बहू को अपना समझो

 

Emotional Indian family reconciliation between a daughter-in-law and her mother-in-law in a warm traditional home.


नंदिनी अपने मायके से ससुराल लौटने वाली थी।


उसका मायका बहुत बड़ा या बहुत अमीर नहीं था, लेकिन वहां उसके लिए हर चीज में अपनापन था। उसके माता-पिता की दुनिया ही जैसे अपनी बेटी के इर्द-गिर्द घूमती थी।


नंदिनी के पिता रमेश जी ने बेटी का सामान एक जगह रखते हुए कहा,

“बेटा, यह अचार तुम्हारी मां ने खास तुम्हारे लिए बनाया है। ससुराल में जब मन करे, निकालकर खा लेना।”


नंदिनी ने मुस्कुराते हुए कहा,

“पापा, इतना सारा सामान क्यों रख दिया? वहां भी तो खाना मिलता है।”


रमेश जी ने हंसकर कहा,

“वहां खाना मिलता होगा, लेकिन मायके का अचार कहां मिलेगा?”


नंदिनी कुछ नहीं बोली।


उसकी मां सरोज देवी पास बैठी थीं। उन्होंने बेटी के बाल ठीक करते हुए कहा,

“और यह मिठाई भी रख ले। तेरी सास को पसंद है न?”


नंदिनी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

“मां, उन्हें मेरे हाथ की कोई चीज पसंद आती है क्या?”


सरोज देवी कुछ पल चुप रहीं।


फिर उन्होंने प्यार से कहा,

“हर रिश्ते को समय लगता है बेटा।”


नंदिनी ने मां की तरफ देखा।


“पांच साल हो गए मां। कितना समय चाहिए?”


सरोज देवी के पास कोई जवाब नहीं था।


नंदिनी की शादी को पांच साल हो चुके थे। उसका पति अमन अच्छा कमाने वाला, शांत स्वभाव का आदमी था, लेकिन अपनी मां के सामने उसकी सोच जैसे बदल जाती थी।


उसकी सास शारदा देवी अपने बेटे को बहुत प्यार करती थीं। उन्हें लगता था कि बहू घर में आई है तो उसका काम है घर संभालना और बेटे की हर जरूरत पूरी करना।


नंदिनी ने कभी इस बात की शिकायत नहीं की कि उसे घर का काम करना पड़ता है।


उसकी शिकायत सिर्फ इतनी थी कि उसके काम को कभी अपना नहीं समझा गया।


वह सुबह से लेकर रात तक घर संभालती, लेकिन अगर एक कप चाय में चीनी थोड़ी ज्यादा हो जाए तो वही सबसे बड़ी गलती बन जाती।


वह सबकी पसंद का खाना बनाती, लेकिन किसी को यह याद नहीं रहता कि नंदिनी को क्या पसंद है।


उस दिन भी मायके से लौटने से पहले नंदिनी की मां ने पूछा,

“बेटा, वहां जाकर कुछ परेशान करे तो फोन कर देना।”


नंदिनी ने तुरंत कहा,

“नहीं मां। अब मैं छोटी बच्ची नहीं हूं।”


रमेश जी ने बेटी की तरफ देखते हुए कहा,

“बेटी बड़ी हो जाती है, लेकिन पिता के लिए कभी बड़ी नहीं होती।”


नंदिनी की आंखें भर आईं।


तभी बाहर से अमन की आवाज आई,

“पिताजी, नंदिनी तैयार है?”


रमेश जी ने कहा,

“हां बेटा, बस आती है।”


नंदिनी ने मां के पैर छुए।


सरोज देवी ने बेटी को गले लगाकर कहा,

“खुश रहना।”


नंदिनी ने मां को कसकर पकड़ लिया।


धीरे से बोली,

“मां, कभी-कभी लगता है यहीं रह जाऊं।”


सरोज देवी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,

“मायका दिल को रोक सकता है बेटा, लेकिन जिंदगी आगे बढ़ानी पड़ती है।”


नंदिनी ने आंसू पोंछे और बाहर आ गई।


अमन गाड़ी के पास खड़ा था।


उसने घड़ी देखते हुए कहा,

“बहुत देर हो गई। माँ फोन पर फोन कर रही हैं।”


नंदिनी ने कहा,

“बस दो मिनट।”


अमन ने कोई जवाब नहीं दिया।


रास्ते भर नंदिनी खिड़की से बाहर देखती रही।


अमन ने पूछा,

“क्या हुआ?”


नंदिनी ने कहा,

“कुछ नहीं।”


अमन ने फिर पूछा,

“मायके से आने का मन नहीं कर रहा?”


नंदिनी हल्की मुस्कान के साथ बोली,

“हर बेटी का मन मायके से जाने का नहीं करता।”


अमन ने कहा,

“तो फिर शादी क्यों की?”


नंदिनी ने उसकी तरफ देखा।


उसे लगा जैसे उसके भीतर कुछ टूट गया हो।


लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया।


कुछ देर बाद दोनों घर पहुंच गए।


दरवाजे पर शारदा देवी खड़ी थीं।


अमन को देखते ही उनके चेहरे पर खुशी आ गई।


उन्होंने कहा,

“आ गया मेरा बेटा! कितना थक गया होगा। अंदर आ, पहले पानी पी।”


अमन मुस्कुराते हुए अंदर चला गया।


नंदिनी ने सामान उठाया और पीछे आने लगी।


शारदा देवी ने उसकी तरफ देखा और कहा,

“बहू, सामान बाद में रख देना। पहले रसोई देख लेना।”


नंदिनी ने पूछा,

“माँजी, क्या हुआ?”


शारदा देवी बोलीं,

“बर्तन पड़े हैं। और अमन के लिए कुछ अच्छा बना देना। उसे बाहर का खाना पसंद नहीं आता।”


नंदिनी ने धीरे से कहा,

“जी माँजी।”


अमन कमरे में बैठा था।


शारदा देवी उसके पास पानी लेकर गईं।


“ले बेटा, पानी पी।”


अमन ने पानी लिया।


नंदिनी कुछ दूरी पर खड़ी यह सब देख रही थी।


उसने मन में सोचा,

“मायके में मां मेरे पति को दामाद समझकर सम्मान देती है और यहां मेरी सास अपने बेटे को बेटा समझकर प्यार देती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि वहां मुझे भी बेटी समझा जाता है... और यहां मुझे सिर्फ बहू।”


वह रसोई में चली गई।


सिंक में बर्तनों का ढेर लगा था।


उसने चुपचाप बर्तन धोने शुरू कर दिए।


कुछ देर बाद शारदा देवी रसोई में आईं।


उन्होंने कहा,

“बहू, अमन के लिए चाय बना देना।”


नंदिनी ने कहा,

“जी।”


शारदा देवी ने फिर कहा,

“चीनी कम रखना।”


नंदिनी बोली,

“जी।”


चाय बनाकर उसने अमन के सामने रख दी।


अमन ने चाय पी और कहा,

“ठीक है।”


नंदिनी इंतजार करती रही कि शायद वह एक बार कहेगा कि चाय अच्छी है।


लेकिन वह मोबाइल देखने लगा।


नंदिनी वापस रसोई में चली गई।


उसने कभी नहीं चाहा था कि उसका पति हर बात पर उसकी तारीफ करे।


वह सिर्फ इतना चाहती थी कि वह कभी उसकी परेशानी समझे।


लेकिन अमन की एक आदत थी।


जब भी नंदिनी अपनी सास की किसी बात से दुखी होकर उससे बात करती, अमन तुरंत कह देता,

“मेरी माँ कभी गलत नहीं हो सकती।”


पहली बार नंदिनी ने यह बात शादी के कुछ महीनों बाद सुनी थी।


उस दिन शारदा देवी ने नंदिनी पर सबके सामने आरोप लगाया था कि उसने जानबूझकर उनकी पसंद की साड़ी खराब कर दी।


नंदिनी ने रोते हुए कहा था,

“माँजी, मैंने ऐसा नहीं किया।”


शारदा देवी ने कहा था,

“अब मेरे सामने सफाई मत दे। मुझे सब समझ आता है।”


नंदिनी ने रात में अमन से कहा था,

“आप मां से पूछिए, मैंने साड़ी खराब नहीं की।”


अमन ने कहा था,

“तुम्हें मेरी माँ पर भरोसा नहीं है?”


नंदिनी ने कहा,

“मुझे आप पर भरोसा है। इसलिए तो कह रही हूं।”


अमन नाराज हो गया था।


“मेरी माँ कभी गलत नहीं हो सकती।”


वह रात नंदिनी बहुत रोई थी।


लेकिन उस दिन के बाद उसने अपनी शिकायतें कम कर दीं।


वह समझ गई थी कि अगर वह रोएगी तो कोई उसका आंसू पोंछने नहीं आएगा।


अगर वह खाना नहीं खाएगी तो कोई नहीं पूछेगा कि क्यों नहीं खाया।


अगर वह चुप रहेगी तो कोई यह नहीं पूछेगा कि मन में क्या है।


इसलिए उसने खुद को मजबूत बनाना शुरू कर दिया।


लेकिन मजबूत दिखने वाला इंसान भी अंदर से टूट सकता है।


एक दिन नंदिनी की तबीयत खराब थी।


उसके सिर में बहुत तेज दर्द था।


फिर भी उसने पूरे घर का काम किया।


शारदा देवी ने रसोई में आकर कहा,

“बहू, आज खाना बनाने में इतनी देर क्यों लग रही है?”


नंदिनी ने धीरे से कहा,

“माँजी, सिर में बहुत दर्द है।”


शारदा देवी ने कहा,

“सिर दर्द तो सबको होता है। घर का काम दर्द देखकर थोड़ी रुक जाएगा।”


नंदिनी चुप हो गई।


वह खाना बनाती रही।


अमन घर आया।


नंदिनी ने उम्मीद से उसकी तरफ देखा।


अमन ने पूछा,

“खाना तैयार है?”


नंदिनी ने कहा,

“जी।”


वह खाना लगाने लगी।


अमन ने मां से पूछा,

“माँ, आज क्या हुआ? आप चुप क्यों हैं?”


शारदा देवी ने तुरंत कहा,

“मुझे क्या होना है बेटा? तेरी पत्नी को देख। काम करने का मन नहीं है। सिर दर्द का बहाना बना रही है।”


नंदिनी ने अमन की तरफ देखा।


उसे लगा शायद आज वह उसकी बात समझेगा।


लेकिन अमन ने कहा,

“नंदिनी, अगर तबीयत खराब है तो आराम कर लिया करो, लेकिन माँ से इस तरह जवाब मत दिया करो।”


नंदिनी ने पूछा,

“मैंने क्या जवाब दिया?”


अमन बोला,

“बस रहने दो।”


नंदिनी चुप हो गई।


उस रात उसने खाना नहीं खाया।


लेकिन किसी ने नहीं पूछा।


रात काफी देर बाद अमन ने पूछा,

“तुम खाना नहीं खाओगी?”


नंदिनी ने कहा,

“भूख नहीं है।”


अमन बोला,

“ठीक है।”


और वह सो गया।


नंदिनी छत की तरफ देखते हुए सोचती रही—


“क्या सच में बहू को सिर्फ इसलिए सब सहना पड़ता है क्योंकि वह बहू है?”


उसकी आंखों से आंसू निकल आए।


लेकिन उसने खुद से एक वादा किया।


“मैं रोकर अपनी जिंदगी नहीं बिताऊंगी।”


उसे नहीं पता था कि आने वाले दिनों में एक ऐसी घटना होने वाली थी जो न सिर्फ उसकी जिंदगी बदल देगी, बल्कि उसके पति और सास की सोच भी बदल देगी।


लेकिन उस बदलाव से पहले नंदिनी को एक और बड़ी परीक्षा से गुजरना था।


और वह परीक्षा उसके रिश्ते की सबसे कठिन घड़ी बनने वाली थी।



नंदिनी ने शिकायत करना लगभग छोड़ दिया था।


अब उसे कोई कुछ कहता तो वह सिर्फ “जी” कहती।


शारदा देवी को लगता था कि बहू आखिर समझदार हो गई है।


उन्हें यह समझ नहीं आया कि नंदिनी समझदार नहीं, बल्कि थक चुकी थी।


एक दिन शारदा देवी की बेटी पूजा अपने मायके आई।


पूजा की शादी को तीन साल हुए थे।


शारदा देवी ने बेटी को देखते ही कहा,

“आ मेरी बच्ची! कैसी है?”


पूजा ने मां को गले लगाते हुए कहा,

“माँ, मैं ठीक हूं।”


नंदिनी रसोई से यह सब देख रही थी।


पूजा के लिए शारदा देवी ने उसके पसंद का खाना बनाया।


उसकी पसंद की मिठाई मंगवाई।


उसके लिए नया कपड़ा निकाला।


पूजा ने मां से कहा,

“माँ, आप अभी भी मेरा इतना ध्यान रखती हो।”


शारदा देवी ने मुस्कुराकर कहा,

“बेटियां तो मां की जान होती हैं।”


नंदिनी के हाथ रुक गए।


उसने मन ही मन सोचा—


“काश, बहुएं भी किसी की जान हो पातीं।”


कुछ देर बाद पूजा ने नंदिनी को आवाज दी,

“भाभी, आप भी बैठिए न।”


नंदिनी ने कहा,

“आप लोग बातें करो। मैं खाना देख रही हूं।”


पूजा ने कहा,

“भाभी, आप भी परिवार हैं।”


शारदा देवी ने तुरंत कहा,

“अरे उसे काम करने दे। बहू का काम ही घर संभालना है।”


पूजा चुप हो गई।


नंदिनी ने भी कोई जवाब नहीं दिया।


उसे बुरा जरूर लगा, लेकिन अब उसे ऐसे शब्द चुभते कम थे।


उसे आदत हो गई थी।


अमन भी अपनी बहन से बहुत प्यार करता था।


पूजा के आने पर वह उसके लिए फल लेकर आया।


पूजा ने हंसते हुए कहा,

“भैया, अभी भी मेरी पसंद याद है?”


अमन ने कहा,

“तुम्हारी पसंद कैसे भूल सकता हूं?”


नंदिनी यह सुनकर मुस्कुराई।


उसे लगा, “काश अमन को मेरी पसंद भी याद होती।”


लेकिन वह शिकायत नहीं करना चाहती थी।


कुछ देर बाद पूजा ने नंदिनी से कहा,

“भाभी, आप बहुत शांत रहती हैं।”


नंदिनी ने कहा,

“शांत रहना सीख लिया है।”


पूजा ने हंसकर पूछा,

“क्यों?”


नंदिनी ने मुस्कुराकर कहा,

“क्योंकि हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं होता।”


पूजा ने उसकी आंखों में कुछ पढ़ लिया।


लेकिन उसने कोई सवाल नहीं किया।


कुछ दिन बाद पूजा अपने ससुराल लौट गई।


घर फिर पहले जैसा हो गया।


नंदिनी अपने काम में लग गई।


लेकिन उस दौरान शारदा देवी की तबीयत धीरे-धीरे खराब होने लगी।


उन्हें कई दिनों से कमजोरी महसूस हो रही थी।


नंदिनी ने कई बार कहा,

“माँजी, डॉक्टर को दिखा दीजिए।”


शारदा देवी ने कहा,

“कुछ नहीं हुआ मुझे। उम्र हो रही है, थोड़ी कमजोरी तो होगी ही।”


नंदिनी ने कहा,

“फिर भी एक बार जांच करा लीजिए।”


शारदा देवी ने कहा,

“तू ज्यादा चिंता मत कर।”


नंदिनी चुप हो गई।


अमन से भी उसने कहा।


“अमन, माँ की तबीयत कुछ दिनों से ठीक नहीं लग रही।”


अमन ने कहा,

“माँ खुद कह रही हैं कि ठीक हैं तो ठीक होंगी।”


नंदिनी ने कहा,

“फिर भी डॉक्टर को दिखा देते हैं।”


अमन बोला,

“ठीक है, समय मिला तो ले जाऊंगा।”


नंदिनी ने कुछ नहीं कहा।


वह जानती थी कि अमन काम में व्यस्त रहता है।


इसलिए वह शारदा देवी का खुद ध्यान रखने लगी।


वह समय पर दवा देती।


खाना हल्का बनाती।


उनके कमरे की सफाई करती।


शारदा देवी कभी-कभी कहतीं,

“बहू, इतना करने की जरूरत नहीं है।”


नंदिनी जवाब देती,

“आप मेरी जिम्मेदारी हैं, माँजी।”


शारदा देवी कुछ पल उसे देखतीं और फिर नजरें फेर लेतीं।


उन्हें नंदिनी की सेवा दिखाई देती थी, लेकिन उनके भीतर की पुरानी सोच अभी भी पूरी तरह नहीं बदली थी।


फिर एक दिन घर में एक बड़ा हादसा होते-होते बचा।


शारदा देवी रसोई में गईं।


उन्हें अचानक चक्कर आया।


वह दीवार पकड़कर खड़ी होने की कोशिश करने लगीं।


नंदिनी ने पीछे से आवाज सुनी।


“माँजी?”


कोई जवाब नहीं आया।


नंदिनी दौड़कर रसोई में पहुंची।


उसने देखा कि शारदा देवी जमीन पर गिर चुकी थीं।


नंदिनी घबरा गई।


उसने तुरंत पड़ोसी को बुलाया और अमन को फोन किया।


नंदिनी ने घबराकर कहा,

“अमन, माँ गिर गई हैं। उनकी हालत ठीक नहीं लग रही।”


अमन ने पूछा,

“क्या हुआ?”


नंदिनी ने कहा,

“मुझे नहीं पता। मैं उन्हें अस्पताल लेकर जा रही हूं।”


अमन ने कहा,

“मैं अभी निकलता हूं।”


नंदिनी ने पड़ोसी की मदद से शारदा देवी को अस्पताल पहुंचाया।


डॉक्टर ने तुरंत जांच शुरू की।


नंदिनी बाहर खड़ी हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रही थी।


कुछ देर बाद डॉक्टर बाहर आए।


डॉक्टर ने कहा,

“घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन इन्हें कुछ समय निगरानी में रखना होगा। कमजोरी और ब्लड प्रेशर की समस्या है।”


नंदिनी ने राहत की सांस ली।


कुछ देर बाद अमन भी अस्पताल पहुंच गया।


उसने नंदिनी को देखा।


उसकी आंखों के नीचे थकान साफ दिखाई दे रही थी।


अमन ने पूछा,

“तुमने कुछ खाया?”


नंदिनी ने कहा,

“नहीं।”


अमन ने कहा,

“क्यों?”


नंदिनी ने कहा,

“माँजी को छोड़कर खाने कैसे चली जाती?”


अमन कुछ नहीं बोला।


वह पहली बार नंदिनी को उस नजर से देख रहा था, जिस नजर से शायद उसे बहुत पहले देखना चाहिए था।


अंदर शारदा देवी होश में आ चुकी थीं।


उन्होंने नंदिनी को पास बुलाया।


“बहू...”


नंदिनी तुरंत उनके पास गई।


“जी माँजी।”


शारदा देवी ने पूछा,

“तूने अमन को बुलाया?”


नंदिनी ने कहा,

“जी।”


शारदा देवी ने पूछा,

“और मुझे यहां कौन लेकर आया?”


नंदिनी ने कहा,

“मैं।”


शारदा देवी की आंखों में आंसू आ गए।


उन्होंने कहा,

“जब मैं गिरी थी, मुझे लगा कोई नहीं आएगा।”


नंदिनी ने उनका हाथ पकड़ते हुए कहा,

“ऐसा क्यों सोचती हैं?”


शारदा देवी ने कहा,

“क्योंकि मैंने तुझे कभी अपना समझा ही नहीं।”


नंदिनी चुप रही।


शारदा देवी ने कहा,

“तूने कभी मेरे सामने शिकायत नहीं की।”


नंदिनी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

“शिकायत करने से अगर रिश्ता ठीक होता तो मैं जरूर करती।”


शारदा देवी ने पूछा,

“फिर तूने इतना सब सहा क्यों?”


नंदिनी ने कहा,

“क्योंकि मुझे लगता था कि एक दिन आपको समझ आएगा कि मैं इस घर को अपना घर मानती हूं।”


शारदा देवी की आंखों से आंसू बहने लगे।


उन्होंने कहा,

“और अगर मैं कभी नहीं समझती तो?”


नंदिनी कुछ पल चुप रही।


फिर उसने कहा,

“तब भी मैं अपना फर्ज निभाती। क्योंकि किसी के गलत व्यवहार से मेरा संस्कार गलत नहीं हो जाता।”


अमन दरवाजे पर खड़ा सब सुन रहा था।


उसके पास बोलने के लिए कोई शब्द नहीं था।


उसे अपनी पत्नी की वह बात याद आई—


“मैं सिर्फ चाहती हूं कि तुम एक बार मेरी बात भी समझो।”


उसे एहसास हुआ कि उसने कभी उसकी बात समझने की कोशिश ही नहीं की।


अमन अंदर आया।


उसने मां का हाथ पकड़ा।


“माँ, आप ठीक हैं?”


शारदा देवी ने बेटे की तरफ देखा।


फिर नंदिनी की तरफ।


उन्होंने कहा,

“अमन, तेरी पत्नी बहुत अच्छी है।”


अमन चौंक गया।


“माँ?”


शारदा देवी ने कहा,

“मैंने उसे बहुत दुख दिया है।”


अमन ने तुरंत कहा,

“माँ, ऐसी बात मत करो।”


शारदा देवी बोलीं,

“नहीं बेटा। आज मुझे बोलने दे।”


उन्होंने नंदिनी का हाथ पकड़ लिया।


“बहू, मुझे माफ कर दे।”


नंदिनी ने तुरंत कहा,

“माँजी, आप ऐसी बात मत कीजिए।”


शारदा देवी ने कहा,

“तू मुझे माँ कहती रही और मैं तुझे बहू से आगे कभी देख ही नहीं पाई।”


नंदिनी की आंखें भर आईं।


लेकिन तभी शारदा देवी ने एक ऐसी बात कही जिसने नंदिनी को भीतर तक हिला दिया।


उन्होंने कहा,

“लेकिन बहू, मैं अभी भी पूरी तरह बदल नहीं पाई हूं।”


नंदिनी ने उनकी तरफ देखा।


शारदा देवी बोलीं,

“मुझे डर लगता है कि अगर मैं तुझसे ज्यादा प्यार करने लगी तो कहीं मेरी बेटी की जगह कोई और न ले ले।”


नंदिनी ने उनकी हथेली दबाते हुए कहा,

“माँजी, मैं आपकी बेटी की जगह लेने नहीं आई।”


शारदा देवी चुप हो गईं।


नंदिनी ने कहा,

“पूजा जी आपकी बेटी हैं और हमेशा रहेंगी। मैं सिर्फ आपकी बहू हूं। लेकिन अगर आप मुझे अपना समझ लें तो मैं भी इस घर को अपना मानकर जी सकती हूं।”


शारदा देवी की आंखें फिर भर आईं।


अमन ने नंदिनी की तरफ देखा।


उसने कहा,

“नंदिनी, मुझे माफ कर दो।”


नंदिनी ने कहा,

“अमन, अभी माँ को आराम चाहिए।”


अमन ने कहा,

“तुम हर बार मेरी बात टाल देती हो।”


नंदिनी ने मुस्कुराकर कहा,

“क्योंकि मुझे तुम्हें माफ करने में कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन मैं चाहती हूं कि तुम मुझे सिर्फ पत्नी नहीं, एक इंसान समझो।”


अमन ने सिर झुका लिया।


उस दिन अस्पताल के कमरे में तीन लोग थे।


एक मां, जिसे अपनी सोच पर पछतावा हो रहा था।


एक बेटा, जिसे पहली बार अपनी गलती समझ आई थी।


और एक बहू, जिसने वर्षों तक सम्मान की कमी सहने के बाद भी अपने रिश्ते को टूटने नहीं दिया था।


लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी।


अस्पताल से घर लौटने के बाद शारदा देवी के सामने एक और परीक्षा आने वाली थी।


इस बार फैसला सिर्फ नंदिनी के बारे में नहीं था।


इस बार पूरे परिवार को तय करना था कि घर में बहू की असली जगह क्या है।



शारदा देवी अस्पताल से घर लौट आई थीं।


नंदिनी ने उनके लिए कमरे में सारी चीजें व्यवस्थित कर दीं।


दवाइयां समय के अनुसार अलग रखीं।


पानी की बोतल पास रखी।


हल्का खाना बनाया।


तकिया ठीक किया।


शारदा देवी चुपचाप नंदिनी को देख रही थीं।


उन्होंने पूछा,

“बहू, तू इतना सब क्यों कर रही है?”


नंदिनी ने कहा,

“क्योंकि आपको आराम चाहिए।”


शारदा देवी बोलीं,

“लेकिन मैंने तेरे साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया।”


नंदिनी ने मुस्कुराते हुए कहा,

“आप मेरी सास हैं। आपका ख्याल रखना मेरा फर्ज है।”


शारदा देवी ने कहा,

“और मेरा फर्ज?”


नंदिनी रुक गई।


शारदा देवी ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा,

“मेरा फर्ज है कि मैं भी तेरा ख्याल रखूं।”


नंदिनी की आंखें भर आईं।


शारदा देवी ने आगे कहा,

“आज से घर का हर काम अकेले मत करना।”


नंदिनी ने मुस्कुराकर कहा,

“आप आराम करेंगी तो ही मैं काम करूंगी।”


शारदा देवी पहली बार हंस पड़ीं।


“अच्छा! अब बहू मुझे ही आदेश देगी?”


नंदिनी ने मजाक में कहा,

“आपने ही तो कहा है कि अपना समझो।”


दोनों के बीच पहली बार हल्की हंसी गूंजी।


अमन दरवाजे पर खड़ा यह सब देख रहा था।


उसके चेहरे पर संतोष था।


लेकिन वह जानता था कि सिर्फ एक दिन की भावुकता से पांच साल की दूरी खत्म नहीं होगी।


उसे भी बदलना पड़ेगा।


अगले दिन अमन ने नंदिनी से कहा,

“आज खाना मैं बनाऊंगा।”


नंदिनी ने आश्चर्य से पूछा,

“आप?”


अमन ने कहा,

“हां। क्यों? पति खाना नहीं बना सकता?”


नंदिनी हंसते हुए बोली,

“बना सकते हैं। लेकिन आपकी मां क्या कहेंगी?”


अमन ने कहा,

“माँ अब कुछ नहीं कहेंगी।”


तभी शारदा देवी कमरे से बोलीं,

“मैं क्यों कुछ कहूंगी? मुझे तो खुशी होगी कि मेरा बेटा काम सीख रहा है।”


अमन हंस पड़ा।


उस दिन अमन ने पहली बार रसोई में नंदिनी का हाथ बंटाया।


नंदिनी को यह बहुत बड़ी बात लगी।


लेकिन असली बदलाव तब दिखाई दिया जब कुछ दिनों बाद पूजा अपने मायके आई।


पूजा ने घर में आते ही मां को गले लगाया।


फिर उसने नंदिनी से कहा,

“भाभी, आप कैसी हैं?”


नंदिनी ने कहा,

“मैं ठीक हूं।”


पूजा ने देखा कि अब मां नंदिनी से पहले की तरह आदेश देने के बजाय प्यार से बात कर रही थीं।


उसने पूछा,

“माँ, क्या हुआ है? आप बदल गई हो।”


शारदा देवी ने कहा,

“हां बेटी, क्योंकि देर से समझ आया कि घर में सिर्फ बेटियां ही नहीं होतीं।”


पूजा चुप हो गई।


शारदा देवी ने नंदिनी की तरफ देखते हुए कहा,

“यह बहू है, लेकिन यह भी किसी की बेटी है। इसे भी अपने घर की तरह सम्मान चाहिए।”


पूजा मुस्कुराई।


फिर उसने नंदिनी से कहा,

“भाभी, मुझे खुशी है कि अब आपको मां मिल गई।”


नंदिनी ने कहा,

“मुझे भी।”


शारदा देवी ने दोनों की तरफ देखा।


उन्होंने कहा,

“एक बात मैं तुम दोनों से कहना चाहती हूं।”


पूजा ने पूछा,

“क्या माँ?”


शारदा देवी बोलीं,

“मैंने अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती यह सोचकर की कि बहू को बेटी की तरह रखना चाहिए या नहीं। असली बात यह है कि बहू को बेटी बनाना जरूरी नहीं। उसे सम्मान देना जरूरी है।”


पूजा ने कहा,

“आपने सही कहा माँ।”


लेकिन उसी समय शारदा देवी के फोन पर एक कॉल आया।


वह उनकी पड़ोसन का फोन था।


पड़ोसन ने पूछा,

“शारदा जी, सुना है आपकी तबीयत खराब हो गई थी?”


शारदा देवी ने कहा,

“हां, लेकिन अब ठीक हूं।”


पड़ोसन ने पूछा,

“बहू ने ध्यान रखा?”


शारदा देवी ने कहा,

“हां। मेरी बहू ने।”


पड़ोसन ने हंसते हुए कहा,

“बहुएं तो ऐसी ही होती हैं, दो दिन सेवा करती हैं फिर अपना रंग दिखा देती हैं।”


शारदा देवी कुछ पल चुप रहीं।


फिर उन्होंने दृढ़ आवाज में कहा,

“आप मेरी बहू को नहीं जानतीं।”


पड़ोसन ने पूछा,

“क्यों?”


शारदा देवी बोलीं,

“जब मैं गिरी थी, मेरा बेटा मेरे पास नहीं था। मेरी बेटी भी मेरे पास नहीं थी। मेरी बहू थी।”


पड़ोसन चुप हो गई।


शारदा देवी ने आगे कहा,

“जिसे हम पराया कहते रहे, वही हमारे सबसे मुश्किल समय में अपना बनकर खड़ी थी।”


नंदिनी पास खड़ी यह सब सुन रही थी।


उसकी आंखें नम हो गईं।


फोन रखने के बाद शारदा देवी ने नंदिनी को देखा।


“बहू, आज मैंने पहली बार तेरे लिए किसी के सामने आवाज उठाई है।”


नंदिनी मुस्कुराई।


“माँजी, मुझे किसी से लड़ने की जरूरत नहीं।”


शारदा देवी ने कहा,

“तुझे नहीं, लेकिन मुझे है। क्योंकि मैंने तेरे साथ गलत किया है।”


अमन ने मां की बात सुनी तो उसने कहा,

“माँ, आपने अकेले गलती नहीं की। मैंने भी की।”


शारदा देवी ने बेटे की तरफ देखा।


अमन बोला,

“जब नंदिनी मेरे पास शिकायत लेकर आती थी, मैं उसकी बात सुनने के बजाय कह देता था कि मेरी माँ गलत नहीं हो सकती।”


नंदिनी ने धीरे से कहा,

“अब वह बात पुरानी हो गई।”


अमन ने कहा,

“नहीं। उसे याद रखना जरूरी है, ताकि मैं दोबारा वही गलती न करूं।”


उस दिन से घर का माहौल बदलने लगा।


नंदिनी अब भी घर का काम करती थी।


लेकिन अब काम को उसकी मजबूरी नहीं माना जाता था।


शारदा देवी कभी-कभी खुद रसोई में आकर कहतीं,

“बहू, आज तू बैठ। सब्जी मैं काट देती हूं।”


नंदिनी कहती,

“आपकी तबीयत अभी पूरी तरह ठीक नहीं हुई।”


शारदा देवी मुस्कुराकर कहतीं,

“तो तू मेरे लिए बेटी की तरह चिंता करती है और मैं तेरे लिए नहीं कर सकती?”


नंदिनी हंस पड़ती।


अमन भी घर के काम में हाथ बंटाने लगा।


एक दिन नंदिनी ने कहा,

“आपको इतना काम करने की जरूरत नहीं।”


अमन ने कहा,

“जरूरत है।”


नंदिनी ने पूछा,

“क्यों?”


अमन ने मुस्कुराकर कहा,

“क्योंकि मुझे अब समझ आया है कि घर सिर्फ महिलाओं की जिम्मेदारी नहीं होती।”


नंदिनी ने उसकी तरफ देखा।


उसके मन में वर्षों से जमा शिकायतें धीरे-धीरे पिघल रही थीं।


लेकिन एक दिन फिर एक ऐसी घटना हुई जिसने सबको भावुक कर दिया।


नंदिनी की मां सरोज देवी की तबीयत अचानक खराब हो गई।


नंदिनी को मायके से फोन आया।


उसके भाई ने कहा,

“दीदी, मां की तबीयत ठीक नहीं है। डॉक्टर ने कुछ जांचें लिखी हैं।”


नंदिनी घबरा गई।


उसने अमन से कहा,

“मुझे मायके जाना है।”


अमन ने तुरंत कहा,

“मैं तुम्हें लेकर चलता हूं।”


नंदिनी ने आश्चर्य से पूछा,

“आप?”


अमन ने कहा,

“हां। वह सिर्फ तुम्हारी मां नहीं हैं। अब मेरी भी जिम्मेदारी हैं।”


शारदा देवी भी यह सुन रही थीं।


उन्होंने कहा,

“बहू, तू अकेली क्यों जाएगी? अमन को तेरे साथ जाना चाहिए।”


नंदिनी की आंखों में आंसू आ गए।


वह अपनी सास के पास गई।


“माँजी...”


शारदा देवी ने कहा,

“जा बेटा। मां के पास बेटी को होना चाहिए।”


नंदिनी ने पूछा,

“और घर?”


शारदा देवी मुस्कुराईं।


“घर मैं संभाल लूंगी।”


नंदिनी ने पहली बार महसूस किया कि उसके जीवन में सचमुच कुछ बदल गया था।


वह अमन के साथ मायके पहुंची।


सरोज देवी बिस्तर पर थीं।


नंदिनी को देखते ही उन्होंने कहा,

“बेटा, तू क्यों आई? घर का काम कौन करेगा?”


नंदिनी ने मां का हाथ पकड़कर कहा,

“मां, अब मेरे घर में कोई मुझे सिर्फ काम करने वाली नहीं समझता।”


सरोज देवी ने आश्चर्य से अमन की तरफ देखा।


अमन ने मुस्कुराते हुए कहा,

“मम्मी जी, नंदिनी अब सिर्फ आपकी बेटी नहीं, हमारे घर की सबसे जरूरी सदस्य है।”


सरोज देवी की आंखें भर आईं।


उन्होंने अमन से कहा,

“बेटा, मेरी बेटी को खुश रखना।”


अमन ने कहा,

“अब मैं उसे समझने की कोशिश करूंगा।”


उसी समय नंदिनी का फोन बजा।


शारदा देवी का फोन था।


नंदिनी ने पूछा,

“माँजी, सब ठीक है?”


शारदा देवी ने कहा,

“हां। तू अपनी मां के पास रह। यहां की चिंता मत कर।”


नंदिनी ने पूछा,

“आपने खाना खा लिया?”


शारदा देवी हंसते हुए बोलीं,

“हां बहू। तू अब अपनी मां की चिंता कर।”


फोन रखने के बाद नंदिनी कुछ देर चुप रही।


उसके चेहरे पर आंसू थे।


अमन ने पूछा,

“रो क्यों रही हो?”


नंदिनी ने मुस्कुराते हुए कहा,

“खुशी के हैं।”


अमन ने पूछा,

“किस बात की?”


नंदिनी ने कहा,

“कभी मैं सोचती थी कि ससुराल में मेरा कोई नहीं है। लेकिन आज पहली बार लगा कि मेरे पास दो घर हैं।”


अमन ने उसका हाथ पकड़ लिया।


कुछ दिनों बाद नंदिनी की मां ठीक होकर घर लौट आईं।


नंदिनी भी ससुराल वापस आ गई।


दरवाजे पर शारदा देवी उसका इंतजार कर रही थीं।


नंदिनी ने उनके पैर छुए।


शारदा देवी ने उसे रोककर गले लगा लिया।


उन्होंने कहा,

“इतने दिन बाद आई है, पहले गले लग।”


नंदिनी उनकी बाहों में सिमट गई।


शारदा देवी ने धीरे से कहा,

“बहू, मुझे एक बात समझने में पांच साल लग गए।”


नंदिनी ने पूछा,

“क्या?”


शारदा देवी बोलीं,

“बहू को बेटी बनाना जरूरी नहीं है।”


नंदिनी चुप रही।


शारदा देवी ने कहा,

“क्योंकि बेटी अपनी जगह होती है और बहू अपनी जगह। दोनों रिश्तों की तुलना ही गलत है।”


फिर उन्होंने नंदिनी का चेहरा अपने हाथों में लेते हुए कहा,

“लेकिन बहू को अपना मानना जरूरी है।”


नंदिनी की आंखों से आंसू बहने लगे।


शारदा देवी ने कहा,

“तूने मेरे घर को घर बनाए रखा। अब मेरी जिम्मेदारी है कि मैं तुझे इस घर में कभी पराया महसूस न होने दूं।”


नंदिनी ने रोते हुए कहा,

“माँजी, मुझे कभी आपकी बेटी बनने की इच्छा नहीं थी।”


शारदा देवी ने पूछा,

“फिर क्या चाहती थी?”


नंदिनी ने कहा,

“बस इतना कि जब मैं इस घर के लिए अपना सब कुछ करूं, तो मुझे भी इस घर का हिस्सा समझा जाए।”


शारदा देवी ने उसे फिर गले लगा लिया।


अमन यह सब देख रहा था।


उसने कहा,

“और मेरी एक गलती का क्या?”


नंदिनी ने उसकी तरफ देखा।


अमन ने कहा,

“मैंने हमेशा कहा कि मेरी माँ कभी गलत नहीं हो सकती।”


शारदा देवी मुस्कुराईं।


उन्होंने कहा,

“बेटा, मां गलत हो सकती है।”


अमन ने कहा,

“और पत्नी?”


शारदा देवी ने कहा,

“वह भी गलत हो सकती है।”


फिर उन्होंने दोनों की तरफ देखते हुए कहा,

“क्योंकि मां हो या पत्नी, दोनों इंसान हैं। किसी रिश्ते को भगवान का दर्जा देकर उसकी हर बात सही मान लेना रिश्ते को मजबूत नहीं करता। रिश्ते को मजबूत करता है एक-दूसरे की बात सुनना।”


नंदिनी मुस्कुरा दी।


अमन ने भी सिर हिला दिया।


घर में अब भी कभी-कभी छोटी-मोटी नोकझोंक होती थी।


कभी नंदिनी की सब्जी में नमक ज्यादा हो जाता।


कभी शारदा देवी किसी बात पर नाराज हो जातीं।


कभी अमन काम के कारण देर से घर आता।


लेकिन अब फर्क यह था कि कोई बात मन में दबाकर नहीं रखता था।


बात होती थी।


गलती होती थी।


माफी मांगी जाती थी।


और रिश्ता फिर संभाल लिया जाता था।


एक दिन नंदिनी रसोई में खाना बना रही थी।


शारदा देवी अंदर आईं।


उन्होंने कहा,

“बहू, आज मैं रोटियां बेलती हूं।”


नंदिनी ने हंसते हुए कहा,

“माँजी, आप बैठिए।”


शारदा देवी ने कहा,

“नहीं। अब सिर्फ तू ही क्यों काम करेगी?”


दोनों साथ बैठकर रोटियां बनाने लगीं।


अमन बाहर से यह दृश्य देख रहा था।


उसने मुस्कुराकर कहा,

“माँ, अब तो आप दोनों मुझे घर से बाहर कर दोगी।”


शारदा देवी ने हंसकर कहा,

“तू बाहर जाएगा तो बहू को आराम मिलेगा।”


नंदिनी ने मुस्कुराते हुए कहा,

“अमन, आप बाहर मत जाइए। आज खाना आपने भी बनाना है।”


तीनों हंस पड़े।


वह घर वही था।


वही दीवारें थीं।


वही रसोई थी।


वही लोग थे।


लेकिन रिश्तों की भाषा बदल चुकी थी।


नंदिनी अब घर में काम करने वाली बहू नहीं थी।


वह उस परिवार की सदस्य थी।


और शारदा देवी ने भी समझ लिया था कि बहू को बेटी की जगह देने के लिए बेटी कहना जरूरी नहीं।


बस उसे इंसान समझना जरूरी है।


अंतिम सीख:

किसी भी घर में बहू से यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि वह हर बात चुपचाप सहती रहेगी। वह भी किसी की बेटी है, किसी की बहन है और सबसे पहले एक इंसान है। उसे बेटी बनाना जरूरी नहीं, लेकिन सम्मान देना जरूरी है।


क्योंकि जब घर में रिश्तों के बीच “अपना” और “पराया” का फर्क खत्म हो जाता है, तभी वह घर सच में परिवार बनता है।



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