हरी चूड़ियों की खनक
मेरा नाम कमला बाई है। उम्र 60 साल। मैं शहर के छोटे से रेलवे स्टेशन के बाहर चाय का ठेला लगाती हूँ। सुबह चार बजे उठकर चूल्हा जलाती हूँ, अदरक कूटती हूँ और दिन भर मुस्कुराकर लोगों को चाय पिलाती हूँ।
मेरी दुनिया बस एक ही है—मेरी बेटी आरती। उसके पिता के जाने के बाद मैंने ही उसे पाला, पढ़ाया और बड़ा किया। वह पढ़ने में तेज थी। मैंने चाहा कि वह मेरी तरह ठेला न लगाए, बल्कि अपने पैरों पर खड़ी हो।
वक्त बीतता गया। आरती ने मेहनत की और नर्स बन गई। जब उसे शहर के बड़े अस्पताल में नौकरी मिली, तो मुझे लगा जैसे मेरी सालों की थकान एक पल में उतर गई हो।
फिर एक दिन उसने बताया कि वह अपने साथ काम करने वाले डॉक्टर, आदित्य, से शादी करना चाहती है। लड़का अच्छा था, परिवार भी पढ़ा-लिखा और सम्पन्न। मैंने मुस्कुराकर हाँ कह दी, पर दिल के किसी कोने में एक डर बैठ गया।
शादी बड़े होटल में होने वाली थी। चमचमाती लाइटें, बड़े लोग, महंगे कपड़े… और मैं? मेरे पास तो बस मेरी पुरानी गुलाबी साड़ी थी और हाथों में कांच की हरी चूड़ियाँ, जिन्हें मैं खास मौकों पर पहनती थी।
वो चूड़ियाँ मैंने तब खरीदी थीं जब आरती ने दसवीं में पहला स्थान पाया था। उस दिन मैंने ठेले की पूरी कमाई से खुद के लिए नहीं, उसके लिए मिठाई खरीदी थी… और बची हुई रकम से ये साधारण सी चूड़ियाँ।
शादी से कुछ दिन पहले आरती ने पूछा,
“अम्मा, आप क्या पहनेंगी?”
मैंने हंसकर कहा,
“अरे, वही गुलाबी साड़ी। और मेरी हरी चूड़ियाँ।”
उसने कुछ नहीं कहा, बस मुझे देखती रही।
शादी का दिन आ गया। होटल रोशनी से जगमगा रहा था। बड़े-बड़े फूलों के गेट, कैमरों की चमक, लोगों की हंसी… सब कुछ नया और भव्य था।
मैंने अपनी गुलाबी साड़ी पहनी, बालों में थोड़ा सा तेल लगाया और हरी चूड़ियाँ पहन लीं। वे पुरानी थीं, कुछ जगह से हल्की खरोंच भी थी, लेकिन जब वे खनकती थीं तो मुझे अपने संघर्ष की आवाज सुनाई देती थी।
हॉल में कदम रखते ही मुझे लगा जैसे मैं कहीं और की हूँ। लोग सजे-धजे थे। सोने के गहने, रेशमी कपड़े… मैं चुपचाप एक कोने में बैठ गई।
कुछ औरतें मुझे देखकर धीरे-धीरे बातें कर रही थीं—
“शायद लड़की की माँ है…”
“बेचारी, कम से कम नई साड़ी तो पहन लेती…”
मैंने सिर झुका लिया। सोचा, बस चुप रहो। आज आरती का दिन है।
तभी मंच से आवाज आई,
“मेरी अम्मा कहाँ हैं?”
मैंने ऊपर देखा। लाल जोड़े में सजी मेरी बेटी मुझे ढूंढ रही थी। उसकी आँखों में चमक थी।
वह मंच से नीचे उतरी और सीधे मेरे पास आई। सब लोग हैरान थे।
उसने मेरा हाथ पकड़ा और बोली,
“अम्मा, ये वही हरी चूड़ियाँ हैं ना, जो आपने मेरे रिजल्ट वाले दिन खरीदी थीं?”
मैं चौंक गई।
“तुझे याद है?”
वह मुस्कुराई,
“अम्मा, जब भी मैं डरती थी या थक जाती थी, तो मुझे आपकी इन चूड़ियों की खनक याद आती थी। वो आवाज कहती थी—‘मेरी बेटी मजबूत है।’”
पूरा हॉल शांत हो गया।
आरती ने माइक उठाया और बोली,
“आज मैं जो भी हूँ, इन चूड़ियों की खनक की वजह से हूँ। मेरी अम्मा ने कभी सोना नहीं पहना, लेकिन उन्होंने मुझे सोने जैसा जीवन दिया।”
लोगों की आँखें नम हो गईं।
आदित्य भी हमारे पास आया। उसने झुककर मेरे पैर छुए और कहा,
“माँ, हमें गर्व है कि आप हमारी माँ हैं।”
उस पल मुझे लगा जैसे मेरी साधारण साड़ी रेशम बन गई हो, और मेरी कांच की चूड़ियाँ हीरे से ज्यादा चमक रही हों।
रस्मों के बाद कई लोग मेरे पास आए।
“कमला जी, आप बहुत सुंदर लग रही हैं।”
“हरी चूड़ियाँ तो आपकी पहचान हैं।”
मैं मुस्कुरा दी।
उस रात जब सब मेहमान चले गए, आरती मेरे पास आई और बोली,
“अम्मा, एक दिन मैं भी ऐसी ही माँ बनना चाहती हूँ।”
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।
सुंदरता महंगे कपड़ों में नहीं होती। वह उन हाथों में होती है जो मेहनत करते हैं, उन आँखों में होती है जो सपने देखती हैं, और उन चूड़ियों की खनक में होती है जो हर मुश्किल में हिम्मत देती हैं।
माँ चाहे चाय बेचे या घर संभाले, वह हमेशा खूबसूरत होती है।
क्योंकि उसके कपड़ों में नहीं, उसके दिल में सबसे ज्यादा चमक होती है।
और अगर माँ के प्यार की कोई आवाज होती है, तो वह कांच की हरी चूड़ियों की खनक जैसी होती है—साधारण, मगर जीवन भर गूंजती रहने वाली।

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