अपना घर

 

Emotional family reconciliation between a daughter-in-law, mother-in-law, and husband in a warm Indian home


शहर के पुराने और प्रतिष्ठित इलाके में बना “शांति निवास” बाहर से देखने पर किसी महल से कम नहीं था। ऊंचे लोहे का गेट, बड़ा सा बगीचा, संगमरमर की सीढ़ियां और अंदर कीमती सामान से सजा हुआ विशाल घर।


इस घर में रहने वाले रघुवीर प्रसाद शहर के जाने-माने कारोबारी थे। उनके दो बेटे थे—अमित और रोहन।


अमित बड़ा बेटा था। शांत स्वभाव का, जिम्मेदार और मेहनती। पिता के साथ कारोबार संभालने के बाद उसने अपनी मेहनत से व्यापार को काफी आगे बढ़ाया था।


रोहन छोटा बेटा था। पढ़ाई में अच्छा था, लेकिन नौकरी या कारोबार में उसका मन ज्यादा नहीं लगता था। उसे लगता था कि पिता और बड़ा भाई हैं ही, फिर उसे इतनी चिंता करने की क्या जरूरत है।


रोहन की पत्नी सिया इस घर में शादी करके आई थी।


सिया बहुत साधारण परिवार से थी। उसके पिता एक छोटी सी दुकान चलाते थे। उन्होंने अपनी बेटी को हमेशा यही सिखाया था कि घर बड़ा हो या छोटा, इंसान की इज्जत उसके व्यवहार से होती है।


लेकिन शादी के बाद सिया को धीरे-धीरे समझ आने लगा कि शांति निवास में रहने के लिए सिर्फ अच्छा व्यवहार काफी नहीं था।


यहां हर चीज की अपनी जगह थी।


कौन कब उठेगा।


कौन किस कमरे में बैठेगा।


किस दिन कौन सा खाना बनेगा।


किससे कितनी देर बात करनी है।


यहां तक कि घर के किस कमरे में कौन कितनी देर बैठ सकता है, इसका भी अनकहा नियम था।


सिया अपने कमरे की अलमारी में कपड़े रख रही थी, तभी उसकी सास सविता देवी कमरे में आईं।


सविता देवी ने अलमारी की तरफ देखते हुए कहा,

“सिया, ये तुम्हारी साड़ियां यहां मत रखो।”


सिया ने पलटकर पूछा,

“मांजी, क्यों? अलमारी में तो काफी जगह है।”


सविता देवी ने कहा,

“ये हिस्सा रोहन के कपड़ों के लिए है। तुम्हारे कपड़े नीचे वाली अलमारी में रखो।”


सिया ने चुपचाप अपनी साड़ियां निकालनी शुरू कर दीं।


उसी समय रोहन कमरे में आया।


रोहन ने पूछा,

“क्या हुआ सिया?”


सिया ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

“कुछ नहीं। मांजी कह रही हैं कि मेरे कपड़े नीचे वाली अलमारी में रख दूं।”


रोहन ने मां की तरफ देखा और कहा,

“मां, अलमारी तो दोनों की है। रहने दीजिए।”


सविता देवी तुरंत बोलीं,

“तुम बीच में मत बोलो रोहन। घर कैसे चलाना है, मुझे पता है।”


रोहन चुप हो गया।


सिया ने भी कोई जवाब नहीं दिया।


वह जानती थी कि बात बढ़ाने से उसे ही गलत समझा जाएगा।


लेकिन उसके मन में पहली बार एक सवाल उठा—


“क्या सच में यह कमरा मेरा भी है?”


वह सवाल छोटा था, लेकिन उसके भीतर धीरे-धीरे बहुत बड़ा होता गया।



कुछ दिनों बाद घर में रिश्तेदार आने वाले थे।


सविता देवी ने पूरे घर की सफाई करवानी शुरू कर दी।


नौकर-चाकर काम में लगे थे।


सिया भी रसोई में लगातार काम कर रही थी।


उसने कई तरह के पकवान तैयार किए।


जब सारे काम पूरे हो गए तो वह अपने कमरे में जाकर थोड़ी देर बैठने लगी।


तभी सविता देवी ने दरवाजा खोलकर कहा,

“सिया, तुम यहां बैठी हो?”


सिया ने कहा,

“मांजी, काम पूरा हो गया था, इसलिए थोड़ी देर बैठ गई।”


सविता देवी ने कहा,

“मेहमान आने वाले हैं। बहू घर में बैठकर आराम करे, अच्छा नहीं लगता। नीचे आओ।”


सिया तुरंत उठ गई।


वह नीचे चली गई।


रसोई में पहुंचकर उसने देखा कि उसकी ननद नेहा आराम से सोफे पर बैठी मोबाइल चला रही थी।


सिया ने कुछ नहीं कहा।


लेकिन उसके मन में फिर वही सवाल आया—


“आराम सिर्फ बेटी कर सकती है और बहू नहीं?”



कुछ समय बाद घर में एक और घटना हुई।


सिया ने अपनी बचत से अपने कमरे के लिए एक छोटा सा सुंदर पौधा खरीदा।


वह पौधा उसे बहुत पसंद था।


उसने उसे खिड़की के पास रख दिया।


रोहन ने पौधे को देखकर कहा,

“बहुत सुंदर है। तुम्हें पौधे पसंद हैं?”


सिया मुस्कुराई और बोली,

“हां। मायके में भी मेरे कमरे में बहुत सारे पौधे थे।”


रोहन ने कहा,

“फिर तो यहां भी रखो।”


सिया ने कहा,

“रखूंगी।”


लेकिन अगले दिन वह पौधा कमरे से गायब था।


सिया ने नौकरानी से पूछा,

“रीना, मेरा पौधा कहां गया?”


रीना ने कहा,

“मालकिन ने उसे बाहर रखवा दिया है।”


सिया ने पूछा,

“क्यों?”


रीना ने धीरे से कहा,

“उन्होंने कहा कि कमरे में मिट्टी और पानी गिरता है।”


सिया कुछ पल चुप रही।


फिर उसने पौधा उठाया और वापस अपने कमरे में रख दिया।


लेकिन इस बार उसने खिड़की के पास नहीं, अलमारी के ऊपर रखा।


रोहन ने पूछा,

“वहां क्यों रखा?”


सिया ने मुस्कुराकर कहा,

“क्योंकि वहां शायद किसी को परेशानी नहीं होगी।”


रोहन ने उसकी आंखों में देखा।


उसे पहली बार लगा कि सिया की मुस्कान के पीछे कुछ टूट रहा है।



एक दिन रोहन ऑफिस से लौटकर कमरे में आया।


उसने देखा कि सिया चुपचाप अपने पुराने कपड़ों को एक बैग में रख रही थी।


रोहन ने पूछा,

“कहीं जा रही हो?”


सिया ने कहा,

“नहीं।”


रोहन ने फिर पूछा,

“तो सामान क्यों पैक कर रही हो?”


सिया ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा,

“मायके में मेरी छोटी बहन की शादी है। सोचा कुछ पुराने कपड़े उसे दे दूंगी।”


रोहन ने कहा,

“अच्छा।”


लेकिन उसे सिया के चेहरे पर अजीब सी उदासी दिखाई दी।


रोहन ने उसके पास बैठकर पूछा,

“सिया, सच बताओ। क्या हुआ है?”


सिया ने सिर हिलाकर कहा,

“कुछ नहीं।”


रोहन ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा,

“तुम मुझसे भी कुछ छिपाओगी?”


सिया की आंखें भर आईं।


उसने धीरे से कहा,

“रोहन, कभी-कभी लगता है कि मैं इस घर में रहती तो हूं, लेकिन इस घर का हिस्सा नहीं हूं।”


रोहन चौंक गया।


उसने पूछा,

“ऐसा क्यों कह रही हो?”


सिया ने कहा,

“क्योंकि यहां मेरी हर चीज किसी और की अनुमति से चलती है। मैं क्या पहनूं, कहां बैठूं, कमरे में क्या रखूं, कब आराम करूं… हर बात पर किसी न किसी की नजर रहती है।”


रोहन ने कहा,

“मां का स्वभाव थोड़ा सख्त है। तुम दिल पर मत लिया करो।”


सिया ने उसकी तरफ देखते हुए कहा,

“अगर हर बार मुझे ही दिल छोटा न करने के लिए कहा जाएगा, तो कभी कोई यह क्यों नहीं पूछेगा कि मेरा दिल दुखा किसने?”


रोहन के पास कोई जवाब नहीं था।


सिया ने फिर कहा,

“मैं तुम्हारी मां से लड़ना नहीं चाहती। मैं घर में सम्मान चाहती हूं।”


रोहन ने उसका हाथ दबाया और कहा,

“मैं बात करूंगा मां से।”


सिया ने सिर हिलाते हुए कहा,

“बात करना, लेकिन मेरे लिए नहीं। अपने लिए करना। क्योंकि अगर तुम हमेशा चुप रहोगे तो एक दिन तुम्हें भी समझ नहीं आएगा कि तुम्हारी पत्नी तुम्हारे पास रहते हुए भी तुमसे दूर क्यों हो गई।”


रोहन ने उस रात पहली बार महसूस किया कि समस्या छोटी-छोटी बातों की नहीं थी।


समस्या यह थी कि सिया को अपना होने का एहसास नहीं मिल रहा था।



अगले दिन रोहन ने अपनी मां से बात करने का फैसला किया।


रोहन ने कहा,

“मां, सिया को लगता है कि उसे इस घर में अपनापन नहीं मिलता।”


सविता देवी ने तुरंत जवाब दिया,

“किसने कहा उससे कि वह इस घर की मालकिन है?”


रोहन चुप रह गया।


सविता देवी ने आगे कहा,

“मैंने भी शादी के बाद बहुत कुछ सहा था। क्या मैंने कभी शिकायत की?”


रोहन ने शांत स्वर में कहा,

“मां, आपने जो सहा, जरूरी नहीं कि सिया भी वही सहे।”


सविता देवी को यह बात बुरी लगी।


उन्होंने कहा,

“अब तुम्हारी पत्नी तुम्हें अपनी मां के खिलाफ भी खड़ा करने लगी?”


रोहन ने कहा,

“मैं किसी के खिलाफ नहीं हूं मां। मैं बस चाहता हूं कि घर में सबकी इज्जत हो।”


सविता देवी ने नाराज होकर कहा,

“तुम्हें जो ठीक लगे करो।”


रोहन वहां से चला गया।


उसे लगा था कि बात करने से कुछ सुधार होगा।


लेकिन स्थिति और बिगड़ गई।



कुछ दिनों तक सविता देवी सिया से बहुत कम बात करने लगीं।


घर का माहौल शांत था, लेकिन उस शांति में अपनापन नहीं था।


एक दिन सिया रसोई में खाना बना रही थी।


सविता देवी वहां आईं और बोलीं,

“आज खाना थोड़ा ज्यादा बना लेना।”


सिया ने पूछा,

“किसके लिए मांजी?”


सविता देवी ने कहा,

“अमित के कुछ दोस्त आ रहे हैं।”


सिया ने कहा,

“ठीक है।”


उसने खाना बनाना शुरू कर दिया।


काफी देर तक मेहनत करने के बाद उसने पूरा खाना तैयार कर दिया।


लेकिन जब मेहमान आए तो सविता देवी ने सबके सामने कहा,

“सिया, तुमने दाल में नमक थोड़ा ज्यादा कर दिया है।”


सिया ने चुपचाप सिर झुका लिया।


एक रिश्तेदार ने कहा,

“कोई बात नहीं, थोड़ा ज्यादा नमक तो हो ही जाता है।”


सविता देवी बोलीं,

“इसे सीखना चाहिए। घर की बहू से इतनी भी गलती नहीं होनी चाहिए।”


सिया ने कोई जवाब नहीं दिया।


लेकिन उसकी आंखें नम हो गईं।


वह रसोई में चली गई।


वहां जाकर उसने गैस बंद की और कुछ देर दीवार के सहारे खड़ी रही।


उसी समय रोहन वहां आया।


उसने पूछा,

“तुम रो रही हो?”


सिया ने जल्दी से आंखें पोंछते हुए कहा,

“नहीं।”


रोहन ने कहा,

“सिया, मुझे सब पता है।”


सिया ने धीमे स्वर में कहा,

“मुझे किसी से लड़ना नहीं है रोहन।”


रोहन ने कहा,

“तो फिर?”


सिया ने कहा,

“मैं यहां रहूंगी। लेकिन एक दिन अपना छोटा सा घर जरूर बनाऊंगी। ऐसा घर जहां किसी को यह पूछने की जरूरत न पड़े कि मैं अपनी अलमारी में क्या रख रही हूं।”


रोहन ने उसकी बात ध्यान से सुनी।


उसने कहा,

“मैं तुम्हें वह घर दूंगा।”


सिया ने मुस्कुराकर कहा,

“घर सिर्फ दीवारों से नहीं बनता रोहन। उसमें सम्मान भी होना चाहिए।”



रोहन ने उसी दिन एक फैसला लिया।


उसने अपने बड़े भाई अमित से बात की।


रोहन ने कहा,

“भैया, मुझे आपसे एक मदद चाहिए।”


अमित ने कहा,

“बोलो।”


रोहन ने कहा,

“मैं अपनी पत्नी के साथ अलग रहना चाहता हूं।”


अमित कुछ पल चुप रहा।


फिर उसने पूछा,

“क्या सिया ने तुमसे ऐसा कहा?”


रोहन ने कहा,

“नहीं। यह मेरा फैसला है।”


अमित ने पूछा,

“क्यों?”


रोहन ने कहा,

“क्योंकि मैं चाहता हूं कि मैं अपनी जिंदगी की जिम्मेदारी खुद उठाऊं। अभी तक मैं इस घर में रहकर बहुत कुछ मुफ्त में पा रहा हूं। लेकिन अपनी पत्नी को यह एहसास नहीं दे पा रहा कि हमारा भी कोई अपना संसार है।”


अमित ने उसकी तरफ देखा।


फिर मुस्कुराकर कहा,

“तुम्हें पता है अलग रहना आसान नहीं होगा?”


रोहन ने कहा,

“पता है।”


अमित ने कहा,

“किराया देना होगा। बिजली का बिल देना होगा। राशन खरीदना होगा। बीमारी में खुद संभालना होगा। कोई नौकर हर वक्त नहीं होगा।”


रोहन ने कहा,

“फिर भी मैं कोशिश करना चाहता हूं।”


अमित ने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा,

“तो मैं तुम्हें रोकूंगा नहीं।”


रोहन ने पूछा,

“मां नाराज होंगी।”


अमित ने कहा,

“उन्हें समझाना मेरा काम है। लेकिन एक बात याद रखना—अलग घर बनाने का मतलब रिश्ते तोड़ना नहीं होता।”


रोहन की आंखें भर आईं।


उसने कहा,

“भैया, आपने हमेशा मेरा साथ दिया है।”


अमित मुस्कुराया और बोला,

“अब तुम्हें खुद अपना साथ देना सीखना है।”



रोहन और सिया ने शहर के एक साधारण इलाके में छोटा सा किराए का फ्लैट ले लिया।


फ्लैट बहुत बड़ा नहीं था।


दो छोटे कमरे, एक छोटी रसोई, एक संकरी बालकनी और बाहर सड़क का लगातार शोर।


सिया ने पहली बार उस खाली घर को देखा तो उसकी आंखों में चमक आ गई।


रोहन ने पूछा,

“क्या हुआ?”


सिया ने कहा,

“कुछ नहीं।”


रोहन ने मुस्कुराकर पूछा,

“फिर इतनी खुश क्यों हो?”


सिया ने कमरे की दीवार को छूते हुए कहा,

“क्योंकि इस दीवार पर पहली कील हम अपनी मर्जी से ठोकेंगे।”


रोहन हंस पड़ा।


उसने कहा,

“और पौधा?”


सिया ने तुरंत कहा,

“खिड़की के ठीक पास।”


रोहन ने कहा,

“और अगर किसी ने कहा कि वहां मत रखना?”


सिया मुस्कुराई और बोली,

“तो मैं कहूंगी—यह हमारा घर है।”



नया जीवन आसान नहीं था।


पहले महीने ही खर्च उम्मीद से ज्यादा हो गया।


रोहन को पहली बार बिजली का बिल देखकर चिंता हुई।


सिया ने बिल हाथ में लेते हुए कहा,

“इतना तो नहीं है।”


रोहन ने कहा,

“पहले कभी खुद नहीं भरा था, इसलिए ज्यादा लग रहा है।”


सिया ने कहा,

“कोई बात नहीं। धीरे-धीरे सीख जाएंगे।”


कुछ दिनों बाद रोहन की बाइक खराब हो गई।


मरम्मत के पैसे देने पड़े।


फिर सिया की फ्रीलांस नौकरी का एक भुगतान देर से आया।


दोनों ने मिलकर खर्चों की सूची बनाई।


रोहन ने कहा,

“इस महीने बाहर खाना बंद।”


सिया ने कहा,

“ठीक है।”


रोहन ने कहा,

“ऑनलाइन शॉपिंग बंद।”


सिया ने कहा,

“ठीक है।”


रोहन ने कहा,

“और…”


सिया हंसते हुए बोली,

“और तुम्हारी महंगी कॉफी भी बंद।”


रोहन भी हंस पड़ा।


उस छोटे से घर में पहली बार दोनों ने महसूस किया कि परेशानी जरूर है, लेकिन फैसला उनका अपना है।



कुछ महीनों बाद रोहन की नौकरी में अच्छा प्रदर्शन हुआ।


उसे वेतन बढ़ने की खबर मिली।


वह घर पहुंचा तो सिया रसोई में चाय बना रही थी।


रोहन ने उत्साह से कहा,

“सिया!”


सिया ने बाहर आकर पूछा,

“क्या हुआ?”


रोहन ने कहा,

“मेरी सैलरी बढ़ गई।”


सिया के चेहरे पर खुशी आ गई।


उसने कहा,

“सच?”


रोहन ने सिर हिलाया।


सिया ने पूछा,

“कितनी?”


रोहन ने बताया।


सिया ने दोनों हाथ जोड़कर कहा,

“भगवान का शुक्र है।”


रोहन हंसते हुए बोला,

“तुम ऐसे खुश हो रही हो जैसे करोड़ों मिल गए हों।”


सिया ने कहा,

“मेरे लिए तो करोड़ों जैसे ही हैं।”


रोहन ने पूछा,

“क्यों?”


सिया ने कहा,

“क्योंकि पहली बार हमारी जिंदगी किसी और की कृपा से नहीं, हमारी मेहनत से थोड़ी बेहतर हुई है।”


रोहन चुप हो गया।


उसने सिया की बात अपने मन में रख ली।



एक साल बीत गया।


छोटा सा घर अब पहले जैसा खाली नहीं था।


दीवारों पर तस्वीरें थीं।


खिड़की के पास पौधे थे।


रसोई में सिया के हाथों की खुशबू थी।


बालकनी में दो कुर्सियां थीं, जहां दोनों बैठकर चाय पीते थे।


फर्नीचर महंगा नहीं था, लेकिन हर चीज उनकी पसंद की थी।


एक दिन अमित और उसकी पत्नी घर आए।


अमित ने चारों तरफ देखा।


उसने कहा,

“रोहन, तुमने घर बहुत सुंदर बना लिया।”


रोहन ने मुस्कुराकर कहा,

“भैया, चीजें कम हैं, लेकिन अपनी हैं।”


अमित ने सिया की तरफ देखा और कहा,

“अब खुश हो?”


सिया मुस्कुराई।


उसने कहा,

“बहुत।”


अमित ने कहा,

“मां अभी भी तुमसे नाराज हैं।”


सिया कुछ पल चुप रही।


फिर उसने कहा,

“मैं उनसे नाराज नहीं हूं।”


अमित ने पूछा,

“क्यों?”


सिया ने कहा,

“क्योंकि उन्होंने मुझे एक ऐसी चीज सिखा दी, जो शायद कोई स्कूल नहीं सिखा सकता—अपना घर और अपना सम्मान खुद बनाना।”


अमित मुस्कुरा दिया।



कुछ दिनों बाद सविता देवी अचानक उनके घर आ गईं।


रोहन दरवाजा खोलकर उन्हें देखकर चौंक गया।


उसने कहा,

“मां, आप?”


सविता देवी ने कहा,

“अंदर नहीं बुलाओगे?”


रोहन तुरंत किनारे हो गया।


“आइए मां।”


सविता देवी अंदर आईं।


उन्होंने घर को ध्यान से देखा।


उनकी नजर खिड़की के पास रखे उसी तरह के पौधों पर पड़ी।


उन्होंने पूछा,

“ये सब तुमने लगाए हैं?”


सिया ने कहा,

“जी मांजी।”


सविता देवी ने कहा,

“सुंदर हैं।”


यह सुनकर सिया चौंक गई।


सविता देवी कुछ देर चुप रहीं।


फिर उन्होंने कहा,

“सिया, मुझे तुमसे कुछ कहना है।”


सिया उनके सामने बैठ गई।


सविता देवी ने धीमे स्वर में कहा,

“मैंने हमेशा सोचा कि घर की बहू अगर मेरी बात मानेगी, तभी घर ठीक चलेगा।”


सिया चुप रही।


सविता देवी ने आगे कहा,

“लेकिन तुम्हारे जाने के बाद मुझे समझ आया कि घर सिर्फ नियमों से नहीं चलता।”


उनकी आवाज भर्रा गई।


“कभी-कभी हम अपने घर को संभालते-संभालते उसमें रहने वालों की सांसें ही रोक देते हैं।”


सिया की आंखें नम हो गईं।


सविता देवी ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा,

“मुझे माफ कर दो।”


सिया ने तुरंत उनका हाथ थाम लिया।


उसने कहा,

“मांजी, मैं आपसे नाराज नहीं हूं।”


सविता देवी ने कहा,

“लेकिन मैंने तुम्हें बहुत दुख दिया।”


सिया ने कहा,

“अब हम उस बात को यहीं छोड़ देते हैं।”


सविता देवी की आंखों से आंसू निकल आए।


उन्होंने कहा,

“तुमने मुझे बहू होकर नहीं, बेटी बनकर माफ किया।”


सिया ने मुस्कुराते हुए कहा,

“नहीं मांजी, मैंने आपको मां मानकर माफ किया है।”


रोहन दरवाजे के पास खड़ा यह सब देख रहा था।


उसकी आंखें भी नम थीं।



सविता देवी उठने लगीं तो सिया ने पूछा,

“मांजी, चाय पीकर जाइए।”


सविता देवी ने मुस्कुराकर कहा,

“अदरक वाली।”


सिया ने हंसते हुए कहा,

“आपको कैसे पता?”


सविता देवी बोलीं,

“मां हूं। इतनी तो खबर होनी चाहिए।”


तीनों हंस पड़े।


उस छोटे से घर में उस दिन कोई महंगा झूमर नहीं था।


कोई संगमरमर की सीढ़ियां नहीं थीं।


कोई बड़ा ड्राइंग रूम नहीं था।


लेकिन वहां एक ऐसी चीज थी जो बड़े से बड़े घर में भी हमेशा नहीं मिलती—


अपनापन।


रोहन ने बालकनी से बाहर देखा।


सड़क पर वही शोर था।


बच्चे खेल रहे थे।


दुकानदार आवाज लगा रहे थे।


गाड़ियां गुजर रही थीं।


लेकिन अब उसे वह शोर परेशान नहीं करता था।


उसे लगा जैसे पूरी दुनिया उससे कह रही हो—


“यह जगह छोटी जरूर है, लेकिन यह तुम्हारी है।”


सिया चाय लेकर आई और बोली,

“क्या सोच रहे हो?”


रोहन ने मुस्कुराकर कहा,

“सोच रहा हूं, इतने बड़े घर में रहकर भी मुझे कभी घर जैसा महसूस क्यों नहीं हुआ।”


सिया ने पूछा,

“और अब?”


रोहन ने उसके हाथ से चाय का कप लेते हुए कहा,

“अब समझ आया है कि घर की कीमत उसकी दीवारों से नहीं, उसमें रहने वालों के रिश्तों से होती है।”


सिया मुस्कुराई।


रोहन ने उसकी तरफ देखते हुए कहा,


“दूसरों के घर में मिली सुविधाएं हमें अमीर दिखा सकती हैं, लेकिन अपने छोटे से घर की मेहनत हमें सच में आत्मनिर्भर बनाती है।”


और उस दिन रोहन ने महसूस किया कि उसने सिर्फ एक छोटा सा घर नहीं बनाया था।


उसने अपनी पहचान, अपना सम्मान और अपने रिश्तों के लिए एक ऐसी जगह बनाई थी, जहां किसी को किसी की अनुमति लेकर सांस लेने की जरूरत नहीं थी।


क्योंकि अपना घर हमेशा बड़ा होना जरूरी नहीं होता…

बस उसमें अपना होने का एहसास होना चाहिए।


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