बहन की कुर्बानी
“बहू, डॉक्टर ने साफ कहा है कि अब तुम्हें ज्यादा काम नहीं करना चाहिए। घर के काम के लिए अपनी छोटी बहन को कुछ दिनों के लिए बुला लो।”
सरला देवी ने अपनी बहू राधिका से कहा।
राधिका ने धीरे से अपनी सास की तरफ देखते हुए कहा,
“मम्मी जी, मैं मानती हूं कि मुझे आराम की जरूरत है, लेकिन मेरी बहन पायल की अगले महीने से कॉलेज की परीक्षाएं हैं। उसकी पढ़ाई खराब हो जाएगी।”
सरला देवी ने तुरंत जवाब दिया,
“अरे बहू, पढ़ाई तो चलती ही रहती है। आखिर बहन के काम आने का मौका बार-बार थोड़ी मिलता है। दस-पंद्रह दिन के लिए आ जाएगी तो कौन सा उसका साल खराब हो जाएगा?”
राधिका कुछ बोलती, उससे पहले उसके पति अमित कमरे में आ गए।
अमित ने अपनी मां की बात सुनकर कहा,
“मम्मी, पायल की परीक्षा सच में बहुत जरूरी है। वह अंतिम वर्ष में है। अगर उसे अभी पढ़ाई छोड़कर यहां आना पड़ा तो उसका नुकसान होगा।”
सरला देवी ने नाराज होकर कहा,
“तो फिर क्या मैं अकेली सब संभालूंगी? राधिका से तो अब काम हो नहीं रहा। घर में बच्चा आने वाला है। खाना कौन बनाएगा? घर कौन देखेगा?”
अमित ने शांत स्वर में कहा,
“मम्मी, काम के लिए किसी को रख लेते हैं।”
सरला देवी ने तुरंत मना करते हुए कहा,
“नहीं! मुझे बाहर की औरतों पर भरोसा नहीं है। घर की बात बाहर चली जाएगी। और फिर कामवाली को बार-बार समझाना पड़ेगा। अपनी ही बेटी जैसी पायल आ जाएगी तो कम से कम भरोसा रहेगा।”
राधिका ने अपनी सास की तरफ देखा और धीरे से बोली,
“मम्मी जी, पायल मेरी छोटी बहन है, लेकिन वह पढ़ाई में बहुत मेहनत कर रही है। पापा ने भी उसकी फीस बड़ी मुश्किल से जमा की है। मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से उसकी पढ़ाई प्रभावित हो।”
सरला देवी ने थोड़ी सख्ती से कहा,
“तुम्हें अपनी बहन की इतनी चिंता है तो फिर खुद ही सब कर लो। मैंने तो अपनी बात कह दी है।”
राधिका चुप हो गई।
अमित ने अपनी पत्नी की तरफ देखा। उसके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
कुछ देर बाद अमित ने कहा,
“मम्मी, ऐसा करते हैं कि कुछ दिनों के लिए कामवाली रख लेते हैं। जब बच्चा हो जाएगा, तब जरूरत के हिसाब से दूसरा इंतजाम कर लेंगे।”
सरला देवी ने मुंह बनाते हुए कहा,
“तुम दोनों को जो करना है करो। लेकिन बाद में यह मत कहना कि मैंने पहले नहीं समझाया था।”
राधिका ने उस दिन कोई जवाब नहीं दिया।
उसे अपनी सास की बातों से ज्यादा अपनी बहन की पढ़ाई की चिंता थी।
लेकिन कुछ ही दिनों बाद परिस्थितियां ऐसी बनीं कि राधिका को खुद पायल को फोन करना पड़ा।
राधिका ने फोन पर कहा,
“पायल, अगर तेरी परीक्षा बहुत करीब नहीं होती तो मैं तुझे कभी नहीं बुलाती। लेकिन मुझे इस समय सच में तेरी जरूरत है।”
पायल ने तुरंत पूछा,
“दीदी, आप ठीक तो हैं?”
राधिका ने कहा,
“हां, मैं ठीक हूं। बस डॉक्टर ने आराम करने को कहा है। घर में कोई ऐसा नहीं है जो कुछ दिनों तक मेरी मदद कर सके।”
पायल ने बिना ज्यादा सोचे कहा,
“दीदी, आप चिंता मत करो। मैं आ जाती हूं।”
राधिका ने तुरंत कहा,
“लेकिन तेरी पढ़ाई?”
पायल हंसकर बोली,
“मैं किताबें साथ ले आऊंगी। जब आप आराम करेंगी तब मैं पढ़ लिया करूंगी।”
राधिका की आंखें भर आईं।
उसने कहा,
“तू मेरी बहन है, इसलिए शायद मैं तुझसे यह कह भी पा रही हूं। लेकिन मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से तेरा नुकसान हो।”
पायल ने प्यार से कहा,
“दीदी, जरूरत के समय बहन काम नहीं आएगी तो कौन आएगा?”
अगले दिन पायल अपने कुछ कपड़े और किताबें लेकर राधिका के ससुराल आ गई।
सरला देवी ने उसे देखते ही कहा,
“आ गई बेटा? अच्छा हुआ। अब राधिका को ज्यादा काम नहीं करना पड़ेगा।”
पायल ने मुस्कुराकर कहा,
“जी मम्मी जी।”
सरला देवी ने उसी समय काम गिनाना शुरू कर दिया।
“देख पायल, घर बहुत बड़ा तो है नहीं। बस खाना बनाना है, राधिका के लिए दूध-फल देखना है, कपड़े संभालने हैं और थोड़ा घर साफ रखना है। बाकी कोई बहुत बड़ा काम नहीं है।”
पायल ने सिर हिलाकर कहा,
“जी, मैं कर लूंगी।”
राधिका ने अपनी बहन की तरफ देखकर कहा,
“पायल, तू पहले थोड़ा आराम कर ले। सफर करके आई है।”
सरला देवी ने तुरंत कहा,
“अरे आराम तो करती रहेगी। पहले रसोई देख ले। मैंने सब्जियां निकालकर रखी हैं।”
पायल ने कुछ नहीं कहा।
वह सीधे रसोई में चली गई।
पहले दिन उसने खाना बनाया।
दूसरे दिन उसने घर की सफाई की।
तीसरे दिन राधिका की तबीयत थोड़ी खराब हुई तो पायल उसे डॉक्टर के पास भी लेकर गई।
रात को वापस आकर उसने खाना बनाया और फिर अपनी किताबें खोलकर बैठ गई।
लेकिन अभी उसने मुश्किल से आधा घंटा ही पढ़ा था कि सरला देवी की आवाज आई।
“पायल, जरा मेरे कमरे से दवाई तो ले आ।”
पायल ने किताब बंद की और दवाई ले आई।
कुछ देर बाद फिर आवाज आई।
“पायल, जरा पानी गर्म कर दे।”
पायल पानी गर्म करने चली गई।
पानी देकर जब वह वापस आई तो उसकी किताबें अभी भी उसी पन्ने पर खुली थीं।
अगले दिन भी यही हुआ।
पायल जब पढ़ने बैठती, कोई न कोई काम सामने आ जाता।
राधिका सब समझ रही थी।
एक दिन उसने अपनी सास से कहा,
“मम्मी जी, पायल दिनभर काम करती है। जब वह पढ़ने बैठती है तो उसे थोड़ा समय पढ़ने के लिए दे दिया कीजिए।”
सरला देवी ने तुरंत कहा,
“अरे बहू, मैं कौन सा उसे दिनभर काम करवाती हूं? घर में काम ही कितना है?”
राधिका ने शांत स्वर में कहा,
“काम कम है मम्मी जी, लेकिन छोटे-छोटे काम पूरे दिन चलते रहते हैं।”
सरला देवी ने नाराज होकर कहा,
“तो अब मैं घर का काम भी नहीं बता सकती? आखिर वह यहां आई किसलिए है?”
राधिका चुप हो गई।
पायल ने अपनी बहन का हाथ दबाकर कहा,
“दीदी, आप चिंता मत करो। मैं पढ़ लूंगी।”
लेकिन पायल की आंखों के नीचे काले घेरे बढ़ते जा रहे थे।
एक दिन अमित ने उसे रसोई में अकेले खाना बनाते देखा।
अमित ने पूछा,
“पायल, तुमने पढ़ाई की?”
पायल मुस्कुराकर बोली,
“जीजा जी, थोड़ी बहुत।”
अमित ने उसकी किताबों की तरफ देखते हुए पूछा,
“कब पढ़ती हो?”
पायल कुछ पल चुप रही।
फिर बोली,
“रात को सबके सो जाने के बाद।”
अमित को यह सुनकर बुरा लगा।
उसने कहा,
“तुम्हारी परीक्षा अगले महीने है। तुम्हें दिन में भी पढ़ना चाहिए।”
पायल ने धीरे से कहा,
“जीजा जी, दीदी की जरूरत थी इसलिए आ गई। पढ़ाई बाद में कर लूंगी।”
अमित ने कहा,
“नहीं। पढ़ाई बाद में नहीं होती। मैं मां से बात करता हूं।”
पायल ने तुरंत रोकते हुए कहा,
“नहीं जीजा जी। आप कुछ मत कहिए। मेरी वजह से दीदी और मम्मी जी के बीच कोई बात नहीं होनी चाहिए।”
अमित ने उसकी तरफ देखा।
उसे पहली बार समझ आया कि पायल शिकायत नहीं कर रही थी, बल्कि अपनी बहन का घर बचाने की कोशिश कर रही थी।
कुछ दिनों बाद राधिका ने एक बेटे को जन्म दिया।
अस्पताल में अमित उसके साथ था।
सरला देवी भी कुछ समय के लिए अस्पताल आईं।
पायल पूरे समय राधिका के लिए जरूरी सामान लेकर आती-जाती रही।
जब राधिका को अस्पताल से घर लाया गया तो असली जिम्मेदारी फिर पायल के ऊपर आ गई।
नवजात बच्चे को संभालना, राधिका को दवा देना, उसके लिए खाना बनाना, कपड़े धोना—सब कुछ पायल ही कर रही थी।
सरला देवी बस निर्देश देतीं।
“पायल, बच्चे के कपड़े बदल दे।”
“पायल, राधिका को दूध दे।”
“पायल, जरा रसोई साफ कर दे।”
“पायल, मेरे लिए चाय बना दे।”
पायल हर बार “जी” कहकर काम कर देती।
अमित ने दो दिन तक सब देखा।
तीसरे दिन वह बाजार गया और एक अनुभवी आया को घर पर काम के लिए रख आया।
सरला देवी ने पूछा,
“इसकी क्या जरूरत थी?”
अमित ने कहा,
“मम्मी, पायल बच्ची है। उसे बच्चे की देखभाल का इतना अनुभव नहीं है। और उसे अपनी पढ़ाई भी करनी है।”
सरला देवी ने कहा,
“इतने साल की हो गई है। अपनी बहन का बच्चा नहीं संभाल सकती?”
अमित ने शांत स्वर में कहा,
“संभाल सकती है, लेकिन सिर्फ इसलिए कि वह संभाल सकती है, इसका मतलब यह नहीं कि उसकी पढ़ाई और उसका भविष्य भी हम ले लें।”
सरला देवी ने कोई जवाब नहीं दिया।
लेकिन उनके मन में यह बात बैठ गई कि अमित अपनी साली के पक्ष में ज्यादा बोल रहा है।
अब वह पायल के हर काम में कमी निकालने लगीं।
एक दिन उन्होंने कहा,
“पायल, दाल में नमक ज्यादा है।”
अगले दिन बोलीं,
“सब्जी में मसाला ठीक नहीं है।”
फिर कहा,
“तुम्हें घर संभालना बिल्कुल नहीं आता।”
पायल चुप रहती।
राधिका यह सब सुनकर परेशान हो जाती।
एक दिन उसने अपनी मां को फोन किया।
राधिका ने कहा,
“मां, पायल यहां बहुत काम कर रही है। मुझे लगता है उसे वापस बुला लेना चाहिए।”
राधिका की मां ने कहा,
“बेटी, अगर तुझे जरूरत है तो वह कुछ दिन और रह लेगी। लेकिन उसकी परीक्षा भी है। ध्यान रखना कि उसकी पढ़ाई खराब न हो।”
राधिका ने कहा,
“मैं पूरी कोशिश कर रही हूं।”
उधर पायल अपने कमरे में बैठकर पढ़ रही थी।
उसकी किताब खुली थी, लेकिन आंखें बार-बार बंद हो रही थीं।
तभी सरला देवी ने दरवाजा खटखटाया।
“पायल, सो गई क्या?”
पायल ने तुरंत किताब बंद कर दी।
“नहीं मम्मी जी।”
“तो जरा नीचे आकर रसोई में मेरी मदद कर दे।”
पायल ने घड़ी की तरफ देखा।
रात के करीब दस बज रहे थे।
उसने धीरे से कहा,
“जी।”
वह नीचे चली गई।
अमित ने यह सब देख लिया।
उस रात उसने अपनी मां से कहा,
“मम्मी, पायल की परीक्षा में अब ज्यादा समय नहीं बचा है। उसे पढ़ने दीजिए।”
सरला देवी ने कहा,
“तुझे हर बात में मेरी गलती ही दिखाई देती है।”
अमित ने कहा,
“ऐसा नहीं है मम्मी। लेकिन सच यह है कि जरूरत के समय हमने पायल को बुलाया था। उसने अपनी पढ़ाई छोड़कर हमारी मदद की। अब हमारी जिम्मेदारी है कि हम उसकी पढ़ाई का ध्यान रखें।”
सरला देवी चुप रहीं।
लेकिन अगले दिन उन्होंने एक अलग ही बात कह दी।
“बहू, पायल को उसके घर भेज देना चाहिए। अब तो आया भी रख ली है। यहां उसकी जरूरत नहीं है।”
राधिका ने कहा,
“मम्मी जी, मैं भी यही चाहती हूं। उसकी परीक्षा है।”
पायल ने यह बात सुनी तो वह खुश हो गई।
उसने अपनी किताबें समेटनी शुरू कर दीं।
उसी समय सरला देवी ने कहा,
“लेकिन जाते समय ज्यादा उम्मीद मत रखना। आखिर उसने कोई नौकरी तो की नहीं है। कुछ दिन घर में रहकर अपनी बहन की मदद ही तो की है।”
राधिका ने मां की बात सुनकर कुछ नहीं कहा।
अमित ने भी उस समय कोई जवाब नहीं दिया।
पायल अगले दिन घर जाने वाली थी।
राधिका के पिता बेटी और नाती को देखने आए।
उन्होंने अपने साथ मिठाई, फल और कपड़ों का सामान लाया था।
उन्होंने पायल के लिए भी एक सुंदर सूट रखा था।
पायल ने कहा,
“पापा, मेरे लिए क्यों लाए?”
उसके पिता ने मुस्कुराकर कहा,
“बेटी, तूने अपनी पढ़ाई छोड़कर अपनी बहन के लिए इतना कुछ किया है। तेरे लिए तो कुछ लाना ही था।”
पायल की आंखें भर आईं।
राधिका ने अपनी बहन को गले लगा लिया।
“पायल, तूने मेरे लिए जो किया है, मैं जिंदगीभर नहीं भूलूंगी।”
पायल ने कहा,
“दीदी, ऐसा मत बोलो। आप मेरी बहन हो।”
तभी सरला देवी वहां आईं।
उन्होंने पायल को एक छोटा सा लिफाफा देते हुए कहा,
“ले बेटा, हमारी तरफ से।”
पायल ने दोनों हाथों से लिफाफा ले लिया।
“धन्यवाद मम्मी जी।”
अमित वहीं खड़ा था।
उसने अपनी जेब से एक पैकेट निकाला और पायल की तरफ बढ़ाया।
“यह तुम्हारे लिए है।”
पायल ने कहा,
“जीजा जी, इसकी क्या जरूरत थी?”
अमित ने कहा,
“तुमने यहां रहकर सिर्फ अपनी बहन की मदद नहीं की। तुमने हमारे घर और हमारे बच्चे की भी जिम्मेदारी उठाई है। इसलिए यह तुम्हारा हक है, एहसान नहीं।”
सरला देवी ने तुरंत कहा,
“अमित, इतना सब देने की क्या जरूरत थी?”
अमित ने शांत स्वर में कहा,
“मम्मी, जरूरत के समय हमने उससे मदद मांगी थी। उसने बिना किसी शर्त के मदद की। अब जब उसे कुछ देने की बारी आई तो हमें हिसाब-किताब याद नहीं करना चाहिए।”
सरला देवी ने कहा,
“हमारे यहां बहू की बहन को इतना कुछ देने का कोई रिवाज नहीं है।”
अमित ने अपनी मां की तरफ देखते हुए कहा,
“मम्मी, रिवाज तब याद क्यों आता है जब देने की बात हो?”
सरला देवी चुप हो गईं।
अमित ने आगे कहा,
“जब राधिका को जरूरत थी तब हमने कहा कि पायल बहन है, इसलिए आ जाएगी। उसकी परीक्षा थी, फिर भी वह आ गई। दिन-रात उसने काम किया। बच्चे को संभाला। राधिका की सेवा की। घर के काम किए। कई रातें जागकर निकालीं।”
पायल ने धीरे से कहा,
“जीजा जी, रहने दीजिए।”
लेकिन अमित ने कहा,
“नहीं पायल। आज बात पूरी होनी चाहिए।”
फिर उसने अपनी मां से कहा,
“मम्मी, अगर पायल यहां नहीं आती तो आप कहतीं कि घर कैसे संभलेगा। जब वह आ गई तो आपने उसकी पढ़ाई को महत्व नहीं दिया। जब उसने काम किया तो उसे उसका काम समझा गया। और जब उसे कुछ देने की बात आई तो कहा गया कि हमारे यहां रिवाज नहीं है।”
कमरे में खामोशी छा गई।
अमित ने आगे कहा,
“रिश्ते सिर्फ रिवाज से नहीं चलते मम्मी। रिश्ते उस समय पहचाने जाते हैं जब कोई आपके लिए अपनी सुविधा छोड़ता है।”
सरला देवी कुछ बोल नहीं पाईं।
राधिका की आंखों में आंसू थे।
अमित ने पायल की तरफ देखकर कहा,
“तुम घर जाओ और अपनी परीक्षा की तैयारी करो। इस बार अगर तुम्हारे नंबर अच्छे आए तो सबसे ज्यादा खुशी मुझे और राधिका को होगी।”
पायल ने मुस्कुराकर कहा,
“जीजा जी, मैं पूरी मेहनत करूंगी।”
सरला देवी अब भी चुप थीं।
पायल अपने पिता के साथ जाने लगी तो सरला देवी ने उसे आवाज दी।
“पायल।”
पायल रुक गई।
सरला देवी कुछ पल चुप रहीं।
फिर उन्होंने कहा,
“बेटा... अपनी परीक्षा की तैयारी अच्छे से करना।”
पायल ने मुस्कुराकर कहा,
“जी मम्मी जी।”
सरला देवी ने पहली बार उसके हाथ पर प्यार से हाथ रखा और बोलीं,
“और अगर कभी मेरी कोई बात बुरी लगी हो तो मुझे माफ कर देना।”
पायल ने तुरंत कहा,
“आप बड़ी हैं। मैं आपकी बात का बुरा नहीं मानती।”
पायल चली गई।
राधिका ने अपनी सास की तरफ देखा।
सरला देवी ने धीमी आवाज में कहा,
“बहू, शायद मैं सच में गलत थी। जरूरत पड़ने पर किसी से मदद लेना आसान है, लेकिन उसकी मेहनत की कद्र करना भी उतना ही जरूरी है।”
राधिका की आंखों से आंसू निकल आए।
उसने अपनी सास का हाथ पकड़ लिया।
उस दिन घर में कोई बड़ा समारोह नहीं हुआ था, कोई लंबा भाषण नहीं हुआ था।
बस एक छोटी-सी बात ने सबको बहुत बड़ा सबक दे दिया था—
किसी के रिश्ते का नाम देखकर उसकी मदद मत मांगिए, उसके त्याग को देखकर उसका सम्मान कीजिए। क्योंकि जो इंसान आपके मुश्किल समय में अपनी खुशी, अपना समय और अपना काम छोड़कर आपके साथ खड़ा होता है, वह किसी रिवाज का नहीं, बल्कि सच्चे सम्मान का हकदार होता है।

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