बड़ी बहू की मेहनत, सास की वाहवाही
“बड़ी बहू, आज तुम्हारी बुआ सास अपने पूरे परिवार के साथ खाने पर आ रही हैं। घर की साफ-सफाई से लेकर खाने की तैयारी तक, हर चीज अच्छी होनी चाहिए। कोई कमी नहीं रहनी चाहिए।” कमला देवी ने अपनी बड़ी बहू नेहा से कहा।
नेहा रसोई में नाश्ते की तैयारी कर रही थी। सास की बात सुनकर उसने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “जी मम्मी जी, आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए। मैं और छोटी मिलकर सारी तैयारी कर लेंगे।”
कमला देवी ने तुरंत उसकी बात काटते हुए कहा, “अरे नहीं बहू, तुम छोटी को अपने साथ मत लगाना। उसे अभी घर के कामों का उतना अनुभव नहीं है। ऊपर से उसका छोटा बच्चा भी है। अगर वह काम में लग गई और बच्चा रोने लगा, तो सारा काम बिगड़ जाएगा।”
नेहा ने धीरे से कहा, “लेकिन मम्मी जी, अगर हम दोनों मिलकर काम करेंगे, तो सब कुछ जल्दी हो जाएगा।”
कमला देवी ने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा, “मैंने जो कहा है, वही करो। तुम्हें खाना बनाना अच्छी तरह आता है। तुम्हारे हाथों में तो जैसे जादू है। तुम अकेली ही सब संभाल सकती हो। आखिर घर की बड़ी बहू होने के नाते तुम्हारी जिम्मेदारी भी तो ज्यादा है।”
नेहा कुछ पल चुप रही। फिर उसने सिर झुकाकर कहा, “ठीक है मम्मी जी, मैं अकेली ही सब संभाल लूंगी।”
कमला देवी ने संतुष्ट होकर कहा, “और हां, ड्राइंग रूम की सफाई भी अच्छी तरह कर देना। सोफे के कवर बदल देना, पर्दे ठीक कर देना और मेज पर फूल भी रख देना। तुम्हें घर सजाने का बहुत अच्छा सलीका है।”
नेहा ने जवाब दिया, “जी मम्मी जी, मैं सब देख लूंगी।”
कमला देवी वहां से चली गईं, लेकिन नेहा के मन में कई सवाल उठने लगे।
वह पिछले पांच सालों से इस घर में बहू बनकर रह रही थी। घर की जिम्मेदारियां निभाना उसने अपनी खुशी से सीखा था। उसे घर साफ रखना, स्वादिष्ट खाना बनाना और परिवार के लोगों का ख्याल रखना अच्छा लगता था।
लेकिन धीरे-धीरे उसे एहसास होने लगा था कि इस घर में उसकी मेहनत को उसकी जिम्मेदारी समझ लिया गया है। जब भी कोई बड़ा काम होता, तो सबकी निगाहें उसी पर टिक जातीं। मगर जब तारीफ मिलने की बारी आती, तो उसकी मेहनत का जिक्र कहीं खो जाता।
उसकी छोटी देवरानी रिया को इस घर में आए अभी एक साल ही हुआ था। रिया का एक छोटा बच्चा था, इसलिए कमला देवी उसे घर के कामों से दूर रखती थीं। यह बात अपने आप में गलत नहीं थी, क्योंकि छोटे बच्चे की देखभाल करना भी एक बड़ी जिम्मेदारी है।
लेकिन परेशानी तब होती थी, जब रिया को आराम देने के नाम पर नेहा पर हर काम का बोझ डाल दिया जाता था और फिर उसी काम का श्रेय किसी और को मिल जाता था।
नेहा ने मन ही मन सोचा, 'शायद एक दिन मम्मी जी को मेरी मेहनत की अहमियत समझ आएगी।'
फिर उसने अपने मन को समझाया और काम में लग गई।
नेहा ने सबसे पहले ड्राइंग रूम की सफाई शुरू की। उसने सोफे के कवर बदले, पर्दों को ठीक किया, मेज पर ताजे फूल सजाए और फर्श को चमकाकर साफ किया।
इसके बाद वह रसोई में पहुंची और खाने की तैयारी करने लगी।
उसने मेहमानों के लिए शाही पनीर, मटर पुलाव, दाल तड़का, आलू की सूखी सब्जी, पूरी, रायता, सलाद और खीर बनाने का फैसला किया।
वह अकेली ही सब्जियां काट रही थी, मसाले तैयार कर रही थी और एक साथ कई बर्तनों पर नजर रख रही थी।
इसी बीच उसकी ननद पूजा का फोन आया।
पूजा ने पूछा, “भाभी, आज घर में क्या खास है? मम्मी ने बताया कि बुआ जी का परिवार आ रहा है।”
नेहा ने जवाब दिया, “हां दीदी, आज मेहमानों के लिए खाना बना रही हूं। काफी सारी चीजें बनानी हैं।”
पूजा ने उत्सुकता से पूछा, “अच्छा! छोटी भाभी भी मदद कर रही हैं क्या?”
नेहा कुछ कहने ही वाली थी कि उसे अपनी सास की बात याद आ गई। उसने बात टालते हुए कहा, “नहीं दीदी, रिया के पास बच्चा है। इसलिए मैं ही सब संभाल रही हूं।”
पूजा ने सहजता से कहा, “अच्छा भाभी, आप तो सब कर ही लेती हैं। चलिए, फिर मैं बाद में बात करती हूं।”
फोन कट गया।
नेहा के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आई, लेकिन उसकी आंखों में उदासी उतर आई।
उसे बुरा इस बात का नहीं लगता था कि उसे काम करना पड़ता है। उसे दुख इस बात का था कि घर के सभी लोग उसकी मेहनत को इतना सामान्य मान चुके थे कि किसी को यह पूछने की जरूरत भी महसूस नहीं होती थी कि वह थक तो नहीं गई।
वह चाहती थी कि कोई एक बार उससे कहे, “नेहा, तुम बैठ जाओ। आज बाकी काम हम कर लेंगे।”
लेकिन ऐसी आवाज उसके कानों तक कभी नहीं पहुंचती थी।
नेहा ने बड़ी मुश्किल से समय पर सारा खाना तैयार कर लिया। उसने खाने की मेज सजाई और एक बार फिर ड्राइंग रूम को व्यवस्थित किया।
उसी समय कमला देवी रसोई में आईं।
उन्होंने खाने की ओर देखा और खुशी से बोलीं, “अरे वाह बहू! तुमने तो बहुत अच्छा खाना बनाया है। सब कुछ बिल्कुल सही लग रहा है।”
नेहा के चेहरे पर संतोष झलक उठा।
उसने सोचा कि शायद आज मम्मी जी मेहमानों के सामने उसकी मेहनत की तारीफ करेंगी।
नेहा ने विनम्रता से कहा, “धन्यवाद मम्मी जी। बस, सब कुछ समय पर तैयार हो गया।”
कमला देवी ने तुरंत कहा, “अच्छा सुनो, मेहमानों के आने से पहले अपने कपड़े बदल लेना। ऐसे रसोई वाले कपड़ों में उनके सामने मत आना। और हां, सबको पानी देने और खाना परोसने का ध्यान रखना।”
नेहा ने सिर हिलाकर कहा, “जी मम्मी जी।”
कुछ देर बाद बुआ सास सावित्री देवी अपने पति, बेटे, बहू और पोते के साथ घर पहुंचीं।
कमला देवी ने दरवाजे पर उनका स्वागत किया।
“आइए दीदी, आपका ही इंतजार कर रहे थे। घर में आपका स्वागत है।” कमला देवी ने मुस्कुराते हुए कहा।
सावित्री देवी ने घर के अंदर कदम रखा और चारों ओर नजर दौड़ाई।
उन्होंने सुंदर ढंग से सजे ड्राइंग रूम को देखकर कहा, “अरे वाह कमला! तुमने तो घर बहुत सुंदर बना रखा है। हर चीज कितनी व्यवस्थित है। आजकल लोगों के पास घर संभालने का समय ही कहां होता है, लेकिन तुमने तो कमाल कर दिया।”
कमला देवी ने गर्व से मुस्कुराते हुए कहा, “अरे दीदी, यह सब तो घर-परिवार की जिम्मेदारियां हैं। इन्हें निभाना ही पड़ता है।”
सावित्री देवी ने खाने की खुशबू महसूस करते हुए कहा, “और यह कैसी खुशबू आ रही है! लगता है आज तो बहुत शानदार खाना बना है।”
कमला देवी ने तुरंत जवाब दिया, “हां दीदी, मैंने सोचा कि आप इतने दिनों बाद आ रही हैं, तो कुछ अच्छा बनाया जाए।”
रसोई के दरवाजे के पास खड़ी नेहा ने यह बात सुन ली।
उसके हाथ में खीर का बर्तन था। वह कुछ पल के लिए ठिठक गई।
खाना उसने बनाया था। घर उसने सजाया था। सफाई उसने की थी। लेकिन कमला देवी ऐसे बता रही थीं, जैसे सब कुछ उन्होंने ही किया हो।
फिर भी नेहा ने खुद को संभाला और खीर मेज पर रखकर मेहमानों के सामने मुस्कुराने लगी।
सभी मेहमान ड्राइंग रूम में बैठ गए। नेहा पानी और नाश्ता लेकर उनके पास पहुंची।
सावित्री देवी ने नेहा को देखकर कहा, “अरे नेहा बेटा, तुम तो बहुत व्यस्त दिखाई दे रही हो। सुबह से ही काम में लगी हो क्या?”
नेहा कुछ बोल पाती, उससे पहले कमला देवी ने हंसते हुए कहा, “अरे दीदी, घर में मेहमान आते हैं, तो काम तो करना ही पड़ता है। वैसे मेरी दोनों बहुएं बहुत गुणी हैं। दोनों मिलकर घर का सारा काम संभाल लेती हैं। मुझे तो किसी बात की चिंता ही नहीं रहती।”
नेहा के कदम वहीं रुक गए।
वह हैरानी से अपनी सास का चेहरा देखने लगी।
कमला देवी ने आगे कहा, “मेरी किस्मत अच्छी है कि मुझे इतनी समझदार बहुएं मिली हैं। एक घर संभालती है, तो दूसरी बच्चे को देख लेती है। दोनों के सहयोग से घर बहुत अच्छे से चलता है।”
सावित्री देवी ने खुश होकर कहा, “यह तो बहुत अच्छी बात है कमला। आजकल घर में बहुओं के बीच इतना तालमेल कहां देखने को मिलता है!”
कमला देवी ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “बस दीदी, मैंने हमेशा अपनी बहुओं को प्यार से रखा है। इसलिए दोनों मेरी बात समझती हैं और मिल-जुलकर काम करती हैं।”
नेहा के मन में जैसे कुछ टूट गया।
उसे अपनी सास के शब्दों से ज्यादा दुख इस बात का था कि उसी के सामने उसकी मेहनत की सच्चाई बदल दी गई थी।
वह चाहती तो उसी समय सबके सामने कह सकती थी कि खाना उसने अकेले बनाया है। घर भी उसी ने सजाया है। लेकिन उसने मेहमानों के सामने विवाद करना ठीक नहीं समझा।
वह चुपचाप रसोई में लौट गई।
उसकी आंखें नम थीं, मगर उसने आंसुओं को पोंछ लिया।
'क्या मेरी मेहनत की कोई कीमत नहीं है? क्या बड़ी बहू होने का मतलब यही है कि मैं सबके लिए काम करती रहूं और मेरी जगह कोई दूसरा तारीफ पाता रहे?' उसने मन ही मन सोचा।
फिर उसने गहरी सांस ली और मेहमानों के लिए खाना परोसने लगी।
उधर रिया अपने कमरे में एसी चलाकर बच्चे को सुला रही थी। बच्चे को सुलाते-सुलाते उसकी भी आंख लग गई थी।
कमला देवी ने उसे काम में नहीं लगाया था, इसलिए रिया को यह पता भी नहीं था कि नेहा ने अकेले कितनी मेहनत की है।
कुछ देर बाद कमला देवी रिया के कमरे में पहुंचीं।
उन्होंने धीरे से दरवाजा खोला और देखा कि रिया बच्चे के साथ सो रही है।
कमला देवी ने उसे जगाना उचित नहीं समझा। उन्होंने सोचा कि बच्चा छोटा है, इसलिए रिया को आराम करने देना चाहिए।
फिर वह वापस मेहमानों के पास चली गईं।
खाना परोसते समय सावित्री देवी ने नेहा से कहा, “बेटा, तुम्हारे हाथ का खाना बहुत स्वादिष्ट है। खासकर यह शाही पनीर और खीर तो लाजवाब है।”
नेहा ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “धन्यवाद बुआ जी। आपको पसंद आया, यह मेरे लिए बहुत खुशी की बात है।”
सावित्री देवी ने कमला देवी की ओर देखकर कहा, “कमला, तुम्हारी बहुओं ने तो तुम्हारा घर स्वर्ग बना दिया है।”
कमला देवी ने तुरंत कहा, “हां दीदी, दोनों बहुओं का बहुत सहयोग रहता है। मैं तो बस उन्हें सही रास्ता दिखाती हूं।”
यह सुनकर नेहा ने पहली बार अपनी सास की ओर सीधे देखा।
उसे लगा कि उसकी चुप्पी को उसकी सहमति समझ लिया गया है।
लेकिन वह अभी भी चुप रही।
खाना खत्म होने के बाद सभी लोग ड्राइंग रूम में बैठ गए। नेहा रसोई में बर्तन समेट रही थी।
सावित्री देवी की बहू अंजलि ने रसोई में आकर कहा, “दीदी, आप अकेली ही सब कुछ कर रही हैं? मुझे बता दीजिए, मैं आपकी मदद कर देती हूं।”
नेहा ने मुस्कुराकर कहा, “नहीं बेटा, तुम मेहमान हो। तुम बैठो, मैं कर लूंगी।”
अंजलि ने उसके हाथ से प्लेटें लेते हुए कहा, “मेहमान हूं तो क्या हुआ, दीदी? आप भी तो इस घर की सदस्य हैं। इतने लोगों के लिए खाना बनाना और फिर अकेले सब समेटना आसान नहीं है।”
नेहा कुछ पल चुप रही।
फिर उसने धीमी आवाज में कहा, “आदत हो गई है बेटा।”
अंजलि ने उसकी आंखों में देखते हुए पूछा, “लेकिन दीदी, आदत हो जाने का मतलब यह तो नहीं कि आपको कभी आराम की जरूरत नहीं पड़ती?”
यह सवाल सुनकर नेहा की आंखें भर आईं।
वह कुछ बोल नहीं पाई।
अंजलि ने धीरे से उसका हाथ पकड़कर कहा, “दीदी, आप परेशान मत होइए। मैं आपके साथ हूं।”
दोनों रसोई में काम करने लगीं।
कुछ देर बाद अंजलि ने अपनी सास सावित्री देवी से कहा, “मां, नेहा दीदी ने अकेले ही इतना सारा खाना बनाया है। घर भी उन्होंने ही सजाया है। मैंने उनसे पूछा, तो पता चला कि सुबह से लगातार काम कर रही हैं।”
सावित्री देवी ने आश्चर्य से पूछा, “क्या कमला ने उनकी मदद नहीं की?”
अंजलि ने जवाब दिया, “मुझे तो यही बताया गया कि दोनों बहुएं मिलकर सारा काम संभालती हैं। लेकिन आज मैंने दीदी को अकेले ही सब करते देखा।”
सावित्री देवी कुछ सोचने लगीं।
उन्हें कमला की बात याद आई कि दोनों बहुएं मिल-जुलकर काम करती हैं। मगर उन्होंने नेहा को लगातार रसोई में काम करते भी देखा था।
उन्होंने मन ही मन तय किया कि इस बात को समझना जरूरी है।
मेहमानों के जाने से पहले सावित्री देवी ने कमला देवी से कहा, “कमला, तुम्हारे घर का माहौल अच्छा है। लेकिन एक बात पूछूं?”
कमला देवी ने मुस्कुराकर कहा, “पूछिए दीदी, आपसे क्या छिपाना!”
सावित्री देवी ने सहजता से पूछा, “तुमने बताया था कि दोनों बहुएं मिलकर सारा काम करती हैं। लेकिन आज तो नेहा ही रसोई में लगी हुई थी। क्या रिया ने उसकी मदद नहीं की?”
कमला देवी थोड़ी असहज हो गईं।
उन्होंने तुरंत जवाब दिया, “अरे दीदी, रिया का बच्चा छोटा है। इसलिए मैंने उसे आराम करने दिया। नेहा को तो काम करने का अच्छा अनुभव है। वह सब संभाल लेती है।”
सावित्री देवी ने पूछा, “यह तो ठीक है। बच्चे की देखभाल भी जरूरी है। लेकिन क्या नेहा को आराम की जरूरत नहीं पड़ती?”
कमला देवी ने कहा, “अरे, वह तो मजबूत है। उसे इन सब कामों की आदत है।”
सावित्री देवी ने गंभीर होकर कहा, “कमला, मजबूत होने का मतलब यह नहीं होता कि इंसान को थकान नहीं होती। और जिम्मेदार होने का मतलब यह भी नहीं है कि सारी जिम्मेदारियां उसी के कंधों पर डाल दी जाएं।”
कमला देवी चुप हो गईं।
सावित्री देवी ने आगे कहा, “तुम अपनी छोटी बहू को बच्चे की वजह से आराम देती हो, यह अच्छी बात है। लेकिन बड़ी बहू को भी तो इंसान समझो। उसके भी हाथ दुखते होंगे, उसे भी आराम चाहिए होगा। वह घर की बड़ी बहू है, इसका मतलब यह नहीं कि उसका अपना कोई जीवन ही नहीं है।”
कमला देवी ने बात बदलते हुए कहा, “दीदी, आप भी कैसी बातें कर रही हैं! मैं अपनी बहुओं के साथ कोई भेदभाव नहीं करती।”
सावित्री देवी ने शांत स्वर में जवाब दिया, “मैं तुम्हें गलत साबित करने नहीं आई हूं, कमला। मैं तो बस वही कह रही हूं, जो आज अपनी आंखों से देखा है। और एक बात याद रखना, किसी की मेहनत का श्रेय लेना भी ठीक नहीं है। अगर नेहा ने खाना बनाया है, तो उसकी तारीफ उसे मिलनी चाहिए। तुमने उसकी मेहनत की सराहना की होती, तो तुम्हारा सम्मान कम नहीं होता, बल्कि बढ़ता।”
कमला देवी के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था।
उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि उनकी बातों और व्यवहार में कितना अंतर था।
मेहमानों के जाने के बाद घर में शांति छा गई।
नेहा रसोई में बचे हुए बर्तन समेट रही थी। कमला देवी उसके पास आईं।
उन्होंने पूछा, “बहू, तुमने खाना ठीक से खाया था न?”
नेहा ने जवाब दिया, “जी मम्मी जी, मैंने थोड़ा खा लिया था।”
कमला देवी ने कुछ देर चुप रहने के बाद कहा, “आज दीदी ने मुझसे कुछ बातें कहीं।”
नेहा ने उनकी ओर देखा, लेकिन कुछ नहीं बोली।
कमला देवी ने पूछा, “तुम्हें बुरा लगा क्या कि मैंने दीदी से कहा कि दोनों बहुएं मिलकर काम करती हैं?”
नेहा कुछ पल चुप रही। फिर उसने बहुत ही शांत स्वर में कहा, “मम्मी जी, मुझे इस बात का दुख नहीं है कि आपने छोटी को आराम करने दिया। उसका बच्चा छोटा है। मैं समझती हूं कि उसे बच्चे की देखभाल करनी होती है।”
कमला देवी ध्यान से उसकी बात सुनने लगीं।
नेहा ने आगे कहा, “मुझे दुख तब होता है, जब हर काम की जिम्मेदारी मुझे दी जाती है और फिर मेरी मेहनत का जिक्र भी नहीं होता। मैं इस घर को अपना घर समझकर काम करती हूं। मुझे किसी से इनाम नहीं चाहिए, लेकिन कभी-कभी अच्छा लगता है, जब कोई कहता है कि नेहा, तुमने बहुत मेहनत की है।”
कमला देवी ने नजरें झुका लीं।
नेहा की आवाज भर्रा गई, लेकिन उसने अपनी बात पूरी की।
“मम्मी जी, मैं भी थक जाती हूं। मेरे भी हाथ दुखते हैं। कभी-कभी मेरा भी मन करता है कि मैं बैठकर चाय पी लूं और कोई मुझसे कहे कि आज तुम आराम कर लो, बाकी काम हम कर लेंगे। लेकिन जब मैं काम करती रहती हूं, तो सबको लगता है कि यह तो मेरा फर्ज है। और जब छोटी आराम करती है, तो सब कहते हैं कि उसे आराम की जरूरत है।”
कमला देवी की आंखों में अब गंभीरता थी।
नेहा ने कहा, “मैं छोटी से कोई शिकायत नहीं करती। वह मेरी बहन जैसी है। मैं बस चाहती हूं कि इस घर में मेरी मेहनत को भी समझा जाए। मैं बड़ी बहू हूं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मुझे हर बार अपनी थकान छिपानी पड़े।”
कमला देवी के पास कहने के लिए शब्द नहीं थे।
वह पहली बार अपनी बड़ी बहू की खामोशी के पीछे छिपे दर्द को समझने की कोशिश कर रही थीं।
अगले दिन रिया को पता चला कि नेहा ने अकेले ही सारे काम किए थे और मेहमानों के सामने भी उसकी मेहनत का सही जिक्र नहीं हुआ था।
रिया को यह जानकर बहुत बुरा लगा।
वह नेहा के पास आई और बोली, “दीदी, मुझे माफ कर दीजिए। मुझे पता ही नहीं चला कि आप अकेले इतना काम कर रही थीं। मुझे लगता था कि मम्मी जी सब संभाल लेती होंगी।”
नेहा ने प्यार से कहा, “अरे रिया, तुम मुझसे माफी क्यों मांग रही हो? तुम्हें तो मम्मी जी ने ही आराम करने को कहा था। इसमें तुम्हारी गलती नहीं है।”
रिया ने कहा, “दीदी, लेकिन अब मुझे पता है कि घर का काम केवल आपकी जिम्मेदारी नहीं है। बच्चा मेरा है, इसलिए उसकी देखभाल मेरी जिम्मेदारी है। लेकिन जब बच्चा सो रहा हो और घर में जरूरत हो, तो मैं आपकी मदद कर सकती हूं। मुझे आपकी मेहनत को अनदेखा नहीं करना चाहिए।”
नेहा ने मुस्कुराते हुए कहा, “बस, यही समझदारी है। घर में सभी लोग एक-दूसरे का साथ दें, तो किसी एक पर बोझ नहीं पड़ता।”
रिया ने नेहा का हाथ पकड़कर कहा, “आज से हम दोनों मिलकर काम करेंगे। और मम्मी जी से भी प्यार से बात करेंगे, ताकि घर की जिम्मेदारियां सबके बीच ठीक से बंट सकें।”
नेहा ने उसे गले लगा लिया।
उसे पहली बार लगा कि शायद अब घर के हालात बदल सकते हैं।
कुछ दिनों बाद परिवार में एक छोटा-सा धार्मिक कार्यक्रम रखा गया।
कमला देवी ने सभी को बुलाकर कहा, “इस बार घर की तैयारी हम सब मिलकर करेंगे। रिया, तुम बच्चे को संभालने के साथ जो काम आसानी से कर सको, उसमें मदद करना। नेहा, तुम खाने की सूची बना दो। बाकी काम मैं और घर के दूसरे सदस्य मिलकर संभाल लेंगे।”
नेहा ने आश्चर्य से अपनी सास की ओर देखा।
कमला देवी ने उसके पास आकर कहा, “बहू, मुझे अब समझ आया है कि मैंने तुम्हें बड़ी बहू होने के नाम पर बहुत सारी जिम्मेदारियां दे दी थीं। मुझे तुम्हारी मेहनत की आदत पड़ गई थी, इसलिए मैंने कभी यह नहीं सोचा कि तुम्हें भी आराम चाहिए।”
नेहा चुपचाप सुनती रही।
कमला देवी ने आगे कहा, “और उस दिन बुआ जी के सामने मैंने जो कहा, वह भी ठीक नहीं था। घर की सजावट और खाना तुमने तैयार किया था। मुझे तुम्हारी तारीफ करनी चाहिए थी, न कि सारी मेहनत का श्रेय खुद लेना चाहिए था।”
नेहा की आंखों में आंसू आ गए।
कमला देवी ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “मुझे माफ कर दो बहू। मैं तुम्हें अपनी बेटी जैसा मानने की बात तो करती थी, लेकिन तुम्हारी भावनाओं को समझने में पीछे रह गई।”
नेहा ने धीरे से कहा, “मम्मी जी, मैं आपसे नाराज नहीं हूं। मैं तो बस चाहती थी कि आप मेरी मेहनत को समझें।”
कमला देवी ने उसे गले लगाते हुए कहा, “अब मैं कोशिश करूंगी कि ऐसा दोबारा न हो। घर की जिम्मेदारी हम सबकी है, केवल तुम्हारी नहीं।”
रिया भी वहां आ गई और बोली, “मम्मी जी, मैं भी दीदी का साथ दूंगी। घर तभी अच्छा लगता है, जब उसमें रहने वाले सभी लोग खुश हों।”
कमला देवी ने दोनों बहुओं को अपने पास बिठा लिया।
उस दिन पहली बार उन्होंने महसूस किया कि परिवार केवल इस बात से खुशहाल नहीं बनता कि घर कितना साफ है या खाने में कितने पकवान बने हैं। परिवार तब खुशहाल बनता है, जब घर में हर व्यक्ति की मेहनत और भावनाओं को सम्मान मिलता है।
समय बीतने के साथ घर का माहौल बदलने लगा।
अब जब कोई मेहमान आने वाला होता, तो कमला देवी पहले ही सभी के साथ बैठकर काम बांट लेतीं। नेहा खाना बनाती, रिया अपनी सुविधा के अनुसार तैयारी में मदद करती और कमला देवी भी रसोई तथा घर के दूसरे कामों में हाथ बंटातीं।
अगर नेहा थक जाती, तो कमला देवी खुद कहतीं, “बहू, थोड़ी देर आराम कर लो। बाकी काम मैं देख लूंगी।”
नेहा के लिए ये शब्द किसी बड़े उपहार से कम नहीं थे।
एक दिन सावित्री देवी फिर उनके घर आईं। उन्होंने घर को व्यवस्थित देखा और खाने की मेज पर सभी को मिलकर काम करते हुए पाया।
सावित्री देवी ने हंसते हुए कहा, “कमला, इस बार तो तुम्हारा घर पहले से भी ज्यादा अच्छा लग रहा है।”
कमला देवी ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “दीदी, इस बार घर को केवल मेरी बहुओं ने नहीं, बल्कि हम सबने मिलकर संभाला है। पहले मुझे लगता था कि घर की जिम्मेदारी बहुओं का काम है। अब समझ आया है कि परिवार की जिम्मेदारी परिवार के हर सदस्य की होती है।”
उन्होंने नेहा की ओर देखकर कहा, “और हमारी नेहा ने मुझे यह सिखाया कि किसी की मेहनत को अपना समझ लेना और उसकी मेहनत को सम्मान देना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।”
नेहा ने अपनी सास को देखा। उसके चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान थी।
उसे अब हर दिन अपनी मेहनत साबित करने की जरूरत नहीं पड़ती थी। उसके परिवार ने आखिरकार समझ लिया था कि प्यार का मतलब केवल जिम्मेदारियां सौंपना नहीं, बल्कि एक-दूसरे का बोझ हल्का करना भी है।
और कमला देवी ने भी सीख लिया था कि बहू की चुप्पी हमेशा उसकी खुशी की निशानी नहीं होती। कई बार वह रिश्ते बचाने के लिए अपने दर्द को शब्द नहीं देती।
कहानी की सीख: घर की बड़ी बहू होने का मतलब यह नहीं कि सारी जिम्मेदारियां उसी के कंधों पर डाल दी जाएं। छोटी बहू को आराम देना अच्छी बात है, लेकिन बड़ी बहू की मेहनत और थकान को अनदेखा करना गलत है। किसी के काम का श्रेय खुद लेने से सम्मान नहीं बढ़ता। सच्चा सम्मान तब मिलता है, जब हम दूसरों की मेहनत को खुले दिल से स्वीकार करते हैं।
अगर आपको लगता है कि घर की जिम्मेदारियां सभी सदस्यों को मिलकर निभानी चाहिए और हर व्यक्ति की मेहनत को सम्मान मिलना चाहिए, तो इस कहानी को लाइक करें और ऐसी ही दिल को छू लेने वाली पारिवारिक कहानियों के लिए पेज को फॉलो करें।

Post a Comment