बेटी बदली, बेटा नहीं
“सुना है, शर्मा जी की बहू शादी के आठ महीने बाद ही मायके चली गई। अब वापस आने का नाम ही नहीं ले रही है।”
पड़ोस में रहने वाली विमला देवी ने अपनी सहेली कमला देवी से कहा।
कमला देवी ने हैरानी जताते हुए जवाब दिया, “अरे, ऐसा क्या हो गया? अभी तो शादी को साल भर भी नहीं हुआ। आजकल की लड़कियों में जरा-सी बात सहने की ताकत नहीं रही। हमारे समय में तो सास की सौ बातें सुनकर भी घर नहीं छोड़ा जाता था।”
विमला देवी ने सिर हिलाते हुए कहा, “बिल्कुल सही कह रही हो। आजकल की बहुओं को घर की जिम्मेदारी उठानी नहीं आती। मायके में राजकुमारियों की तरह रहती हैं और ससुराल आते ही उन्हें अपनी आजादी याद आने लगती है।”
पास बैठी एक बुजुर्ग महिला शांति देवी ने उनकी बातें सुनकर कहा, “तुम दोनों ने बहू को दोषी तो ठहरा दिया, लेकिन यह जानने की कोशिश की कि आखिर वह घर छोड़कर गई क्यों? कहीं ऐसा तो नहीं कि घर में रहने वाले लोगों ने उसे इतना मजबूर कर दिया हो कि उसे अपना घर ही पराया लगने लगा हो?”
शांति देवी की बात सुनकर दोनों महिलाएँ कुछ पल के लिए चुप हो गईं।
विमला देवी ने जवाब दिया, “लेकिन बहू का भी तो फर्ज होता है कि वह ससुराल के लोगों के साथ तालमेल बैठाकर चले।”
शांति देवी ने शांत स्वर में कहा, “बिल्कुल होता है। लेकिन क्या तालमेल बैठाने की जिम्मेदारी सिर्फ बहू की होती है? क्या पति, सास-ससुर और परिवार के दूसरे लोगों की कोई जिम्मेदारी नहीं होती?”
उनकी इस बात ने एक ऐसा सवाल खड़ा कर दिया, जिस पर शायद ही कोई गंभीरता से विचार करता था।
हमारे समाज में जब भी किसी शादीशुदा लड़की का रिश्ता टूटने की खबर आती है, तो सबसे पहले सवाल लड़की के चरित्र, उसके संस्कार और उसकी सहनशीलता पर उठते हैं। लोग यह जानने से पहले ही फैसला सुना देते हैं कि लड़की ने अपना घर नहीं बसाया।
लेकिन क्या किसी घर को बसाने की जिम्मेदारी केवल एक इंसान की होती है?
क्या शादी के बाद लड़की की जिंदगी में होने वाला हर बदलाव उसकी अपनी जिम्मेदारी है?
और क्या लड़के को शादी के बाद भी वैसा ही रहने का अधिकार है, जैसा वह अपने माता-पिता के घर में रहता आया है?
इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने के लिए हमें एक ऐसे परिवार की कहानी समझनी होगी, जहाँ एक बेटी को पढ़ा-लिखाकर आत्मनिर्भर तो बनाया गया, लेकिन बेटे को एक अच्छा पति बनना सिखाना भूल गए।
राजेश शर्मा एक सरकारी कार्यालय में काम करते थे। उनकी पत्नी सुनीता शर्मा घर संभालती थीं। परिवार में उनका बेटा रोहित और बेटी नेहा थे।
राजेश शर्मा का मानना था कि बेटा हो या बेटी, दोनों को अच्छी शिक्षा मिलनी चाहिए। उन्होंने अपनी दोनों संतानों को अच्छे विद्यालय में पढ़ाया और उनकी जरूरतों का पूरा ध्यान रखा।
नेहा पढ़ाई में होशियार थी। रोहित भी पढ़ने में अच्छा था। दोनों को अपने भविष्य के बारे में सोचने की आजादी थी।
नेहा जब छोटी थी, तब सुनीता शर्मा उससे कहती थीं, “बेटी, मन लगाकर पढ़ाई करना। तुम्हें अपने पैरों पर खड़ा होना है। किसी पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए।”
राजेश शर्मा भी अपनी बेटी को समझाते थे, “बेटा, तुम्हारी जिंदगी तुम्हारी अपनी है। तुम्हें अपने फैसले समझदारी से लेने चाहिए।”
नेहा के मन में आत्मविश्वास बढ़ता गया। उसने पढ़ाई पूरी की और एक अच्छी कंपनी में नौकरी करने लगी।
दूसरी तरफ, रोहित भी पढ़ाई पूरी करके एक निजी कंपनी में नौकरी करने लगा।
दोनों बच्चे कमाने लगे तो घर में खुशी का माहौल था।
लेकिन इस परिवार में एक छोटी-सी बात थी, जिस पर किसी का ध्यान नहीं गया।
नेहा की पढ़ाई, नौकरी और भविष्य को लेकर परिवार जितना गंभीर था, घर के कामों में उसकी भागीदारी को लेकर उतना ही लापरवाह था।
सुनीता शर्मा ने कभी बेटी को नियमित रूप से रसोई का काम नहीं सिखाया। उनका मानना था कि अभी उसकी पढ़ाई और नौकरी जरूरी है। घर के काम तो वह शादी के बाद भी सीख सकती है।
लेकिन रोहित के मामले में भी यही सोच लागू नहीं हुई।
रोहित को कभी अपने कपड़े धोने की जरूरत नहीं पड़ी। उसकी चाय माँ बनाकर देती थीं। खाना मेज पर तैयार मिलता था। कमरे की सफाई से लेकर कपड़ों की इस्त्री तक, हर काम सुनीता शर्मा ही कर देती थीं।
जब कभी राजेश शर्मा बेटे से कोई छोटा काम करने के लिए कहते, तो सुनीता शर्मा हँसकर बोलतीं, “अरे, रहने दीजिए। दिन भर नौकरी करके आया है। घर के कामों के लिए तो मैं हूँ ही।”
राजेश शर्मा भी पत्नी की बात मान लेते।
धीरे-धीरे रोहित के मन में यह बात बैठ गई कि नौकरी करना पुरुष का काम है और घर संभालना महिलाओं की जिम्मेदारी।
किसी ने उसे यह नहीं बताया कि जिस तरह उसकी बहन को नौकरी करके अपनी जिंदगी बनाने का अधिकार है, उसी तरह उसकी होने वाली पत्नी को भी अपने सपनों के साथ जीने का अधिकार होगा।
उसे यह भी नहीं सिखाया गया कि विवाह का अर्थ किसी दूसरे इंसान को अपने घर की जिम्मेदारियाँ सौंप देना नहीं, बल्कि मिलकर एक नई जिंदगी बनाना है।
यही छोटी-सी कमी आगे चलकर एक बड़े संकट का कारण बनने वाली थी।
नेहा की नौकरी शुरू हुए तीन साल हो चुके थे। उसकी उम्र अट्ठाईस वर्ष थी और परिवार उसके विवाह के बारे में सोचने लगा था।
एक रिश्तेदार ने नेहा के लिए अमित नाम के युवक का रिश्ता बताया।
अमित एक निजी कंपनी में अच्छी नौकरी करता था। उसका परिवार शिक्षित और आर्थिक रूप से संपन्न था। उसके पिता महेश वर्मा व्यवसाय करते थे और माँ सरला वर्मा घर संभालती थीं।
अमित की एक छोटी बहन भी थी, जो कॉलेज में पढ़ रही थी।
दोनों परिवार मिले। बातचीत हुई और कुछ मुलाकातों के बाद नेहा और अमित ने विवाह के लिए सहमति दे दी।
शादी तय होने के बाद एक दिन नेहा ने अमित से पूछा, “अमित, मैं शादी के बाद भी नौकरी जारी रखना चाहती हूँ। मेरे लिए मेरा काम बहुत मायने रखता है। क्या तुम्हें इससे कोई परेशानी होगी?”
अमित ने मुस्कुराकर कहा, “नहीं, मुझे क्यों परेशानी होगी? आजकल दोनों का कमाना अच्छी बात है। तुम अपनी नौकरी जारी रखना।”
नेहा को उसका जवाब अच्छा लगा।
उसने दूसरा सवाल पूछा, “और घर की जिम्मेदारियों को लेकर तुम्हारी क्या सोच है? नौकरी के साथ घर भी संभालना होगा। मुझे लगता है कि पति-पत्नी दोनों को मिलकर काम करना चाहिए।”
अमित ने सहजता से कहा, “देखो, मेरे घर में माँ सब कुछ संभालती हैं। मुझे घर के कामों की आदत नहीं है। लेकिन जरूरत पड़ी तो मैं मदद कर दिया करूँगा।”
नेहा ने पूछा, “मदद या बराबर की जिम्मेदारी?”
अमित कुछ पल सोचकर बोला, “तुम भी न, अभी से इतनी गंभीर बातें करने लगीं। शादी के बाद सब ठीक हो जाएगा। हम दोनों समझदारी से काम लेंगे।”
नेहा ने उसकी बात पर भरोसा कर लिया।
उसे लगा कि अमित अभी घर के कामों में अनुभवी नहीं है, लेकिन समय के साथ सीख जाएगा।
उधर अमित ने भी सोचा कि नेहा पढ़ी-लिखी है और समझदार है। वह अपने घर के तौर-तरीके सीख ही लेगी।
दोनों ने एक-दूसरे की बात तो सुनी, लेकिन उसके पीछे छिपी वास्तविक जिम्मेदारियों को ठीक से समझने की कोशिश नहीं की।
शादी की तैयारियाँ शुरू हो गईं।
दोनों परिवारों में खुशी थी। किसी ने यह नहीं सोचा कि विवाह केवल दो लोगों का साथ रहने का नाम नहीं है। यह दो अलग-अलग परवरिशों, आदतों और उम्मीदों का मिलन भी है।
और अगर उन उम्मीदों को पहले से समझा न जाए, तो छोटी-छोटी बातें भी रिश्ते में दरार पैदा कर सकती हैं।
नेहा और अमित की शादी धूमधाम से हुई।
नेहा अपने नए घर में आई तो सभी ने उसका स्वागत किया। सरला वर्मा ने उसे गले लगाकर कहा, “बेटी, अब यह तुम्हारा भी घर है। यहाँ तुम्हें किसी चीज की कमी नहीं होने दूँगी।”
नेहा भावुक हो गई।
उसने सोचा कि उसे एक ऐसा परिवार मिला है, जहाँ उसे प्यार और सम्मान दोनों मिलेंगे।
शादी के शुरुआती कुछ दिन अच्छे रहे। रिश्तेदार आते-जाते रहे। घर में उत्सव का माहौल था।
लेकिन धीरे-धीरे रोजमर्रा की जिंदगी शुरू हुई तो नेहा के सामने एक नई चुनौती आ गई।
सुबह घर के दूसरे लोगों के उठने से पहले चाय तैयार करने की उम्मीद उससे की जाने लगी। नाश्ता बनाना, रसोई समेटना, कपड़े व्यवस्थित करना और घर के छोटे-मोटे काम करना भी उसकी जिम्मेदारी मान लिया गया।
नेहा को खाना बनाने का थोड़ा अनुभव था, लेकिन वह नियमित रूप से घर का काम नहीं करती थी।
एक दिन उसने सरला वर्मा से कहा, “माँजी, मुझे खाना बनाना आता तो है, लेकिन इतने सारे लोगों के लिए एक साथ खाना बनाने की आदत नहीं है। आप मुझे धीरे-धीरे सिखा दीजिए। मैं सीखना चाहती हूँ।”
सरला वर्मा ने जवाब दिया, “बेटी, सीखने में क्या परेशानी है? मैंने भी शादी के बाद ही सब कुछ सीखा था। लेकिन अब तुम्हें जल्दी सीखना होगा। घर की जिम्मेदारी तो आखिर तुम्हें ही संभालनी है।”
नेहा ने सिर हिलाकर उनकी बात मान ली।
वह सचमुच सीखना चाहती थी। उसे घर संभालने से कोई परेशानी नहीं थी। परेशानी तब होती थी, जब उससे एक साथ हर काम में निपुण होने की उम्मीद की जाती थी।
नौकरी पर जाने से पहले नाश्ता बनाना, अपना टिफिन तैयार करना और फिर समय पर कार्यालय पहुँचना उसके लिए कठिन होने लगा।
शाम को लौटने पर वह थक जाती, लेकिन घर में उसके लिए कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं थी।
अमित अपने कमरे में आराम करता या मोबाइल देखने लगता।
नेहा ने एक दिन उससे कहा, “अमित, क्या तुम रात को कभी-कभी सब्जी काटने या खाना लगाने में मेरी मदद कर सकते हो? इससे मेरा काम थोड़ा आसान हो जाएगा।”
अमित ने मोबाइल से नजर हटाए बिना कहा, “आज बहुत थक गया हूँ। तुम कर लो न। कल मैं जरूर मदद करूँगा।”
नेहा चुपचाप रसोई में चली गई।
अगले दिन भी वही हुआ। फिर उसके अगले दिन भी।
धीरे-धीरे नेहा को समझ आने लगा कि अमित के लिए घर का काम उसकी अपनी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पत्नी की जिम्मेदारी थी। वह कभी-कभार कोई काम कर दे, तो उसे विशेष मदद समझा जाता था।
लेकिन नेहा अगर एक दिन खाना बनाने में देर कर दे, तो उसे लापरवाह कहा जाता था।
यहीं से उसके मन में असंतोष पैदा होने लगा।
एक दिन सरला वर्मा रसोई में आईं। नेहा ने अभी-अभी रोटियाँ बनानी शुरू की थीं। कुछ रोटियाँ ठीक बनी थीं और कुछ का आकार बिगड़ गया था।
सरला वर्मा ने एक रोटी उठाकर कहा, “बेटी, यह कैसी रोटी बनाई है? इतनी बड़ी कंपनी में नौकरी करती हो, लेकिन एक ठीक से गोल रोटी नहीं बना पातीं।”
नेहा ने शांत स्वर में कहा, “माँजी, मैं कोशिश कर रही हूँ। अभ्यास से बेहतर हो जाएगा।”
सरला वर्मा ने जवाब दिया, “हमारे जमाने में लड़कियाँ शादी से पहले ही घर का सारा काम सीख लेती थीं। आजकल की लड़कियों को बस नौकरी और अपनी आजादी चाहिए।”
नेहा ने उनकी बात सुनकर कुछ नहीं कहा।
वह जानती थी कि उसकी सास ने वर्षों तक घर संभाला है। वह उनके अनुभव का सम्मान करती थी। लेकिन वह यह भी जानती थी कि किसी काम में अनुभव हासिल करने के लिए समय और अभ्यास की जरूरत होती है।
उस शाम सरला वर्मा ने अमित से कहा, “तुम्हारी पत्नी को घर के कामों में बिल्कुल रुचि नहीं है। पूरे दिन नौकरी करती है, लेकिन घर के कामों में अभी भी बच्ची जैसी है।”
अमित ने माँ की बात सुनकर नेहा से पूछा, “तुम माँ की बातों का बुरा क्यों मानती हो? वह तुम्हें सिखा ही तो रही हैं।”
नेहा ने जवाब दिया, “मुझे सिखाने से कोई परेशानी नहीं है, अमित। लेकिन हर बार मेरी तुलना माँजी से क्यों की जाती है? उन्होंने इतने सालों में अनुभव हासिल किया है। मुझे भी सीखने के लिए समय चाहिए।”
अमित ने कहा, “तुम हर बात को इतना बड़ा बना देती हो। माँ ने कुछ कह दिया तो क्या हो गया?”
नेहा ने उसकी ओर देखकर पूछा, “अगर तुम्हारी नौकरी में कोई अनुभवी व्यक्ति तुम्हें रोज यह कहे कि तुम्हें कुछ नहीं आता, तो क्या तुम्हें अच्छा लगेगा?”
अमित ने नाराज होकर कहा, “मेरी नौकरी की तुलना घर के काम से मत करो। दोनों अलग बातें हैं।”
नेहा ने धीमे स्वर में कहा, “काम अलग हो सकते हैं, लेकिन सीखने की जरूरत दोनों में होती है। जब मैं नौकरी सीख सकती हूँ, तो तुम भी घर के काम सीख सकते हो।”
अमित को यह बात अच्छी नहीं लगी।
उसने बातचीत खत्म करते हुए कहा, “मुझे इस बहस में नहीं पड़ना।”
नेहा चुप हो गई।
उस दिन उसे पहली बार लगा कि उसका पति उसकी बात सुन तो रहा है, लेकिन समझना नहीं चाहता।
शादी के लगभग चार महीने बीत चुके थे।
नेहा नौकरी और घर के बीच संतुलन बनाने की पूरी कोशिश कर रही थी। उसने इंटरनेट पर खाना बनाने की विधियाँ देखीं, छुट्टी के दिन नई चीजें बनाईं और रसोई के काम सीखने में समय लगाया।
लेकिन उसके प्रयासों की चर्चा कम और गलतियों की चर्चा अधिक होती थी।
एक दिन अमित की बहन पूजा अपनी सहेली के साथ घर आई।
पूजा ने नेहा को रसोई में काम करते देखा और हँसते हुए कहा, “भाभी, आप तो ऑफिस भी जाती हैं और घर भी संभालती हैं। लगता है शादी ने आपको पूरी तरह बदल दिया।”
नेहा मुस्कुराकर बोली, “बदलना तो पड़ता है। बस कोशिश कर रही हूँ कि सब कुछ ठीक से कर सकूँ।”
पूजा ने कहा, “भाभी, भैया तो शादी से पहले भी रसोई में नहीं जाते थे। आप उनसे काम करवाने की कोशिश मत करना। उन्हें ये सब पसंद नहीं है।”
नेहा ने हल्के स्वर में कहा, “काम करवाना मेरा उद्देश्य नहीं है, पूजा। मैं चाहती हूँ कि हम दोनों मिलकर घर संभालें।”
पूजा की सहेली ने मजाक में कहा, “लेकिन पुरुषों से घर के काम करवाना आसान थोड़े ही होता है!”
तीनों हँस पड़ीं, लेकिन नेहा के मन में यह बात रह गई।
उसे महसूस हुआ कि उसके पति का घर के काम न करना केवल उसकी व्यक्तिगत आदत नहीं थी। परिवार के लोगों ने भी इसे सामान्य मान रखा था।
उस रात नेहा ने अमित से बात करने का फैसला किया।
उसने कहा, “अमित, मैं तुमसे एक जरूरी बात करना चाहती हूँ।”
अमित ने पूछा, “अब क्या हुआ?”
नेहा ने समझाते हुए कहा, “मैं तुम्हारी पत्नी हूँ, तुम्हारे घर की कर्मचारी नहीं। मैं नौकरी भी करती हूँ और घर की जिम्मेदारियाँ भी निभाना चाहती हूँ। लेकिन मैं चाहती हूँ कि हम दोनों मिलकर यह सब करें।”
अमित ने नाराज होकर कहा, “तो क्या मैं तुम्हें कर्मचारी समझता हूँ? तुम्हें हर बात में गलत मतलब निकालने की आदत है।”
नेहा ने कहा, “मैं तुम्हें दोष नहीं दे रही। मैं सिर्फ अपनी परेशानी बता रही हूँ।”
अमित ने जवाब दिया, “मेरी माँ ने इतने साल घर संभाला है। उन्होंने कभी शिकायत नहीं की। तुम्हें भी थोड़ा समझौता करना चाहिए।”
नेहा की आँखों में आँसू आ गए।
उसने कहा, “तुम्हारी माँ ने जो किया, वह उनका अनुभव और उनका जीवन था। लेकिन क्या इसका मतलब है कि मुझे भी बिना शिकायत सब कुछ अकेले करना चाहिए? क्या मेरा काम, मेरी थकान और मेरी इच्छाएँ कोई मायने नहीं रखतीं?”
अमित ने झुंझलाकर कहा, “तुम्हें हर बात में बराबरी चाहिए। शादी कोई प्रतियोगिता नहीं है।”
नेहा ने उत्तर दिया, “मैं प्रतियोगिता नहीं कर रही। मैं साझेदारी माँग रही हूँ।”
अमित ने उसकी बात सुने बिना करवट बदल ली।
उस रात नेहा देर तक जागती रही।
वह सोचती रही कि उसने शादी से पहले जिस साथी की कल्पना की थी, क्या अमित सचमुच वैसा ही था? या दोनों ने एक-दूसरे को समझने की कोशिश ही नहीं की थी?
कुछ दिनों बाद नेहा की माँ सुनीता शर्मा उससे मिलने आईं।
बेटी को उदास देखकर उन्होंने पूछा, “क्या बात है, नेहा? तुम कुछ परेशान लग रही हो।”
नेहा ने पहले कहा कि सब ठीक है। लेकिन माँ के बार-बार पूछने पर उसकी आँखों से आँसू निकल आए।
उसने अपनी परेशानी बताई।
सुनीता शर्मा ने बेटी की बातें ध्यान से सुनीं। फिर उन्होंने कहा, “बेटी, हर घर में थोड़ा-बहुत समझौता करना पड़ता है। तुम भी थोड़ा धैर्य रखो। धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।”
नेहा ने पूछा, “माँ, मैं धैर्य रख रही हूँ। मैं काम सीख भी रही हूँ। लेकिन क्या हर बार समझौता मुझे ही करना चाहिए?”
सुनीता शर्मा के पास तुरंत कोई जवाब नहीं था।
नेहा ने आगे कहा, “आपने मुझे हमेशा सिखाया कि मुझे अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए। आपने कहा कि मैं किसी पर निर्भर न रहूँ। लेकिन शादी के बाद जब मैं अपने काम और अपने सम्मान की बात करती हूँ, तो मुझे ही समझौता करने के लिए कहा जाता है। क्या आत्मनिर्भर होने का मतलब सिर्फ कमाना है? क्या अपनी परेशानी बताने का अधिकार नहीं है?”
सुनीता शर्मा चुप हो गईं।
बेटी की बात सुनकर उन्हें अपनी परवरिश का एक दूसरा पहलू दिखाई दिया।
उन्होंने नेहा को पढ़ाया-लिखाया, आत्मविश्वास दिया और अपने फैसले लेने की ताकत दी थी। लेकिन क्या उन्होंने कभी उसे यह सिखाया था कि विवाह में असहमति होने पर बातचीत कैसे की जाती है? क्या उन्होंने उसे केवल सहन करना सिखाया था, या समस्याओं का मिलकर समाधान निकालना भी सिखाया था?
फिर उन्हें अपने बेटे रोहित का ध्यान आया।
उन्होंने रोहित को भी पढ़ाया था, लेकिन कभी यह नहीं सिखाया कि अपनी पत्नी के साथ घर की जिम्मेदारियाँ बाँटना भी एक जरूरी जीवन-कौशल है।
वे अपनी बेटी को घर संभालना सिखाने में पीछे रह गई थीं और अपने बेटे को घर संभालने की जिम्मेदारी देना भी भूल गई थीं।
अंतर केवल इतना था कि बेटी से विवाह के बाद बहुत कुछ सीख लेने की उम्मीद की जा रही थी, जबकि बेटे से कुछ नया सीखने की उम्मीद ही नहीं की गई थी।
सुनीता शर्मा ने बेटी का हाथ पकड़कर कहा, “नेहा, शायद हमने तुम्हें बहुत-सी बातें सिखाईं, लेकिन कुछ जरूरी बातें सिखाना भूल गए। मैं तुम्हारी परेशानी को समझने की कोशिश करूँगी।”
नेहा माँ के गले लग गई।
उसे उस दिन पहली बार लगा कि शायद कोई उसकी बात को दोष दिए बिना सुनने के लिए तैयार है।
नेहा की परेशानी के बीच ही रोहित के विवाह की बात चलने लगी।
रोहित के लिए एक सुशिक्षित लड़की, साक्षी, का रिश्ता आया। वह एक निजी विद्यालय में अध्यापिका थी। उसका परिवार साधारण लेकिन विचारों से आधुनिक था।
दोनों परिवारों की मुलाकात हुई। साक्षी और रोहित ने भी एक-दूसरे से बातचीत की।
साक्षी ने रोहित से पूछा, “मैं शादी के बाद अपनी नौकरी जारी रखना चाहती हूँ। क्या तुम्हें कोई परेशानी होगी?”
रोहित ने कहा, “नहीं, मुझे कोई परेशानी नहीं है। मैं चाहता हूँ कि मेरी पत्नी भी अपने सपने पूरे करे।”
साक्षी ने अगला सवाल पूछा, “घर की जिम्मेदारियों को लेकर तुम्हारी क्या सोच है?”
रोहित ने वही जवाब दिया जो कभी अमित ने नेहा को दिया था।
“मेरी माँ घर का सारा काम संभालती हैं। मुझे इसकी आदत नहीं है। लेकिन जरूरत पड़ी तो मैं मदद कर दूँगा।”
साक्षी ने पूछा, “अगर हम दोनों नौकरी करेंगे, तो घर के काम कौन करेगा?”
रोहित ने हँसते हुए कहा, “अरे, इतना मत सोचो। शादी के बाद सब संभल जाएगा।”
साक्षी ने गंभीरता से कहा, “मैं भी यही चाहती हूँ कि सब संभल जाए। लेकिन शादी के बाद अचानक जिम्मेदारियाँ पैदा नहीं होतीं। वे पहले से होती हैं। बस शादी के बाद उनका बँटवारा बदल जाता है।”
रोहित को उसकी बात थोड़ी अजीब लगी।
उसे लगा कि साक्षी छोटी-छोटी बातों को जरूरत से ज्यादा महत्व दे रही है।
लेकिन सुनीता शर्मा पास ही बैठी थीं। उन्होंने साक्षी की बात ध्यान से सुनी।
उन्हें नेहा की बातें याद आ गईं।
उन्होंने रोहित से पूछा, “बेटा, अगर तुम दोनों नौकरी करोगे, तो घर का काम केवल साक्षी क्यों करेगी?”
रोहित ने हैरानी से माँ की ओर देखा।
“माँ, मैंने कब कहा कि वह अकेली करेगी? मैं जरूरत पड़ने पर मदद कर दूँगा।”
सुनीता शर्मा ने पूछा, “और अगर तुम्हें भी थकान होगी और उसे भी थकान होगी, तो खाना कौन बनाएगा? अगर दोनों बीमार हो गए, तो घर कौन संभालेगा? अगर साक्षी की नौकरी में तुम्हारी नौकरी से ज्यादा काम हुआ, तो क्या तुम उसकी मदद नहीं करोगे?”
रोहित के पास कोई स्पष्ट जवाब नहीं था।
सुनीता शर्मा ने कहा, “बेटा, घर के काम किसी पर एहसान करने के लिए नहीं होते। जिस घर में दो लोग रहते हैं, उसकी जिम्मेदारी भी दोनों की होती है। तुमने पढ़ाई की है, नौकरी करते हो। फिर खाना बनाना या अपने कपड़े धोना सीखने में क्या परेशानी है?”
रोहित ने कहा, “माँ, लेकिन आपने तो हमेशा सब कुछ अकेले किया है।”
सुनीता शर्मा ने गहरी साँस ली।
“हाँ बेटा, मैंने किया है। लेकिन मैंने जो किया, क्या वही तुम्हारी पत्नी को भी करना चाहिए? मैंने तुम्हें कभी काम करने नहीं दिया। मुझे लगा कि तुम्हारी पढ़ाई और नौकरी ज्यादा जरूरी हैं। लेकिन अब समझ में आ रहा है कि मैंने तुम्हें जिंदगी का एक जरूरी हिस्सा सीखने ही नहीं दिया।”
रोहित पहली बार माँ की बात ध्यान से सुन रहा था।
सुनीता शर्मा ने आगे कहा, “तुम्हारी बहन भी नौकरी करती है। जब वह अपने ससुराल में परेशान होती है, तो हमें उसकी परेशानी समझ आती है। लेकिन जब किसी दूसरे घर की बहू की बात आती है, तो हम उसके संस्कारों पर सवाल उठाने लगते हैं। यह दोहरा व्यवहार हमें बदलना होगा।”
रोहित कुछ देर तक चुप रहा।
उसके मन में पहली बार यह सवाल उठा कि अगर नेहा की जगह साक्षी को भी वही परिस्थितियाँ झेलनी पड़ीं, तो क्या वह उसे समझ पाएगा?
उस रात सुनीता शर्मा ने राजेश शर्मा से बातचीत की।
उन्होंने कहा, “सुनिए, मुझे लगता है कि हमने बच्चों की परवरिश में एक बड़ी गलती की है।”
राजेश शर्मा ने पूछा, “कैसी गलती?”
सुनीता शर्मा ने कहा, “हमने नेहा को पढ़ाया, आत्मनिर्भर बनाया और उसके सपनों को महत्व दिया। लेकिन घर के कामों की जिम्मेदारी के बारे में हमने उसे भी व्यवस्थित रूप से नहीं सिखाया। दूसरी तरफ, रोहित को हमने कभी अपने काम खुद करने की आदत नहीं डाली। हमें लगा कि घर का काम करना हमारा कर्तव्य है और बच्चों को केवल पढ़ाई करनी चाहिए।”
राजेश शर्मा ने कहा, “लेकिन हमने तो दोनों को बराबर पढ़ाया है। हमने कभी बेटे और बेटी में अंतर नहीं किया।”
सुनीता शर्मा ने उत्तर दिया, “पढ़ाई में अंतर नहीं किया, लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में किया। नेहा से कहा कि वह आत्मनिर्भर बने, मगर रोहित को आत्मनिर्भर होने के लिए जरूरी काम नहीं सिखाए। नेहा की परेशानी देखकर हम उसे समझौता करने की सलाह देते रहे, लेकिन कभी यह नहीं सोचा कि उसके पति को भी अपनी जिम्मेदारियाँ समझनी चाहिए।”
राजेश शर्मा ने गंभीरता से कहा, “तुम ठीक कह रही हो। हमने बराबरी का मतलब केवल शिक्षा और नौकरी तक सीमित कर दिया। हमें बच्चों को जिम्मेदारी और सम्मान की बराबरी भी सिखानी चाहिए थी।”
सुनीता शर्मा की आँखें नम हो गईं।
उन्होंने कहा, “मुझे डर लगता है कि अगर रोहित की सोच नहीं बदली, तो कहीं साक्षी को भी नेहा जैसी परेशानी न झेलनी पड़े।”
राजेश शर्मा ने पत्नी का हाथ पकड़कर कहा, “अभी समय है। हम रोहित से बात करेंगे। लेकिन केवल समझाने से नहीं होगा। हमें उसे अपने काम खुद करने की आदत भी डालनी होगी।”
अगले दिन से घर में एक छोटा-सा बदलाव शुरू हुआ।
सुनीता शर्मा ने रोहित से कहा कि वह अपने कपड़े खुद व्यवस्थित करे, अपने कमरे की सफाई करे और सप्ताह में कुछ दिन रसोई में भी हाथ बँटाए।
शुरू में रोहित को यह सब अजीब लगा।
एक दिन उसने शिकायत की, “माँ, आप अचानक मुझसे इतने सारे काम क्यों करवाने लगी हैं? पहले तो आप सब कर देती थीं।”
सुनीता शर्मा ने मुस्कुराकर कहा, “क्योंकि पहले मुझे लगता था कि तुम्हें इन कामों की जरूरत नहीं है। अब समझ में आया कि तुम्हें इनकी सबसे ज्यादा जरूरत है। कल तुम्हारी पत्नी के साथ तुम्हें भी घर चलाना होगा। मैं हमेशा तुम्हारे साथ नहीं रहूँगी।”
रोहित ने मजाक में कहा, “तो क्या आप मुझे शादी से पहले ही गृहस्थी की ट्रेनिंग दे रही हैं?”
सुनीता शर्मा ने जवाब दिया, “हाँ बेटा, और यह ट्रेनिंग तुम्हें अपनी पत्नी के साथ सम्मान से जीवन बिताने में मदद करेगी।”
धीरे-धीरे रोहित ने अपने छोटे-छोटे काम खुद करने शुरू कर दिए।
उसे पहली बार महसूस हुआ कि घर के काम उतने आसान नहीं हैं, जितने उसे पहले लगते थे।
खाना बनाने में समय लगता था। कपड़े धोने और सुखाने में मेहनत लगती थी। घर को व्यवस्थित रखने के लिए नियमित ध्यान देना पड़ता था।
अब वह समझने लगा था कि उसकी माँ रोज कितने काम करती थीं, जिन्हें वह कभी काम मानता ही नहीं था।
उधर नेहा और अमित के रिश्ते में तनाव बढ़ रहा था।
नेहा कई बार अमित से बातचीत करने की कोशिश कर चुकी थी। वह चाहती थी कि दोनों बैठकर अपनी जिम्मेदारियों का उचित बँटवारा तय करें।
लेकिन अमित हर बार यही कहता, “तुम्हें घर में क्या परेशानी है? सब कुछ तो है। तुम्हें नौकरी करने से किसी ने रोका नहीं। फिर भी तुम खुश नहीं हो।”
नेहा जवाब देती, “मुझे केवल सुविधाएँ नहीं चाहिए, अमित। मुझे एक साथी चाहिए। मैं चाहती हूँ कि जब मैं थक जाऊँ, तो तुम मेरी थकान समझो। जब तुम्हें परेशानी हो, तो मैं तुम्हारा साथ दूँ। यही तो शादी है।”
अमित उसकी बात को भावुकता समझकर टाल देता।
धीरे-धीरे बातचीत कम होने लगी।
नेहा अपनी परेशानियाँ बताने से बचने लगी, क्योंकि हर बातचीत बहस में बदल जाती थी।
अमित को लगता था कि नेहा पहले जैसी नहीं रही। वह कम बोलती थी, मुस्कुराना कम कर चुकी थी और छोटी-छोटी बातों पर चुप हो जाती थी।
लेकिन उसने कभी यह समझने की कोशिश नहीं की कि नेहा के व्यवहार में बदलाव क्यों आया है।
एक दिन कार्यालय में नेहा की तबीयत खराब हो गई। काम का दबाव, लगातार थकान और घर की चिंता के कारण वह बहुत परेशान थी।
उसने अमित को फोन करके कहा, “अमित, आज मेरी तबीयत ठीक नहीं है। क्या तुम घर लौटते समय दवा लेते आ सकते हो?”
अमित ने कहा, “आज मेरी एक जरूरी बैठक है। तुम ऑनलाइन मँगवा लो।”
नेहा ने कहा, “ठीक है।”
उसने फोन रख दिया।
उस दिन उसे दवा मिल गई, लेकिन उसके मन में एक खालीपन और बढ़ गया।
उसे एहसास हुआ कि वह अपने पति से बहुत बड़ी चीज नहीं माँग रही थी। वह केवल इतना चाहती थी कि उसकी परेशानी में कोई उसका साथ दे।
लेकिन अमित के लिए उसका हर अनुरोध एक अतिरिक्त जिम्मेदारी बन जाता था।
शादी को आठ महीने पूरे होने वाले थे।
नेहा ने कई बार अपने ससुराल के लोगों से अपनी परेशानियाँ साझा की थीं। कुछ दिन परिस्थितियाँ बेहतर होतीं, फिर वही पुरानी बातें शुरू हो जातीं।
एक दिन नेहा कार्यालय से लौटी तो सरला वर्मा ने उससे कहा, “बेटी, आज खाना बनाने में इतनी देर क्यों हो गई? अमित को भूख लगी है।”
नेहा ने थके हुए स्वर में कहा, “माँजी, आज कार्यालय में बहुत काम था। मैं अभी खाना बना देती हूँ।”
सरला वर्मा ने नाराज होकर कहा, “नौकरी करने का फैसला तुम्हारा है। लेकिन घर की जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकती। हमारे घर में बहुएँ इस तरह नहीं रहतीं।”
नेहा ने शांत रहने की कोशिश की।
उसने कहा, “माँजी, मैं घर की जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट रही। मैं बस चाहती हूँ कि अमित भी इसमें मेरा साथ दें।”
सरला वर्मा ने तुरंत जवाब दिया, “अब पति से घर के काम करवाओगी? हमारे घर में यह सब नहीं चलता।”
उसी समय अमित घर आ गया।
उसने माँ और नेहा को बहस करते देखा तो पूछा, “अब क्या हुआ?”
सरला वर्मा ने कहा, “तुम्हारी पत्नी को घर का काम करना बोझ लगता है। अब इसे हर काम में तुम्हारा साथ चाहिए।”
अमित ने नेहा की ओर देखकर कहा, “नेहा, तुम्हें बार-बार यही बात क्यों करनी होती है? तुम माँ के साथ तालमेल क्यों नहीं बैठा सकती?”
नेहा की आँखें भर आईं।
उसने कहा, “मैंने कितनी बार कोशिश की है, अमित। मैं घर का काम सीख रही हूँ। मैं नौकरी भी कर रही हूँ। लेकिन जब मैं तुमसे साथ देने के लिए कहती हूँ, तो तुम मुझे ही गलत ठहराते हो। क्या मेरी परेशानी तुम्हें दिखाई नहीं देती?”
अमित ने गुस्से में कहा, “अगर तुम्हें इस घर में इतनी परेशानी है, तो कुछ दिन अपने मायके जाकर रह लो। शायद वहाँ तुम्हें ज्यादा आराम मिलेगा।”
ये शब्द अमित ने गुस्से में कहे थे। शायद उसे लगा था कि नेहा रोएगी, फिर कुछ समय बाद सब सामान्य हो जाएगा।
लेकिन नेहा के लिए यह वाक्य बहुत गहरी चोट बन गया।
उसने अमित की ओर देखकर कहा, “मैं तुम्हारे साथ रहने आई थी, अमित। तुम्हारे घर में अपनी जगह बनाने आई थी। लेकिन हर बार जब मैं अपनी परेशानी बताती हूँ, तो मुझे मायके भेज देने की बात क्यों होती है?”
अमित चुप रहा।
नेहा ने आगे कहा, “मैंने इस रिश्ते को बचाने की पूरी कोशिश की है। लेकिन रिश्ता केवल एक व्यक्ति की कोशिश से नहीं चलता।”
उसने अपने कमरे में जाकर जरूरी सामान रखा और अपने माता-पिता को फोन किया।
सुनीता शर्मा ने फोन उठाया तो नेहा ने कहा, “माँ, मैं घर आना चाहती हूँ। मैं बहुत थक गई हूँ।”
माँ ने तुरंत पूछा, “क्या हुआ, बेटी?”
नेहा ने कहा, “माँ, अभी मैं सब कुछ समझा नहीं पाऊँगी। बस मुझे कुछ समय चाहिए।”
सुनीता शर्मा ने कहा, “तुम आ जाओ। हम बैठकर बात करेंगे।”
नेहा ने ससुराल छोड़ा और अपने मायके चली गई।
लेकिन वह किसी दूसरे व्यक्ति के साथ भागकर नहीं गई थी। उसने अपने विवाह को तुरंत समाप्त करने का फैसला भी नहीं किया था। वह केवल उस वातावरण से कुछ समय के लिए दूर होना चाहती थी, जहाँ उसकी बात सुनने के बजाय उसे बार-बार गलत ठहराया जा रहा था।
फिर भी मोहल्ले में खबर फैलते देर नहीं लगी।
किसी ने कहा, “शर्मा जी की बेटी ससुराल छोड़कर आ गई।”
किसी ने कहा, “आजकल की लड़कियों में धैर्य ही नहीं है।”
किसी ने तो यह भी कह दिया, “पढ़ाई-लिखाई ज्यादा हो जाए तो यही होता है।”
लेकिन किसी ने अमित से यह नहीं पूछा कि उसने अपनी पत्नी को समझने के लिए आखिरी बार कब गंभीरता से कोशिश की थी।
मायके पहुँचने के बाद नेहा कई दिनों तक शांत रही।
सुनीता शर्मा उसे समझाने के लिए बार-बार यह नहीं कहती थीं कि उसे तुरंत ससुराल लौट जाना चाहिए। उन्होंने पहले उसकी बात सुनी।
एक दिन उन्होंने बेटी से पूछा, “नेहा, तुम क्या चाहती हो? क्या तुम यह रिश्ता खत्म करना चाहती हो, या तुम चाहती हो कि अमित तुम्हारी बात समझे और परिस्थितियाँ बदलें?”
नेहा ने कुछ देर सोचने के बाद कहा, “माँ, मैं अपना घर तोड़ना नहीं चाहती। मैं चाहती हूँ कि अमित मुझे समझे। मैं चाहती हूँ कि हम दोनों अपनी गलतियाँ स्वीकार करें। मैं यह भी मानती हूँ कि मुझे घर के काम और जिम्मेदारियों को बेहतर ढंग से व्यवस्थित करना सीखना है। लेकिन मैं अकेले सब कुछ नहीं कर सकती।”
सुनीता शर्मा ने पूछा, “अगर अमित अपनी सोच बदलने को तैयार हो जाए, तो क्या तुम उसके साथ फिर से कोशिश करना चाहोगी?”
नेहा ने कहा, “हाँ, लेकिन केवल वादों पर नहीं। मुझे व्यवहार में बदलाव चाहिए। मैं नहीं चाहती कि कुछ दिन सब ठीक रहे और फिर वही पुरानी स्थिति लौट आए।”
सुनीता शर्मा ने बेटी का हाथ पकड़कर कहा, “तुम्हारी बात उचित है। रिश्ते को बचाने की कोशिश करना अच्छी बात है, लेकिन अपनी परेशानी को हमेशा दबाते रहना जरूरी नहीं है। तुम्हें भी अपनी जिम्मेदारियाँ समझनी हैं और अमित को भी अपनी।”
उधर राजेश शर्मा ने अमित के पिता महेश वर्मा से बात करने का फैसला किया।
उन्होंने फोन करके कहा, “महेश जी, बच्चों के रिश्ते में परेशानी आ गई है। मैं नहीं चाहता कि हम बिना एक-दूसरे की बात समझे किसी नतीजे पर पहुँच जाएँ। हमें दोनों बच्चों को बैठाकर उनकी बातें सुननी चाहिए।”
महेश वर्मा ने कहा, “आप सही कह रहे हैं। मुझे भी पूरी बात जाननी चाहिए। मैं अमित से बात करता हूँ।”
पहली बार दोनों परिवारों ने यह तय किया कि वे केवल बहू को वापस लाने या बेटे को सही साबित करने की कोशिश नहीं करेंगे। वे पहले समस्या को समझेंगे।
जब महेश वर्मा ने अमित से पूरी बात पूछी, तो अमित ने शुरुआत में यही कहा, “पापा, नेहा छोटी-छोटी बातों को बड़ा बना देती है। मैं नौकरी करता हूँ। मुझे भी आराम चाहिए। घर के कामों के लिए माँ हैं।”
महेश वर्मा ने पूछा, “और नेहा नौकरी नहीं करती?”
अमित ने कहा, “करती है।”
“तो उसे भी आराम की जरूरत होती होगी?”
अमित ने कहा, “हाँ, लेकिन घर का काम भी तो करना पड़ता है।”
महेश वर्मा ने गंभीर स्वर में पूछा, “सिर्फ नेहा को या तुम्हें भी?”
अमित चुप हो गया।
महेश वर्मा ने आगे कहा, “बेटा, जब तुम छोटे थे, तब तुम्हारी माँ ने तुम्हारे लिए सब कुछ किया। तुम्हें पढ़ाया, तुम्हारा ध्यान रखा और घर संभाला। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तुम्हारी पत्नी भी उसी तरह बिना किसी सहारे के सब कुछ करे। तुम्हारी माँ ने घर के काम किए, इसलिए तुम उन कामों से अनजान रहे। यह तुम्हारी गलती से ज्यादा हमारी परवरिश की कमी थी। लेकिन अब जब तुम बड़े हो गए हो, तो अपनी जिम्मेदारी समझना तुम्हारा काम है।”
अमित ने धीमे स्वर में कहा, “पापा, मैंने कभी नहीं सोचा था कि बात इतनी बढ़ जाएगी।”
महेश वर्मा ने उत्तर दिया, “यही तो समस्या है। तुमने सोचा ही नहीं। तुम्हें लगा कि शादी के बाद सब अपने आप ठीक हो जाएगा। लेकिन विवाह कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है, जिसमें पत्नी आ जाए और तुम्हारी जिंदगी बिना किसी बदलाव के चलती रहे।”
अमित पहली बार शांत होकर सुन रहा था।
उसके पिता ने कहा, “तुम्हें अपनी पत्नी से शिकायत हो सकती है। तुम्हारी माँ को भी उससे कुछ अपेक्षाएँ हो सकती हैं। लेकिन किसी रिश्ते में केवल शिकायत करने से समाधान नहीं निकलता। तुम्हें यह भी देखना होगा कि तुम स्वयं क्या कर रहे हो।”
अमित ने पूछा, “तो अब मुझे क्या करना चाहिए?”
महेश वर्मा ने कहा, “पहले यह स्वीकार करो कि तुम्हारी पत्नी की परेशानी वास्तविक हो सकती है। फिर उससे बात करो। उसे केवल वापस आने के लिए मत कहो। उसे यह भरोसा दो कि तुम दोनों मिलकर अपनी जिंदगी बदलने के लिए तैयार हो।”
अमित उस दिन बहुत देर तक सोचता रहा।
उसे याद आया कि नेहा ने उससे कितनी बार मदद माँगी थी। हर बार उसने अपनी थकान का हवाला देकर बात टाल दी थी।
उसे यह भी याद आया कि जब नेहा अपनी परेशानी बताती थी, तो वह उसे समझने के बजाय कहता था कि वह बात बढ़ा रही है।
अब उसे पहली बार एहसास हुआ कि जिस रिश्ते को वह सामान्य समझ रहा था, उसमें उसकी पत्नी लगातार अकेली पड़ती जा रही थी।
कुछ दिनों बाद दोनों परिवारों की सहमति से नेहा और अमित की मुलाकात एक पारिवारिक परामर्शदाता की उपस्थिति में तय हुई।
बैठक में नेहा, अमित और उनके माता-पिता मौजूद थे।
परामर्शदाता ने दोनों से कहा, “यह बैठक किसी एक को दोषी ठहराने के लिए नहीं है। इसका उद्देश्य यह समझना है कि आपके रिश्ते में समस्या कहाँ पैदा हुई और क्या आप दोनों इसे सुधारने के लिए तैयार हैं।”
सबसे पहले नेहा ने अपनी बात रखी।
उसने कहा, “मैं मानती हूँ कि शादी के बाद मुझे कई नए काम सीखने थे। मैं सीखने के लिए तैयार भी थी। लेकिन मुझे हर समय अपनी सास से तुलना किए जाने और पति से सहयोग न मिलने की परेशानी थी। मैं चाहती थी कि अमित मेरी बात सुने और घर की जिम्मेदारियाँ बाँटने के लिए तैयार हो।”
परामर्शदाता ने अमित से पूछा, “आप इस बारे में क्या सोचते हैं?”
अमित ने कुछ देर चुप रहने के बाद कहा, “मुझे लगता था कि घर के काम मुख्य रूप से पत्नी की जिम्मेदारी हैं। मैं नौकरी करके घर आता था तो आराम करना चाहता था। मैंने यह नहीं सोचा कि नेहा भी नौकरी करके थकती होगी। जब वह अपनी परेशानी बताती थी, तो मुझे लगता था कि वह मेरी माँ से शिकायत कर रही है। मैंने उसकी बात को ठीक से समझने की कोशिश नहीं की।”
नेहा ने उसकी ओर देखा।
अमित ने आगे कहा, “मुझे यह भी लगता था कि अगर मैं कभी कोई काम कर दूँ, तो मैं उसकी मदद कर रहा हूँ। अब समझ में आ रहा है कि यह केवल उसकी जिम्मेदारी नहीं थी। मुझे भी घर संभालना सीखना चाहिए था।”
सरला वर्मा ने कहा, “मैंने भी नेहा की तुलना अपने समय से की। मुझे लगा कि जो काम मैंने किए, वही उसे भी करने चाहिए। मैंने यह नहीं सोचा कि उसका जीवन और परिस्थितियाँ मुझसे अलग हैं। मुझे उसे सीखने का समय देना चाहिए था।”
सुनीता शर्मा ने भी अपनी गलती स्वीकार की।
उन्होंने कहा, “हमने अपनी बेटी को पढ़ाई और नौकरी के लिए तैयार किया, लेकिन उसे विवाह में अपनी बात सम्मानपूर्वक रखने और जिम्मेदारियाँ बाँटने की समझ देने पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। हमने अपने बेटे को भी घर के कामों में भागीदारी करना नहीं सिखाया। हमें अपनी परवरिश के इस हिस्से पर विचार करना चाहिए।”
परामर्शदाता ने कहा, “गलतियाँ स्वीकार करना एक अच्छी शुरुआत है। लेकिन केवल माफी माँगने से समस्या हल नहीं होगी। आप लोगों को अपनी आदतों में भी बदलाव लाना होगा।”
उन्होंने नेहा और अमित से कहा कि वे घर की जिम्मेदारियों, नौकरी, निजी समय और परिवार के साथ व्यवहार को लेकर स्पष्ट बातचीत करें।
दोनों ने मिलकर कुछ निर्णय लिए।
वे घर के कामों का बँटवारा अपनी सुविधा और समय के अनुसार करेंगे। खाना बनाने और सफाई की जिम्मेदारी केवल नेहा की नहीं होगी। दोनों अपने कामों की योजना बनाएँगे और जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे का साथ देंगे।
अमित यह भी समझने की कोशिश करेगा कि नेहा की असहमति का अर्थ उसके माता-पिता का अपमान करना नहीं है।
नेहा भी अपनी परेशानी को दबाकर रखने के बजाय समय पर बातचीत करेगी और अमित की बात सुनने के लिए भी तैयार रहेगी।
सरला वर्मा ने वादा किया कि वह नेहा की तुलना अपने पुराने अनुभवों से नहीं करेंगी और उसे सीखने का समय देंगी।
इन निर्णयों के बाद नेहा ने तुरंत ससुराल लौटने की सहमति नहीं दी।
उसने स्पष्ट कहा, “मैं चाहती हूँ कि हम कुछ समय तक इन बदलावों पर काम करें। मैं केवल इसलिए वापस नहीं जाना चाहती कि लोग क्या कहेंगे। मैं वापस तभी जाना चाहती हूँ, जब मुझे लगे कि हम सचमुच मिलकर अपनी जिंदगी बेहतर बनाने की कोशिश कर रहे हैं।”
अमित ने इस बार उसकी बात का विरोध नहीं किया।
उसने कहा, “मैं समझता हूँ। मैं तुम्हें जल्दी फैसला लेने के लिए मजबूर नहीं करूँगा। मैं अपने व्यवहार में बदलाव लाने की कोशिश करूँगा।”
नेहा ने उसकी बात सुनी, लेकिन इस बार उसने केवल वादे पर भरोसा करने के बजाय समय के साथ व्यवहार में बदलाव देखने का फैसला किया।
अगले कुछ सप्ताह अमित ने अपने जीवन में बदलाव लाने की कोशिश की।
उसने खाना बनाना सीखने के लिए घर पर अभ्यास शुरू किया। शुरुआत में कभी सब्जी में नमक ज्यादा हो जाता, तो कभी रोटी ठीक से नहीं बनती। लेकिन उसने काम छोड़ने के बजाय सीखना जारी रखा।
एक दिन उसने अपने पिता से कहा, “पापा, मुझे अब समझ में आता है कि माँ रोज कितना काम करती हैं। पहले मुझे लगता था कि घर में रहकर काम करना आसान होता है।”
महेश वर्मा ने जवाब दिया, “बेटा, किसी काम की कठिनाई तभी समझ आती है, जब हम उसे खुद करते हैं। लेकिन तुम्हें केवल अपनी पत्नी की परेशानी समझने के लिए ही नहीं, बल्कि अपने जीवन को आत्मनिर्भर बनाने के लिए भी यह सब सीखना चाहिए।”
उधर सरला वर्मा ने भी अपने व्यवहार पर ध्यान देना शुरू किया।
एक बार अमित ने रोटी बनाई तो वह पूरी तरह गोल नहीं बनी। सरला वर्मा के मुँह से निकल गया, “अरे, ऐसी रोटी कौन बनाता है?”
फिर वह रुक गईं।
उन्होंने खुद को सुधारते हुए कहा, “कोई बात नहीं, बेटा। अभ्यास से बेहतर हो जाएगी। मैंने भी सीखते समय गलतियाँ की थीं।”
अमित मुस्कुराया।
उसे एहसास हुआ कि जब यही बात नेहा से कही जाती थी, तो उसे कितना बुरा लगता होगा।
कुछ समय बाद नेहा और अमित फिर मिले।
अमित ने उससे कहा, “नेहा, मैंने बहुत कुछ सीखा है। मैं यह नहीं कहूँगा कि अब मैं पूरी तरह बदल गया हूँ, लेकिन अब मुझे समझ में आ रहा है कि मुझे क्या बदलना है। मैं चाहता हूँ कि हम दोनों अपने रिश्ते को एक मौका दें।”
नेहा ने पूछा, “और अगर आगे फिर कोई समस्या आई तो?”
अमित ने जवाब दिया, “तो हम बात करेंगे। मैं तुम्हारी बात सुने बिना तुम्हें गलत नहीं ठहराऊँगा। और अगर हम दोनों अकेले समाधान नहीं निकाल पाए, तो किसी योग्य परामर्शदाता की मदद लेंगे।”
नेहा ने कहा, “मुझे भी अपनी जिम्मेदारियों को बेहतर ढंग से समझना है। मैं चाहती हूँ कि हम दोनों एक-दूसरे की कमियों को गिनने के बजाय उन्हें सुधारने में मदद करें।”
इस बार उनकी बातचीत में पहले जैसा गुस्सा नहीं था।
कुछ समय तक दोनों ने अपने रिश्ते को सुधारने की कोशिश जारी रखी। जब नेहा को लगा कि अमित का व्यवहार केवल कुछ दिनों का बदलाव नहीं, बल्कि लगातार प्रयास का हिस्सा बन रहा है, तब उसने ससुराल लौटने का निर्णय लिया।
यह फैसला किसी के दबाव में नहीं, बल्कि अपनी समझ और परिस्थितियों को देखकर लिया गया था।
नेहा के लौटने के बाद घर में एक नई व्यवस्था शुरू हुई।
अमित ने अपनी नौकरी के समय के अनुसार घर के कामों की जिम्मेदारी ली। कभी वह खाना बनाता, कभी रसोई समेटता और कभी कपड़े धोने की जिम्मेदारी संभालता।
नेहा भी अपनी सुविधा के अनुसार घर के काम करती और जरूरत पड़ने पर अमित से बातचीत करती।
सरला वर्मा ने धीरे-धीरे अपनी अपेक्षाओं में बदलाव किया।
एक दिन नेहा ने खाना बनाया। सब्जी अच्छी बनी थी, लेकिन रोटियाँ थोड़ी मोटी थीं।
सरला वर्मा ने खाना खाते हुए कहा, “नेहा, सब्जी बहुत अच्छी बनी है। रोटियाँ भी पहले से बेहतर हैं। धीरे-धीरे तुम्हारा हाथ और अच्छा हो जाएगा।”
नेहा मुस्कुराई।
उसके लिए यह केवल रोटी की तारीफ नहीं थी। यह उस सम्मान का संकेत था, जिसकी उसे लंबे समय से जरूरत थी।
एक दिन अमित ने कार्यालय से लौटकर कहा, “नेहा, आज तुम आराम करो। खाना मैं बना लूँगा।”
नेहा ने आश्चर्य से पूछा, “तुम्हारी आज बैठक नहीं थी?”
अमित ने हँसते हुए कहा, “थी, लेकिन खत्म हो गई। और वैसे भी, खाना बनाना केवल तुम्हारा काम नहीं है।”
नेहा मुस्कुरा दी।
उसने कहा, “ठीक है, लेकिन अगर सब्जी में नमक ज्यादा हो गया तो शिकायत मत करना।”
अमित ने जवाब दिया, “और अगर रोटी गोल नहीं बनी तो माँ से मेरी शिकायत मत करना।”
दोनों हँस पड़े।
यह हँसी किसी बड़ी उपलब्धि का उत्सव नहीं थी। यह उन छोटी-छोटी बातों की वापसी थी, जो रिश्तों में भरोसा पैदा करती हैं।
अब भी उनके बीच मतभेद होते थे। कभी समय को लेकर, कभी खर्चों को लेकर और कभी परिवार के किसी निर्णय को लेकर।
लेकिन अब वे हर असहमति को रिश्ते की हार नहीं मानते थे।
वे सीख रहे थे कि एक अच्छा विवाह वह नहीं जिसमें कभी विवाद न हो, बल्कि वह है जिसमें दोनों लोग एक-दूसरे की बात सुनने, अपनी गलती स्वीकार करने और समाधान खोजने के लिए तैयार हों।
कुछ समय बाद रोहित और साक्षी की शादी भी तय हो गई।
शादी से पहले रोहित ने साक्षी से कहा, “मैं तुम्हें एक बात बताना चाहता हूँ। मुझे पहले लगता था कि घर के काम मुख्य रूप से पत्नी की जिम्मेदारी होते हैं। लेकिन अब मुझे समझ में आ गया है कि यह सोच सही नहीं है। मैंने अपने घर में भी बहुत कुछ सीखा है।”
साक्षी ने पूछा, “क्या बदला?”
रोहित ने कहा, “मैंने अपने कपड़े खुद धोने, खाना बनाने और घर व्यवस्थित रखने की आदत डाली है। शुरुआत में मुश्किल लगी, लेकिन अब समझ में आता है कि यह किसी पर एहसान करना नहीं है। यह अपनी जिम्मेदारी है।”
साक्षी मुस्कुराई।
उसने कहा, “मुझे यह सुनकर खुशी हुई। मैं भी तुम्हारे साथ मिलकर घर संभालना चाहती हूँ। मुझे यह उम्मीद नहीं कि तुम्हें हर काम पहले से आता हो, लेकिन मैं चाहती हूँ कि हम दोनों सीखने के लिए तैयार रहें।”
रोहित ने कहा, “हम दोनों सीखेंगे। और अगर कभी किसी बात पर असहमति हुई, तो उसे मन में रखने के बजाय बात करेंगे।”
शादी के बाद दोनों ने अपने समय और जरूरतों के अनुसार घर के काम बाँट लिए।
कभी रोहित खाना बनाता, तो कभी साक्षी। कभी साक्षी घर की खरीदारी करती, तो कभी रोहित। जिस दिन किसी एक का काम ज्यादा होता, दूसरा अतिरिक्त जिम्मेदारी उठा लेता।
एक दिन सुनीता शर्मा उनके घर गईं। उन्होंने देखा कि रोहित रसोई में खाना बना रहा था और साक्षी अपने विद्यालय की एक जरूरी फाइल तैयार कर रही थी।
सुनीता शर्मा ने हँसते हुए कहा, “रोहित, अब तो तुम अच्छे रसोइए बन गए हो!”
रोहित ने जवाब दिया, “माँ, अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है। लेकिन कम से कम अब मुझे यह तो पता है कि खाना अपने आप मेज पर नहीं पहुँचता।”
सभी हँस पड़े।
सुनीता शर्मा की आँखों में संतोष था।
उन्हें लगा कि अगर उन्होंने यह बात पहले समझ ली होती, तो शायद नेहा को इतनी परेशानी नहीं झेलनी पड़ती।
लेकिन उन्होंने यह भी समझ लिया था कि अपनी गलती स्वीकार करने का सबसे अच्छा तरीका केवल पछतावा करना नहीं, बल्कि आगे बेहतर व्यवहार करना है।
एक दिन विमला देवी और कमला देवी फिर से सुनीता शर्मा के घर आईं।
बातों-बातों में नेहा का जिक्र निकल आया।
विमला देवी ने पूछा, “सुना था कि नेहा शादी के कुछ ही महीनों बाद मायके चली गई थी। अब सब ठीक है क्या?”
सुनीता शर्मा ने कहा, “हाँ, अब दोनों मिलकर अपना रिश्ता सुधारने की कोशिश कर रहे हैं।”
कमला देवी ने कहा, “लेकिन बहू को इतनी जल्दी घर छोड़कर नहीं जाना चाहिए था। हमारे जमाने में तो ऐसी बातें सहन कर ली जाती थीं।”
सुनीता शर्मा ने उनकी ओर देखकर शांत स्वर में कहा, “हमारे जमाने में बहुत-सी अच्छी बातें थीं, लेकिन कुछ ऐसी बातें भी थीं जिन्हें बदलने की जरूरत थी। पहले कई महिलाएँ अपनी परेशानी कह नहीं पाती थीं। इसका मतलब यह नहीं कि उनकी जिंदगी में परेशानियाँ नहीं थीं।”
विमला देवी ने पूछा, “तो क्या अब बहू को हर बात पर अपने पति से बहस करनी चाहिए?”
सुनीता शर्मा ने उत्तर दिया, “नहीं, हर बात पर बहस करना भी ठीक नहीं है। लेकिन हर बात पर चुप रहना भी ठीक नहीं। रिश्ते में दोनों को अपनी बात रखने और दूसरे की बात सुनने का अधिकार होना चाहिए।”
कमला देवी ने कहा, “लेकिन घर का काम तो आखिर बहू को ही संभालना पड़ता है।”
सुनीता शर्मा ने मुस्कुराकर कहा, “घर बहू का अकेले का नहीं होता। उसमें पति भी रहता है, बच्चे भी रहते हैं और परिवार के दूसरे सदस्य भी रहते हैं। फिर जिम्मेदारी केवल बहू की क्यों?”
विमला देवी ने कहा, “लेकिन पुरुषों को घर के कामों की आदत कहाँ होती है?”
सुनीता शर्मा ने उत्तर दिया, “तो आदत डालनी चाहिए। जैसे लड़कियों को बचपन से घर के काम सिखाए जाते हैं, वैसे ही लड़कों को भी सिखाना चाहिए। कोई बच्चा पैदा होते ही रोटी बनाना या झाड़ू लगाना नहीं जानता। दोनों सीखते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि हम किसे सीखने का अवसर देते हैं।”
कुछ पल के लिए कमरे में शांति छा गई।
फिर सुनीता शर्मा ने आगे कहा, “मैं यह नहीं कहती कि हर टूटते विवाह की वजह घर के काम होते हैं। रिश्ते टूटने के कई कारण हो सकते हैं। कभी विचार नहीं मिलते, कभी भरोसा टूटता है, कभी अपमान या हिंसा होती है और कभी दोनों लोग अपनी समस्याओं का समाधान नहीं निकाल पाते। लेकिन जहाँ समस्या का कारण जिम्मेदारियों का असमान बँटवारा और एक-दूसरे को न समझना हो, वहाँ बदलाव की शुरुआत घर से ही हो सकती है।”
विमला देवी ने धीरे से कहा, “तुम्हारी बात में दम तो है। हम अक्सर बहू को ही दोष देते हैं, लेकिन बेटे से सवाल पूछना भूल जाते हैं।”
सुनीता शर्मा ने कहा, “क्योंकि हमने बचपन से ही लड़कों को यह भरोसा दिया है कि घर का काम कोई दूसरा करेगा। अब समय है कि हम उन्हें यह सिखाएँ कि आत्मनिर्भरता केवल पैसे कमाने का नाम नहीं है। अपने जीवन और अपने घर की जिम्मेदारी उठाना भी आत्मनिर्भरता है।”
उस दिन दोनों महिलाएँ घर से निकलीं तो उनके मन में एक नया विचार था।
शायद अगली बार जब वे किसी बहू के मायके चले जाने की बात सुनेंगी, तो तुरंत फैसला सुनाने से पहले यह जानने की कोशिश करेंगी कि आखिर उस घर में हुआ क्या था।
समय बीतता गया।
नेहा और अमित अपने रिश्ते को बेहतर बनाने में लगे रहे। रोहित और साक्षी ने भी अपने जीवन में बराबरी और साझेदारी को महत्व दिया।
राजेश शर्मा और सुनीता शर्मा अब बच्चों की परवरिश को लेकर दूसरी तरह से सोचने लगे थे।
वे अपने आसपास के माता-पिता से कहते कि बच्चों को केवल अच्छे विद्यालय में भेजना और अच्छी नौकरी के योग्य बनाना ही पर्याप्त नहीं है।
उन्हें जीवन जीना भी सिखाना चाहिए।
बेटियों को खाना बनाना, कपड़े धोना और घर व्यवस्थित रखना सिखाया जाए, तो बेटों को भी यही काम सिखाए जाएँ।
बेटों को यह समझाया जाए कि पत्नी उनके जीवन की साथी है, उनकी माँ का दूसरा रूप नहीं।
हर महिला की आदतें, पसंद, क्षमता और अनुभव अलग होते हैं। किसी पत्नी की तुलना उसकी सास या ननद से करना उचित नहीं है।
इसी तरह बेटियों को भी यह समझाया जाए कि विवाह में केवल अधिकारों की बात करना पर्याप्त नहीं है। अपनी जिम्मेदारियाँ निभाना, दूसरे की बात सुनना, गलती स्वीकार करना और उचित संवाद करना भी उतना ही जरूरी है।
पति-पत्नी दोनों को यह सीखना चाहिए कि असहमति होने का अर्थ यह नहीं कि सामने वाला दुश्मन है।
और सबसे जरूरी बात, बच्चों को यह सिखाना चाहिए कि सम्मान किसी एक पक्ष की जिम्मेदारी नहीं है।
जिस तरह एक बहू से उम्मीद की जाती है कि वह नए परिवार को अपनाए, उसी तरह परिवार को भी उसे अपनाने का प्रयास करना चाहिए।
जिस तरह एक पत्नी से उम्मीद की जाती है कि वह पति की परिस्थितियों को समझे, उसी तरह पति को भी पत्नी की परिस्थितियों को समझना चाहिए।
किसी भी रिश्ते में एक व्यक्ति हमेशा देता रहे और दूसरा हमेशा लेता रहे, तो समय के साथ थकान और दूरी पैदा हो सकती है।
रिश्ता तभी मजबूत होता है, जब दोनों लोग एक-दूसरे के लिए जगह बनाते हैं।
सीख:
शादी के बाद किसी लड़की का घर छोड़कर चले जाना हमेशा उसकी असहनशीलता का प्रमाण नहीं होता। उसी तरह हर वैवाहिक विवाद में लड़के या उसके परिवार को ही दोषी ठहराना भी उचित नहीं है। किसी भी रिश्ते के बारे में निर्णय लेने से पहले पूरी परिस्थिति समझना जरूरी है।
शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी पाना नहीं, बल्कि बेहतर इंसान बनना भी है।
बेटियों को आत्मनिर्भर बनाना अच्छी बात है, लेकिन बेटों को जिम्मेदार बनाना भी उतना ही आवश्यक है।
घर के काम किसी एक लिंग की जिम्मेदारी नहीं हैं। वे जीवन जीने के जरूरी कौशल हैं, जिन्हें हर बच्चे को सीखना चाहिए।
और विवाह का सबसे महत्वपूर्ण नियम यह है कि पति-पत्नी एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करने के लिए नहीं, बल्कि एक-दूसरे का साथ देने के लिए जीवन में आते हैं।
क्योंकि घर केवल दीवारों, सामान और रिश्तों के नामों से नहीं बनता। घर तब बनता है, जब वहाँ रहने वाले लोग एक-दूसरे की थकान समझते हैं, गलतियों को सुधारने का अवसर देते हैं और जिम्मेदारियों को मिलकर निभाते हैं।
इसलिए अगली बार जब किसी के वैवाहिक रिश्ते में परेशानी की खबर सुनें, तो यह कहने से पहले कि “आजकल की लड़कियों में सहनशीलता नहीं रही”, एक बार यह भी पूछिएगा कि क्या हमने अपने बेटों को एक अच्छा जीवनसाथी बनना सिखाया है?
क्योंकि बेटी को ससुराल के लिए तैयार करना जितना जरूरी है, बेटे को किसी की बेटी का सम्मान करना सिखाना भी उतना ही जरूरी है।
एक बार इस बात पर जरूर सोचिएगा।

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