बेटे ने ठुकराया, संपत्ति पर हक जताया
“पिताजी, आपसे एक बात कहनी है। मैंने तय कर लिया है कि अब यह घर मेरे नाम कर दीजिए। आखिर मैं आपका इकलौता बेटा हूँ। कल को यह संपत्ति मुझे ही मिलने वाली है, तो फिर इसे अपने नाम करवाने में गलत क्या है?”
अभय की बात सुनकर रमेश बाबू कुछ पल तक अपने बेटे का चेहरा देखते रहे। जिस बेटे की पढ़ाई, नौकरी और खुशियों के लिए उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी खपा दी थी, आज वही बेटा उनसे उनके बुढ़ापे का आखिरी सहारा माँग रहा था।
रमेश बाबू ने अपनी पत्नी कमला की ओर देखा। कमला की आँखों में भी हैरानी थी। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि आखिर जिस बेटे को उन्होंने अच्छे संस्कार देकर बड़ा किया, उसके मन में ऐसी सोच कैसे आ गई।
“बेटा, यह घर केवल ईंट-पत्थरों से बना मकान नहीं है। इसे बनाने में हमारी पूरी जिंदगी की कमाई लगी है। तुम्हारी माँ ने अपने गहने तक बेच दिए थे, तब जाकर हम अपना घर खरीद पाए थे। तुम्हारे पिता ने कितने साल तक अपनी जरूरतें छोड़कर पैसे जोड़े, यह तुम नहीं जानते।”
रमेश बाबू ने भारी आवाज में कहा।
अभय ने बिना किसी भावुकता के जवाब दिया, “पिताजी, मैं आपकी मेहनत की इज्जत करता हूँ। लेकिन हर माँ-बाप अपनी संपत्ति अपने बच्चों के लिए ही तो जोड़ते हैं। जब आखिर में यह सब मुझे ही मिलने वाला है, तो अभी मेरे नाम करने में परेशानी क्या है?”
कमला देवी ने अपने बेटे की बात सुनकर धीमे स्वर में कहा, “बेटा, हमें तुम्हें कुछ देने से परेशानी नहीं है। लेकिन हमारे जीते-जी हम अपना एकमात्र सहारा कैसे छोड़ दें? कल को हमें किसी चीज की जरूरत पड़ी, तो हम किसके भरोसे रहेंगे?”
अभय ने तुरंत जवाब दिया, “माँ, मैं आपका बेटा हूँ। क्या मैं आपको सड़क पर छोड़ दूँगा? आप लोग मुझ पर भरोसा क्यों नहीं करते?”
उसकी बात सुनकर कमला देवी चुप हो गईं। माँ का दिल था। बेटे की मीठी बातों पर उनका भरोसा अब भी बाकी था। लेकिन रमेश बाबू के मन में एक अनजाना डर बैठ गया था।
उन्हें क्या पता था कि जिस दिन वह अपने बेटे की बात पर भरोसा करेंगे, उसी दिन उनके जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा शुरू हो जाएगी।
रमेश बाबू एक सरकारी विभाग में क्लर्क थे। उनकी तनख्वाह बहुत ज्यादा नहीं थी, लेकिन उन्होंने हमेशा ईमानदारी से अपने परिवार का पालन-पोषण किया था। उनकी पत्नी कमला देवी गृहिणी थीं। घर में एक बेटा अभय और एक बेटी पूजा थी।
रमेश बाबू की सबसे बड़ी इच्छा थी कि उनके दोनों बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त करें और अपने पैरों पर खड़े हों। वह नहीं चाहते थे कि उनके बच्चों को उन कठिनाइयों से गुजरना पड़े, जिनका सामना उन्होंने अपनी जिंदगी में किया था।
उन्होंने वर्षों तक एक-एक रुपया जोड़कर अपने बच्चों की पढ़ाई का इंतजाम किया। बेटी पूजा की शादी भी उन्होंने अपनी हैसियत के अनुसार अच्छे परिवार में की। शादी के लिए उन्होंने कर्ज नहीं लिया था, लेकिन उनकी जमा पूँजी का काफी हिस्सा खर्च हो गया था।
अब उनकी सारी उम्मीदें बेटे अभय पर टिकी थीं।
अभय पढ़ाई में अच्छा था। उसने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और एक बड़ी कंपनी में नौकरी पा ली। उसकी पहली तनख्वाह आई, तो वह मिठाई लेकर घर पहुँचा।
“माँ, यह मिठाई आपके लिए। आज मेरी जिंदगी का सबसे अच्छा दिन है। मेरी पहली तनख्वाह आ गई!”
अभय ने खुशी से कहा।
कमला देवी ने बेटे का माथा चूम लिया। उनकी आँखों में खुशी के आँसू थे।
“भगवान तुम्हें हमेशा खुश रखे, बेटा। तुमने हमारी मेहनत सफल कर दी।”
रमेश बाबू भी बहुत खुश थे। उन्हें लग रहा था कि अब धीरे-धीरे परिवार की आर्थिक स्थिति सुधर जाएगी। वह अपनी नौकरी के अंतिम वर्षों में थे और चाहते थे कि रिटायर होने से पहले कुछ बचत कर लें, ताकि बुढ़ापे में किसी पर निर्भर न रहना पड़े।
लेकिन अभय की महत्वाकांक्षाएँ तेजी से बढ़ रही थीं।
उसे अपने दोस्तों की महँगी गाड़ियाँ, बड़े-बड़े फ्लैट और विदेश यात्राएँ देखकर लगता था कि उसकी जिंदगी अभी बहुत छोटी है। उसकी नौकरी अच्छी थी, लेकिन वह जल्द से जल्द अमीर बनना चाहता था।
एक दिन उसने अपने पिता से कहा, “पिताजी, मैं अपना बिजनेस शुरू करना चाहता हूँ। नौकरी में रहकर कोई बहुत बड़ा आदमी नहीं बन सकता। अगर आप मेरा साथ दें, तो मैं कुछ ही सालों में हमारी जिंदगी बदल सकता हूँ।”
रमेश बाबू ने पूछा, “कितने पैसे चाहिए तुम्हें?”
अभय ने जवाब दिया, “लगभग पच्चीस लाख रुपये। एक दोस्त के साथ मिलकर काम शुरू करना है। अगर सब ठीक रहा, तो पहले ही साल अच्छा मुनाफा हो सकता है।”
रमेश बाबू कुछ देर सोचते रहे।
“बेटा, मेरे पास इतनी रकम नहीं है। तुम्हारी माँ और मैंने जो पैसे बचाए हैं, वे हमारी बुढ़ापे की जरूरतों के लिए हैं। तुम्हारी नौकरी अच्छी है। तुम धीरे-धीरे पैसे जोड़कर शुरुआत कर सकते हो।”
अभय का चेहरा उतर गया।
“पिताजी, आप लोग हमेशा यही कहते हैं कि हम तुम्हारे लिए सब कुछ करेंगे। लेकिन जब मुझे आपकी जरूरत है, तब आप पीछे हट रहे हैं।”
कमला देवी अपने बेटे को उदास नहीं देख सकती थीं।
उन्होंने पति से कहा, “सुनिए, बच्चा कुछ करना चाहता है। अगर हम ही उसका साथ नहीं देंगे, तो कौन देगा? हमारे पास थोड़ी बचत है। कुछ पैसे उसे दे देते हैं।”
रमेश बाबू ने समझाया, “कमला, मैं उसके सपनों के खिलाफ नहीं हूँ। लेकिन अपनी पूरी जमा पूँजी एक ऐसे काम में लगाना ठीक नहीं, जिसकी सफलता की कोई गारंटी नहीं है।”
फिर भी कमला देवी बेटे के पक्ष में खड़ी रहीं। आखिरकार रमेश बाबू ने अपनी जमा पूँजी में से पंद्रह लाख रुपये अभय को दे दिए। बाकी रकम का इंतजाम अभय ने बैंक से कर्ज लेकर किया।
अभय ने पिता से वादा किया कि वह हर महीने कुछ पैसे लौटाएगा और जल्द ही उनकी जमा पूँजी भी वापस कर देगा।
शुरू में सब ठीक चलता रहा। अभय काम में व्यस्त रहने लगा। उसके कपड़े बदल गए, रहन-सहन बदल गया और दोस्तों का दायरा भी बड़ा हो गया।
लेकिन छह महीने बाद उसका बिजनेस घाटे में जाने लगा।
जिस दोस्त के साथ उसने काम शुरू किया था, उसने अचानक साझेदारी छोड़ दी। कुछ बड़े ग्राहकों ने भुगतान रोक दिया और अभय पर कर्ज बढ़ने लगा।
जब रमेश बाबू ने उससे पैसों के बारे में पूछा, तो उसने झुंझलाकर कहा, “पिताजी, बिजनेस में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। आप बार-बार पैसे का हिसाब मत पूछा कीजिए। मैं सब संभाल लूँगा।”
रमेश बाबू चुप हो गए।
उन्हें दुख इस बात का नहीं था कि पैसे डूब गए। उन्हें दुख इस बात का था कि बेटा अब उनसे बात करने में भी चिढ़ने लगा था।
कुछ समय बाद अभय ने अपना बिजनेस बंद कर दिया और फिर से नौकरी करने लगा। इस बार उसे पहले से ज्यादा वेतन मिलने लगा था। रमेश बाबू को उम्मीद थी कि अब बेटा धीरे-धीरे उनकी जमा पूँजी वापस कर देगा।
लेकिन अभय की जिंदगी में अब एक नई प्राथमिकता आ चुकी थी।
उसकी मुलाकात रिया नाम की एक युवती से हुई थी। दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे और कुछ समय बाद उन्होंने शादी करने का फैसला कर लिया।
रमेश बाबू और कमला देवी ने शादी के लिए खुशी-खुशी हामी भर दी।
शादी बड़े धूमधाम से नहीं हुई, लेकिन माता-पिता ने अपनी तरफ से कोई कमी नहीं छोड़ी। कमला देवी ने बहू को अपने हाथों से गहने दिए और रमेश बाबू ने अपनी बची हुई बचत से शादी का खर्च उठाया।
शादी के बाद रिया घर आ गई।
शुरू के कुछ महीने सामान्य रहे। रिया अपने पति के साथ अलग घर में रहने की बात करती थी, लेकिन अभय को लगता था कि माता-पिता को छोड़ना ठीक नहीं होगा।
एक दिन रिया ने उससे कहा, “अभय, तुम्हारे माता-पिता अच्छे हैं, लेकिन मैं इस घर में हमेशा नहीं रह सकती। मुझे अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीनी है। हमें अपना अलग फ्लैट लेना चाहिए।”
अभय ने कहा, “लेकिन पिताजी और माँ अकेले कैसे रहेंगे?”
रिया ने जवाब दिया, “वे अकेले कहाँ रहेंगे? तुम उनसे मिलने आते रहना। आखिर शादी के बाद हर किसी को अपनी जिंदगी बनानी होती है।”
अभय को रिया की बात सही लगने लगी।
कुछ दिनों बाद उसने अपने पिता से कहा, “पिताजी, मैं और रिया अलग घर में रहना चाहते हैं। आप लोग बुरा मत मानिएगा। आजकल सब अपनी प्राइवेसी चाहते हैं।”
रमेश बाबू ने शांत स्वर में कहा, “बेटा, अपनी जिंदगी बनाना गलत नहीं है। अगर तुम्हें अलग रहना है, तो हम तुम्हें रोकेंगे नहीं। लेकिन इतना ध्यान रखना कि रिश्तों में दूरी मत आने देना।”
अभय ने भरोसा दिलाया, “आप चिंता मत कीजिए। मैं रोज फोन करूँगा और हर सप्ताह मिलने भी आऊँगा।”
वह रिया के साथ किराये के फ्लैट में रहने चला गया।
शुरू में वह सप्ताह में एक बार आता था। फिर महीने में एक बार आने लगा। उसके बाद फोन पर भी उसकी बातचीत कम होती गई।
कमला देवी हर बार बेटे के आने पर उसकी पसंद का खाना बनातीं। वह उसके लिए मिठाई रखतीं और बार-बार पूछतीं कि रिया कैसी है।
लेकिन अभय को अब उनके घर आने में भी परेशानी होने लगी थी।
एक दिन कमला देवी ने फोन करके कहा, “बेटा, बहुत दिन हो गए तुम्हें देखे हुए। इस रविवार को आ जाना। तुम्हारे पिताजी भी तुम्हें याद कर रहे हैं।”
अभय ने कहा, “माँ, इस रविवार को हमारी कहीं जाने की योजना है। अगले सप्ताह देखूँगा।”
अगला सप्ताह भी निकल गया।
फिर एक महीना बीत गया।
कमला देवी ने अपने पति से कहा, “लगता है अभय काम में बहुत व्यस्त रहता है। बेचारा थक जाता होगा।”
रमेश बाबू ने उनकी ओर देखा और बोले, “कमला, व्यस्त होना अलग बात है और अपनों को भूल जाना अलग बात है। लेकिन अभी हम उसके मन में क्या चल रहा है, यह नहीं जानते। हमें जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं करना चाहिए।”
कमला देवी ने कुछ नहीं कहा। वह अब भी अपने बेटे का इंतजार करती रहीं।
रमेश बाबू की नौकरी से रिटायरमेंट हो चुका था। उन्हें हर महीने पेंशन मिलती थी, जिससे घर का खर्च चल जाता था। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ दवाइयों और डॉक्टर के खर्च भी बढ़ रहे थे।
एक दिन अभय अपनी पत्नी रिया के साथ घर आया।
कमला देवी उसे देखकर खुश हो गईं। उन्होंने तुरंत रसोई में जाकर खाना तैयार करना शुरू कर दिया।
खाने के बाद अभय ने अपने पिता से कहा, “पिताजी, मैं एक नया फ्लैट खरीदना चाहता हूँ। अच्छी लोकेशन में है और उसकी कीमत भी बढ़ने वाली है। लेकिन बैंक से जितना लोन मिल रहा है, उससे काम नहीं चल रहा।”
रमेश बाबू ने पूछा, “तो तुम क्या चाहते हो?”
अभय ने कहा, “आप यह पुराना घर बेच दीजिए। इसकी अच्छी कीमत मिल जाएगी। उससे मैं फ्लैट की डाउन पेमेंट कर दूँगा। आप दोनों मेरे साथ नए फ्लैट में रह सकते हैं।”
रमेश बाबू को बेटे का प्रस्ताव पसंद नहीं आया।
उन्होंने कहा, “बेटा, यह घर बेचकर हम कहाँ जाएँगे? तुम्हारा नया फ्लैट कितना बड़ा है, यह भी हमें नहीं पता। और अगर कल को तुम्हारे परिवार की जरूरतें बढ़ गईं, तो हम कहाँ रहेंगे?”
रिया ने तुरंत कहा, “पिताजी, आप लोग हर बात में बुरा क्यों सोचते हैं? अभय आपका बेटा है। वह आपको अपने साथ ही तो रखेगा।”
रमेश बाबू ने जवाब दिया, “बेटी, हम तुम्हारे साथ रहने के खिलाफ नहीं हैं। लेकिन अपना घर बेचने का फैसला बहुत सोच-समझकर करना होगा।”
अभय को यह बात बुरी लग गई।
“पिताजी, आप मुझ पर भरोसा नहीं करते। आपने मेरी पढ़ाई करवाई, मुझे बड़ा किया, मेरी शादी करवाई। अब जब मुझे आपकी जरूरत है, तो आप अपने घर के पीछे पड़े हैं।”
रमेश बाबू ने गहरी साँस ली।
“बेटा, तुम्हें जरूरत पड़ने पर हमने हमेशा मदद की है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम अपने बुढ़ापे की सुरक्षा भी छोड़ दें। यह घर तुम्हारी माँ और मेरी मेहनत का परिणाम है।”
अभय बिना कुछ बोले वहाँ से चला गया।
उस दिन के बाद रिया ने भी कमला देवी से बात करना कम कर दिया।
कमला देवी मन ही मन परेशान रहती थीं। वह चाहती थीं कि परिवार में फिर से पहले जैसा प्यार लौट आए।
उन्हें यह समझ नहीं आ रहा था कि बेटे को अपना बनाने की कोशिश में कहीं वह उसे जरूरत से ज्यादा छूट तो नहीं देती रहीं।
कुछ महीनों बाद रमेश बाबू की तबीयत अचानक खराब हो गई। उन्हें सीने में तेज दर्द हुआ और कमला देवी घबराकर पड़ोसियों की मदद से उन्हें अस्पताल ले गईं।
डॉक्टरों ने जाँच के बाद बताया कि उन्हें हृदय संबंधी समस्या हुई है और कुछ दिनों तक अस्पताल में रहना पड़ेगा।
कमला देवी ने तुरंत अभय को फोन किया।
“बेटा, तुम्हारे पिताजी अस्पताल में हैं। डॉक्टर कह रहे हैं कि उनकी हालत पर निगरानी रखनी होगी। तुम जल्दी आ जाओ।”
अभय ने परेशान स्वर में कहा, “माँ, मैं अभी ऑफिस में हूँ। एक जरूरी मीटिंग है। मैं शाम को आने की कोशिश करूँगा।”
कमला देवी ने रोते हुए कहा, “बेटा, तुम्हारे पिताजी को तुम्हारी जरूरत है। कम से कम एक बार आकर उनका हाल तो पूछ लो।”
अभय ने जवाब दिया, “माँ, आप घबराइए मत। डॉक्टर हैं वहाँ। मैं पैसे भेज देता हूँ।”
कुछ देर बाद उसके खाते से अस्पताल के लिए पैसे आ गए, लेकिन वह खुद नहीं आया।
कमला देवी पूरी रात अस्पताल में अपने पति के पास बैठी रहीं। उनके मन में बार-बार यही सवाल उठता रहा कि जिस बेटे के लिए उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी लगा दी, क्या उसके पास अपने पिता के पास बैठने के लिए कुछ घंटे भी नहीं हैं?
अगले दिन रमेश बाबू को होश आया।
उन्होंने पत्नी से पूछा, “अभय आया था?”
कमला देवी की आँखें भर आईं।
उन्होंने झूठ बोलने की कोशिश की, “बेटा काम में व्यस्त है। उसने पैसे भेजे हैं। जल्द ही आ जाएगा।”
रमेश बाबू सब समझ गए।
उन्होंने पत्नी का हाथ पकड़कर कहा, “कमला, किसी से शिकायत मत करना। हमने अपने बच्चों को अपनी क्षमता के अनुसार सब कुछ दिया है। अब उन्हें अपने जीवन के फैसले लेने का अधिकार है। लेकिन हमें भी अपनी जिंदगी के बारे में सोचना होगा।”
कमला देवी ने रोते हुए कहा, “मैंने कभी नहीं सोचा था कि हमारा बेटा हमें इस तरह अकेला छोड़ देगा।”
रमेश बाबू ने उन्हें समझाया, “अभी अपने मन को मजबूत रखो। हमें एक-दूसरे का सहारा बनना है।”
कुछ दिनों बाद रमेश बाबू अस्पताल से घर लौट आए।
अभय उनसे मिलने आया, लेकिन उसकी बातचीत का विषय पिता की सेहत से ज्यादा घर ही रहा।
“पिताजी, अब आपकी तबीयत भी ठीक नहीं रहती। आपको अकेले इस बड़े घर में रहने की क्या जरूरत है? इसे बेचकर मेरे साथ चलिए। आपके लिए भी अच्छा रहेगा।”
रमेश बाबू ने पहली बार बेटे को साफ शब्दों में जवाब दिया।
“अभय, मुझे तुम्हारे साथ रहने से कोई परेशानी नहीं है। लेकिन मैं अपना घर नहीं बेचूँगा। जब तक हम दोनों जीवित हैं, यह घर हमारा सहारा रहेगा।”
अभय का चेहरा गुस्से से लाल हो गया।
“ठीक है, पिताजी। फिर अपनी जिंदगी अपने हिसाब से चलाइए। कल को कोई परेशानी हो, तो मुझसे उम्मीद मत रखिएगा।”
कमला देवी ने बेटे को रोकने की कोशिश की, लेकिन अभय जा चुका था।
उस दिन रमेश बाबू को महसूस हुआ कि उनका बेटा अब उनसे केवल वही चाहता है, जो उसकी अपनी जरूरत पूरी कर सके।
रमेश बाबू की बेटी पूजा दूसरे शहर में रहती थी। उसे जब पिता की बीमारी के बारे में पता चला, तो वह तुरंत अपने पति के साथ मायके पहुँची।
घर में आते ही उसने अपनी माँ को गले लगा लिया।
“माँ, आपने मुझे पहले क्यों नहीं बताया कि पिताजी की तबीयत इतनी खराब हो गई थी?”
कमला देवी ने आँसू पोंछते हुए कहा, “बेटी, तुम अपने घर में खुश रहो। हम तुम्हें परेशान नहीं करना चाहते थे।”
पूजा ने माँ का हाथ पकड़ लिया।
“माँ, शादी के बाद घर बदलता है, रिश्ता नहीं। आप दोनों मेरे माता-पिता हैं। आपकी परेशानी मेरी परेशानी है।”
पूजा की बात सुनकर कमला देवी फूट-फूटकर रो पड़ीं।
रमेश बाबू भी भावुक हो गए।
पूजा ने कुछ दिन उनके साथ रहकर घर के जरूरी काम संभाले। उसने पिता के इलाज के कागजात देखे, दवाइयों का हिसाब व्यवस्थित किया और माँ को डॉक्टर से बात करने का तरीका समझाया।
एक दिन पूजा ने अपने पिता से कहा, “पिताजी, अगर आप चाहें तो कुछ समय मेरे साथ रह सकते हैं। मेरे घर में आपके और माँ के लिए जगह है।”
रमेश बाबू ने बेटी के सिर पर हाथ रखा।
“बेटी, तुम्हारा प्यार ही हमारे लिए बहुत है। लेकिन अभी हम अपना घर नहीं छोड़ना चाहते। हम दोनों एक-दूसरे का ध्यान रख लेंगे। तुम बस समय-समय पर आती रहना।”
पूजा ने कहा, “पिताजी, मैं आती रहूँगी। लेकिन आप दोनों अपनी जरूरतों को कभी मत छिपाइएगा।”
पूजा कुछ दिनों बाद अपने घर लौट गई, लेकिन उसने अपने माता-पिता से नियमित बात करना शुरू कर दिया।
उसने यह भी तय किया कि वह हर महीने अपनी माँ के खाते में कुछ पैसे जमा करेगी, ताकि किसी आपात स्थिति में उन्हें किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े।
रमेश बाबू ने बेटी से पैसे लेने से मना किया, लेकिन पूजा ने समझाया कि यह कोई एहसान नहीं, बल्कि उसका अपने माता-पिता के प्रति प्रेम है।
रमेश बाबू को अपनी बेटी पर गर्व हुआ। साथ ही उनके मन में एक सवाल भी उठा—क्या रिश्तों का मूल्य केवल इस बात से तय होता है कि कौन किससे कितना धन प्राप्त करेगा?
समय बीतता गया।
अभय ने अपना फ्लैट खरीद लिया। उसने घर की सजावट पर खूब पैसा खर्च किया, नई गाड़ी खरीदी और अपनी जिंदगी में व्यस्त हो गया।
लेकिन रमेश बाबू और कमला देवी के पास उसका आना-जाना लगभग बंद हो गया था।
एक दिन कमला देवी ने बेटे को फोन किया।
“बेटा, तुम्हारे पिताजी की दवाइयाँ खत्म हो गई हैं। इस महीने कुछ अतिरिक्त खर्च आ गया है। अगर संभव हो, तो थोड़ी मदद कर देना।”
अभय ने कहा, “माँ, अभी मेरे ऊपर भी बहुत खर्च है। फ्लैट की किस्तें चल रही हैं और रिया की नौकरी भी कुछ समय के लिए बंद है। आप लोग अपनी पेंशन से काम चलाइए।”
कमला देवी ने धीमे स्वर में कहा, “बेटा, हम अपनी पेंशन से ही काम चलाते हैं। लेकिन इस बार खर्च थोड़ा ज्यादा हो गया है।”
अभय ने चिढ़कर कहा, “माँ, आप हर बार कोई न कोई परेशानी लेकर फोन कर देती हैं। मेरी भी अपनी जिंदगी है। मैं कब तक सब संभालता रहूँगा?”
कमला देवी के हाथ काँपने लगे।
“बेटा, हमने तुमसे कभी अपने लिए कुछ नहीं माँगा। जब तुम्हें जरूरत थी, हमने अपनी बचत तुम्हें दे दी थी। हम केवल तुम्हें अपना समझकर फोन करते हैं।”
अभय ने जवाब दिया, “तो क्या आपने मेरी मदद करके कोई एहसान किया था? माता-पिता बच्चों के लिए करते ही हैं। अब हर बात का हिसाब रखोगी क्या?”
यह सुनकर कमला देवी के आँसू बहने लगे।
उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया और फोन रख दिया।
रमेश बाबू पास ही बैठे थे। उन्होंने पत्नी की आँखों में आँसू देख लिए थे।
उन्होंने पूछा, “क्या हुआ, कमला?”
कमला देवी ने कहा, “आज अभय ने कहा कि हमने उसकी मदद करके उस पर कोई एहसान नहीं किया। शायद वह ठीक कहता है। माता-पिता बच्चों के लिए करते हैं। लेकिन क्या बच्चे अपने माता-पिता के लिए थोड़ा समय और सम्मान भी नहीं निकाल सकते?”
रमेश बाबू ने पत्नी को अपने पास बैठाया।
“कमला, हमने अपने बेटे से कभी अपने पैसे का ब्याज नहीं माँगा। हमने तो बस यह उम्मीद की थी कि वह हमें अपना समझेगा। लेकिन अगर किसी रिश्ते में सम्मान ही न बचे, तो केवल खून का रिश्ता होने से क्या सब कुछ ठीक हो जाता है?”
कमला देवी ने सिर झुका लिया।
उस दिन उनके मन में बेटे के लिए जो उम्मीद बची थी, वह भी धीरे-धीरे खत्म होने लगी।
कुछ समय बाद रमेश बाबू ने अपने घर के एक कमरे को किराये पर देने का फैसला किया। इससे उन्हें हर महीने कुछ अतिरिक्त आमदनी होने लगी।
उन्होंने अपने पुराने परिचित की मदद से पेंशन और बचत का सही हिसाब बनाया। कुछ अनावश्यक खर्च कम किए और अपनी जरूरतों के लिए अलग से आपातकालीन निधि तैयार की।
कमला देवी ने भी घर के खर्च का हिसाब रखना शुरू कर दिया।
अब दोनों ने तय कर लिया था कि वे अपनी बाकी जिंदगी किसी की कृपा पर निर्भर रहकर नहीं बिताएँगे।
एक दिन रमेश बाबू ने पत्नी से कहा, “कमला, हमें अपने भविष्य के लिए कुछ जरूरी फैसले लेने चाहिए। हम बूढ़े हो रहे हैं। पता नहीं आगे क्या होगा। मैं चाहता हूँ कि हमारे बाद हमारी संपत्ति का उपयोग ऐसे लोगों की मदद के लिए हो, जिन्हें सच में इसकी जरूरत है।”
कमला देवी ने पूछा, “आप क्या सोच रहे हैं?”
रमेश बाबू ने जवाब दिया, “मैं चाहता हूँ कि हम अपनी वसीयत बनवाएँ। जो घर और बचत हमने अपनी मेहनत से जुटाई है, उसके बारे में अभी से स्पष्ट फैसला कर लें। ताकि हमारे जाने के बाद किसी तरह का विवाद न हो।”
कमला देवी कुछ देर चुप रहीं।
फिर उन्होंने कहा, “मैं भी यही चाहती हूँ। लेकिन फैसला गुस्से में नहीं होना चाहिए। हमें अपने बेटे से नाराजगी है, पर हम अपनी संपत्ति का उपयोग सोच-समझकर करेंगे।”
रमेश बाबू ने पत्नी की बात से सहमति जताई।
दोनों ने एक वकील से सलाह ली। उन्होंने अपनी जरूरतों, इलाज और भविष्य के खर्च का पूरा हिसाब सामने रखा। वकील ने उन्हें समझाया कि वे अपनी संपत्ति के बारे में कानून के अनुसार वसीयत बना सकते हैं, लेकिन उसे सही तरीके से तैयार करना जरूरी है।
रमेश बाबू ने अपनी वसीयत में लिखा कि उनके और उनकी पत्नी के जीवनकाल में घर पर उनका अधिकार और नियंत्रण बना रहेगा। उनके निधन के बाद उनकी बची हुई संपत्ति का उपयोग जरूरतमंद बुजुर्गों की देखभाल, इलाज और रहने की व्यवस्था के लिए किया जाए।
उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि कमला देवी की आर्थिक सुरक्षा पहले से व्यवस्थित रहे और उनके जीवनकाल में किसी को भी उनकी इच्छा के विरुद्ध संपत्ति बेचने या हस्तांतरित करने का अधिकार न हो।
वकील ने सभी कागजात तैयार किए और दोनों ने पूरी बात समझने के बाद उन पर हस्ताक्षर किए।
रमेश बाबू ने किसी को दंड देने के लिए यह फैसला नहीं लिया था। वह केवल यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि उनकी मेहनत की कमाई उन लोगों के काम आए, जिन्हें वास्तव में सहारे की जरूरत है।
समय अपनी गति से चलता रहा।
पूजा अपने माता-पिता से नियमित बात करती रही। वह जब भी मायके आती, घर के कामों में हाथ बँटाती और अपनी माँ के साथ समय बिताती।
अभय की जिंदगी भी आगे बढ़ती रही। उसका एक बेटा हुआ। अब वह अपने परिवार में व्यस्त रहता था। कभी-कभी त्योहार पर माता-पिता को संदेश भेज देता, लेकिन मिलने नहीं आता था।
सात साल बीत गए।
एक दिन अभय को अपने पुराने मित्र से पता चला कि उसके पिता ने अपने काम और निवेश से अच्छी बचत बना ली है। जिस घर को बेचने के लिए वह कभी अपने पिता पर दबाव डालता था, उसकी कीमत भी अब काफी बढ़ चुकी थी।
अभय को लगा कि शायद अब माता-पिता को उसकी जरूरत होगी और वह उनसे संबंध सुधार सकता है।
उसने फोन लगाया।
“पिताजी, कैसे हैं आप? बहुत दिन हो गए आपसे बात किए हुए।”
रमेश बाबू ने शांत स्वर में जवाब दिया, “हाँ, काफी दिन हो गए।”
अभय ने कहा, “पिताजी, मैं आपसे मिलने आना चाहता हूँ। रिया और मेरा बेटा भी आपसे मिलना चाहते हैं।”
रमेश बाबू ने पूछा, “अचानक तुम्हें हमारी याद कैसे आ गई, बेटा?”
अभय कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला, “पिताजी, आप भी कैसी बातें करते हैं? आखिर मैं आपका बेटा हूँ। क्या अपने माता-पिता से मिलने के लिए भी कोई कारण चाहिए?”
रमेश बाबू ने कहा, “मिलने के लिए कारण नहीं चाहिए, अभय। लेकिन सात साल तक अपने माता-पिता की सुध न लेने के बाद अचानक अपनापन दिखाने पर सवाल जरूर उठते हैं।”
अभय ने सफाई दी, “पिताजी, मैं अपनी जिंदगी में बहुत व्यस्त था। नौकरी, परिवार, बच्चों की जिम्मेदारी—समय ही नहीं मिल पाया।”
रमेश बाबू ने जवाब दिया, “बेटा, समय किसी के पास अपने आप नहीं होता। अपनों के लिए निकालना पड़ता है। तुम्हारी माँ अस्पताल में तुम्हारा इंतजार करती रही, लेकिन तुम नहीं आए। हमने कभी तुमसे महँगे उपहार नहीं माँगे। हमें केवल तुम्हारा साथ चाहिए था।”
अभय ने बात बदलते हुए कहा, “पिताजी, पुरानी बातें छोड़िए। अब सब कुछ ठीक कर लेते हैं। मैं चाहता हूँ कि हम फिर से एक परिवार की तरह रहें।”
रमेश बाबू ने कहा, “अगर तुम सच में रिश्ते सुधारना चाहते हो, तो पहले यह समझो कि परिवार केवल संपत्ति से नहीं बनता। परिवार समय, विश्वास और जिम्मेदारी से बनता है।”
अभय ने कुछ देर बाद कहा, “पिताजी, मुझे पता चला है कि आपने अपनी संपत्ति की वसीयत किसी संस्था के नाम कर दी है। क्या यह सच है?”
रमेश बाबू समझ गए कि बेटे के फोन करने का एक कारण यह भी था।
उन्होंने कहा, “हाँ, हमने अपनी संपत्ति के बारे में फैसला कर लिया है। यह फैसला हमने सोच-समझकर लिया है।”
अभय की आवाज बदल गई।
“लेकिन पिताजी, मैं आपका इकलौता बेटा हूँ। आपकी संपत्ति पर मेरा भी तो हक है!”
रमेश बाबू ने दृढ़ स्वर में कहा, “अभय, तुम्हें अपने माता-पिता से रिश्ता निभाने के लिए कभी किसी संपत्ति की जरूरत नहीं थी। लेकिन तुमने सात साल तक हमें अकेला छोड़ दिया। अब तुम्हें संपत्ति की चिंता क्यों हो रही है?”
अभय ने कहा, “पिताजी, आप मुझे गलत समझ रहे हैं। मैं तो बस चाहता हूँ कि मेरी भी कुछ जिम्मेदारी हो। आखिर मैं आपका बेटा हूँ।”
रमेश बाबू ने जवाब दिया, “जिम्मेदारी निभाने के लिए हमने तुम्हें कभी नहीं रोका था। जब तुम्हारी माँ ने तुम्हें फोन किया, तब तुमने कहा था कि अपनी परेशानियाँ खुद संभालो। आज हम अपनी जिंदगी के फैसले खुद संभाल रहे हैं। इसमें तुम्हें परेशानी क्यों हो रही है?”
अभय के पास कोई जवाब नहीं था।
कुछ देर बाद उसने कहा, “पिताजी, मैं फिर भी आपसे मिलने आऊँगा। आप मुझे मना नहीं कर सकते।”
रमेश बाबू ने शांत स्वर में कहा, “मिलने आना चाहो, तो पहले अपनी माँ से माफी माँगने की तैयारी करके आना। लेकिन यह मत समझना कि केवल घर आ जाने से सात साल का दर्द मिट जाएगा।”
यह कहकर उन्होंने फोन रख दिया।
कुछ दिनों बाद अभय अपनी पत्नी रिया के साथ माता-पिता के घर पहुँचा।
कमला देवी ने दरवाजा खोला, तो अपने बेटे को देखकर कुछ पल के लिए ठिठक गईं। उनकी आँखों में खुशी भी थी और पुराना दर्द भी।
अभय ने माँ के पैर छूने की कोशिश की।
कमला देवी ने उसे आशीर्वाद दिया, लेकिन पहले की तरह गले लगाकर रो नहीं पाईं।
रिया ने कहा, “माँ जी, हमें माफ कर दीजिए। बहुत समय से आप लोगों से मिलने नहीं आ पाए।”
कमला देवी ने शांत स्वर में जवाब दिया, “बेटी, माफी माँगना आसान है, लेकिन भरोसा दोबारा बनाना समय लेता है।”
सभी बैठक में बैठ गए।
अभय ने अपने पिता से कहा, “पिताजी, मैं चाहता हूँ कि हम सब फिर से साथ रहें। मैं आपको अपने साथ ले जाना चाहता हूँ।”
रमेश बाबू ने पूछा, “क्या तुम सच में हमें अपने साथ ले जाना चाहते हो, या तुम्हें लगता है कि हमारी संपत्ति का फैसला बदल सकता है?”
अभय को यह सवाल बुरा लगा।
“पिताजी, आप हर बात में संपत्ति क्यों ले आते हैं?”
रमेश बाबू ने जवाब दिया, “मैं संपत्ति की बात नहीं कर रहा। मैं तुम्हारे व्यवहार की बात कर रहा हूँ। जब तुम्हें घर चाहिए था, तब तुमने कहा था कि हम तुम्हारे माता-पिता हैं और तुम्हें हम पर भरोसा करना चाहिए। जब हमें तुम्हारी जरूरत थी, तब तुमने कहा कि हमारी परेशानी हमारी अपनी है। अब जब तुम्हें हमारी संपत्ति की वसीयत का पता चला, तो तुम अचानक हमें साथ ले जाने की बात कर रहे हो।”
रिया ने सिर झुका लिया।
उसे पहली बार एहसास हुआ कि अभय ने अपने माता-पिता से कितनी दूरी बना ली थी। उसने भी अलग रहने की इच्छा जताई थी, लेकिन उसने कभी यह नहीं सोचा था कि एक दिन उनके बीच बातचीत भी लगभग खत्म हो जाएगी।
रिया ने धीरे से कहा, “पिताजी, मुझसे भी गलती हुई। मैंने अभय से अलग घर लेने की बात की थी, लेकिन मैंने कभी नहीं चाहा था कि वह आपसे रिश्ता तोड़ दे। मुझे भी आपके अकेलेपन का ध्यान रखना चाहिए था।”
कमला देवी ने रिया की ओर देखा।
“बेटी, गलती हर इंसान से होती है। लेकिन गलती स्वीकार करने के बाद अपने व्यवहार में बदलाव लाना जरूरी है।”
रिया की आँखों में आँसू आ गए।
उसने कहा, “माँ जी, मैं चाहती हूँ कि आप हमें एक मौका दें। हम आप दोनों के संपर्क में रहेंगे और आपकी जरूरतों का ध्यान रखेंगे।”
रमेश बाबू ने कहा, “हम तुम्हें मना नहीं कर रहे। लेकिन अब हम अपनी जिंदगी के फैसले किसी दबाव में नहीं लेंगे। अगर तुम्हारा प्यार सच्चा है, तो उसे साबित करने के लिए संपत्ति की जरूरत नहीं पड़ेगी।”
अभय चुप बैठा रहा।
उसे पहली बार समझ आने लगा था कि माता-पिता का भरोसा खोना कितना बड़ा नुकसान है।
जाने से पहले अभय अपनी माँ के पास गया।
“माँ, क्या तुम मुझे माफ नहीं कर सकतीं? मैं तुम्हारा बेटा हूँ।”
कमला देवी की आँखों में आँसू आ गए।
उन्होंने कहा, “बेटा, माँ अपने बच्चे से नफरत करना नहीं सीख सकती। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि वह हर बार अपने दर्द को भूल जाए। मैंने तुम्हें हमेशा खुश देखना चाहा। जब तुमने बिजनेस के लिए पैसे माँगे, हमने अपनी बचत दे दी। जब तुम अलग घर में रहने गए, हमने तुम्हें रोका नहीं। जब तुम्हारे पिताजी अस्पताल में थे, तब भी मैंने तुम्हारा इंतजार किया।”
अभय ने सिर झुका लिया।
कमला देवी आगे बोलीं, “मुझे तुम्हारे पैसे नहीं चाहिए थे। मुझे तुम्हारी आवाज सुननी थी। तुम्हारा चेहरा देखना था। तुम्हारे पिताजी को तुम्हारे साथ बैठकर कुछ बातें करनी थीं। लेकिन तुमने हमें अपनी जिंदगी से बाहर कर दिया। अब तुम लौटकर आए हो, तो मैं तुम्हें दरवाजे से वापस नहीं भेजूँगी। मगर पहले जैसा भरोसा एक दिन में वापस नहीं आएगा।”
अभय की आँखों से आँसू बहने लगे।
“माँ, मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई।”
कमला देवी ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“बेटा, गलती समझ आ जाए, तो जिंदगी बदलने का मौका अभी भी रहता है। लेकिन याद रखना, माता-पिता को केवल बुढ़ापे में सहारे की जरूरत नहीं होती। उन्हें तब भी अपने बच्चों की जरूरत होती है, जब बच्चे अपनी जिंदगी की शुरुआत कर रहे होते हैं।”
अभय ने माँ के पैर छू लिए।
उस दिन वह अपने माता-पिता के घर से खाली हाथ लौटा। न उसे कोई संपत्ति मिली, न उसके पिता ने वसीयत बदलने का वादा किया।
लेकिन उसके मन में एक बात साफ हो चुकी थी—माता-पिता का प्यार कोई ऐसी जमा पूँजी नहीं है, जिसे जरूरत पड़ने पर निकाल लिया जाए और फिर सालों तक उसकी सुध न ली जाए।
उसने धीरे-धीरे अपने व्यवहार में बदलाव लाने की कोशिश शुरू की। वह नियमित रूप से माता-पिता से मिलने आने लगा। उनके इलाज और जरूरतों में हाथ बँटाने लगा। रमेश बाबू ने भी उसे अपने जीवन से पूरी तरह अलग नहीं किया, लेकिन उन्होंने अपनी संपत्ति के संबंध में लिया गया फैसला नहीं बदला।
अब उनके लिए सबसे जरूरी बात यह थी कि उनका बेटा अपने रिश्तों की कीमत समझे।
समय के साथ परिवार में बातचीत बढ़ी। पुराने घाव पूरी तरह मिटे या नहीं, यह कहना कठिन था, लेकिन एक नई शुरुआत जरूर हुई।
रमेश बाबू और कमला देवी ने अपनी जिंदगी से एक बड़ा सबक सीखा था—बच्चों से प्यार करना गलत नहीं है, लेकिन प्यार के नाम पर अपने बुढ़ापे की सुरक्षा और आत्मसम्मान को पूरी तरह दाँव पर लगा देना भी जरूरी नहीं।
दोस्तों, आप बताइए—क्या रमेश बाबू ने अपनी संपत्ति जरूरतमंद बुजुर्गों के नाम करने का फैसला सही लिया, या उन्हें अपने बेटे को एक और मौका देते हुए वसीयत बदल देनी चाहिए थी? अपनी राय जरूर बताइए।

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