दिखावे का रिश्ता
निधि के पति रोहित का कुछ महीने पहले ही दूसरे शहर में तबादला हुआ था। रोहित को तो नए शहर में अपना ऑफिस और सहकर्मी मिल गए थे, लेकिन निधि के लिए सब कुछ नया था।
नया घर, नई गली, नए लोग और सबसे बड़ी बात—आस-पड़ोस में कोई जान-पहचान वाला नहीं था।
सुबह रोहित ऑफिस चले जाते और निधि घर के काम निपटाने के बाद अकेली बैठी रहती। कभी खिड़की से बाहर लोगों को देखती तो कभी मोबाइल में समय बिताती।
धीरे-धीरे उसे अकेलापन महसूस होने लगा।
एक दिन सामने वाले मकान में रहने वाली सुधा उससे मिलने आई। दोनों की बातचीत शुरू हुई और फिर धीरे-धीरे अच्छी दोस्ती हो गई।
सुधा काफी मिलनसार थी। वह कभी चाय पीने निधि के घर आ जाती तो कभी निधि को अपने घर बुला लेती।
निधि को भी अच्छा लगता। उसके मन की बात करने के लिए कोई मिल गया था।
सुधा के कारण उसे मोहल्ले के लोगों के बारे में भी जानकारी मिलने लगी।
एक रविवार की शाम सुधा उसके घर आई।
सुधा ने मुस्कुराते हुए निधि से पूछा,
"निधि, आज मेरे साथ चलोगी?"
निधि ने उसकी तरफ देखते हुए पूछा,
"कहाँ?"
सुधा ने कहा,
"गली के आखिरी मकान में वर्मा जी रहते हैं ना?"
निधि ने कुछ सोचते हुए कहा,
"हाँ, वही बड़ा-सा घर?"
सुधा ने सिर हिलाते हुए बताया,
"हाँ। उनकी पत्नी सरला देवी का कुछ दिन पहले निधन हो गया था। आज उनकी बरसी है। घर पर पूजा रखी है। मैं जा रही हूँ। तुम भी मेरे साथ चलो।"
निधि ने बिना ज्यादा सोचे कहा,
"हाँ, ठीक है। मैं चलती हूँ।"
शाम को दोनों वर्मा जी के घर पहुँचीं।
घर के बाहर फूलों की सुंदर सजावट थी। दरवाजे पर लोगों का आना-जाना लगा हुआ था।
अंदर बड़े हॉल में सरला देवी की एक बड़ी तस्वीर रखी थी। तस्वीर पर फूलों की मोटी माला चढ़ी हुई थी।
सामने दरी बिछी थी। एक तरफ पुरुष बैठे थे और दूसरी तरफ महिलाएँ।
निधि भी महिलाओं के बीच जाकर बैठ गई।
कुछ देर बाद पूजा समाप्त हुई।
महिलाएँ आपस में धीरे-धीरे बातें करने लगीं।
तभी अंदर के कमरे से दो महिलाएँ बाहर आईं।
दोनों सरला देवी की बहुएँ थीं।
बड़ी बहू तस्वीर के पास जाकर बैठ गई।
उसने तस्वीर को देखते ही अपना सिर पकड़ लिया और जोर-जोर से रोने लगी।
"माँ... आप हमें छोड़कर क्यों चली गईं?"
दूसरी बहू भी रोने लगी।
"माँ, आपने तो हमें हमेशा अपनी बेटियों की तरह रखा था। अब हम किससे अपने मन की बात कहेंगे?"
उन दोनों को देखकर कमरे में बैठे कई लोगों की आँखें नम हो गईं।
निधि भी भावुक हो गई।
उसने सुधा के कान में कहा,
"कितना प्यार करती थीं अपनी सास से दोनों। सच में सरला आंटी बहुत भाग्यशाली रही होंगी कि उन्हें इतनी अच्छी बहुएँ मिलीं।"
सुधा ने उसकी ओर देखा, लेकिन कुछ नहीं बोली।
निधि ने सामने देखा।
दोनों बहुएँ अब भी रो रही थीं।
बड़ी बहू बार-बार तस्वीर से लिपट रही थी।
"माँ, आपने मुझे बेटी से ज्यादा प्यार दिया था।"
निधि का मन भर आया।
तभी उसके पास बैठी एक बुजुर्ग महिला अचानक बोल पड़ीं,
"बेटी, जो दिखाई दे रहा है, हमेशा वैसा होता नहीं है।"
निधि ने चौंककर उनकी ओर देखा।
"जी?"
महिला ने धीरे से कहा,
"तुम इन्हें देखकर जो सोच रही हो, अगर तुम्हें इनकी पूरी कहानी पता चल जाए तो शायद तुम्हें बहुत दुख होगा।"
निधि कुछ समझ नहीं पाई।
"आप क्या कहना चाह रही हैं?"
बुजुर्ग महिला ने सरला देवी की तस्वीर की ओर देखा।
फिर धीमी आवाज में बोलीं,
"इनकी बहुओं को आज अपनी सास की बहुत याद आ रही है। लेकिन जब सरला जिंदा थीं, तब शायद किसी को उनकी जरूरत महसूस नहीं होती थी।"
निधि स्तब्ध रह गई।
उसने दोबारा तस्वीर की ओर देखा।
उसे समझ नहीं आया कि अभी जो महिलाएँ अपनी सास के लिए इतना रो रही हैं, उनके बारे में यह महिला ऐसा क्यों कह रही है।
बुजुर्ग महिला ने धीरे से कहा,
"अगर सुनना चाहती हो तो बताती हूँ कि सरला ने अपने आखिरी दिन कैसे बिताए थे..."
निधि की नजरें उसी महिला के चेहरे पर टिक गईं।
और फिर जो कहानी उसने सुनी, उसने उसके मन में रिश्तों के बारे में बनी पूरी सोच बदल दी।
बुजुर्ग महिला ने बोलना शुरू किया।
"मैं इसी मोहल्ले में तीस साल से रह रही हूँ। सरला को मैंने बहुत करीब से देखा है। बहुत सीधी और शांत महिला थीं।"
"उनके पति की मृत्यु काफी पहले हो गई थी। दोनों बेटों की जिम्मेदारी उन्होंने अकेले संभाली। घर चलाया, बच्चों को पढ़ाया और उन्हें अपने पैरों पर खड़ा किया।"
निधि चुपचाप सुनती रही।
महिला बोली,
"बेटों की शादी हुई तो सरला ने दोनों बहुओं को बेटी जैसा प्यार दिया। किसी बहू को कभी पराया नहीं समझा।"
"बड़ी बहू सीमा को शादी के बाद खाना बनाना तक ठीक से नहीं आता था। सरला ने उसे कभी ताना नहीं दिया। प्यार से सब सिखाया।"
"छोटी बहू पूजा के साथ भी उन्होंने यही किया।"
निधि ने पूछा,
"फिर ऐसा क्या हुआ कि आज बात यहाँ तक पहुँच गई?"
महिला ने गहरी साँस ली।
"शुरुआत में सब ठीक था। बहुओं के बच्चे हुए तो सरला ने उनकी भी पूरी जिम्मेदारी उठा ली।"
"रात को बच्चे रोते तो सरला उठतीं। सुबह बहुएँ सोती रहतीं और सरला बच्चों को तैयार करतीं।"
"स्कूल से बच्चे आते तो उन्हें खाना खिलातीं। होमवर्क करवातीं। उनकी छोटी-बड़ी जरूरतों का ध्यान रखतीं।"
"तब तक सबको सरला बहुत अच्छी लगती थीं।"
निधि ने धीरे से पूछा,
"क्योंकि वह सबकी जरूरत पूरी करती थीं?"
बुजुर्ग महिला ने सिर हिलाया।
"हाँ बेटी। जब तक उनके हाथ-पैर चलते रहे, सब उन्हें बहुत प्यार करते रहे।"
"लेकिन उम्र किसी की रुकती नहीं। धीरे-धीरे सरला के घुटनों में दर्द रहने लगा। कमर में तकलीफ रहने लगी। चलने में परेशानी होने लगी।"
"और यहीं से सब बदल गया।"
निधि ध्यान से सुन रही थी।
महिला बोली,
"जो महिला सुबह से रात तक पूरे घर के लिए भागती थी, वही अब अपने लिए एक गिलास पानी माँगने में भी सोचने लगी।"
"बहुओं को लगता था कि सरला हर बात के लिए उन्हें बुलाती रहती हैं।"
"धीरे-धीरे उन्होंने सरला को उनके कमरे तक सीमित कर दिया।"
निधि के चेहरे पर दुख साफ दिखाई देने लगा।
"क्या सच में?"
"हाँ।"
"खाने में भी उनके लिए अलग साधारण खाना बनता था। डॉक्टर ने कुछ चीजें मना की थीं, तो बहुओं ने बाकी सब चीजें भी बंद कर दीं।"
"घर में कभी मिठाई बनती, कभी पकौड़े, कभी पूरी-सब्जी... लेकिन सरला को देखकर कहा जाता—'माँजी, आपको तो डॉक्टर ने मना किया है।'"
"एक दिन सरला ने मुझसे कहा था कि उन्हें खाने से ज्यादा इस बात का दुख है कि अब कोई उनके पास बैठकर दो मिनट बात भी नहीं करता।"
निधि की आँखें नम हो गईं।
"उन्होंने बहुओं से नहीं कहा?"
महिला हल्का-सा मुस्कुराई।
"कहतीं तो शायद बहुएँ कुछ दिन ध्यान देतीं। लेकिन सरला बहुत स्वाभिमानी थीं। उन्हें किसी पर बोझ बनना पसंद नहीं था।"
"वह अक्सर कहती थीं—'बच्चे व्यस्त रहते हैं। मुझे ही समझना चाहिए।'"
कुछ क्षण के लिए सब शांत हो गया।
फिर बुजुर्ग महिला ने कहा,
"एक दिन रात में सरला को बहुत तेज बुखार था। उन्होंने बड़ी बहू को आवाज दी।"
"बहू ने अंदर से कहा—'माँजी, दवा मेज पर रखी है। आप ले लीजिए। मुझे सुबह जल्दी उठना है।'"
"सरला ने खुद उठने की कोशिश की। लेकिन चक्कर आने से फर्श पर गिर गईं।"
निधि ने अपने मुँह पर हाथ रख लिया।
"हे भगवान! फिर क्या हुआ?"
बुजुर्ग महिला ने भारी आवाज़ में कहा,
"सुबह जब कामवाली घर पर आई, तो उसने सरला को फर्श पर पड़ा हुआ देखा। उसने तुरंत पड़ोसियों को बुलाया। पड़ोसियों ने मिलकर उन्हें उठाया और फिर अस्पताल ले गए।"
निधि की आँखों में चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
उसने धीरे से पूछा,
"क्या वह ठीक हो गई थीं?"
बुजुर्ग महिला ने सिर हिलाते हुए कहा,
"हाँ, कुछ दिनों के इलाज के बाद सरला घर वापस तो आ गई थीं, लेकिन पहले जैसी नहीं रहीं। उस घटना के बाद उनका शरीर और भी कमजोर हो गया था। अब वह ठीक से चल भी नहीं पाती थीं।"
महिला की आवाज भर्रा गई।
"उसके बाद उनका ज्यादातर समय अकेले कमरे में बीतता था।"
"लेकिन अजीब बात यह थी कि जब कोई बाहर का व्यक्ति घर आता था, तब दोनों बहुएँ तुरंत उनके पास पहुँच जाती थीं।"
निधि ने पूछा,
"मतलब?"
महिला बोली,
"फिर वही प्यार।"
"'माँजी, आपने खाना खाया?'"
"'माँजी, दवा ली?'"
"'माँजी, आपको कुछ चाहिए?'"
"बाहर वालों के सामने दोनों बहुएँ अपनी सास की खूब सेवा करती थीं।"
निधि को अब कुछ समझ आने लगा था।
उसने सामने तस्वीर की ओर देखा।
अभी कुछ देर पहले जो दृश्य देखकर उसे बहुओं पर गर्व हो रहा था, वही दृश्य अब उसे भीतर तक दुखी कर रहा था।
महिला बोली,
"सरला ने एक दिन मेरा हाथ पकड़कर कहा था—'शकुंतला, आदमी बूढ़ा हो जाए तो बीमारी से ज्यादा अकेलापन सताता है।'"
निधि की आँखों से आँसू निकल पड़े।
तभी पास बैठी दूसरी महिला ने धीरे से कहा,
"सरला ने एक बार मुझसे भी कहा था—'मेरे जाने के बाद शायद सबको मेरी याद आएगी।'"
निधि ने चौंककर उसकी तरफ देखा।
"क्या उन्होंने ऐसा कहा था?"
"हाँ।"
महिला बोली,
"और देखो... आज सच में सबको उनकी बहुत याद आ रही है।"
उसी समय दोनों बहुएँ फिर तस्वीर के सामने बैठ गईं।
बड़ी बहू रोते हुए बोली,
"माँ, आपने मुझे बेटी माना था। मैं आपका यह एहसान कभी नहीं भूलूँगी।"
छोटी बहू ने भी आँसू पोंछते हुए कहा,
"माँ जैसी सास तो किसी को नहीं मिल सकती।"
निधि के मन में एक सवाल उठने लगा—
अगर सरला देवी इतनी अच्छी थीं, तो उनके जीते-जी उन्हें वह प्यार क्यों नहीं मिला जिसकी वे हकदार थीं?
कुछ देर बाद सुधा ने निधि के कंधे पर हाथ रखा।
"चलें?"
निधि ने धीरे से सिर हिलाया।
दोनों घर से बाहर निकल गईं।
लेकिन रास्ते भर निधि के मन में वही बातें घूमती रहीं।
उस दिन पहली बार उसे महसूस हुआ कि रिश्तों का भी दिखावा किया जा सकता है।
और इस एहसास ने उसके मन को अंदर तक हिला दिया।
घर लौटते समय निधि बिल्कुल चुप थी।
सुधा ने पूछा,
"क्या सोच रही हो?"
निधि ने कुछ देर बाद कहा,
"सुधा, आज मुझे एक बात समझ आई।"
"क्या?"
"हम लोग घर, कपड़े, गहने और पैसे का दिखावा करते हैं, यह तो सुना था। लेकिन रिश्तों का भी दिखावा होता है, यह आज देखा।"
सुधा चुप रही।
निधि बोली,
"सरला आंटी को जब प्यार चाहिए था, तब शायद उन्हें अकेलापन मिला। जब उन्हें सहारे की जरूरत थी, तब उन्हें अपने कमरे तक सीमित कर दिया गया।"
"और आज उनके जाने के बाद वही लोग उनके लिए रो रहे हैं।"
उसकी आवाज भर्रा गई।
"मुझे सबसे ज्यादा दुख इस बात का है कि सरला आंटी शायद अपने बच्चों से कुछ ज्यादा नहीं चाहती थीं। उन्हें बस दो मीठे शब्द चाहिए थे। कोई उनके पास बैठकर पूछ लेता कि 'माँ, आज कैसी हो?' तो शायद उनका मन खुश हो जाता।"
सुधा ने कहा,
"तुम ठीक कह रही हो।"
दोनों कुछ कदम आगे बढ़ीं।
तभी निधि की नजर सड़क किनारे एक बुजुर्ग व्यक्ति पर पड़ी।
एक बुजुर्ग आदमी अकेले बेंच पर बैठे थे। उनके हाथ में एक खाली टिफिन था।
निधि ने पूछा,
"ये कौन हैं?"
सुधा ने कहा,
"ये शर्मा अंकल हैं। उनके दोनों बेटे दूसरे शहरों में रहते हैं। यहाँ अकेले रहते हैं।"
निधि कुछ देर उन्हें देखती रही।
फिर बोली,
"चलो इनके घर चलते हैं।"
सुधा ने हैरानी से पूछा,
"क्यों? इनके घर क्यों जाना है?"
निधि ने मुस्कुराते हुए कहा,
"आज मैंने थोड़ा ज्यादा खाना बनाया था। कुछ बचा हुआ है। सोचा, इन्हें दे देते हैं।"
दोनों वापस निधि के घर गईं।
निधि ने खाना गर्म किया। एक साफ डिब्बे में रखा और शर्मा जी के घर पहुँच गई।
दरवाजा खटखटाया।
शर्मा जी ने दरवाजा खोला।
निधि मुस्कुराकर बोली,
"अंकल, आज थोड़ा ज्यादा खाना बन गया था। सोचा आपके लिए ले आऊँ।"
शर्मा जी ने डिब्बे की ओर देखा।
फिर निधि की ओर।
उनकी आँखें नम हो गईं।
"बेटी, मेरे लिए?"
"जी अंकल।"
"तुम्हें कैसे पता कि मैंने खाना नहीं बनाया?"
निधि मुस्कुराई।
"पता नहीं था। बस मन हुआ कि आपको दे दूँ।"
शर्मा जी कुछ पल उसे देखते रहे।
फिर बोले,
"भगवान तुम्हें खुश रखे बेटी।"
निधि ने उनके पैर छुए।
वापस आते समय सुधा ने कहा,
"तुम बहुत भावुक हो गई हो।"
निधि ने मुस्कुराकर कहा,
"शायद आज मुझे समझ आया है कि किसी को याद करने से ज्यादा जरूरी है, उसे याद रखना।"
"मतलब?"
"मतलब यह कि किसी के मरने के बाद उसकी तस्वीर पर फूल चढ़ाना आसान है। लेकिन जब वह हमारे सामने हो और उसे हमारी जरूरत हो, तब उसके पास बैठना मुश्किल होता है।"
सुधा ने उसकी बात सुनी।
निधि आगे बोली,
"मैं नहीं चाहती कि हमारे आसपास कोई बुजुर्ग सिर्फ इसलिए अकेला महसूस करे कि वह अब पहले की तरह काम नहीं कर सकता।"
उस दिन से निधि ने अपने पड़ोस के बुजुर्गों का ध्यान रखना शुरू कर दिया।
किसी को दवा चाहिए होती तो वह ला देती।
किसी को डॉक्टर के पास जाना होता तो साथ चली जाती।
किसी के घर कई दिनों से कोई मिलने नहीं आया होता तो वह थोड़ी देर बैठकर बातें कर लेती।
धीरे-धीरे मोहल्ले के लोग उसे पसंद करने लगे।
एक दिन शर्मा अंकल ने उससे कहा,
"बेटी, तुमने मुझे कोई बहुत बड़ी चीज नहीं दी। बस कभी-कभी मेरे पास बैठ जाती हो। लेकिन तुम्हें पता नहीं, तुम्हारे दस मिनट मेरे लिए पूरे दिन के बराबर होते हैं।"
निधि की आँखें भर आईं।
उसे सरला देवी याद आ गईं।
उसे लगा जैसे वह महिला कहीं दूर से उसे यही समझा रही हों—
"बेटी, बूढ़े इंसान को महंगे कपड़े, बड़े पकवान और दिखावे की जरूरत नहीं होती। उसे बस यह एहसास चाहिए कि वह अभी भी किसी के लिए महत्वपूर्ण है।"
निधि ने उसी दिन मन में एक संकल्प लिया।
वह अपने रिश्तों को कभी दिखावे का हिस्सा नहीं बनने देगी।
वह अपने माता-पिता से नियमित बात करेगी।
बुजुर्गों के पास बैठेगी।
और जब कभी किसी अपने को उसकी जरूरत होगी, तब उसके पास रहेगी।
क्योंकि उसने उस दिन एक बहुत बड़ा सच समझ लिया था—
किसी के जाने के बाद उसके लिए आँसू बहाना सच्चे रिश्ते की पहचान नहीं है।
सच्चा रिश्ता तो वह है जिसमें किसी के जीते-जी उसकी आँखों के आँसू दिखाई दें।
उसकी चुप्पी सुनाई दे।
उसका अकेलापन महसूस हो।
और उसके बिना माँगे ही उसके पास बैठने का मन करे।
निधि ने आसमान की ओर देखा और मन ही मन कहा—
"हे भगवान, हमें इतना समझदार बनाना कि किसी अपने के जाने के बाद उसकी कमी महसूस करने से पहले, उसके जीते-जी उसकी कद्र करना सीख जाएँ।"
और शायद यही जीवन का सबसे बड़ा सच है—
"मरने के बाद की भीड़ में खड़े होकर रोना आसान है, लेकिन किसी के अकेलेपन में उसके पास बैठना ही सच्चा रिश्ता है।"

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