माँ जाहिल नहीं है
“बहू, ये चाय इतनी ठंडी क्यों है? तुम्हें इतना भी नहीं पता कि घर में किसी को चाय कब और कैसी चाहिए?”
विनोद जी ने कप मेज पर रखते हुए अपनी बहू नेहा से तीखी आवाज़ में कहा।
नेहा कुछ पल चुप खड़ी रही। उसने धीरे से कप उठाया और बोली,
“पिताजी, अभी दो मिनट पहले ही तो चाय बनाई थी। शायद आपको देर से मिली इसलिए ठंडी लग रही होगी। मैं दूसरी बना देती हूँ।”
“रहने दो। तुम्हें हर बात समझाने की जरूरत पड़ती है। पता नहीं आजकल की लड़कियाँ घर संभालना सीखकर क्यों नहीं आतीं।”
विनोद जी की बात सुनकर नेहा ने कोई जवाब नहीं दिया।
रसोई के दरवाजे के पास खड़ी उनकी पत्नी कमला जी सब सुन रही थीं। उनके चेहरे पर वही परिचित उदासी उतर आई थी, जिसे वह पिछले कई वर्षों से अपने पति की बातों के बाद छिपाने की कोशिश करती थीं।
उन्होंने धीरे से नेहा के पास जाकर कहा,
“बहू, तुम मन पर मत लेना। तुम्हारे ससुर जी का स्वभाव ही थोड़ा तेज है।”
नेहा ने अपनी सास की ओर देखा और धीमे स्वर में बोली,
“माँ, बात सिर्फ तेज स्वभाव की नहीं है। आपको भी तो रोज किसी न किसी बात पर सुनना पड़ता है।”
कमला जी ने तुरंत उसकी बात काट दी।
“नहीं बहू, तुम अभी नई हो। घर की बातें जितनी कम समझो, उतना अच्छा है। मुझे तो आदत हो गई है।”
नेहा ने हैरानी से पूछा,
“आदत हो गई है?”
कमला जी हल्का-सा मुस्कराईं, लेकिन उनकी आँखें नम थीं।
“हाँ बहू, कुछ बातें सुनते-सुनते इंसान उन्हें अपनी किस्मत समझ लेता है।”
नेहा के पास इसका कोई जवाब नहीं था।
उसी समय कमरे से उनका बेटा आकाश बाहर आया। उसने पत्नी और माँ दोनों के चेहरे देखे और पूछा,
“क्या हुआ? आप दोनों इतनी चुप क्यों हैं?”
नेहा ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, लेकिन कमला जी ने तुरंत कहा,
“कुछ नहीं बेटा। तुम अपना नाश्ता कर लो।”
आकाश ने पिता की ओर देखा। विनोद जी अखबार पढ़ने का अभिनय कर रहे थे।
नेहा चुपचाप रसोई में चली गई।
आकाश कुछ क्षण अपनी माँ के पास खड़ा रहा। फिर उसने धीरे से पूछा,
“माँ, पिताजी ने फिर कुछ कहा क्या?”
कमला जी ने बेटे की ओर देखकर मुस्कराने की कोशिश की।
“कुछ नहीं कहा बेटा। छोटी-सी बात थी।”
आकाश ने गहरी साँस ली और बोला,
“माँ, छोटी-सी बात अगर बार-बार किसी के दिल को चोट पहुँचाए तो छोटी नहीं रहती।”
कमला जी कुछ बोल पातीं, उससे पहले विनोद जी की आवाज़ आई,
“आकाश, अपनी माँ से पूछताछ करने के बजाय अपना काम देखो। हर बात में पत्नी और माँ के बीच बैठना जरूरी नहीं है।”
आकाश ने पिता की ओर देखा और शांत स्वर में कहा,
“पिताजी, मैं किसी के बीच नहीं बैठ रहा। बस माँ से बात कर रहा हूँ।”
“तुम्हारी माँ को कोई परेशानी नहीं है। तुम लोगों ने आजकल दो किताबें क्या पढ़ लीं, घर के बड़े-बुजुर्गों को समझाने लगे।”
विनोद जी ने अखबार मोड़ते हुए कहा।
कमला जी घबरा गईं।
उन्होंने बेटे से कहा,
“आकाश, रहने दे बेटा। तुम्हारे पिताजी को गुस्सा आ जाएगा।”
आकाश ने माँ की ओर देखा। वह कुछ कहना चाहता था, लेकिन माँ की आँखों में डर देखकर चुप हो गया।
नेहा दूर खड़ी सब देख रही थी।
उसके मन में एक सवाल लगातार उठ रहा था।
क्या शादी के बाद हर औरत को अपने सम्मान से समझौता करना पड़ता है?
उसने अपने मायके में भी अपनी माँ को कई बार चुप होते देखा था। पिता की नाराज़गी से बचने के लिए माँ हमेशा यही कहती थीं,
“तुम्हारे पापा हैं बेटा, उनका स्वभाव ऐसा ही है। हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं होता।”
तब नेहा को लगता था कि माँ शायद बहुत सहनशील हैं।
लेकिन अब उसे समझ आने लगा था कि कई बार सहनशीलता और मजबूरी के बीच बहुत पतली रेखा होती है।
कुछ दिनों तक नेहा ने घर की बातों को नजरअंदाज किया।
वह कोशिश करती कि विनोद जी को कोई शिकायत न मिले।
चाय समय पर रखती।
खाना उनकी पसंद का बनाती।
कपड़े ठीक से रखती।
दवाइयाँ समय पर देती।
लेकिन फिर भी किसी न किसी बात पर विनोद जी नाराज़ हो जाते।
एक दिन उन्होंने अपनी शर्ट ढूँढ़ते हुए पूरे घर में आवाज़ लगाई,
“कमला! मेरी सफेद शर्ट कहाँ है?”
कमला जी रसोई से भागती हुई आईं।
“जी, अलमारी के दाएँ हिस्से में रखी है।”
विनोद जी ने अलमारी खोली और शर्ट निकालते हुए कहा,
“तुम्हें कोई काम ढंग से करना आता भी है या नहीं? मैंने कितनी बार कहा है मेरी चीजें अलग रखो।”
कमला जी ने विनम्रता से कहा,
“जी, मैंने तो अलग ही रखी थी।”
“बस, अब मुझे मत समझाओ। तुमसे कुछ कहो तो दस जवाब तैयार रहते हैं।”
विनोद जी ने झुँझलाकर कहा।
नेहा कमरे के बाहर खड़ी थी।
उसने पहली बार देखा कि कमला जी ने अपनी सफाई देने के बजाय सिर झुका लिया।
नेहा से रहा नहीं गया।
उसने धीरे से कहा,
“पिताजी, माँ ने तो बस इतना कहा कि उन्होंने शर्ट अलग रखी थी।”
विनोद जी ने पलटकर बहू को देखा।
“तुम मुझे सिखाओगी कि मुझे अपनी पत्नी से कैसे बात करनी चाहिए?”
नेहा कुछ पल चुप रही।
फिर उसने विनम्रता से कहा,
“नहीं पिताजी, मैं आपको कुछ सिखाने की कोशिश नहीं कर रही। बस मुझे लगा कि माँ ने कोई गलती नहीं की।”
विनोद जी ने गुस्से में कहा,
“बहुत जल्दी बोलना सीख गई हो तुम।”
कमला जी ने तुरंत नेहा का हाथ पकड़ लिया।
“बहू, रहने दो।”
नेहा चुप हो गई।
लेकिन उस दिन उसके भीतर कुछ टूट गया।
रात को कमरे में आकर उसने आकाश से पूछा,
“आकाश, मैं तुमसे एक बात पूछूँ?”
आकाश ने मोबाइल एक तरफ रखते हुए कहा,
“हाँ, पूछो।”
नेहा ने धीरे से कहा,
“अगर कभी मैं भी माँ की तरह हर बात चुपचाप सहती रहूँ तो क्या तुम मुझे भी यही कहोगे कि पिताजी का स्वभाव ऐसा ही है?”
आकाश अचानक गंभीर हो गया।
“नेहा, तुम ऐसा क्यों पूछ रही हो?”
“क्योंकि मैं जो देख रही हूँ उससे डर रही हूँ। आज माँ हैं, कल अगर किसी बात पर मेरे साथ ऐसा हुआ तो क्या होगा?”
आकाश कुछ देर चुप रहा।
फिर उसने कहा,
“मैं तुम्हारे साथ ऐसा नहीं होने दूँगा।”
नेहा ने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा,
“सिर्फ मेरे साथ नहीं होने दोगे या माँ के साथ भी नहीं होने दोगे?”
आकाश के पास कोई जवाब नहीं था।
नेहा ने आगे कहा,
“आकाश, मैं माँ के खिलाफ तुम्हें भड़काना नहीं चाहती। लेकिन मैं रोज उन्हें अपने सम्मान को बचाने के लिए चुप होते देखती हूँ। वह हर बात पर कहती हैं कि आदत हो गई है। मुझे लगता है किसी इंसान को अपमान की आदत नहीं पड़नी चाहिए।”
आकाश ने सिर झुका लिया।
“तुम सही कह रही हो नेहा। शायद हम दोनों भाई भी गलत थे। हमें लगता रहा कि माँ-पापा के बीच की बात है। हमें बोलना नहीं चाहिए। लेकिन शायद चुप रहना भी एक तरह से गलत बात को सहमति देना है।”
नेहा ने पहली बार राहत की साँस ली।
अगले दिन घर में एक और घटना हुई।
कमला जी पूजा के कमरे की सफाई कर रही थीं। उनकी उँगलियों से भगवान की छोटी-सी पीतल की मूर्ति हाथ से छूटकर नीचे गिर गई।
आवाज सुनकर विनोद जी दौड़ते हुए आए।
“ये क्या कर दिया तुमने?”
कमला जी घबरा गईं।
“जी, गलती से हाथ से छूट गई।”
विनोद जी ने गुस्से में कहा,
“तुमसे एक चीज भी संभालकर नहीं रखी जाती। न जाने किस मिट्टी की बनी हो। इतने साल हो गए इस घर में, लेकिन अक्ल आज तक नहीं आई।”
कमला जी की आँखों से आँसू निकल आए।
उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा,
“गलती हो गई जी। आगे से ध्यान रखूँगी।”
नेहा रसोई से बाहर आई।
उसने देखा कि कमला जी मूर्ति उठाकर अपने आँचल से साफ कर रही थीं और साथ-साथ आँसू भी पोंछ रही थीं।
नेहा ने धीरे से कहा,
“माँ, आप रहने दीजिए। मैं साफ कर देती हूँ।”
विनोद जी ने नेहा की ओर देखा।
“तुम फिर बीच में आ गईं?”
नेहा ने पहली बार बिना डरे उनकी आँखों में देखा।
“पिताजी, मैं बीच में नहीं आ रही। मैं बस माँ का आँसू देख रही हूँ।”
विनोद जी कुछ बोलने ही वाले थे कि आकाश भी कमरे में आ गया।
उसने शांत स्वर में कहा,
“पिताजी, आज बात पूरी होने दीजिए।”
विनोद जी ने बेटे की ओर देखा।
“तुम भी अपनी पत्नी की भाषा बोलने लगे?”
आकाश ने कहा,
“नहीं पिताजी। मैं अपनी माँ की भाषा समझने की कोशिश कर रहा हूँ।”
इतने में छोटा बेटा निखिल भी वहाँ आ गया।
उसने माहौल देखकर पूछा,
“क्या हुआ?”
आकाश ने कहा,
“कुछ नहीं निखिल। बस आज हम सबको एक जरूरी बात करनी है।”
विनोद जी ने नाराज़ होकर कहा,
“मुझे किसी सभा में बैठने का शौक नहीं है।”
आकाश ने विनम्रता से कहा,
“पिताजी, सभा नहीं है। घर है। और बात भी घर की ही है।”
निखिल ने पहली बार अपनी माँ की ओर देखा।
“माँ, आप रो क्यों रही हैं?”
कमला जी ने आँसू छिपाते हुए कहा,
“कुछ नहीं बेटा।”
निखिल ने पिता की ओर देखा और पूछा,
“पिताजी, माँ से गलती हो गई तो आपने समझा क्यों नहीं दिया? इतनी बड़ी बात तो नहीं थी।”
विनोद जी चुप रहे।
आकाश ने कहा,
“पिताजी, गलती आपकी भी हो सकती है और माँ की भी। लेकिन गलती पर समझाया जा सकता है, अपमान करना जरूरी नहीं।”
विनोद जी ने गुस्से में कहा,
“तुम लोग मुझे ही गलत साबित करने पर क्यों तुले हो?”
नेहा ने शांत स्वर में कहा,
“हम आपको गलत साबित नहीं करना चाहते पिताजी। हम बस चाहते हैं कि माँ को हर बार खुद को गलत साबित न करना पड़े।”
कमला जी ने नेहा की ओर देखा।
उनकी आँखों में पहली बार डर के साथ-साथ अपनेपन का भाव भी था।
विनोद जी ने कुछ नहीं कहा और कमरे से बाहर चले गए।
कमला जी ने घबराकर कहा,
“तुम लोगों ने ये क्या कर दिया? तुम्हारे पिताजी नाराज़ हो गए।”
आकाश ने माँ का हाथ पकड़कर कहा,
“माँ, अगर किसी के सम्मान की बात करने से कोई नाराज़ होता है तो होने दीजिए।”
कमला जी की आँखों से आँसू बह निकले।
उन्होंने कहा,
“तुम दोनों मेरे लिए इतना मत लड़ो। मैं ठीक हूँ।”
निखिल ने माँ के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा,
“माँ, आप ठीक नहीं हैं। आप बस हमें ठीक दिखाने की कोशिश करती रही हैं।”
कमला जी कुछ बोल नहीं पाईं।
उधर अपने कमरे में बैठे विनोद जी के मन में बच्चों की बातें घूम रही थीं।
उन्हें याद आया कि शादी के बाद कमला ने किस तरह उनके साथ कदम मिलाकर घर संभाला था।
जब वह नौकरी के कारण महीनों बाहर रहते थे, तब कमला अकेले बच्चों की जिम्मेदारी उठाती थीं।
आकाश की फीस कब जमा करनी है, निखिल की परीक्षा कब है, किस बच्चे को कौन-सी किताब चाहिए—सब कमला को याद रहता था।
उन्होंने कभी नहीं पूछा था कि कमला थकती भी हैं या नहीं।
उन्होंने कभी यह नहीं कहा था कि तुमने अच्छा किया।
उन्हें बस गलतियाँ दिखाई देती रहीं।
उसी समय कमला कमरे में आईं।
उन्होंने धीमे स्वर में कहा,
“आप खाना खा लीजिए।”
विनोद जी ने उनकी ओर देखा।
“कमला।”
कमला जी रुक गईं।
विनोद जी ने पूछा,
“तुम सच में इतने सालों से मेरी बातें सहती रही?”
कमला जी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“आप मेरे पति हैं जी। आपकी बातें सुनना मेरी जिम्मेदारी समझती रही।”
विनोद जी ने कहा,
“लेकिन तुम्हारा अपमान सहना तुम्हारी जिम्मेदारी नहीं थी।”
कमला जी चुप हो गईं।
विनोद जी ने सिर झुका लिया।
“मुझे माफ कर दो कमला।”
कमला जी ने हैरानी से उनकी ओर देखा।
“आप ये क्या कह रहे हैं?”
विनोद जी ने कहा,
“आज पहली बार समझ आया कि घर चलाना सिर्फ पैसे कमाना नहीं होता। तुमने घर संभाला, बच्चों को संभाला, मेरी अनुपस्थिति में सब कुछ संभाला। और मैंने तुम्हें कभी सम्मान से धन्यवाद तक नहीं कहा।”
कमला जी की आँखें भर आईं।
विनोद जी ने आगे कहा,
“तुम पढ़ी-लिखी कम हो सकती हो, लेकिन मैंने तुम्हें कभी समझने की कोशिश ही नहीं की। पढ़ाई कम होना और समझ कम होना एक बात नहीं है।”
कमला जी कुछ कह नहीं पाईं।
विनोद जी ने उनका हाथ पकड़कर कहा,
“आज बच्चों ने मेरी आँखें खोल दीं। मैं यह नहीं कहूँगा कि इतने सालों की आदत एक दिन में बदल जाएगी। लेकिन कोशिश जरूर करूँगा।”
कमला जी ने धीमे से कहा,
“बस इतना ही काफी है जी।”
तभी बाहर से निखिल की आवाज़ आई,
“माँ, पापा, खाना लग गया है।”
दोनों बाहर आए।
मेज पर आकाश, नेहा और निखिल बैठे थे। तीनों के चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
विनोद जी ने कुर्सी खींचकर बैठते हुए कहा,
“तुम लोग मुझे ऐसे क्यों देख रहे हो?”
निखिल ने झिझकते हुए कहा,
“कुछ नहीं पिताजी।”
विनोद जी मुस्कराए।
“डरो मत। आज किसी को डाँटने का मन नहीं है।”
नेहा ने कमला जी की ओर देखा।
कमला जी की आँखों में हल्की-सी मुस्कान थी।
विनोद जी ने सबकी ओर देखते हुए कहा,
“और एक बात सुन लो। तुम्हारी माँ से गलती हो सकती है, लेकिन अब मैं उसकी गलती को उसके चरित्र का नाम नहीं दूँगा।”
आकाश ने मुस्कराकर पूछा,
“मतलब?”
विनोद जी ने कमला जी की ओर देखकर कहा,
“मतलब तुम्हारी माँ जाहिल नहीं है।”
कमला जी ने तुरंत कहा,
“और आप?”
विनोद जी कुछ पल चुप रहे, फिर मुस्कराकर बोले,
“मैं भी अब जाहिल नहीं रहना चाहता।”
सभी के चेहरों पर मुस्कान आ गई।
नेहा ने धीरे से कमला जी का हाथ पकड़ लिया।
कमला जी ने बहू की ओर देखा और कहा,
“बहू, तुमने उस दिन मेरे लिए आवाज उठाई थी, इसलिए नहीं कि मैं तुम्हारी सास थी। तुमने इसलिए आवाज उठाई क्योंकि तुमने मुझे एक औरत की तरह देखा, जिसे सम्मान चाहिए।”
नेहा ने मुस्कराकर कहा,
“माँ, घर में रिश्ते सिर्फ उम्र से बड़े नहीं होते। सम्मान से बड़े होते हैं।”
आकाश ने कहा,
“और शायद हमें यह बात बहुत पहले समझ जानी चाहिए थी।”
निखिल ने हँसते हुए कहा,
“तो आज से घर का नया नियम क्या है?”
विनोद जी ने जवाब दिया,
“गलती किसी की भी हो सकती है, लेकिन किसी का सम्मान नहीं छीना जाएगा।”
कमला जी ने पति की ओर देखा।
उनके चेहरे पर वर्षों बाद ऐसा सुकून था, जिसे किसी दवा, किसी पैसे और किसी बड़ी खुशी से नहीं खरीदा जा सकता था।
उन्होंने मन ही मन सोचा—
किसी औरत का कम पढ़ा-लिखा होना उसे कम समझदार नहीं बनाता।
घर संभालने वाली स्त्री की मेहनत दिखाई भले न दे, लेकिन उसी मेहनत पर पूरा परिवार खड़ा होता है।
और सबसे जरूरी बात—
जिस रिश्ते में प्यार हो, वहाँ गलती पर समझाया जा सकता है, लेकिन अपमान को प्यार का नाम नहीं दिया जा सकता।
क्योंकि किसी भी घर की सबसे बड़ी जरूरत सिर्फ रोटी, कपड़े और पैसे नहीं होती।
सम्मान होता है।
और जिस दिन परिवार अपने ही घर की औरत का सम्मान करना सीख जाता है, उस दिन वह घर सिर्फ मकान नहीं रहता—
सचमुच घर बन जाता है।

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