माँ का कमरा
“माँ, आपसे एक बात कहनी थी… अब आपको नीचे वाले कमरे की जरूरत नहीं है।”
राघव ने अपनी माँ शारदा जी के सामने खड़े होकर यह बात बिल्कुल सामान्य तरीके से कही, जैसे वह कोई बहुत छोटी-सी बात बता रहा हो।
शारदा जी कुछ पल तक अपने बेटे का चेहरा देखती रहीं। फिर उन्होंने धीरे से पूछा,
“बेटा, ऐसा क्या हो गया कि मेरे कमरे की जरूरत नहीं रही?”
राघव ने नजरें इधर-उधर करते हुए कहा,
“माँ, कुछ खास नहीं हुआ। बस घर में थोड़ी परेशानी है। नीलम की छोटी बहन पूजा की शादी टूट गई है। अब वह कुछ समय हमारे साथ रहेगी। उसे रहने के लिए नीचे वाला कमरा चाहिए।”
शारदा जी ने हैरानी से पूछा,
“तो बेटा, उसे ऊपर वाला कमरा दे दो। वह तो खाली पड़ा है।”
राघव की पत्नी नीलम वहीं खड़ी थी। उसने तुरंत जवाब दिया,
“मम्मी जी, मेरी बहन ऊपर नहीं रहेगी। उसकी तबीयत भी ठीक नहीं रहती और ऊपर आने-जाने में परेशानी होगी।”
शारदा जी ने शांत स्वर में कहा,
“लेकिन बहू, मेरे घुटनों में भी बहुत दर्द रहता है। डॉक्टर ने सीढ़ियां कम चढ़ने को कहा है। तुम तो जानती हो।”
नीलम ने बिना किसी भाव के कहा,
“मम्मी जी, आप तो वैसे भी घर में ही रहती हैं। थोड़ा-बहुत ऊपर-नीचे हो जाएंगी तो क्या फर्क पड़ेगा?”
शारदा जी चुप हो गईं।
उन्होंने अपने घुटनों पर हाथ रखा और धीरे से बोलीं,
“फर्क पड़ता है बहू। तुम्हें शायद नहीं पता, लेकिन हर सीढ़ी चढ़ते समय ऐसा लगता है जैसे घुटने टूट जाएंगे।”
राघव ने बीच में कहा,
“माँ, आप बात को इतना बड़ा मत बनाइए। कुछ दिनों की ही तो बात है।”
शारदा जी ने बेटे की तरफ देखते हुए पूछा,
“कुछ दिन मतलब कितने दिन बेटा?”
राघव ने जवाब दिया,
“पता नहीं माँ। जब तक पूजा अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो जाती।”
शारदा जी ने पूछा,
“और अगर उसे एक साल लग गया तो?”
राघव कुछ नहीं बोला।
नीलम ने कहा,
“मम्मी जी, आप बेकार की बातें क्यों कर रही हैं? घर में किसी की मदद करनी हो तो करनी पड़ती है।”
शारदा जी ने धीमे स्वर में कहा,
“मैंने कब मना किया बहू? मैं तो सिर्फ इतना कह रही हूं कि तुम लोग मेरे कमरे के बजाय ऊपर वाला कमरा दे दो।”
नीलम ने तुनककर कहा,
“मुझे समझ नहीं आता कि आप हर बात में अपनी ही बात क्यों सही समझती हैं।”
शारदा जी ने हैरानी से पूछा,
“अपनी बात सही समझना क्या गलत है बहू?”
नीलम ने कहा,
“जब घर में हम लोग खर्च कर रहे हैं, घर की जिम्मेदारियां हम उठा रहे हैं, तो थोड़ा फैसला हमें भी लेने दीजिए।”
शारदा जी कुछ पल चुप रहीं।
फिर उन्होंने अपने बेटे की तरफ देखा।
“राघव, तू भी यही चाहता है?”
राघव ने नजरें झुकाकर कहा,
“माँ… अभी हालात ऐसे हैं। आप समझने की कोशिश करो।”
शारदा जी ने धीरे से मुस्कुराकर कहा,
“मैंने तो पूरी जिंदगी समझने की ही कोशिश की है बेटा।”
नीलम ने कहा,
“तो फिर समझ जाइए ना। आपको अपना सामान ऊपर वाले कमरे में रखना होगा।”
शारदा जी ने पूछा,
“आज ही?”
नीलम ने जवाब दिया,
“हां। पूजा अगले हफ्ते आ रही है। कमरा खाली करना पड़ेगा।”
शारदा जी ने कमरे की तरफ देखा।
वही कमरा था जिसमें उन्होंने अपने पति के साथ लगभग तीस साल बिताए थे।
दीवार पर उनके पति की तस्वीर लगी थी।
कोने में लकड़ी की पुरानी अलमारी थी।
खिड़की के पास वह कुर्सी रखी थी जिस पर बैठकर उनके पति अखबार पढ़ा करते थे।
उनकी आंखें नम हो गईं।
शारदा जी ने तस्वीर की तरफ देखते हुए कहा,
“तुम होते तो शायद मुझे यूं अपना कमरा खाली करने के लिए नहीं कहा जाता।”
राघव ने सुन लिया, लेकिन कुछ नहीं बोला।
नीलम ने कहा,
“मम्मी जी, भावुक होने से समस्या हल नहीं होगी। सामान ऊपर रखवा दीजिए।”
शारदा जी ने बेटे से कहा,
“राघव, तू कम से कम मेरी अलमारी तो नीचे रहने दे।”
राघव ने कहा,
“माँ, ऊपर जगह है। सब सामान चला जाएगा।”
शारदा जी ने कहा,
“बेटा, अलमारी भारी है। ऊपर ले जाते समय टूट जाएगी।”
राघव ने कहा,
“नई ले आएंगे।”
शारदा जी ने अपने बेटे को देखा।
“नई अलमारी आ जाएगी बेटा, लेकिन इसमें तुम्हारे पिता की आखिरी निशानी है।”
राघव कुछ कहने ही वाला था कि नीलम ने बीच में कहा,
“राघव, आप क्यों खड़े हैं? मजदूरों को बोलो सामान ऊपर ले जाएं।”
राघव ने सिर हिलाया और बाहर चला गया।
शारदा जी वहीं बैठ गईं।
उनकी आंखों से आंसू निकलने लगे।
उन्हें अपने पति की कही हुई एक बात याद आ गई।
“शारदा, हमारा बेटा बड़ा होकर हमारा सहारा बनेगा।”
तब शारदा जी ने हंसते हुए कहा था,
“मुझे अपने लिए किसी सहारे की जरूरत नहीं। बस बेटा अच्छा इंसान बन जाए।”
आज उन्हें लगा कि शायद उन्होंने बेटे को बड़ा तो कर दिया, लेकिन यह सिखाना भूल गईं कि घर में बुजुर्गों की इज्जत कैसे की जाती है।
कुछ देर बाद मजदूर उनका सामान उठाकर ऊपर ले जाने लगे।
शारदा जी एक-एक सामान को देखती रहीं।
पुराना रेडियो।
पति की किताबें।
एक लकड़ी की पेटी।
पुरानी तस्वीरें।
और वह छोटी-सी मेज जिस पर राघव बचपन में बैठकर पढ़ाई करता था।
शारदा जी ने वह मेज देखकर कहा,
“इसे मत ले जाना।”
मजदूर ने पूछा,
“माता जी, क्यों?”
शारदा जी ने कहा,
“इसी मेज पर बैठकर मेरा बेटा पढ़ा करता था।”
मजदूर ने सामान रोक दिया।
नीलम ने दूर से कहा,
“वह भी ऊपर रख दो। नीचे कुछ नहीं रहेगा।”
शारदा जी ने पहली बार थोड़ा कठोर होकर कहा,
“नीलम, इस मेज को मैं नीचे ही रखूंगी।”
नीलम ने कहा,
“मम्मी जी, यह घर अब सिर्फ आपकी मर्जी से नहीं चलता।”
शारदा जी ने शांत स्वर में कहा,
“मैंने कब कहा कि सिर्फ मेरी मर्जी चलेगी?”
नीलम ने कहा,
“तो फिर समस्या क्या है?”
शारदा जी ने जवाब दिया,
“समस्या यह है बहू कि जिस कमरे में मैंने अपनी जिंदगी के इतने साल बिताए, उसे खाली करते समय किसी ने मुझसे एक बार भी नहीं पूछा कि मैं क्या चाहती हूं।”
नीलम चुप हो गई।
तभी राघव वापस आया।
उसने पूछा,
“क्या हुआ?”
नीलम ने कहा,
“मम्मी जी मेज नीचे रखना चाहती हैं।”
राघव ने माँ से कहा,
“माँ, ऊपर रखवा दो ना। इतनी छोटी बात पर बहस क्यों कर रही हो?”
शारदा जी ने बेटे की तरफ देखा।
“ठीक है बेटा।”
उन्होंने मेज भी ऊपर जाने दी।
उस दिन शाम तक उनका पूरा कमरा खाली हो चुका था।
नीचे का कमरा अब पूजा के लिए सजाया जाने लगा।
शारदा जी ऊपर चली गईं।
ऊपर वाला कमरा छोटा था।
वहां न ठीक से धूप आती थी और न हवा।
सीढ़ियां चढ़ना भी उनके लिए बहुत मुश्किल था।
पहली बार सीढ़ियां चढ़ते समय उनका पैर फिसल गया।
वह दीवार पकड़कर किसी तरह संभलीं।
राघव पीछे खड़ा था।
उसने कहा,
“माँ, धीरे चला करो।”
शारदा जी ने पलटकर कहा,
“बेटा, धीरे ही तो चल रही हूं। उम्र तेज चलने नहीं देती।”
राघव ने कुछ नहीं कहा।
कुछ दिन बीत गए।
पूजा घर आ गई।
नीलम उसकी खूब सेवा करने लगी।
उसके लिए अलग खाना बनता।
अलग कपड़े आते।
कमरे में नई अलमारी लग गई।
नया पलंग आ गया।
नया पर्दा लग गया।
शारदा जी ऊपर अपने छोटे कमरे में बैठकर सब देखती रहीं।
एक दिन पूजा ने ऊपर आकर कहा,
“मामी जी, आप यहां अकेली रहती हैं?”
शारदा जी ने मुस्कुराकर कहा,
“हां बेटा।”
पूजा ने पूछा,
“आप नीचे क्यों नहीं रहतीं?”
शारदा जी कुछ पल चुप रहीं।
फिर बोलीं,
“नीचे किसी और को जरूरत थी।”
पूजा समझ गई कि बात क्या है।
उसने कहा,
“मामी जी, अगर मेरी वजह से आपको तकलीफ हुई है तो मुझे बहुत बुरा लग रहा है।”
शारदा जी ने उसका हाथ पकड़कर कहा,
“तुम्हारी कोई गलती नहीं है बेटा।”
पूजा ने पूछा,
“मामी जी, फिर गलती किसकी है?”
शारदा जी ने मुस्कुराकर कहा,
“गलती किसी एक की नहीं होती बेटा। कभी-कभी लोग अपनी जरूरतों में इतने उलझ जाते हैं कि सामने वाले का दर्द दिखाई देना बंद हो जाता है।”
पूजा की आंखें भर आईं।
कुछ दिनों बाद एक और समस्या शुरू हो गई।
शारदा जी को नीचे डॉक्टर के पास जाना था।
उन्होंने राघव से कहा,
“बेटा, मुझे डॉक्टर को दिखाना है। मेरे घुटनों का दर्द बढ़ गया है। मेरे साथ चल सकेगा?”
राघव ने मोबाइल देखते हुए कहा,
“माँ, आज बहुत काम है। आप ऑटो से चली जाइए।”
शारदा जी ने पूछा,
“अकेली?”
राघव ने कहा,
“माँ, आप पहले भी तो जाती रही हैं।”
नीलम ने वहीं से कहा,
“मम्मी जी, अगर बहुत ज्यादा दिक्कत है तो पूजा को साथ ले जाइए।”
पूजा ने तुरंत कहा,
“मामी जी, मैं चलती हूं आपके साथ।”
शारदा जी ने उसकी तरफ देखा और मुस्कुराईं।
“नहीं बेटा, तुम्हारी पढ़ाई जरूरी है। मैं चली जाऊंगी।”
पूजा ने कहा,
“लेकिन मामी जी…”
शारदा जी ने बात काटते हुए कहा,
“मैं ठीक हूं।”
वह धीरे-धीरे सीढ़ियां उतरने लगीं।
नीचे पहुंचते-पहुंचते उनका चेहरा दर्द से भर गया था।
लेकिन उन्होंने किसी से कुछ नहीं कहा।
डॉक्टर ने जांच करने के बाद कहा,
“आपको ज्यादा सीढ़ियां नहीं चढ़नी चाहिए। कोशिश कीजिए कि कम से कम ऊपर-नीचे जाना पड़े।”
शारदा जी ने फीकी मुस्कान के साथ कहा,
“डॉक्टर साहब, कोशिश तो करूंगी।”
डॉक्टर ने पूछा,
“घर में कौन-कौन है?”
शारदा जी ने कहा,
“बेटा, बहू और एक बेटी जैसी भांजी।”
डॉक्टर ने कहा,
“तो किसी को अपने साथ रखिए। अकेले मत चलिए।”
शारदा जी ने मन ही मन सोचा,
“लोग घर में बहुत हैं डॉक्टर साहब, लेकिन साथ देने वाला शायद कोई नहीं है।”
घर लौटकर उन्होंने डॉक्टर की पर्ची राघव को दी।
राघव ने पूछा,
“क्या कहा डॉक्टर ने?”
शारदा जी ने कहा,
“कहा है कि सीढ़ियां कम चढ़ो।”
नीलम ने तुरंत कहा,
“तो मम्मी जी नीचे आकर रहिए ना।”
शारदा जी ने उसकी तरफ देखा।
“अब नीचे मेरा कमरा कहां है बहू?”
नीलम चुप हो गई।
राघव ने कहा,
“माँ, पूजा का कोर्स खत्म होने तक तो ऐसे ही चलाना पड़ेगा।”
शारदा जी ने कहा,
“कितने साल?”
राघव ने कहा,
“अभी तो एक साल बाकी है।”
शारदा जी ने धीरे से कहा,
“एक साल…”
फिर वह अपने कमरे में चली गईं।
उस रात उन्होंने अपने पति की तस्वीर सामने रखी और बोलीं,
“आपने कहा था ना कि हमारा बेटा हमारा सहारा बनेगा। शायद आपने भी सोचकर नहीं कहा था कि एक दिन वही बेटा मुझे अपने ही घर में जगह के लिए तरसा देगा।”
अगले कुछ दिनों तक शारदा जी ने किसी से शिकायत नहीं की।
लेकिन एक दिन एक ऐसी घटना हुई जिसने सब कुछ बदल दिया।
शारदा जी सीढ़ियों से नीचे उतर रही थीं।
उनके हाथ में पानी का गिलास था।
अचानक उनका पैर फिसला।
वह सीढ़ियों पर गिर पड़ीं।
गिलास दूर जा गिरा।
उनके घुटने में जोर से चोट लगी।
उन्होंने दर्द से आवाज लगाई,
“राघव…”
राघव नीचे ही बैठा था।
उसने आवाज सुनी तो दौड़कर आया।
“माँ, क्या हुआ?”
शारदा जी ने दर्द में कहा,
“बेटा, पैर…”
राघव ने उन्हें उठाया।
नीलम भी आ गई।
उसने कहा,
“मम्मी जी, मैंने कितनी बार कहा है कि धीरे चला कीजिए।”
शारदा जी ने कुछ नहीं कहा।
राघव उन्हें डॉक्टर के पास ले गया।
जांच के बाद डॉक्टर ने कहा,
“चोट गंभीर नहीं है, लेकिन इन्हें सीढ़ियों से बचाना होगा।”
राघव ने सिर झुका लिया।
वापस घर आते समय कार में पूरी तरह चुप्पी थी।
घर पहुंचकर शारदा जी ने राघव से कहा,
“बेटा, एक बात पूछूं?”
राघव ने कहा,
“पूछो माँ।”
शारदा जी ने कहा,
“अगर यह घर तुम्हारे नाम होता और मैं तुम्हें कहती कि अपना कमरा छोड़कर स्टोर में रहो, तो क्या तुम मान जाते?”
राघव चुप रहा।
शारदा जी ने फिर पूछा,
“अगर तुम्हारे घुटनों में दर्द होता और मैं कहती कि सीढ़ियां चढ़ते रहो, तो क्या तुम्हें बुरा नहीं लगता?”
राघव ने कहा,
“माँ, मुझे समझ आ रहा है।”
शारदा जी ने कहा,
“नहीं बेटा। तुम्हें आज चोट लगने के बाद समझ आ रहा है। मुझे तो रोज दर्द होता था।”
राघव की आंखें झुक गईं।
तभी नीलम ने कहा,
“मम्मी जी, अगर आपको इतना ही बुरा लग रहा था तो पहले क्यों नहीं बताया?”
शारदा जी ने उसकी तरफ देखा।
“बताया था बहू। कई बार बताया था। लेकिन मेरी बात शायद तुम्हें शिकायत लगती थी।”
नीलम ने कुछ नहीं कहा।
शारदा जी ने आगे कहा,
“तुमने मेरा कमरा लिया, मैंने कुछ नहीं कहा। तुमने मुझे ऊपर भेजा, मैंने कुछ नहीं कहा। तुमने कहा कि घर का खर्च तुम लोग उठाते हो, मैंने कुछ नहीं कहा। लेकिन अब मैं एक बात कहूंगी।”
राघव ने पूछा,
“क्या माँ?”
शारदा जी ने बिल्कुल शांत स्वर में कहा,
“यह घर अभी भी मेरे नाम है।”
राघव ने सिर उठाया।
नीलम भी चौंक गई।
शारदा जी ने कहा,
“मैंने यह घर तुम्हारे पिता के साथ मिलकर बनाया था। तुम्हारे पिता के जाने के बाद मैंने यह घर तुम्हारे नाम करने के बारे में सोचा था।”
राघव ने तुरंत कहा,
“माँ, आपने कभी बताया नहीं।”
शारदा जी ने कहा,
“क्योंकि मुझे लगा था कि बेटा घर का मालिक बनने से पहले मां के दर्द का मालिक बनेगा।”
राघव की आंखों में आंसू आ गए।
शारदा जी ने कहा,
“लेकिन मैंने गलती की।”
नीलम ने धीमे स्वर में पूछा,
“क्या गलती मम्मी जी?”
शारदा जी ने कहा,
“मैंने तुम्हें अपना समझने में गलती नहीं की। मैंने यह सोचने में गलती की कि मेरे अपने लोग मुझे कभी पराया महसूस नहीं कराएंगे।”
नीलम की आंखों से भी आंसू निकलने लगे।
शारदा जी ने कहा,
“बहू, तुम्हारी बहन को घर में रखने से मुझे कोई परेशानी नहीं थी। परेशानी इस बात से थी कि मेरी सुविधा और मेरी उम्र से ज्यादा जरूरी किसी और की सुविधा समझी गई।”
पूजा भी वहां आ गई थी।
उसने रोते हुए कहा,
“मामी जी, मैं कल ही हॉस्टल चली जाऊंगी।”
शारदा जी ने कहा,
“नहीं बेटा।”
पूजा ने कहा,
“लेकिन मेरी वजह से…”
शारदा जी ने कहा,
“तुम्हारी वजह से कुछ नहीं हुआ। जो हुआ, वह हम सबकी सोच की वजह से हुआ।”
फिर शारदा जी ने राघव की तरफ देखा।
“बेटा, मैं तुम्हें घर से निकालना नहीं चाहती। मैं तुम्हारी मां हूं। लेकिन अब मैं अपने ही घर में किसी की दया पर नहीं रहूंगी।”
राघव ने रोते हुए कहा,
“माँ, मुझे माफ कर दो।”
शारदा जी ने कहा,
“माफी मांगना आसान है बेटा। बदलाव करना मुश्किल।”
राघव ने कहा,
“मैं बदलूंगा माँ।”
शारदा जी ने कहा,
“तो आज से एक बात याद रखना। घर बड़ा होने से परिवार बड़ा नहीं होता। परिवार तब बड़ा होता है जब घर के सबसे कमजोर इंसान को सबसे ज्यादा सम्मान मिलता है।”
नीलम हाथ जोड़कर शारदा जी के सामने खड़ी हो गई।
“मम्मी जी, मुझसे बहुत बड़ी गलती हुई। मैंने घर के खर्चे को अपना अधिकार समझ लिया और आपके घर को अपना घर समझने लगी। लेकिन घर अपना होना और घर पर अधिकार जमाना दो अलग बातें हैं।”
शारदा जी ने कुछ नहीं कहा।
नीलम ने रोते हुए कहा,
“आप मुझे एक मौका दे दीजिए।”
शारदा जी ने कहा,
“मौका मैं दूंगी बहू, लेकिन एक शर्त पर।”
नीलम ने पूछा,
“क्या शर्त?”
शारदा जी ने कहा,
“अब इस घर में किसी बुजुर्ग को यह महसूस नहीं होना चाहिए कि वह किसी पर बोझ है।”
नीलम ने सिर झुका दिया।
राघव ने मां के पैर पकड़ लिए।
“माँ, आज आपने मुझे मेरा सबसे बड़ा सच दिखा दिया।”
शारदा जी ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“बेटा, मुझे अपना सच पहले ही दिख गया था। बस मैं तुम्हारे समझने का इंतजार करती रही।”
उस दिन के बाद घर का माहौल बदलने लगा।
पूजा ने खुद फैसला किया कि वह हॉस्टल में रहेगी ताकि शारदा जी को नीचे वाला कमरा वापस मिल सके।
राघव ने मजदूर बुलाकर शारदा जी का सामान फिर से नीचे वाले कमरे में रखवा दिया।
वही पुरानी अलमारी।
वही छोटी मेज।
वही कुर्सी।
और दीवार पर वही तस्वीर।
शारदा जी कमरे में आईं तो उनकी आंखें भर आईं।
राघव ने कहा,
“माँ, अब यह कमरा आपका है। हमेशा आपका रहेगा।”
शारदा जी ने कहा,
“कमरा मेरा पहले भी था बेटा। मुझे बस यह याद दिलाने की जरूरत थी कि इस घर में मेरी जगह किसी की कृपा से नहीं है।”
नीलम ने आगे बढ़कर शारदा जी का हाथ पकड़ लिया।
“मम्मी जी, अब आप नीचे ही रहेंगी। और सीढ़ियां चढ़ने की जरूरत नहीं पड़ेगी।”
शारदा जी मुस्कुराईं।
“और तुम?”
नीलम ने कहा,
“मैं आपके साथ नीचे बैठकर खाना खाऊंगी।”
शारदा जी ने मुस्कुराकर कहा,
“बस इतना कर लेना कि कभी मेरे हिस्से का सम्मान मत छीनना।”
नीलम ने कहा,
“कभी नहीं मम्मी जी।”
राघव दूर खड़ा मां को देख रहा था।
उसे पहली बार समझ आया कि मां को महंगे कपड़े, बड़ी कार या आलीशान कमरा नहीं चाहिए था।
उसे सिर्फ इतना चाहिए था कि जिस घर को बनाने में उसकी पूरी जिंदगी लगी, उसमें उसे पराया न समझा जाए।
और शारदा जी ने भी उस दिन एक बात हमेशा के लिए समझ ली थी—
रिश्ते बचाने के लिए झुकना अच्छी बात है, लेकिन अपना स्वाभिमान मिटाकर किसी रिश्ते को बचाना समझदारी नहीं है।
क्योंकि जिस घर में बुजुर्गों को सम्मान नहीं मिलता, वहां दीवारें कितनी भी ऊंची क्यों न हों, वह घर अंदर से हमेशा छोटा ही रहता है।

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