हक भी बराबर, जिम्मेदारी भी
सुबह के करीब दस बजे का समय था।
आंगन में धूप धीरे-धीरे फैल रही थी। रसोई से चाय की खुशबू पूरे घर में फैल रही थी। कविता रसोई में खड़ी अपनी सास शारदा देवी के लिए दलिया बना रही थी।
शारदा देवी की उम्र करीब सत्तर वर्ष थी। कुछ दिनों से उनकी आंखों की रोशनी कम हो रही थी। डॉक्टर ने जांच के बाद बताया था कि दोनों आंखों में मोतियाबिंद है और जल्द ही ऑपरेशन करवाना जरूरी है।
कविता ने दलिया कटोरी में निकाला और सास के कमरे में पहुंची।
शारदा देवी चारपाई पर बैठी खिड़की के बाहर देख रही थीं।
कविता ने प्यार से कहा,
“मम्मी जी, आपका दलिया रख दिया है। पहले इसे खा लीजिए, फिर दवाई भी लेनी है।”
शारदा देवी ने कटोरी की तरफ देखते हुए कहा,
“रहने दे बहू, पहले मेरे पास बैठ।”
कविता पास रखी कुर्सी पर बैठ गई।
कविता ने पूछा,
“क्या हुआ मम्मी जी?”
शारदा देवी ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा—
शारदा देवी ने गंभीर आवाज में कहा,
“कविता बहू, डॉक्टर ने जो तारीख बताई थी ना… अगले बुधवार की… उसी दिन मेरा आंखों का ऑपरेशन करवाना है।”
कविता ने तुरंत कहा,
“जी मम्मी जी। आप चिंता मत कीजिए। मैं सब तैयारी कर लूंगी।”
शारदा देवी ने कहा,
“तैयारी ही तो करनी है। अस्पताल में पहले पैसे जमा होंगे। फिर ऑपरेशन होगा। दो-तीन दिन अस्पताल के चक्कर लगाने पड़ेंगे। मेरे साथ किसी को रहना पड़ेगा।”
कविता ने शांत स्वर में कहा,
“जी, मैं रहूंगी।”
शारदा देवी ने अचानक कविता की ओर देखा।
शारदा देवी ने कहा,
“तू रहेगी, ये तो तय है। आखिर बहू है मेरी। लेकिन इस बार खर्चा भी तुम्हें और महेश को ही देखना पड़ेगा।”
महेश कविता का पति था।
कविता कुछ पल चुप रही।
उसने सास की ओर देखा और धीरे से पूछा—
कविता ने कहा,
“मम्मी जी, इस बार रिया दीदी को भी बुला लेते हैं।”
रिया शारदा देवी की बेटी थी और शादी के बाद अपने पति नितिन के साथ दूसरे शहर में रहती थी।
शारदा देवी ने भौंहें सिकोड़ते हुए पूछा,
“रिया को क्यों बुलाना है?”
कविता ने शांत लेकिन स्पष्ट आवाज में कहा,
“मम्मी जी, आपकी आंखों का ऑपरेशन है। खर्चा भी थोड़ा ज्यादा आएगा और आपकी देखभाल भी करनी होगी। इसलिए मैंने सोचा कि रिया दीदी और जीजाजी भी इस जिम्मेदारी में हिस्सा लें।”
शारदा देवी का चेहरा अचानक बदल गया।
शारदा देवी ने नाराज होकर कहा,
“तुझे क्या हो गया है बहू? मेरी बेटी अपने घर में रहती है। उसके अपने खर्चे हैं। वह मेरा ऑपरेशन क्यों करवाएगी?”
कविता ने कोई जवाब नहीं दिया।
शारदा देवी ने बात आगे बढ़ाई।
शारदा देवी ने तीखे स्वर में कहा,
“मेरी बीमारी और मेरे इलाज की जिम्मेदारी मेरे बेटे की है। बेटी से ऐसी उम्मीद करना भी ठीक नहीं है।”
कविता ने गहरी सांस ली।
फिर उसने बहुत शांत आवाज में कहा—
कविता ने कहा,
“मम्मी जी, एक बात पूछूं?”
शारदा देवी ने कहा,
“पूछ।”
कविता ने कहा,
“जब पिताजी की मृत्यु के बाद यह घर और गांव वाली जमीन बांटी गई थी, तब रिया दीदी ने भी अपना हिस्सा लिया था ना?”
शारदा देवी कुछ पल के लिए चुप हो गईं।
शारदा देवी ने कहा,
“हां लिया था। उसमें गलत क्या है? वह उनका कानूनी हक था।”
कविता ने सिर हिलाते हुए कहा,
“बिल्कुल। मैंने भी यही कहा था कि वह उनका हक है। उन्हें मिलना ही चाहिए।”
शारदा देवी ने कहा,
“तो फिर?”
कविता ने शांत स्वर में कहा,
“तो फिर मम्मी जी… अगर संपत्ति में बेटी का हक बराबर है, तो माता-पिता की जिम्मेदारी में भी उसका हिस्सा होना चाहिए।”
शारदा देवी का चेहरा लाल हो गया।
शारदा देवी ने गुस्से में कहा,
“तू मुझे कानून समझाएगी?”
कविता ने तुरंत कहा,
“नहीं मम्मी जी। मैं आपको कानून नहीं समझा रही। मैं सिर्फ वही बात कह रही हूं जो आपने खुद मुझे सिखाई थी—हक और जिम्मेदारी साथ-साथ चलते हैं।”
शारदा देवी कुछ कहतीं, उससे पहले बाहर से महेश की आवाज आई।
महेश ने कमरे में आते हुए पूछा,
“क्या हुआ मां? सुबह-सुबह इतनी तेज आवाज क्यों आ रही है?”
शारदा देवी ने तुरंत शिकायत भरे अंदाज में कहा—
शारदा देवी ने कहा,
“अपने घर की बहू से पूछ! कह रही है कि मेरी बेटी मेरा ऑपरेशन करवाएगी।”
महेश ने कविता की ओर देखा।
महेश ने पूछा,
“कविता, तुमने ऐसा क्यों कहा?”
कविता ने शांत स्वर में पूरी बात बताई।
कविता ने कहा,
“महेश, मैं मां को अकेला नहीं छोड़ना चाहती। पिछली बार जब उनकी पित्त की थैली का ऑपरेशन हुआ था, तब हमने पूरा खर्च उठाया था। तुमने अस्पताल के चक्कर लगाए थे और मैंने करीब दस दिन उनकी सेवा की थी। मुझे उसमें कोई शिकायत नहीं है। मां हैं हमारी, सेवा करना हमारा कर्तव्य है।”
महेश चुपचाप सुनता रहा।
कविता ने आगे कहा,
“लेकिन रिया दीदी भी उनकी बेटी हैं। अगर हम दोनों बच्चों की बात करें, तो जिम्मेदारी सिर्फ बेटे की क्यों हो?”
महेश ने मां की ओर देखा।
महेश ने धीरे से कहा,
“मां, कविता गलत तो नहीं कह रही।”
शारदा देवी को बेटे की बात बिल्कुल पसंद नहीं आई।
शारदा देवी ने गुस्से में कहा,
“तू भी अपनी पत्नी की बातों में आ गया?”
महेश ने शांत स्वर में कहा,
“नहीं मां। मैं बस इतना कह रहा हूं कि रिया को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए।”
शारदा देवी ने तुरंत अपना फोन उठाया और रिया को फोन कर दिया।
कुछ देर बाद रिया का फोन उठ गया।
रिया ने फोन पर पूछा,
“हां मां, क्या हुआ?”
शारदा देवी ने शिकायत करते हुए कहा,
“तुम्हारी भाभी कह रही है कि तुम्हें मेरा ऑपरेशन करवाना चाहिए।”
फोन के दूसरी तरफ कुछ पल खामोशी रही।
रिया ने कहा,
“भाभी ने ऐसा क्यों कहा?”
शारदा देवी ने कहा,
“कह रही है कि तुम्हें संपत्ति में बराबर हिस्सा मिला है, इसलिए मां की जिम्मेदारी भी बराबर उठाओ।”
रिया चुप हो गई।
उसे याद आया कि कुछ महीने पहले गांव की जमीन का बंटवारा हुआ था। पिता की संपत्ति में उसे भी बराबर हिस्सा मिला था।
उस समय वह बहुत खुश हुई थी।
लेकिन मां की देखभाल की बात आते ही उसे हमेशा लगता था कि यह जिम्मेदारी उसके भाई की है।
रिया ने धीरे से कहा,
“मां, मैं बात समझती हूं। लेकिन नितिन की नौकरी ऐसी है कि…”
कविता ने फोन पर कुछ नहीं कहा।
महेश भी चुप रहा।
शारदा देवी ने तुरंत बेटी का पक्ष लेते हुए कहा—
शारदा देवी ने कहा,
“देखा! उसके अपने घर की जिम्मेदारियां हैं। तुम दोनों को समझना चाहिए।”
कविता ने पहली बार थोड़ा कठोर स्वर अपनाया।
कविता ने कहा,
“मम्मी जी, रिया दीदी के अपने घर की जिम्मेदारियां हैं, ये सही है। लेकिन आपके लिए हमारा घर भी तो उनकी जिम्मेदारी है। हम भी तो अपनी नौकरी, बच्चों और घर के बीच आपकी सेवा करते हैं।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
फिर कविता ने एक ऐसी बात कही, जिसने शारदा देवी को भीतर तक सोचने पर मजबूर कर दिया।
कविता ने कहा,
“मम्मी जी, मैं आपकी सेवा से पीछे नहीं हट रही। मैं सिर्फ इतना चाहती हूं कि सेवा को बेटे और बहू की मजबूरी न समझा जाए। अगर मां-बाप दोनों बच्चों के होते हैं, तो जिम्मेदारी भी दोनों बच्चों की होनी चाहिए।”
शारदा देवी ने गुस्से में मुंह फेर लिया।
शारदा देवी ने कहा,
“ठीक है। जो करना है कर। लेकिन मेरी बेटी को इस मामले में मत घसीटना।”
कविता ने कुछ नहीं कहा।
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ऑपरेशन से तीन दिन पहले
अगले तीन दिनों तक घर में ऑपरेशन की तैयारी होती रही।
कविता ने अस्पताल की फाइल तैयार की।
दवाइयां खरीदीं।
जरूरी कपड़े अलग रखे।
रिपोर्टों की फाइल बनाई।
महेश ने अस्पताल में पैसे जमा करने की व्यवस्था की।
लेकिन कविता के मन में एक बात लगातार चल रही थी।
वह चाहती थी कि रिया खुद आगे आए।
क्योंकि बात सिर्फ पैसों की नहीं थी।
बात सोच बदलने की थी।
ऑपरेशन से एक दिन पहले रिया और उसका पति नितिन अचानक घर पहुंच गए।
शारदा देवी अपनी बेटी को देखकर बहुत खुश हुईं।
शारदा देवी ने मुस्कुराते हुए कहा,
“अरे रिया! तू आ गई?”
रिया ने मां का हाथ पकड़कर कहा,
“हां मां। आपका ऑपरेशन है, तो मैं कैसे नहीं आती?”
शारदा देवी ने कविता की तरफ देखा।
उनकी आंखों में जैसे एक जीत का भाव था।
शारदा देवी ने कहा,
“देखा बहू? मेरी बेटी खुद आ गई। अब खुश?”
कविता मुस्कुरा दी।
कविता ने कहा,
“बहुत खुश हूं मम्मी जी।”
रिया ने मां की रिपोर्ट देखी।
फिर महेश से अस्पताल के खर्च के बारे में पूछा।
रिया ने पूछा,
“भैया, लगभग कितना खर्च आएगा?”
महेश ने कहा,
“डॉक्टर ने दोनों आंखों का ऑपरेशन अलग-अलग बताया है। अभी पहली आंख के लिए करीब पैंतालीस हजार का खर्च आएगा।”
रिया कुछ पल चुप रही।
नितिन ने भी उसकी तरफ देखा।
फिर रिया ने धीरे से पूछा—
रिया ने कहा,
“भैया, आपने पैसे जमा कर दिए?”
महेश ने कहा,
“हां।”
रिया ने तुरंत अपना पर्स खोला।
रिया ने कहा,
“तो पच्चीस हजार मेरी तरफ से।”
महेश ने चौंककर उसकी तरफ देखा।
महेश ने कहा,
“रिया, रहने दे।”
रिया ने दृढ़ता से कहा,
“नहीं भैया। मां सिर्फ आपकी नहीं हैं।”
शारदा देवी ने बेटी की तरफ देखा।
रिया ने मां का हाथ पकड़ लिया।
रिया ने कहा,
“मां, भाभी ने जो कहा था, पहले मुझे बुरा लगा था। लेकिन रास्ते में सोचती रही। जब पापा की जमीन में मैंने अपना हिस्सा लिया था, तब मैंने कभी नहीं कहा कि मैं बेटी हूं इसलिए मेरा हिस्सा कम होना चाहिए। मैंने पूरा हक लिया। तो फिर मां की जिम्मेदारी से पीछे हटना भी सही नहीं होगा।”
शारदा देवी की आंखें भर आईं।
रिया ने आगे कहा,
“आपने हमेशा मुझे बेटा कहा। लेकिन मां, सिर्फ बेटा कहलाने से बेटा नहीं बनते। जरूरत के समय साथ खड़ा होना पड़ता है।”
कविता चुपचाप खड़ी थी।
शारदा देवी ने उसकी ओर देखा।
शारदा देवी ने धीमी आवाज में कहा,
“बहू… तूने रिया को मेरे खिलाफ भड़काया नहीं?”
कविता की आंखें भर आईं।
कविता ने कहा,
“नहीं मम्मी जी। मैं किसी को आपके खिलाफ क्यों करूंगी? मैं तो चाहती हूं कि आपका घर आपके बच्चों की वजह से और मजबूत हो।”
रिया ने कविता का हाथ पकड़ लिया।
रिया ने कहा,
“भाभी, उस दिन आपकी बात मुझे कठोर लगी थी। लेकिन आज समझ आ रहा है कि आपकी बात में मेरे लिए भी एक आईना था।”
कविता ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
कविता ने कहा,
“दीदी, मुझे आपसे पैसे नहीं चाहिए थे। मुझे बस आपकी भागीदारी चाहिए थी।”
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अस्पताल का दिन
अगली सुबह चारों लोग अस्पताल पहुंचे।
शारदा देवी को ऑपरेशन थिएटर ले जाया गया।
बाहर कविता और रिया दोनों बैठी थीं।
महेश दवाइयों और कागजों की व्यवस्था कर रहा था।
नितिन अस्पताल के काउंटर पर भुगतान कर रहा था।
करीब एक घंटे बाद डॉक्टर बाहर आए।
डॉक्टर ने कहा,
“ऑपरेशन सफल रहा है। अभी कुछ घंटे निगरानी में रखना होगा।”
कविता ने राहत की सांस ली।
रिया की आंखों से आंसू निकल आए।
रिया ने कहा,
“भाभी, मां ठीक हो जाएंगी ना?”
कविता ने उसका हाथ पकड़कर कहा,
“हां दीदी। मां बिल्कुल ठीक होंगी।”
कुछ देर बाद शारदा देवी को कमरे में लाया गया।
उनकी आंखों पर पट्टी बंधी थी।
उन्होंने हाथ बढ़ाया।
शारदा देवी ने कहा,
“कविता… तू है?”
कविता ने उनका हाथ पकड़ लिया।
कविता ने कहा,
“हां मम्मी जी।”
फिर शारदा देवी ने दूसरे हाथ से किसी को टटोलना शुरू किया।
रिया ने तुरंत उनका हाथ पकड़कर कहा,
“मैं भी हूं मां।”
शारदा देवी की आंखों से आंसू बहने लगे।
शारदा देवी ने कहा,
“आज पहली बार मुझे लग रहा है कि मेरे दोनों बच्चे मेरे पास हैं।”
कविता ने कुछ नहीं कहा।
लेकिन उसके चेहरे पर संतोष था।
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छह महीने की जिम्मेदारी
अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद रिया ने एक और फैसला लिया।
रिया ने कहा,
“मां के पूरी तरह ठीक होने तक मैं हर महीने एक सप्ताह यहां रहूंगी।”
महेश ने कहा—
महेश ने कहा,
“एक सप्ताह क्यों? जितने दिन जरूरत हो, रहो।”
रिया मुस्कुराई।
रिया ने कहा,
“भैया, आपकी भी अपनी जिम्मेदारियां हैं। हम दोनों मिलकर संभालेंगे।”
नितिन ने भी सहमति में सिर हिलाया।
नितिन ने कहा,
“मां की जिम्मेदारी सिर्फ तुम्हारी नहीं है। अब से जब भी जरूरत होगी, मैं भी आऊंगा।”
शारदा देवी यह सब सुन रही थीं।
उन्होंने कविता को अपने पास बुलाया।
शारदा देवी ने भावुक होकर कहा,
“बहू, मैंने तुझे हमेशा बहू समझकर जिम्मेदारी दी। लेकिन आज समझ आया कि तू इस घर की बेटी से भी बढ़कर निकली।”
कविता ने उनके पैर छुए।
कविता ने कहा,
“मम्मी जी, मैं आपकी बहू हूं। लेकिन बहू होना सेवा की सजा नहीं है। परिवार में जिसे जरूरत हो, उसकी मदद करना सबकी जिम्मेदारी है।”
शारदा देवी ने कविता का हाथ पकड़ लिया।
शारदा देवी ने कहा,
“तू सही थी।”
कविता ने सिर झुका लिया।
शारदा देवी ने आगे कहा,
“मैंने अपनी बेटी को उसका हक दिलाते समय कभी नहीं सोचा कि उसके साथ जिम्मेदारी भी बांटनी चाहिए। और तुम्हारे ऊपर जिम्मेदारियां डालते समय कभी नहीं सोचा कि तुम भी किसी की बेटी हो।”
कविता की आंखों में आंसू आ गए।
कविता ने कहा,
“मम्मी जी, पुरानी बातें छोड़ दीजिए।”
शारदा देवी ने कहा,
“नहीं बहू। कुछ बातें याद रखना जरूरी होता है, ताकि वही गलती दोबारा न हो।”
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कुछ महीने बाद
शारदा देवी की आंखों की रोशनी काफी बेहतर हो चुकी थी।
एक शाम वह आंगन में बैठी थीं।
रिया उनके बालों में तेल लगा रही थी।
कविता चाय बना रही थी।
महेश बच्चों के साथ खेल रहा था।
नितिन बाजार से दवाइयां लेकर आया।
शारदा देवी ने चारों को देखा।
उनके चेहरे पर संतोष था।
उन्होंने रिया से कहा—
शारदा देवी ने कहा,
“बेटी, मैंने तुझे बराबर का हक दिया था। लेकिन आज समझ आया कि बराबर का हक सिर्फ कागज पर नहीं होता।”
रिया ने मां की तरफ देखा।
रिया ने पूछा,
“फिर बराबरी क्या है मां?”
शारदा देवी मुस्कुराईं।
शारदा देवी ने कहा,
“बराबरी का मतलब है—जिस दिन खुशी हो, उस दिन साथ खड़े होना… और जिस दिन मुश्किल आए, उस दिन भी साथ खड़े होना।”
फिर उन्होंने कविता की ओर देखा।
शारदा देवी ने कहा,
“और बहू… तूने मुझे ये बात बहुत देर से समझाई, लेकिन हमेशा के लिए समझा दी।”
कविता मुस्कुराई।
कविता ने कहा,
“मम्मी जी, परिवार में किसी का हक कम नहीं होना चाहिए। लेकिन किसी एक के कंधे पर पूरी जिम्मेदारी भी नहीं डालनी चाहिए।”
रिया ने कविता का हाथ पकड़ लिया।
रिया ने कहा,
“अब मां की जिम्मेदारी हम दोनों की है।”
महेश ने मुस्कुराते हुए कहा—
महेश ने कहा,
“सिर्फ तुम दोनों की नहीं। मैं और नितिन भी साथ हैं।”
नितिन ने हंसते हुए कहा—
नितिन ने कहा,
“अब तो मां की दवाइयों की बारी भी बांटनी पड़ेगी।”
सभी हंस पड़े।
शारदा देवी की आंखों में खुशी के आंसू थे।
उन्होंने हाथ उठाकर चारों को आशीर्वाद दिया।
उस दिन कविता ने किसी का हक नहीं छीना था।
उसने बस एक ऐसी जिम्मेदारी बांटी थी, जो पहले से ही सबकी थी।
क्योंकि संपत्ति का हिस्सा कागज पर बांटा जा सकता है, लेकिन माता-पिता का प्यार और जिम्मेदारी सिर्फ एक बच्चे के हिस्से में नहीं बांटी जा सकती।
और शारदा देवी ने उस दिन अपने जीवन की सबसे बड़ी बात समझी—
“सिर्फ बराबर का हक मांगना ही बराबरी नहीं है…
जरूरत के समय बराबर का साथ देना भी बराबरी है।”

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