सम्मान की असली कीमत

 

Indian family having an emotional conversation in a warmly lit living room during a rainy evening.


शाम के साढ़े सात बजे थे। गुप्ता परिवार के घर में हल्की-हल्की बारिश की आवाज़ आ रही थी। दरवाज़े की घंटी बजी।


दरवाज़ा खोला तो सामने खड़ी थी तन्वी — हाथ में ट्रॉली बैग और चेहरे पर हल्की झुंझलाहट।


“मम्मी, दो-तीन दिन रुकूँगी,” उसने अंदर आते ही कहा।


सास शारदा जी खुश हो गईं—

“अरे वाह बेटा! पहले बताती तो कुछ अच्छा बना लेती।”


इतने में अंदर से आवाज़ आई—

“दीदी आ गईं? मैं अभी गरम सूप लेकर आती हूँ।”


यह आवाज़ थी आरती की — घर की बहू। वह बैंक में काम करती थी और आज भी देर तक ऑफिस में थी। बारिश के कारण ट्रैफिक में फँस गई थी। फिर भी घर आकर सबसे पहले रसोई संभाल ली।


तन्वी ने भौंहें चढ़ाते हुए कहा—

“भाभी, आप भी ना… इतना काम क्यों करती हैं? वैसे भी नौकरी करती हैं, घर की जिम्मेदारी मम्मी पर छोड़ दीजिए।”


आरती ने मुस्कुराकर जवाब दिया—

“घर सबका होता है दीदी, तो काम भी सबका होना चाहिए।”


तन्वी को यह बात अच्छी नहीं लगी।



अगले दिन सुबह का समय था। घर में हल्की-हल्की ठंडक थी।


आरती अलार्म बजते ही पाँच बजे उठ गई। जल्दी-जल्दी तैयार होकर उसने चाय बनाई, मम्मी जी की दवा पास रखी और टिफ़िन संभालकर छह बजे ही ऑफिस के लिए निकल गई। बैंक में ऑडिट चल रहा था, इसलिए उसे समय से पहले पहुँचना जरूरी था।


घर में फिर सन्नाटा छा गया।


तन्वी आराम से रजाई ओढ़े सोती रही। करीब दस बजे उसकी आँख खुली। वह धीरे-धीरे उठी, बाल ठीक किए और बाहर आकर ऊँची आवाज़ में बोली—


“मम्मी, नाश्ता नहीं बना अभी तक?”


शारदा जी रसोई से बाहर आईं और शांत स्वर में बोलीं—

“आरती तो छह बजे ही निकल गई थी बेटा। आज बैंक में ऑडिट है, बहुत काम है।”


तन्वी ने भौंहें चढ़ाते हुए हल्का-सा ताना मारा—

“इतना भी क्या काम होता है बैंक में? घर संभालना ज्यादा जरूरी है। बाहर की नौकरी के चक्कर में घर के काम पीछे रह जाते हैं।”


शारदा जी ने एक पल के लिए तन्वी की ओर देखा, लेकिन कुछ नहीं बोलीं।

उनकी चुप्पी में समझ भी थी और हल्की-सी चिंता भी।



शाम ढल चुकी थी। बाहर आसमान में हल्की लालिमा बची थी और घर के भीतर दिनभर की भागदौड़ की थकान जैसे दीवारों पर टंगी हुई थी।


दरवाज़ा खुला और आरती अंदर आई। कंधे से बैग लगभग फिसल रहा था और हाथ में ऑफिस की मोटी फाइलें थीं। चेहरे पर थकान साफ दिखाई दे रही थी, लेकिन आदत के अनुसार उसने घर में कदम रखते ही हल्की मुस्कान ओढ़ ली।


जैसे ही उसने बैग मेज़ पर रखा, तन्वी सोफे से उठकर बोली—

“भाभी, कल मेरा सूट सिलवाना है, बाजार चलना पड़ेगा। और हाँ, रात के खाने में मेरे लिए अलग से पास्ता बना देना, मुझे दाल बिल्कुल पसंद नहीं है।”


आरती ने एक पल के लिए आँखें बंद कीं, जैसे खुद को संभाल रही हो। फिर शांत स्वर में बोली—

“दीदी, कल ऑफिस में मेरी ज़रूरी मीटिंग है, शायद देर भी हो जाए। अगर आप चाहें तो हम रविवार को आराम से बाजार चल सकते हैं।”


तन्वी ने होंठ भींचते हुए कहा—

“आपके पास हर बात के लिए कोई ना कोई वजह तैयार रहती है। कभी मीटिंग, कभी काम… घर भी कोई चीज़ होती है।”


कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।


आरती ने कुछ जवाब नहीं दिया। उसने बस धीरे से फाइलें समेटीं और रसोई की ओर बढ़ गई। उसकी चुप्पी में थकान भी थी और रिश्ते को बचाए रखने की कोशिश भी।



दो दिन बाद अचानक आरती को तेज बुखार हो गया। डॉक्टर ने आराम की सलाह दी।


उस दिन घर का सारा काम शारदा जी और तन्वी पर आ गया।


सुबह की चाय बनाने में ही तन्वी परेशान हो गई। गैस तेज कर दी, दूध उफन गया।


दाल में नमक भूल गई। सब्ज़ी जल गई।


घर समेटते-समेटते दोपहर हो गई।


वह थककर बैठ गई—

“मम्मी, भाभी ये सब रोज कैसे करती हैं? और ऊपर से नौकरी भी?”


शारदा जी ने धीरे से कहा—

“यही तो मैं समझाना चाहती थी। बाहर की नौकरी भी आसान नहीं होती। वहाँ भी जिम्मेदारी होती है, यहाँ भी। आरती कभी शिकायत नहीं करती।”


तन्वी चुप हो गई।


शाम को वह चुपचाप आरती के कमरे में गई।


आरती बुखार में भी मोबाइल पर बैंक का मैसेज देख रही थी।


तन्वी ने धीरे से उसका फोन हटाया—

“बस करो भाभी, आराम करो।”


आरती ने कमजोर आवाज़ में कहा—

“ऑडिट चल रहा है, इसलिए…”


तन्वी की आँखें भर आईं—

“मुझे माफ कर दीजिए। मैंने आपकी मेहनत को कभी समझा ही नहीं।”


आरती ने हल्की मुस्कान दी—

“कोई बात नहीं दीदी। घर में अपनी ही तो हैं।”


अगले ही दिन से तन्वी के व्यवहार में साफ बदलाव दिखने लगा।


वह अब पहले की तरह देर तक नहीं सोती थी। सुबह अलार्म बजते ही उठ जाती, चुपचाप रसोई में जाकर सबके लिए चाय बना देती। चाय की ट्रे लेकर सबसे पहले आरती के कमरे में जाती और धीमे से कहती—

“भाभी, पहले दवा ले लीजिए, फिर चाय पीना।”


वह ध्यान रखती कि दवा समय पर दी जाए, खाना हल्का और सही समय पर बने। दोपहर में वह घर समेटती, और शाम को रसोई में खुद आगे बढ़कर कहती—

“आज सब्ज़ी मैं काटती हूँ, आप बस बैठकर बताइए।”


उसके चेहरे पर अब शिकायत नहीं, जिम्मेदारी झलकती थी।


कुछ दिनों बाद जब आरती पूरी तरह ठीक हो गई और फिर से अपने काम पर जाने लगी, तो एक शाम उसने मुस्कुराते हुए कहा—

“दीदी, आपने जिस तरह सब संभाला… सच में, आपका बहुत धन्यवाद।”


तन्वी हल्के से हँस पड़ी। उसकी आवाज़ में अब अपनापन था—

“धन्यवाद कैसा भाभी? अब समझ आया कि जिम्मेदारी सिर्फ शब्द नहीं होती। उसे निभाने में कितनी मेहनत और धैर्य लगता है… यह मैंने आपसे सीखा है।”


दोनों की आँखों में उस दिन एक नई समझ थी—रिश्तों की और एक-दूसरे के सम्मान की।


कुछ हफ्तों बाद तन्वी अपने घर लौटी, लेकिन इस बार वह पहले जैसी नहीं थी। उसके शब्दों में नरमी थी और सोच में समझदारी।


अब जब भी वह फोन करती, सबसे पहले यही पूछती—

“भाभी, आज आराम किया ना? अपने लिए भी थोड़ा समय निकाला करो।”


उसकी आवाज़ में अब शिकायत नहीं, अपनापन होता था।


शारदा जी यह बदलाव देखकर मन ही मन खुश होतीं। वे अक्सर मुस्कुराकर कहतीं—

“घर की खुशियाँ काम बाँटने से बढ़ती हैं, ताने देने से नहीं। जब हम एक-दूसरे का हाथ पकड़ते हैं, तभी घर सच में घर बनता है।”


और सच में, गुप्ता परिवार में अब कोई किसी से बड़ा या छोटा नहीं था। वहाँ अब अधिकार से ज्यादा सम्मान था, और काम से ज्यादा रिश्तों की कद्र।


क्योंकि उन्होंने सीख लिया था — साथ रहना ही सबसे बड़ी ताकत है।





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