगी, तो विमला देवी ने कहा, “फिर?”


नेहा ने कहा, “मम्मी जी, मां की जांच करवानी है।”


विमला देवी ने कहा, “तुम्हारे जाने से पहले घर की सारी व्यवस्था करके जाना।”


नेहा ने कहा, “जी।”


विमला देवी ने ताना देते हुए कहा, “काश तुम अपने ससुराल को भी अपनी मां जितना ही महत्व देती।”


नेहा ने शांत स्वर में कहा, “मम्मी जी, मैं अपने ससुराल को भी उतना ही महत्व देती हूं। तभी तो हर बार जाने से पहले यहां का काम पूरा करके जाती हूं।”


विमला देवी ने कोई उत्तर नहीं दिया।


अगले दिन नेहा अपनी मां के पास चली गई।



अस्पताल में डॉक्टर ने रिपोर्ट देखकर कहा, “इनका इलाज समय पर होना जरूरी है।”


नेहा घबरा गई।


“डॉक्टर साहब, ज्यादा गंभीर बात है क्या?”


डॉक्टर ने कहा, “अभी घबराने की जरूरत नहीं है। लेकिन दवाइयां नियमित चलनी चाहिए और इन्हें अकेला नहीं छोड़ना चाहिए।”


नेहा ने मां की तरफ देखा।


सुशीला ने नजरें झुका लीं।


नेहा समझ गई कि मां उससे कुछ छिपा रही हैं।


वह बोली, “मां, आपने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?”


सुशीला ने कहा, “तू अपने घर में खुश रह बेटी। मैं तेरी परेशानी नहीं बढ़ाना चाहती।”


नेहा ने मां का हाथ पकड़ लिया।


“मां, अगर आपकी परेशानी मेरी परेशानी नहीं होगी, तो किसकी होगी?”


सुशीला की आंखों से आंसू निकल पड़े।


“बेटी, तू अपने घर को संभाल। मैं किसी तरह संभाल लूंगी।”


नेहा ने दृढ़ता से कहा, “नहीं मां। अब आप अकेली नहीं रहेंगी।”


सुशीला ने घबराकर पूछा, “तू क्या करने वाली है?”


नेहा ने कहा, “आपको अपने पास ले जाऊंगी।”


सुशीला ने तुरंत मना कर दिया।


“नहीं बेटी, तेरे ससुराल वाले क्या कहेंगे?”


नेहा ने कहा, “जो कहना है कहने दीजिए।”


“नहीं बेटी, तेरे घर में झगड़ा हो जाएगा।”


नेहा ने मां का हाथ पकड़कर कहा, “मां, जिस घर में अपनी मां को जगह देने के लिए बेटी को डरना पड़े, वह घर अपना कैसे कहलाएगा?”


सुशीला चुप हो गईं।



नेहा वापस घर आई।


उसने रोहित से कहा, “मुझे आपसे एक जरूरी बात करनी है।”


रोहित ने पूछा, “क्या हुआ?”


नेहा ने कहा, “मैं मां को हमारे पास रखना चाहती हूं।”


रोहित चुप हो गया।


फिर उसने पूछा, “कुछ समय के लिए?”


नेहा ने कहा, “नहीं। जब तक वह ठीक नहीं हो जातीं।”


रोहित ने कहा, “नेहा, तुम जानती हो मां क्या कहेंगी?”


नेहा ने कहा, “जानती हूं।”


रोहित ने कहा, “घर में जगह भी नहीं है।”


नेहा ने कहा, “हमारे पास स्टोर रूम है। उसे ठीक करके मां के लिए कमरा बनाया जा सकता है।”


रोहित ने कहा, “बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होगी।”


नेहा ने कहा, “मां बच्चों को परेशान नहीं करेंगी।”


रोहित ने कहा, “मां मानेंगी नहीं।”


नेहा ने कहा, “मां को मनाने की जिम्मेदारी मेरी है।”


रोहित ने गहरी सांस ली।


“नेहा, मैं तुम्हारे साथ हूं। लेकिन मां को समझाना आसान नहीं होगा।”


नेहा ने कहा, “मुझे पता है।”


दोनों बाहर आए।


नेहा ने विमला देवी के सामने सारी बात रख दी।


विमला देवी का चेहरा कठोर हो गया।


उन्होंने कहा, “यह नहीं हो सकता।”


नेहा ने पूछा, “क्यों?”


विमला देवी ने कहा, “इस घर में पहले से ही इतने लोग हैं। अब तुम्हारी मां भी आ जाएंगी तो घर कैसे चलेगा?”


नेहा ने कहा, “मैं सब संभाल लूंगी।”


विमला देवी ने कहा, “नहीं बहू। बात सिर्फ काम की नहीं है।”


नेहा ने पूछा, “फिर बात किसकी है?”


विमला देवी ने कहा, “लोग क्या कहेंगे?”


नेहा कुछ पल चुप रही।


फिर बोली, “मम्मी जी, लोग हमारे साथ रहने नहीं आते। लोग हमारे दुख में एक दिन खड़े नहीं होते। फिर उनके कहने से मेरी मां अकेली क्यों रहें?”


विमला देवी नाराज हो गईं।


“तुम मुझे गलत साबित करना चाहती हो?”


नेहा ने कहा, “नहीं मम्मी जी। मैं आपको गलत साबित नहीं करना चाहती। मैं सिर्फ अपनी मां को अकेला नहीं छोड़ना चाहती।”


रोहित ने पहली बार अपनी मां के सामने पत्नी का साथ दिया।


“माँ, नेहा गलत नहीं कह रही।”


विमला देवी ने बेटे की ओर देखकर कहा, “तो अब तू भी अपनी पत्नी की बातों में आ गया?”


रोहित ने कहा, “नहीं माँ। मैं पहली बार उसकी बात समझ रहा हूं।”


विमला देवी चुप हो गईं।


कुछ देर बाद उन्होंने कहा, “ठीक है। लेकिन तुम्हारी मां के आने से घर की जिम्मेदारी तुम पर ही रहेगी।”


नेहा ने कहा, “मुझे मंजूर है।”



कुछ दिनों बाद सुशीला इस घर में आ गईं।


वह बहुत संकोच में थीं।


दरवाजे पर खड़ी होकर उन्होंने कहा, “बेटी, अगर किसी को मेरी वजह से परेशानी हो तो मुझे वापस छोड़ आना।”


नेहा ने मां का हाथ पकड़ लिया।


“मां, अब यह आपका भी घर है।”


सुशीला की आंखें भर आईं।


विमला देवी थोड़ी दूर खड़ी सब देख रही थीं।


उन्होंने औपचारिकता से कहा, “आइए।”


सुशीला ने उनके पैर छूने चाहे, लेकिन विमला देवी ने उन्हें रोकते हुए कहा, “रहने दीजिए।”


सुशीला ने हाथ जोड़ लिए।


“बहन जी, मेरी वजह से आपको कोई परेशानी हो तो बता दीजिएगा।”


विमला देवी ने कहा, “परेशानी होगी तो बता दूंगी।”


नेहा ने मां को उनके कमरे तक पहुंचाया।


कमरा छोटा था, लेकिन साफ और सुंदर था।


सुशीला ने चारों ओर देखा।


“बेटी, तूने मेरे लिए इतना सब किया?”


नेहा मुस्कुराई।


“मां, आपने मेरे लिए पूरी जिंदगी किया है। यह तो कुछ भी नहीं।”



शुरुआत के कुछ दिन ठीक रहे।


लेकिन धीरे-धीरे विमला देवी के मन में असंतोष बढ़ने लगा।


एक दिन उन्होंने देखा कि सुशीला बच्चों को कहानी सुना रही थीं।


विमला देवी ने कहा, “बहू, बच्चों को पढ़ाना है तो पढ़ाओ। हर समय कहानी सुनाने से पढ़ाई नहीं होगी।”


नेहा ने कहा, “मम्मी जी, बच्चे होमवर्क कर चुके हैं।”


विमला देवी चुप हो गईं।


दूसरे दिन सुशीला ने रसोई में जाकर सब्जी काटने की कोशिश की।


नेहा ने उन्हें रोक दिया।


“मां, डॉक्टर ने आपको ज्यादा काम करने से मना किया है।”


विमला देवी ने दूर से कहा, “जब से आई हैं, घर का काम करने की जरूरत ही नहीं समझतीं।”


नेहा को बात चुभी।


लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।


रात को सुशीला ने बेटी से कहा, “बेटी, मुझे वापस छोड़ आ।”


नेहा चौंक गई।


“मां, आप ऐसा क्यों कह रही हैं?”


सुशीला ने कहा, “मैं तेरे घर में बोझ बनना नहीं चाहती।”


नेहा ने मां को गले लगा लिया।


“मां, आप बोझ नहीं हैं।”


सुशीला ने कहा, “लेकिन तेरी सास खुश नहीं हैं।”


नेहा ने कहा, “उन्हें समय लगेगा।”


सुशीला ने कहा, “मुझे नहीं लगता।”


नेहा ने कहा, “मां, आपने मुझे बचपन में सिखाया था कि रिश्ते पहली परेशानी में छोड़ नहीं दिए जाते।”


सुशीला मुस्कुराईं।


“हां बेटी, सिखाया था।”


“तो अब मुझे भी रिश्ता निभाने दीजिए।”



समय बीतता गया।


एक दिन रोहित को ऑफिस में बड़ा नुकसान हो गया।


कंपनी में कुछ गलत दस्तावेज जमा होने के कारण उसके ऊपर आरोप लग गया।


रोहित घर आया तो उसका चेहरा उतरा हुआ था।


नेहा ने पूछा, “क्या हुआ?”


रोहित ने कहा, “मेरे ऊपर कंपनी का पैसा गलत तरीके से इस्तेमाल करने का आरोप लगा है।”


नेहा घबरा गई।


“लेकिन आपने ऐसा कुछ नहीं किया।”


रोहित ने कहा, “मैंने नहीं किया। लेकिन दस्तावेजों पर मेरे हस्ताक्षर हैं।”


विमला देवी घबरा गईं।


“बेटा, अब क्या होगा?”


रोहित ने कहा, “अगर मैं यह साबित नहीं कर पाया कि दस्तावेजों में बदलाव किसी और ने किया था तो नौकरी तो जाएगी ही, कानूनी परेशानी भी हो सकती है।”


नेहा ने कहा, “सारे कागज मुझे दिखाओ।”


रोहित ने कहा, “तुम क्या करोगी?”


नेहा ने कहा, “पहले देख तो लें।”


उसने कागजों को ध्यान से देखा।


तभी सुशीला कमरे के दरवाजे पर आकर खड़ी हो गईं।


उन्होंने कहा, “बेटी, तुम्हें कुछ याद आया?”


नेहा ने कहा, “मां, क्या?”


सुशीला ने कहा, “जब मैं स्कूल में काम करती थी, तब मेरे पास दस्तावेजों की जांच का काम होता था। तारीख और हस्ताक्षर की छोटी गलती से भी बहुत कुछ पता चल जाता था।”


नेहा ने तुरंत कागज उनकी तरफ बढ़ा दिए।


सुशीला ने दस्तावेज देखे।


कुछ देर बाद उन्होंने एक पन्ने की ओर इशारा किया।


“यह देखो।”


रोहित ने पूछा, “क्या?”


सुशीला ने कहा, “इस दस्तावेज पर तारीख बाद की है, लेकिन नीचे लगा संदर्भ नंबर पहले की फाइल का है।”


नेहा ने ध्यान से देखा।


रोहित भी चौंक गया।


सुशीला ने कहा, “हो सकता है किसी ने पुराने दस्तावेज में बाद की तारीख लगाकर इसे नया दिखाने की कोशिश की हो।”


रोहित ने तुरंत कंपनी की पुरानी फाइलें निकालीं।


जांच करने पर पता चला कि किसी कर्मचारी ने कंपनी के रिकॉर्ड में बदलाव किया था और गलती का आरोप रोहित पर डाल दिया था।


रोहित निर्दोष साबित हो गया।


वह घर आया तो सीधे अपनी सास के पास गया।


“मां, आपने मेरी बहुत बड़ी मदद की।”


सुशीला ने कहा, “बेटा, परिवार में कौन किसके काम आएगा, यह पहले से तय नहीं होता।”


रोहित की आंखें नम हो गईं।


उसने पहली बार सुशीला को सिर्फ अपनी पत्नी की मां के रूप में नहीं, बल्कि अपने परिवार के एक सदस्य के रूप में देखा।


विमला देवी भी चुपचाप यह सब देख रही थीं।


उनके मन में कुछ बदलने लगा था।



कुछ सप्ताह बाद विमला देवी की तबीयत अचानक खराब हो गई।


उन्हें तेज चक्कर आया और वह कमरे में गिर पड़ीं।


नेहा दौड़कर आई।


“मम्मी जी!”


रोहित भी घबरा गया।


सुशीला ने तुरंत कहा, “उन्हें अस्पताल ले जाओ।”


नेहा ने कहा, “मां, आप उनके साथ चलेंगी?”


सुशीला ने बिना एक पल सोचे कहा, “बिल्कुल।”


अस्पताल में डॉक्टर ने जांच की।


उन्होंने बताया कि विमला देवी का ब्लड शुगर बहुत गिर गया था।


उन्हें कुछ समय निगरानी में रखना होगा।


नेहा पूरी रात उनके पास बैठी रही।


सुशीला भी वहीं थीं।


विमला देवी ने कमजोर आंखों से सुशीला की ओर देखा।


उन्होंने धीमे से पूछा, “आप अभी तक यहीं हैं?”


सुशीला ने कहा, “आपको छोड़कर कैसे जाती?”


विमला देवी की आंखों में आंसू आ गए।


उन्होंने कहा, “मैंने आपके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया।”


सुशीला ने उनका हाथ पकड़ लिया।


“छोड़िए बहन जी। परिवार में कभी-कभी गलतफहमियां हो जाती हैं।”


विमला देवी ने कहा, “नहीं। गलती मेरी थी।”


सुशीला चुप रहीं।


विमला देवी ने कहा, “मैं सोचती थी कि बहू की मां हमारे घर में आएगी तो मेरा अधिकार कम हो जाएगा।”


सुशीला ने आश्चर्य से पूछा, “कैसा अधिकार?”


विमला देवी रो पड़ीं।


“बेटे पर। बहू पर। घर पर।”


सुशीला ने धीरे से कहा, “मां का प्यार बांटा नहीं जाता बहन जी। बढ़ता है।”


विमला देवी ने सुशीला का हाथ पकड़ लिया।


“काश मैंने यह बात पहले समझ ली होती।”



विमला देवी अस्पताल से घर लौटीं तो सबसे पहले सुशीला के कमरे में गईं।


सुशीला चारपाई पर बैठी थीं।


विमला देवी ने उनके सामने जाकर कहा, “बहन जी, मुझे माफ कर दीजिए।”


सुशीला घबरा गईं।


“अरे, आप ऐसा क्यों कर रही हैं?”


विमला देवी ने कहा, “क्योंकि मैंने आपको पराया समझा। जबकि आप मेरी बहू की मां हैं। जिस बेटी ने इतने साल मेरा घर संभाला, मैंने उसकी मां को अपने घर में जगह देने से डर महसूस किया।”


सुशीला ने कहा, “आपने मुझे जगह दी, यही बहुत है।”


विमला देवी ने कहा, “नहीं। अब मैं आपको जगह नहीं दे रही। मैं आपको अपना परिवार मान रही हूं।”


तभी दरवाजे पर खड़ी नेहा की आंखों से आंसू बह निकले।


रोहित भी वहां आ गया।


विमला देवी ने नेहा को पास बुलाया।


“बहू, तूने उस दिन मुझसे पूछा था कि शादी के बाद बेटी होना खत्म हो जाता है क्या?”


नेहा ने सिर झुका लिया।


विमला देवी ने कहा, “आज मैं उस सवाल का जवाब देना चाहती हूं।”


उन्होंने नेहा का हाथ पकड़कर कहा—


“नहीं बेटी। शादी के बाद बेटी होना खत्म नहीं होता। बल्कि एक बेटी दो घरों की जिम्मेदारी संभालती है। गलती हमारी थी कि हमने तुम्हारी जिम्मेदारी को तुम्हारी मजबूरी समझ लिया।”


नेहा रोते हुए अपनी सास के गले लग गई।


“मम्मी जी, मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं है।”


विमला देवी ने कहा, “लेकिन मुझे खुद से शिकायत है।”


रोहित ने मुस्कुराते हुए कहा, “माँ, अब शिकायत छोड़िए।”


विमला देवी ने पूछा, “क्यों?”


रोहित ने कहा, “क्योंकि अब हमारे घर में दो मां हैं।”


सुशीला मुस्कुराईं।


विमला देवी ने उनकी ओर देखकर कहा, “नहीं बेटा, अब तीन हैं।”


रोहित ने आश्चर्य से पूछा, “तीन?”


विमला देवी ने नेहा की ओर इशारा किया।


“यह भी तो इस घर की मां है। बच्चों की भी और हम सबकी भी।”


नेहा हंसते हुए रो पड़ी।



कुछ महीने बाद घर का माहौल पूरी तरह बदल चुका था।


सुशीला और विमला देवी साथ बैठकर बातें करतीं।


कभी दोनों बच्चों को कहानी सुनातीं।


कभी पुरानी यादें साझा करतीं।


रोहित ने घर के कामों में हाथ बंटाना शुरू कर दिया।


बच्चे भी अब दोनों नानियों और दादी के बीच खुश रहते।


एक दिन नेहा ऑफिस जाने के लिए तैयार हो रही थी।


विमला देवी ने कहा, “बहू, आज जल्दी मत आना।”


नेहा ने आश्चर्य से पूछा, “क्यों मम्मी जी?”


विमला देवी ने मुस्कुराकर कहा, “तेरी मां के साथ मेरी सहेली मंडली की बैठक है।”


सुशीला हंस पड़ीं।


“सहेली मंडली?”


विमला देवी ने कहा, “क्यों नहीं? अब आप मेरी बहन नहीं, सहेली भी हैं।”


नेहा मुस्कुराते हुए बाहर निकल गई।


दरवाजे तक पहुंचकर वह पलटी।


उसने दोनों माताओं को एक साथ बैठे देखा।


उसकी आंखों में खुशी के आंसू आ गए।


उसे लगा जैसे उसने अपनी मां को सिर्फ अपने घर में जगह नहीं दी थी।


उसने अपने घर को एक और मां दे दी थी।


और सबसे बड़ी बात—


उसने अपनी सास के मन से वह दीवार हटा दी थी, जो रिश्तों को खून और शादी के नाम पर अलग करती थी।


उस दिन नेहा ने समझा कि परिवार में सबसे जरूरी चीज बड़ी कमाई, बड़ा घर या महंगे सामान नहीं होते।


सबसे जरूरी होता है—


एक-दूसरे की जिम्मेदारियों को समझना।


क्योंकि एक बेटी शादी के बाद अपने मायके को छोड़ती जरूर है, लेकिन अपनी मां को नहीं छोड़ती।


और एक बहू जब ससुराल आती है, तो वह अपने माता-पिता के संस्कार साथ लेकर आती है।


अगर उसे सिर्फ जिम्मेदारियों से बांध दिया जाए, तो वह धीरे-धीरे थक जाती है।


लेकिन अगर उसके साथ खड़ा हुआ जाए, तो वही बहू पूरे परिवार को जोड़ने वाली सबसे मजबूत कड़ी बन जाती है।


विमला देवी ने उस दिन अपनी बहू से सिर्फ माफी नहीं मांगी थी।


उन्होंने एक सोच से माफी मांगी थी।


उस सोच से जिसमें बहू की जिम्मेदारियां गिनी जाती हैं, लेकिन उसके त्याग नहीं।


उस सोच से जिसमें बेटी की शादी के बाद उसके मायके को पराया समझ लिया जाता है।


और उस सोच से जिसमें घर की जिम्मेदारी सिर्फ एक महिला के कंधों पर डाल दी जाती है।


क्योंकि सच्चा परिवार वही है, जहां बहू से सिर्फ यह नहीं पूछा जाता कि उसने घर के लिए क्या किया, बल्कि यह भी पूछा जाता है कि घर ने उसके लिए क्या किया।


और जिस दिन यह बात हर परिवार समझ जाएगा, उस दिन बहुत से घर टूटने से बच जाएंगे।



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