जिस घर में माँ नहीं थी

 

Emotional Indian family reunion with an elderly couple returning home, their son embracing his father, and family members sharing a heartfelt moment of forgiveness and love.


सुबह के करीब दस बजे थे।


आंगन में धूप धीरे-धीरे फैल रही थी। पुराने मकान की दीवारों पर धूप की सुनहरी परत चढ़ गई थी। बरामदे में रखी लकड़ी की कुर्सी पर बैठे गोविंद प्रसाद चुपचाप सामने वाली गली को देख रहे थे।


उनकी उम्र करीब सत्तर साल थी।


सफेद बाल, झुका हुआ शरीर और आंखों पर मोटा चश्मा।


पास ही उनकी पत्नी शारदा देवी बैठी थीं। वह पुराने कपड़ों को तह करके एक छोटे से संदूक में रख रही थीं।


आज घर में कुछ अलग ही खामोशी थी।


शारदा देवी ने एक पुरानी साड़ी उठाई और कुछ देर उसे देखती रहीं।


फिर धीरे से बोलीं,


“यह साड़ी बहू ने दी थी न?”


गोविंद प्रसाद ने बिना उनकी तरफ देखे कहा,


“हाँ... शादी के अगले साल।”


शारदा देवी हल्का-सा मुस्कुराईं।


“तब कितनी खुश हुई थी मैं... लगा था मेरा बेटा और बहू दोनों मुझे अपनी माँ समझेंगे।”


उनकी आवाज आखिरी शब्दों पर धीमी पड़ गई।


गोविंद प्रसाद ने उनकी तरफ देखा।


उनकी आंखों में नमी थी।


लेकिन वह कुछ बोले नहीं।


क्योंकि पिछले कुछ दिनों से इस घर में बोलने के लिए शब्द कम और सहने के लिए बातें ज्यादा थीं।


उनका बेटा नितिन शहर की एक निजी कंपनी में काम करता था। तनख्वाह ठीक-ठाक थी, लेकिन घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई, मकान की किश्त और रोजमर्रा की जरूरतों ने उसकी कमर तोड़ रखी थी।


नितिन अपने माता-पिता से बहुत प्यार करता था।


लेकिन उसकी पत्नी राधिका को अपने सास-ससुर का घर में रहना बिल्कुल पसंद नहीं था।


शुरुआत में राधिका छोटी-छोटी बातें करती थी।


“माँ जी, रसोई में इतना सामान मत फैलाया करो।”


“बाबूजी, टीवी थोड़ा धीरे चलाइए।”


“बच्चों के कमरे में मत जाया कीजिए।”


धीरे-धीरे छोटी बातें शिकायतों में बदल गईं।


और शिकायतें तानों में।


एक दिन राधिका ने नितिन से साफ कह दिया,


“मैं अब इस घर में आपके माता-पिता के साथ नहीं रह सकती।”


नितिन चौंक गया।


“क्यों?”


“क्योंकि मेरा भी कोई जीवन है। सुबह से रात तक घर संभालूं, बच्चों को देखूं और ऊपर से आपकी माँ की दवाइयां, बाबूजी की जरूरतें... मैं सब नहीं कर सकती।”


“लेकिन राधिका, वो मेरे माता-पिता हैं।”


“तो?”


नितिन चुप हो गया।


राधिका ने आगे कहा,


“आप चाहें तो उनके लिए अलग कमरा किराए पर ले लीजिए। या किसी अच्छे वृद्धाश्रम में छोड़ आइए। वहाँ उनकी देखभाल भी हो जाएगी।”


नितिन ने गुस्से से उसकी तरफ देखा।


“तुम्हें पता भी है वृद्धाश्रम का मतलब क्या होता है?”


राधिका ने कंधे उचका दिए।


“मतलब यह कि बुजुर्गों को रहने के लिए जगह मिल जाती है।”


नितिन ने उसकी तरफ देखते हुए कहा,

“वे मेरे माता-पिता हैं, कोई बोझ नहीं।”


राधिका ने कुछ पल उसे देखा, फिर बोली,

“बोझ नहीं हैं तो फिर तुम खुद क्यों परेशान हो रहे हो?”


नितिन के पास इसका कोई जवाब नहीं था।


क्योंकि सच यही था कि वह परेशान था।


माता-पिता को छोड़ना नहीं चाहता था।


लेकिन पत्नी से रोज का झगड़ा भी नहीं चाहता था।


और दो छोटे बच्चों की जिम्मेदारी भी उसके कंधों पर थी।


वह कई रातों तक सो नहीं पाया।


कभी पिता का चेहरा सामने आता।


कभी मां का।


कभी बच्चों की फीस का संदेश।


कभी बैंक की किश्त।


और कभी राधिका की कठोर आवाज।


एक रात वह छत पर अकेला बैठा था।


गोविंद प्रसाद उसके पास आकर खड़े हो गए।


“नींद नहीं आ रही?”


नितिन ने चौंककर पीछे देखा।


“आप?”


“बाप हूं बेटा... तेरे चेहरे की परेशानी पढ़ना अभी नहीं भूला।” गोविंद प्रसाद ने हल्की मुस्कान के साथ कहा।


नितिन की आंखें भर आईं।


“पापा, मैं बहुत परेशान हूं।”


गोविंद प्रसाद उसके पास बैठ गए।


“क्या हुआ?”


नितिन कुछ देर चुप रहा।


फिर बोला,


“राधिका चाहती है कि आप दोनों कहीं और चले जाएं।”


गोविंद प्रसाद कुछ क्षण तक शांत रहे।


फिर उन्होंने आसमान की तरफ देखा।


“कहीं और?”


नितिन ने सिर झुकाकर धीमी आवाज में कहा,

“हाँ...”


गोविंद प्रसाद ने उसकी ओर देखा। उनके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।


फिर उन्होंने कांपती आवाज में पूछा,

“वृद्धाश्रम?”


नितिन ने सिर झुका लिया।


गोविंद प्रसाद ने उसके कंधे पर हाथ रखा।


“रो मत बेटा।”


नितिन की आंखों से आंसू लगातार बह रहे थे। वह भर्राई आवाज में बोला,

“मैं आपको वहां नहीं भेजना चाहता, पापा।”


गोविंद प्रसाद ने उसके आंसू पोंछते हुए कहा,

“जानता हूं बेटा।”


नितिन ने पिता का हाथ पकड़ लिया और बेचैनी से पूछा,

“फिर मैं क्या करूं, पापा?”


गोविंद प्रसाद हल्का-सा मुस्कुराए।


“वही कर जो तेरी मां और मैंने तुझे बचपन से सिखाया है।”


नितिन ने आंसू भरी आंखों से पिता की ओर देखा और पूछा,

“क्या पापा?”


गोविंद प्रसाद ने हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा,

“अपना घर बचा।”


नितिन ने उनकी तरफ देखा।


गोविंद प्रसाद बोले,


“घर केवल चार दीवारों का नाम नहीं होता। उसमें रहने वालों का सुख भी होता है। अगर हमारी वजह से तेरे घर में रोज लड़ाई होती है तो हमें यहां रहकर क्या मिलेगा?”


नितिन ने तुरंत कहा,


“लेकिन आप दोनों अकेले कैसे रहेंगे?”


गोविंद प्रसाद ने बेटे के कंधे पर हाथ रखते हुए शांत स्वर में कहा,

“हम बूढ़े हैं बेटा, बेबस नहीं।”


इतने में शारदा देवी भी वहां आ गईं।


उन्होंने कहा,


“और फिर वृद्धाश्रम में हमारे जैसे बहुत लोग होंगे। सुबह साथ बैठेंगे, बातें करेंगे। मंदिर जाएंगे। समय कट जाएगा।”


नितिन ने मां की तरफ देखा।


“मां, तुम सच में वहां रह पाओगी?”


शारदा देवी मुस्कुराईं।


“जिस बच्चे को हमने अपनी गोद से उठाकर बड़ा किया, उसे किसी परेशानी में देखकर अगर मां थोड़ा दर्द नहीं सह सकती तो फिर मां कैसी?”


नितिन की आंखों से आंसू निकल पड़े।


“मुझे माफ कर दो।”


गोविंद प्रसाद ने उसे गले लगा लिया।


“बेटा, इसमें तेरी गलती नहीं है।”


शारदा देवी ने भी उसके सिर पर हाथ रखा।


“बस एक बात याद रखना... हमें छोड़ना, हमें भूलना मत।”


अगली सुबह घर में अजीब-सी हलचल थी।


शारदा देवी अपना सामान बांध रही थीं।


कुछ कपड़े।


दवाइयां।


भगवान की छोटी-सी मूर्ति।


एक पुरानी तस्वीर।


और नितिन के बचपन की वह तस्वीर जिसमें वह स्कूल की ड्रेस पहनकर खड़ा था।


उन्होंने तस्वीर को अपने कपड़ों के बीच सबसे ऊपर रखा।


नितिन दरवाजे पर खड़ा सब देख रहा था।


उसका दिल टूट रहा था।


राधिका रसोई में खड़ी थी।


उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था।


गोविंद प्रसाद ने अपना छोटा-सा बैग उठाया।


शारदा देवी ने घर के मंदिर के सामने हाथ जोड़कर कहा,


“हे भगवान... मेरे बेटे को खुश रखना।”


नितिन ने मां का हाथ पकड़ लिया।


“मां...”


वह आगे कुछ नहीं बोल पाया।


शारदा देवी ने उसके चेहरे को दोनों हाथों में लिया।


“रो मत।”


नितिन ने भर्राई हुई आवाज में कहा,

“मां, मैं आपको वापस लेकर आऊंगा।”


शारदा देवी हल्की-सी मुस्कुराईं और बोलीं,

“जब समय मिले, मिलने आ जाना बेटा।”


नितिन ने तुरंत कहा,

“मैं जल्दी आऊंगा।”


शारदा देवी ने उसकी पीठ थपथपाई और धीरे से कहा,

“हां बेटा।”


वह मुड़ीं।


फिर अचानक वापस आईं और रसोई के दरवाजे पर खड़ी राधिका की तरफ देखा।


कुछ कहना चाहा।


लेकिन चुप रह गईं।


सिर्फ इतना बोलीं,


“बहू... बच्चों का ध्यान रखना।”


राधिका ने कोई जवाब नहीं दिया।


नितिन ने माता-पिता का सामान उठाया।


तीनों घर से बाहर निकल गए।


दरवाजा धीरे से बंद हो गया।


गाड़ी में पूरे रास्ते कोई कुछ नहीं बोला।


करीब एक घंटे बाद वे वृद्धाश्रम पहुंच गए।


वह जगह साफ-सुथरी थी।


चारों तरफ पेड़ थे।


एक बड़ा-सा बरामदा था, जहां कुछ बुजुर्ग धूप में बैठे बातें कर रहे थे।


नितिन ने कागजों की औपचारिकताएं पूरी कीं।


फिर माता-पिता के लिए कमरा देखा।


कमरा छोटा था, लेकिन साफ था।


एक बिस्तर।


एक अलमारी।


एक छोटी मेज।


और खिड़की से दिखाई देता नीम का पेड़।


शारदा देवी ने कमरे को देखा।


फिर बोलीं,


“अच्छा है।”


नितिन ने उनकी तरफ देखा।


“सच?”


“हां।”


गोविंद प्रसाद बोले,


“देख बेटा, हमारे लिए ज्यादा चिंता मत करना।”


नितिन ने कहा,


“मैं हर रविवार आऊंगा।”


गोविंद प्रसाद मुस्कुरा दिए।


“रविवार का इंतजार नहीं करेंगे। जब मन करे आ जाना।”


नितिन ने पिता के पैर छुए।


फिर मां के।


शारदा देवी ने उसे गले लगा लिया।


नितिन वापस मुड़ा।


कुछ कदम चला।


फिर पीछे देखा।


मां दरवाजे पर खड़ी थीं।


वह हाथ हिला रही थीं।


नितिन ने भी हाथ उठाया।


लेकिन गाड़ी में बैठते ही उसका चेहरा दोनों हथेलियों में छिप गया।


उस दिन पहली बार उसे महसूस हुआ कि आदमी की उम्र चाहे कितनी भी हो जाए, मां-बाप को छोड़ने का दर्द उसे अंदर से बच्चा बना देता है।



समय बीतता गया।


पहला रविवार आया।


नितिन सुबह ही वृद्धाश्रम पहुंच गया।


हाथ में फल थे।


बच्चों के लिए चॉकलेट भी थीं।


लेकिन उसके साथ बच्चे नहीं आए।


शारदा देवी ने पूछा,


“बच्चे नहीं आए?”


नितिन ने झूठ बोला,


“उनकी छुट्टी की क्लास है।”


मां समझ गई।


उन्होंने कुछ नहीं पूछा।


दूसरे रविवार नितिन देर से पहुंचा।


तीसरे रविवार वह नहीं जा पाया।


चौथे रविवार वह सिर्फ आधे घंटे के लिए गया।


हर बार मां मुस्कुराकर कहतीं,


“कोई बात नहीं बेटा, काम जरूरी है।”


पिता कहते,


“अपने परिवार को समय दे।”


लेकिन लौटते समय नितिन को हमेशा लगता कि उसके पीछे दो बूढ़ी आंखें उसे देख रही हैं।


एक दिन वह वृद्धाश्रम पहुंचा तो देखा, उसके पिता बरामदे में बैठे बच्चों को कैरम खेलना सिखा रहे थे।


मां पास बैठकर किसी बुजुर्ग महिला के बालों में तेल लगा रही थीं।


नितिन कुछ देर उन्हें दूर से देखता रहा।


उसे अचानक समझ आया—


मां-बाप जहां जाते हैं, वहां भी अपना घर बना लेते हैं।


क्योंकि घर उनके अंदर होता है।



इधर नितिन के घर की स्थिति बदलने लगी।


राधिका को लगा था कि माता-पिता के चले जाने से घर में शांति आ जाएगी।


लेकिन ऐसा नहीं हुआ।


बच्चे दादा-दादी को याद करने लगे।


छोटी बेटी परी अक्सर पूछती,


“पापा, दादी कब आएंगी?”


नितिन ने उसकी तरफ देखते हुए कहा, “जल्द बेटा।”


परी ने फिर पूछा, “दादाजी मुझे कहानी कब सुनाएंगे?”


नितिन के पास कोई जवाब नहीं था।


एक रात बेटे आरव ने पूछा,


“पापा, क्या दादी हमसे नाराज हैं?”


नितिन का दिल कांप गया।


“नहीं बेटा।”


“फिर वो हमारे साथ क्यों नहीं रहतीं?”


नितिन चुप रहा।


बच्चा मासूमियत से बोला,


“क्या हमने कोई गलती की थी?”


नितिन ने उसे सीने से लगा लिया।


उस रात वह बहुत देर तक रोता रहा।


कुछ महीने बाद राधिका की मां गंभीर रूप से बीमार पड़ गईं।


राधिका उन्हें अपने घर ले आई।


कुछ दिनों तक नितिन ने उनकी सेवा की।


दवाइयां लाया।


डॉक्टर को दिखाया।


रात में उठकर पानी दिया।


एक दिन राधिका की मां ने उसका हाथ पकड़कर कहा,


“बेटा, तुम बहुत अच्छे हो।”


नितिन ने बस इतना कहा,


“मां हैं आप मेरी।”


राधिका यह सुन रही थी।


उस रात उसने पहली बार खुद से एक सवाल किया।


“अगर मेरी मां को कोई उनके बुढ़ापे में अपने घर से निकाल दे तो मुझे कैसा लगेगा?”


उसके भीतर कुछ टूट गया।


अगले दिन उसने नितिन से कहा,


“मुझे आपके माता-पिता को घर वापस लाना है।”


नितिन ने सोचा उसने गलत सुना है।


“क्या कहा?”


राधिका की आंखों में आंसू थे।


“मैंने बहुत बड़ी गलती की।”


नितिन चुप रहा।


“मैंने सोचा था कि घर में ज्यादा लोग होंगे तो परेशानी होगी। लेकिन अब समझ आ रहा है कि घर लोगों से नहीं, रिश्तों से बनता है।”


नितिन की आंखें भर आईं।


“क्या तुम सच कह रही हो?”


राधिका ने आंसू पोंछते हुए धीरे से कहा,

“हां, नितिन।”


नितिन की आंखों में उम्मीद की चमक आ गई। उसने भावुक होकर पूछा,

“मां-पापा को वापस लाएंगे?”


राधिका ने सिर हिलाया।


“आज ही।”


दोनों उसी शाम वृद्धाश्रम पहुंचे।


गोविंद प्रसाद बरामदे में बैठे अखबार पढ़ रहे थे।


शारदा देवी भगवान की तस्वीर के सामने दिया जला रही थीं।


राधिका उनके सामने जाकर खड़ी हो गई।


कुछ क्षण तक कुछ बोल नहीं पाई।


फिर अचानक उनके पैरों में बैठ गई।


“मां... मुझे माफ कर दीजिए।”


शारदा देवी घबरा गईं।


“बहू, यह क्या कर रही हो?”


राधिका रोते हुए बोली,


“मैंने आपको बहुत दुख दिया।”


शारदा देवी ने उसके सिर पर हाथ रख दिया।


“उठो।”


राधिका ने आंसू पोंछते हुए कहा,

“मुझे माफ कर दीजिए मां। मैंने आपको बहुत दुख दिया। मैंने कभी यह समझने की कोशिश ही नहीं की कि आपके लिए अपना घर छोड़ना कितना मुश्किल होगा।”


शारदा देवी ने उसके सिर पर हाथ रखा और बोलीं,

“मां अपने बच्चों से बदला नहीं लेती बहू। तुमसे गलती हुई, लेकिन तुमने अपनी गलती समझ ली... मेरे लिए इतना ही काफी है।”


राधिका ने उनका हाथ पकड़ लिया।


“आप हमारे साथ घर चलिए।”


गोविंद प्रसाद चुपचाप सब देख रहे थे।


नितिन ने पिता की तरफ देखा।


“पापा... घर चलिए।”


गोविंद प्रसाद मुस्कुराए।


“घर?”


“हां।”


उन्होंने कुछ देर सोचा।


फिर बोले,


“एक बात कहूं?”


नितिन ने सिर उठाकर कहा,

“जी पापा।”


गोविंद प्रसाद ने राधिका की ओर देखते हुए कहा,

“हम वापस जरूर चलेंगे। लेकिन किसी पर बोझ बनकर नहीं।”


राधिका तुरंत बोली,


“आप बोझ नहीं हैं पापा।”


गोविंद प्रसाद ने उसकी तरफ देखा।


“और एक बात...”


“जी?” राधिका ने उनकी ओर देखते हुए पूछा।


“हमारे आने के बाद अगर कभी तुम्हें लगे कि हम ज्यादा हैं, तो चुप मत रहना। बात कर लेना। किसी रिश्ते को खामोशी में मत सड़ने देना।” गोविंद प्रसाद ने समझाते हुए कहा।


राधिका ने उनके पैर छू लिए।


“अब ऐसा कभी नहीं होगा।”



कुछ दिनों बाद वही घर फिर से बदल गया।


आंगन में सुबह दादाजी की आवाज सुनाई देने लगी।


“आरव, उठो बेटा... स्कूल नहीं जाना क्या?”


दादी रसोई में पोती के लिए पराठा बनाने लगीं।


राधिका कई बार रसोई में उनके साथ खड़ी होती।


“मां, आज मैं बनाऊंगी।”


शारदा देवी हंसतीं,


“अच्छा, तो आज बहू अपनी सास को खाना खिलाएगी?”


राधिका प्यार से बोली,

“हां मां।”


घर में फिर से आवाजें आने लगीं।


बच्चों की हंसी।


दादी की डांट।


दादाजी की कहानियां।


और कभी-कभी राधिका और शारदा देवी की छोटी-सी नोकझोंक।


लेकिन अब उस नोकझोंक में अपनापन था।


एक शाम गोविंद प्रसाद बरामदे में बैठे थे।


नितिन उनके पास आकर बैठ गया।


“पापा।”


गोविंद प्रसाद ने उसकी तरफ देखा और प्यार से बोले,

“हां बेटा?”


नितिन की आंखें नम हो गईं। वह कुछ क्षण चुप रहा, फिर भर्राई हुई आवाज में बोला,

“उस दिन जब आपको वृद्धाश्रम छोड़कर आया था... मुझे लगा था मैंने अपना कर्तव्य निभाया है।”


गोविंद प्रसाद चुप रहे।


नितिन की आंखों में आंसू थे।


“लेकिन अब समझ आया कि कर्तव्य केवल यह नहीं कि मां-बाप को खाना और दवा मिल जाए। कर्तव्य यह भी है कि उन्हें अपने होने का एहसास मिले।”


गोविंद प्रसाद ने उसके सिर पर हाथ रखा।


“तू समझ गया, बस यही काफी है।”


नितिन ने कहा,


“मुझे डर लगता है कि कहीं मैंने उस समय आपको बहुत दुख तो नहीं दिया।”


पिता मुस्कुराए।


“दुख तो दिया था।”


नितिन की आंखें झुक गईं।


फिर गोविंद प्रसाद ने कहा,


“लेकिन उससे बड़ा सुख भी दिया है।”


नितिन ने हैरानी से पिता की ओर देखा और पूछा,

“कैसा सुख?”


गोविंद प्रसाद हल्की-सी मुस्कान के साथ बोले,

“यह देखकर कि मेरा बेटा अपनी गलती समझ गया।”


नितिन ने पिता को गले लगा लिया।


उसी समय अंदर से शारदा देवी की आवाज आई,


“नितिन! खाना ठंडा हो रहा है।”


गोविंद प्रसाद हंस पड़े।


“देखा? मां अभी भी वही है।”


नितिन भी मुस्कुरा दिया।


“हां पापा...”


वह उठकर अंदर जाने लगा।


फिर अचानक रुक गया।


उसने पीछे मुड़कर अपने पिता को देखा।


उसे लगा जैसे जिंदगी ने उसे एक मौका वापस दिया है।


एक ऐसा मौका जिसे हर किसी को नहीं मिलता।


उसने मन ही मन कहा—


“जिस घर से मैंने अपने माता-पिता को विदा किया था, आज उसी घर में उनका आशीर्वाद वापस आया है।”


उस दिन नितिन ने एक बात हमेशा के लिए समझ ली—


माता-पिता को अपने घर में जगह देना केवल उनकी जरूरत पूरी करना नहीं है। यह उस प्यार का सम्मान है, जिसकी वजह से हमारा अपना अस्तित्व बना है।


और राधिका ने भी समझ लिया था कि—


बुढ़ापे में मां-बाप को सबसे ज्यादा जरूरत दवाइयों की नहीं, अपनेपन की होती है।


आंगन में नीम का पेड़ हवा से हिल रहा था।


शारदा देवी बच्चों को खाना खिला रही थीं।


गोविंद प्रसाद अखबार पढ़ रहे थे।


राधिका रसोई से सबको आवाज दे रही थी।


और नितिन दरवाजे पर खड़ा उस घर को देख रहा था।


अब वह घर केवल उसका घर नहीं था।


वह फिर से मां-बाप का घर बन गया था।



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