देवी के दरबार में चढ़ावा और घर में अपमान

 

Emotional Indian family reconciliation between a daughter-in-law and her elderly mother-in-law at home.


मैं अपने आंगन में रखे तुलसी के पौधे के पास बैठकर सूखे पत्ते हटा रही थी। तभी गली में एक कार आकर रुकी। कार का दरवाजा खुला और मेरी पड़ोसन माधवी अपने पति राकेश और दोनों बच्चों के साथ बाहर उतरी।


माधवी के चेहरे पर बहुत खुशी थी। हाथ में प्रसाद का बड़ा-सा डिब्बा था और माथे पर लाल रंग की बड़ी सी बिंदी लगी थी।


मुझे देखते ही वह प्रसाद का डिब्बा संभालते हुए मेरी तरफ बढ़ी।


“अरे भाभी! आप यहीं मिल गईं। देखिए, हम लोग माता रानी के दर्शन करके लौटे हैं।”


मैंने मुस्कुराकर कहा, “अरे वाह माधवी! बहुत अच्छा किया। कैसी रही यात्रा? माता रानी के दर्शन अच्छे से हो गए?”


माधवी ने उत्साह से सिर हिलाया।


“बहुत अच्छे से हुए भाभी। क्या बताऊं, जैसे ही माता के दरबार में पहुंची, मेरी आंखों से आंसू निकल पड़े। इतनी भीड़ थी, लेकिन मन को बिल्कुल थकान नहीं हुई। बस माता का नाम लेते ही सारी परेशानी दूर हो गई।”


उसके पति राकेश ने भी मुस्कुराकर कहा, “यात्रा थोड़ी मुश्किल जरूर थी, लेकिन माधवी की खुशी देखकर सारी थकान भूल गया।”


माधवी ने तुरंत प्रसाद का डिब्बा मेरी तरफ बढ़ा दिया।


“ये लीजिए भाभी, माता रानी का प्रसाद है। मैंने खास आपके लिए अलग रखा था।”


मैंने प्रसाद लेते हुए कहा, “माता रानी तुम्हारे परिवार पर हमेशा कृपा बनाए रखें।”


माधवी ने हाथ जोड़कर कहा, “बस यही तो चाहती हूं भाभी। मैंने माता के दरबार में अपनी तरफ से ग्यारह हजार रुपये का चढ़ावा भी चढ़ाया है। मैंने माता से कहा है कि मेरे परिवार को हमेशा सुखी रखना।”


मैं उसकी बात सुनकर मुस्कुरा ही रही थी कि तभी उसके घर की तरफ से एक छोटा बच्चा घबराया हुआ दौड़ता आया।


वह माधवी का बेटा आरव था।


आरव हांफते हुए अपनी मां के पास पहुंचा।


“मम्मी! जल्दी चलो!”


माधवी ने उसकी तरफ देखकर पूछा, “क्या हुआ? ऐसे क्यों भागते हुए आए हो?”


आरव ने घबराई आवाज में कहा, “मम्मी, दादी की तबीयत बहुत खराब है। दादी बिस्तर से उठ भी नहीं पा रही हैं। दादाजी आपको बहुत देर से फोन कर रहे थे।”


माधवी के चेहरे की खुशी एक पल के लिए फीकी पड़ी, लेकिन अगले ही पल उसने लापरवाही से हाथ हिला दिया।


“अरे, फिर शुरू हो गया तुम्हारी दादी का नाटक?”


आरव ने हैरानी से मां की तरफ देखा।


“लेकिन मम्मी, दादी सच में बहुत परेशान लग रही हैं। दादाजी भी घबरा रहे थे।”


माधवी ने झुंझलाकर कहा, “तुम्हें कितनी बार समझाऊं? तुम्हारी दादी को हर दूसरे दिन कुछ न कुछ होता रहता है। कभी कमर में दर्द, कभी सिर में दर्द और कभी कमजोरी। घर का काम नहीं करना होता तो बीमारी का बहाना बना लेती हैं।”


आरव चुप हो गया।


उसने धीरे से कहा, “लेकिन मम्मी, दादाजी कह रहे थे कि दादी ने खाना भी नहीं खाया है।”


माधवी ने नाराज होकर कहा, “तू ज्यादा सवाल मत कर। घर जा और दादाजी से कह दे कि हम आ गए हैं।”


आरव जाने लगा तो मैंने माधवी की तरफ देखा।


मुझे उसकी बातें अच्छी नहीं लगीं।


मैंने धीरे से कहा, “माधवी, अगर तुम्हारी सास की तबीयत सच में खराब है तो एक बार जाकर देख लेना चाहिए।”


माधवी ने मेरी तरफ देखकर हल्की हंसी हंसी।


“भाभी, आप भी ना बहुत भावुक हैं। इन बुजुर्गों को थोड़ा सिर पर चढ़ाओ तो हर समय बीमारी लेकर बैठ जाते हैं। मैंने दो दिन की छुट्टी लेकर इतनी मुश्किल से यात्रा की है। रास्ते भर बच्चों को संभाला, पति को संभाला और अब घर आते ही बीमार सास को संभालूं?”


राकेश ने धीरे से कहा, “माधवी, लेकिन अगर मां की तबीयत सच में खराब है तो हमें पहले उन्हें देख लेना चाहिए।”


माधवी ने पति की तरफ देखकर कहा, “आप भी शुरू मत हो जाइए। पिताजी हैं ना उनके पास। आखिर उनका काम क्या है?”


राकेश कुछ नहीं बोला।


मैंने उसके चेहरे पर झिझक देखी।


माधवी फिर मेरी तरफ मुड़ी।


“भाभी, मैंने माता रानी के दरबार में कितनी मन से पूजा की है। पूरे परिवार की सलामती मांगी है। अब घर आकर दो घंटे चैन से बैठ भी नहीं सकती क्या?”


मैंने कहा, “चैन तो जरूर बैठो, लेकिन पहले देख लो कि घर में किसी को सच में तुम्हारी जरूरत तो नहीं।”


माधवी ने मेरी बात को अनसुना कर दिया।


“अच्छा भाभी, मैं चलती हूं। रास्ते की थकान भी है। थोड़ा आराम कर लूं, फिर देखूंगी क्या करना है।”


इतना कहकर माधवी अपने घर चली गई।


मैं उसे जाते हुए देखती रही।


मेरे मन में एक सवाल बार-बार उठ रहा था।


जो स्त्री माता रानी के दरबार में जाकर ग्यारह हजार रुपये चढ़ाकर आई थी, क्या उसे अपने ही घर में पड़ी एक बीमार बूढ़ी मां की तकलीफ दिखाई नहीं दे रही थी?


लेकिन मुझे नहीं पता था कि उस दिन जो होने वाला था, वह माधवी की सोच ही बदल देगा।



माधवी के घर में प्रवेश करते ही उसके पिता-समान ससुर गोविंद प्रसाद दरवाजे पर खड़े मिल गए।


उनकी आंखों में चिंता थी।


उन्होंने कांपती आवाज में पूछा, “माधवी, तुम्हारी मां की तबीयत बहुत खराब है। डॉक्टर को फोन करना पड़ेगा।”


माधवी ने जूते उतारते हुए कहा, “पिताजी, अभी तो मैं यात्रा से लौटी हूं। थोड़ा आराम करने दीजिए।”


गोविंद प्रसाद ने परेशान होकर कहा, “बेटी, आराम बाद में कर लेना। तुम्हारी सास को बहुत तेज कमजोरी है। दो बार उठने की कोशिश की तो गिरते-गिरते बचीं।”


राकेश तुरंत आगे बढ़ा।


“पिताजी, मां कहां हैं?”


गोविंद प्रसाद ने कहा, “कमरे में हैं बेटा।”


राकेश बिना देर किए कमरे की तरफ चला गया।


माधवी वहीं खड़ी रही।


उसकी बेटी अनन्या भी धीरे-धीरे अपनी दादी के कमरे की तरफ चली गई।


कमरे में पहुंचकर उसने देखा कि उसकी दादी सरस्वती देवी बिस्तर पर लेटी थीं। चेहरा बिल्कुल मुरझाया हुआ था। पास में पानी का गिलास रखा था, लेकिन वह भी खाली था।


अनन्या दादी के पास बैठ गई।


“दादी, आपको क्या हुआ?”


सरस्वती देवी ने कमजोर आवाज में कहा, “कुछ नहीं बेटा। थोड़ी कमजोरी है।”


अनन्या ने उनका हाथ पकड़ते हुए कहा, “आपने खाना खाया?”


सरस्वती देवी ने आंखें बंद कर लीं।


“मन नहीं हुआ बेटा।”


तभी राकेश कमरे में पहुंचा।


मां की हालत देखकर उसके चेहरे का रंग बदल गया।


“मां! आपने मुझे बताया क्यों नहीं कि आपकी इतनी तबीयत खराब है?”


सरस्वती देवी ने बेटे की तरफ देखकर धीमी मुस्कान दी।


“तू यात्रा पर गया था बेटा। तेरी खुशी खराब नहीं करना चाहती थी।”


राकेश की आंखें भर आईं।


“मां, आप मेरी मां हैं। आपकी तकलीफ से बड़ी मेरे लिए कोई खुशी नहीं हो सकती।”


सरस्वती देवी ने कुछ नहीं कहा।


तभी माधवी दरवाजे पर आकर खड़ी हो गई।


उसने कहा, “इतनी भी क्या बड़ी बात हो गई? थोड़ी कमजोरी ही तो है।”


राकेश ने गुस्से में पत्नी की तरफ देखा।


“माधवी, डॉक्टर को अभी बुलाना पड़ेगा।”


माधवी ने कहा, “बुला लो। लेकिन हर बार डॉक्टर के पास ले जाने से पहले यह भी देख लिया करो कि बीमारी सच में है या नहीं।”


राकेश ने सख्त आवाज में कहा, “बस माधवी!”


कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।


सरस्वती देवी ने बेटे की तरफ देखकर कहा, “राकेश, बहू को कुछ मत कहना। वह भी थकी हुई है।”


माधवी ने कुछ नहीं कहा और कमरे से बाहर चली गई।



डॉक्टर के आने के बाद सरस्वती देवी की जांच हुई।


डॉक्टर ने रिपोर्ट देखकर गंभीर आवाज में कहा, “इनका शरीर बहुत कमजोर हो गया है। कई दिनों से ठीक से खाना नहीं मिला है। इन्हें आराम, दवा और समय पर भोजन की जरूरत है।”


गोविंद प्रसाद ने सिर झुका लिया।


डॉक्टर के जाने के बाद राकेश ने पत्नी से कहा, “माधवी, मां की हालत इतनी खराब हो गई और तुम्हें पता तक नहीं चला?”


माधवी ने सफाई देते हुए कहा, “मैं कोई डॉक्टर तो हूं नहीं। मुझे कैसे पता चलता?”


राकेश ने कहा, “पता करने के लिए मां के पास बैठना पड़ता है।”


माधवी चुप रही।


राकेश ने आगे कहा, “तुमने यात्रा पर जाने से पहले मुझे फोन करके कहा था कि माता रानी से परिवार के लिए सुख मांगोगी।”


माधवी ने कहा, “तो मांगा था।”


राकेश ने दुखी होकर कहा, “परिवार में तुम्हारे सास-ससुर भी आते हैं माधवी।”


माधवी ने कोई जवाब नहीं दिया।


उस रात पहली बार उसे अपने पति की बात चुभी।



कुछ दिन बीत गए।


सरस्वती देवी की हालत धीरे-धीरे सुधरने लगी।


राकेश उनकी दवा और खाने का पूरा ध्यान रखने लगा। गोविंद प्रसाद भी उनकी सेवा में लगे रहते।


लेकिन माधवी पहले की तरह ही दूरी बनाए हुए थी।


एक दिन उसकी बेटी अनन्या उसके पास आकर बैठी।


“मम्मी, दादी आपको बुला रही हैं।”


माधवी ने पूछा, “क्यों?”


अनन्या ने कहा, “पता नहीं। उन्होंने कहा है कि माधवी को मेरे कमरे में भेज देना।”


माधवी अनमने मन से सास के कमरे में पहुंची।


सरस्वती देवी ने उसे पास बुलाया।


“बहू, इधर बैठ।”


माधवी बिस्तर के पास बैठ गई।


सरस्वती देवी ने अपने तकिए के नीचे से एक छोटी सी कपड़े की थैली निकाली।


“ये ले।”


माधवी ने हैरानी से पूछा, “इसमें क्या है?”


सरस्वती देवी ने कहा, “खोलकर देख।”


माधवी ने थैली खोली।


उसमें सोने की एक पुरानी अंगूठी और कुछ रुपये रखे थे।


माधवी चौंक गई।


“मांजी, ये सब मुझे क्यों दे रही हैं?”


सरस्वती देवी मुस्कुराईं।


“जब मेरी शादी इस घर में हुई थी, तब मेरी सास ने मुझे यह अंगूठी दी थी। उन्होंने कहा था कि घर की बहू चाहे जैसी भी परिस्थिति हो, परिवार को जोड़कर रखना।”


माधवी चुपचाप सुनती रही।


सरस्वती देवी ने आगे कहा, “मैंने भी सोचा था कि एक दिन यह अंगूठी अपनी बहू को दूंगी।”


माधवी की आंखें नीचे झुक गईं।


सरस्वती देवी ने कहा, “लेकिन एक बात समझ नहीं पाई।”


माधवी ने धीरे से पूछा, “क्या?”


सरस्वती देवी ने शांत स्वर में कहा, “मैंने सोचा था कि यह अंगूठी उस बहू को दूंगी जो मेरे बुढ़ापे में मेरा हाथ पकड़ेगी। मुझे नहीं पता था कि मेरे हाथ पकड़ने से पहले ही मेरे अपने लोग मुझे बोझ समझने लगेंगे।”


माधवी का चेहरा उतर गया।


“मांजी, मैंने ऐसा कब कहा?”


सरस्वती देवी ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा, “तुमने कहा था बहू। जिस दिन तुमने अपने बेटे से कहा था—‘बुढ़िया को बिस्तर पर पड़े रहने दे।’”


माधवी के हाथ कांप गए।


सरस्वती देवी ने कहा, “मुझे तुम्हारे शब्दों से उतना दुख नहीं हुआ, जितना इस बात से हुआ कि जिस घर के लिए मैंने पूरी जिंदगी लगा दी, उसी घर में मेरी बीमारी तुम्हें नाटक लगी।”


माधवी की आंखें भर आईं।


लेकिन सरस्वती देवी ने उसे डांटा नहीं।


उन्होंने सिर्फ इतना कहा, “बेटी, बुजुर्ग जब बीमार होते हैं तो उन्हें दवा से ज्यादा अपनापन चाहिए होता है।”


माधवी के पास कोई जवाब नहीं था।



कुछ दिनों बाद नवरात्रि का अंतिम दिन आया।


माधवी ने घर में पूजा रखी।


उसने सुंदर तरीके से माता की चौकी सजाई। फूल लगाए, प्रसाद बनाया और पड़ोस की महिलाओं को बुलाया।


पूजा के दौरान उसने हाथ जोड़कर कहा, “माता रानी, मेरे परिवार को सुखी रखना।”


सरस्वती देवी कमरे के दरवाजे से यह सब देख रही थीं।


पूजा खत्म होने के बाद माधवी उनके पास गई।


सरस्वती देवी ने पूछा, “पूजा हो गई?”


माधवी ने सिर हिलाया।


“हां मांजी।”


सरस्वती देवी ने कहा, “अच्छा है।”


माधवी कुछ देर चुप रही।


फिर उसने धीरे से कहा, “मांजी, मैं आपसे कुछ कहना चाहती हूं।”


सरस्वती देवी ने उसकी तरफ देखा।


“बोल बहू।”


माधवी की आंखों से आंसू बहने लगे।


“मुझे माफ कर दीजिए।”


सरस्वती देवी चुप रहीं।


माधवी ने उनके पैर पकड़ लिए।


“मुझे लगा था कि पूजा-पाठ, मंदिर और चढ़ावे से ही सब कुछ मिल जाता है। लेकिन मैं भूल गई कि भगवान की पूजा करने से पहले इंसानियत निभानी पड़ती है।”


सरस्वती देवी की आंखें भी नम हो गईं।


माधवी ने कहा, “मैंने माता के दरबार में ग्यारह हजार रुपये चढ़ाए, लेकिन घर में आपके लिए एक गिलास पानी तक लेकर नहीं गई। मैंने माता से अपने परिवार की खुशी मांगी, लेकिन अपने ही परिवार के एक बुजुर्ग की तकलीफ नहीं समझी।”


सरस्वती देवी ने उसके सिर पर हाथ रखा।


“गलती हर इंसान से होती है बहू। गलती समझ में आ जाए तो वही सबसे बड़ी बात है।”


माधवी रोते हुए बोली, “क्या आप मुझे माफ कर देंगी?”


सरस्वती देवी ने उसे उठाया और गले लगा लिया।


“मैंने तो उसी दिन माफ कर दिया था, जिस दिन तू मेरे कमरे में बैठी थी। मां अपने बच्चों से ज्यादा देर नाराज नहीं रह सकती।”


माधवी फूट-फूटकर रोने लगी।



उस घटना के बाद माधवी पूरी तरह बदल गई।


अब सरस्वती देवी को दवा देने के लिए राकेश का इंतजार नहीं करना पड़ता था।


माधवी खुद उनके पास बैठती।


“मांजी, दवा का समय हो गया है।”


“मांजी, आज क्या खाने का मन है?”


“मांजी, चलिए थोड़ी देर आंगन में बैठते हैं।”


सरस्वती देवी की मुस्कान लौटने लगी।


गोविंद प्रसाद भी बहू को बदलते देखकर खुश थे।


एक दिन उन्होंने माधवी से कहा, “बहू, तू बदल गई है।”


माधवी ने मुस्कुराकर कहा, “पिताजी, शायद मैं पहले खुद को बहुत धार्मिक समझती थी। लेकिन अब समझ आया कि भगवान को खुश करने के लिए सिर्फ मंदिर जाना काफी नहीं है।”


गोविंद प्रसाद ने पूछा, “तो अब क्या समझ आया?”


माधवी ने सरस्वती देवी की तरफ देखते हुए कहा, “भगवान की सबसे बड़ी पूजा किसी दुखी इंसान के चेहरे पर मुस्कान लाना है।”



कुछ समय बाद माधवी फिर अपने पड़ोस में मेरे घर आई।


मैं आंगन में बैठी थी।


माधवी ने आते ही मुझे गले लगा लिया।


मैंने पूछा, “क्या हुआ? आज बड़ी खुश लग रही हो।”


माधवी मुस्कुराई।


“भाभी, आज मैं आपको धन्यवाद कहने आई हूं।”


मैंने हैरानी से पूछा, “मुझे क्यों?”


माधवी ने कहा, “उस दिन आपने मुझसे सिर्फ एक बात कही थी—‘पहले जाकर देख लो कि घर में किसी को तुम्हारी जरूरत तो नहीं।’ उस समय आपकी बात मुझे अच्छी नहीं लगी थी। लेकिन आज समझती हूं कि वह बात मेरी जिंदगी की सबसे जरूरी सीख थी।”


मैंने कहा, “अच्छा हुआ तुमने समझ लिया।”


माधवी ने कहा, “भाभी, अब जब भी मंदिर जाती हूं तो सबसे पहले घर के बुजुर्गों के पैर छूती हूं। मुझे लगता है कि भगवान तक पहुंचने का रास्ता शायद इन्हीं आशीर्वादों से होकर जाता है।”


मैं मुस्कुरा दी।


तभी माधवी का बेटा आरव भी वहां आ गया।


उसने हंसते हुए कहा, “आंटी, अब मम्मी दादी को खुद खाना खिलाती हैं।”


माधवी ने मुस्कुराकर बेटे से कहा, “और अब तू भी अपनी दादी की सेवा करेगा।”


आरव ने तुरंत कहा, “हां मम्मी।”


मुझे देखकर लगा कि एक घर सचमुच बदल चुका था।


जिस घर में कभी एक बुजुर्ग महिला की बीमारी को नाटक कहा जाता था, उसी घर में अब उसकी एक आवाज पर पूरा परिवार दौड़कर आता था।


माधवी ने जाते-जाते मेरे हाथ में प्रसाद रखा।


मैंने पूछा, “आज फिर मंदिर गई थीं?”


माधवी मुस्कुराई।


“नहीं भाभी। आज मंदिर नहीं गई।”


मैंने पूछा, “फिर यह प्रसाद?”


माधवी ने पीछे मुड़कर अपने घर की तरफ देखा, जहां सरस्वती देवी खिड़की के पास बैठी मुस्कुरा रही थीं।


माधवी ने कहा—


“आज मेरी सास ने मुझे अपने हाथ से प्रसाद दिया है। अब मुझे लगता है, माता रानी का आशीर्वाद मंदिर के साथ-साथ घर के बुजुर्गों की दुआओं में भी मिलता है।”


मैंने उसकी बात सुनी तो मन भीतर तक भर आया।


सच ही तो है—


भगवान के सामने घंटों खड़े होकर प्रार्थना करना आसान है, लेकिन घर में मौजूद बुजुर्ग के पास कुछ मिनट बैठकर उसकी बात सुनना मुश्किल लगता है।


हम मंदिर में हजारों रुपये चढ़ा देते हैं, लेकिन कभी-कभी अपने ही माता-पिता की जरूरत पर खर्च करते हुए सोचने लगते हैं।


हम भगवान से अपने परिवार की खुशियां मांगते हैं, लेकिन उसी परिवार के बुजुर्गों को अकेला छोड़ देते हैं।


शायद हमें यह समझने की जरूरत है कि—


भगवान को फूल चढ़ाने से पहले किसी इंसान के दिल को कांटा न दें।


मंदिर में दिया जलाने से पहले अपने घर के बुजुर्गों के जीवन में अपनापन का दीप जलाएं।


क्योंकि मंदिर की मूर्ति को हमारी सेवा की जरूरत नहीं होती, लेकिन घर में बैठे मां-बाप को हमारे समय, सम्मान और प्यार की जरूरत जरूर होती है।


और जिस घर में बुजुर्गों की आंखों में आंसू हों, वहां लाख पूजा कर लेने के बाद भी मन को सच्ची शांति मिलना मुश्किल है।


भगवान को पाने के लिए बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी वे हमारे अपने घर में ही किसी बूढ़े मां-बाप की दुआ बनकर बैठे होते हैं।



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