टूटा भरोसा, सच्चा प्यार
रात के करीब साढ़े ग्यारह बजे थे। अस्पताल की सफेद दीवारें और तेज़ रोशनी माहौल को और ठंडा बना रही थीं।
आदित्य घबराया हुआ था। उसकी बाहों में सिया बेहोश पड़ी थी।
“डॉ. कबीर, प्लीज इसे बचा लीजिए… ये सुबह से अजीब हरकतें कर रही थी… फिर अचानक गिर पड़ी…”
डॉ. कबीर ने तुरंत जांच शुरू कर दी। ब्लड टेस्ट, स्कैन, सब कुछ।
रिपोर्ट आने के बाद उनका चेहरा गंभीर हो गया।
“आदित्य… सिया पागल नहीं है। उसके शरीर में भारी मात्रा में ड्रग्स हैं… और ये कोई एक दिन की बात नहीं है।”
आदित्य के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
“लेकिन वो तो कभी दवा भी डॉक्टर की सलाह के बिना नहीं लेती…”
डॉ. कबीर ने धीमी आवाज़ में कहा,
“किसी ने उसे ये नशा जानबूझकर दिया है।”
एक अधूरा इज़हार...
दो महीने पहले की बात है…
कॉलेज के शांत गार्डन में हल्की-हल्की हवा चल रही थी। शाम ढल रही थी और सूरज की आख़िरी किरणें पेड़ों के पत्तों पर पड़ रही थीं। उसी समय राधिका ने हिम्मत जुटाकर आदित्य को वहाँ बुलाया था। उसके हाथ हल्के-हल्के काँप रहे थे और दिल तेज़ी से धड़क रहा था।
कुछ पल चुप रहने के बाद उसने धीमी आवाज़ में कहा,
“आदित्य… मैं तुमसे प्यार करती हूँ।”
ये कहते हुए उसकी आँखों में उम्मीद थी, जैसे वो किसी खूबसूरत जवाब का इंतज़ार कर रही हो।
आदित्य ने उसे ध्यान से देखा। उसकी आवाज़ में नरमी थी, लेकिन शब्द साफ और सच्चे थे।
“राधिका, मैं तुम्हारी भावनाओं की बहुत इज़्ज़त करता हूँ… लेकिन मैं सिया से प्यार करता हूँ। और मैं बहुत जल्द उसे अपने दिल की बात बताने वाला हूँ।”
ये सुनते ही राधिका की मुस्कान धीरे-धीरे फीकी पड़ गई। उसकी आँखों में आँसू भर आए। उसने कोशिश की खुद को संभालने की, लेकिन उसके अंदर कुछ टूट चुका था।
उस दिन उसकी आँखों में सिर्फ दर्द ही नहीं था… उन आँसुओं के पीछे एक गहरी जलन और ठुकराए जाने का अहसास भी छिपा था। बिना कुछ कहे वो वहाँ से चली गई, लेकिन उसके दिल में एक ऐसी चुभन रह गई, जो आगे चलकर बहुत बड़ा तूफ़ान बन सकती थी।
भूख, डर और टूटती हुई आत्मा...
सुबह हल्की-हल्की धूप कमरे की खिड़की से अंदर आ रही थी। मशीनों की धीमी आवाज़ के बीच अचानक सिया की उंगलियाँ हल्की-सी हिलीं।
उसने धीरे-धीरे आँखें खोलीं। कुछ पल तक वह छत को देखती रही, जैसे समझ ही नहीं पा रही हो कि वह कहाँ है। फिर अचानक उसके चेहरे पर घबराहट छा गई।
वह जोर से चिल्लाई—
“मुझे भूख लगी है… बहुत तेज़ भूख लगी है… मैंने पाँच दिन से कुछ नहीं खाया… प्लीज़ मुझे खाना दो…”
उसकी आवाज़ में इतनी बेचैनी थी कि बाहर खड़ा आदित्य घबराकर अंदर दौड़ आया।
“सिया… मैं यहाँ हूँ… रुको, अभी लाता हूँ खाना…”
वह तुरंत कैंटीन से खाना लेकर आया। प्लेट उसके सामने रखी। सिया ने खाना देखा और जैसे टूट पड़ी। वह तेजी से खाने लगी, जैसे बरसों से भूखी हो।
लेकिन अचानक उसके हाथ रुक गए। उसकी साँसें तेज़ हो गईं। आँखों में अजीब-सा डर उतर आया। उसने काँपते हाथों से प्लेट दूर फेंक दी।
“नहीं… नहीं… ये मत दो… मुझे वो दवा दो… वही दवा चाहिए… मुझे वही चाहिए…”
वह बिस्तर के कोने में सिमट गई, अपने घुटनों को सीने से लगाकर काँपने लगी। उसके होंठ सूख रहे थे, आँखें लाल हो चुकी थीं, और चेहरा पसीने से भीग गया था।
डॉ. कबीर ने उसकी हालत देखी। उन्होंने गहरी साँस ली और धीमे स्वर में कहा—
“आदित्य… ये ड्रग्स की लत है। उसके शरीर को अब उसी दवा की आदत हो चुकी है। जब वो दवा नहीं मिलती, तो उसका शरीर और दिमाग इसी तरह प्रतिक्रिया करते हैं। उसे घबराहट, डर और बेचैनी महसूस होती है।”
आदित्य की आँखों से आँसू बह निकले।
उसने सिया का काँपता हुआ हाथ पकड़ा और टूटती आवाज़ में कहा—
“किसने किया ये सब…? किसने तुम्हें इस हालत में पहुँचाया…?”
उसके दिल में दर्द था… और साथ ही एक आग भी, जो सच जानने के लिए जल रही थी।
हिप्नोसिस और दर्दनाक सच...
सिया को अगले दिन एक अनुभवी मनोचिकित्सक के पास ले जाया गया। कमरा शांत था। हल्की रोशनी और धीमी आवाज़ में बजता संगीत माहौल को स्थिर बना रहा था। आदित्य की धड़कनें तेज़ थीं, लेकिन डॉक्टर का चेहरा शांत था।
डॉक्टर ने सिया से नरम आवाज़ में कहा,
“सिया… अब तुम बिल्कुल सुरक्षित हो। गहरी साँस लो… और धीरे-धीरे एक महीने पीछे जाओ। मुझे बताओ, उस समय क्या हुआ था?”
सिया की पलकें भारी हो गईं। कुछ पल बाद उसकी आँखों के कोनों से आँसू बहने लगे।
धीमी, काँपती हुई आवाज़ में वह बोली,
“मेरी पहली सैलरी आई थी… मैं बहुत खुश थी… मैंने वो पैसे मम्मी-पापा को दिए थे… वो भी बहुत खुश थे… उस दिन मुझे लगा था कि मेरी ज़िंदगी बदल गई है…”
डॉक्टर ने शांत स्वर में पूछा,
“उसके बाद?”
सिया ने गहरी साँस ली।
“उसके बाद राधिका मिली… उसने कहा चलो कैफे चलते हैं… उसने मुझे कॉफी दी… कॉफी का स्वाद अलग था… लेकिन बहुत अच्छा लगा… उसके बाद बार-बार वही कॉफी पीने का मन करता… जैसे उसके बिना मन नहीं मानता था…”
आदित्य की मुट्ठियाँ भींच गईं।
डॉक्टर ने फिर पूछा,
“फिर घर पर क्या हुआ?”
सिया की आवाज़ और धीमी हो गई।
“फिर मम्मी कहने लगीं कि मैं अजीब व्यवहार कर रही हूँ… वो मुझे कमरे में बंद कर देती थीं… कहती थीं मैं ठीक नहीं हूँ… मुझे खाना कम देती थीं… कभी-कभी बिल्कुल नहीं… और फिर पानी के साथ एक दवा देती थीं… वो दवा खाते ही मुझे बहुत सुकून मिलता था… बहुत अच्छा लगता था… जैसे सारी बेचैनी खत्म हो जाती थी…”
उसकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।
“लेकिन जब वो दवा नहीं मिलती थी… तो मैं घबरा जाती थी… मुझे गुस्सा आता था… शरीर काँपता था… मुझे वही दवा चाहिए होती थी…”
कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया।
डॉक्टर ने गंभीर आवाज़ में कहा,
“शुरुआत कॉफी से हुई। संभव है कि उसी में पहली बार नशे की मिलावट की गई हो। उसके बाद जिस ‘दवा’ का ज़िक्र सिया कर रही है, वही उसकी लत बन गई। किसी ने बहुत सोची-समझी योजना के तहत उसे धीरे-धीरे इस हालत में पहुँचाया… ताकि सबको लगे कि वह मानसिक रूप से अस्थिर है।”
आदित्य की आँखों में दर्द और गुस्सा दोनों थे।
अब उसका शक यकीन में बदलने लगा था — यह सब एक साज़िश थी।
साजिश का पर्दाफाश...
उस शाम आसमान में हल्की बारिश हो रही थी। आदित्य यूँ ही ऑफिस से लौटते समय उसी कैफे के पास से गुज़रा, जहाँ कभी सिया और राधिका साथ बैठा करती थीं।
अचानक उसकी नज़र अंदर पड़ी — राधिका अपने दोस्तों के साथ बैठी हँस रही थी।
आदित्य का दिल अनजाने डर से धड़क उठा। वो चुपचाप दरवाज़े के पास रुक गया।
तभी उसने राधिका की आवाज़ साफ़ सुनी—
“मैंने सिया को उसकी औकात दिखा दी। हर जगह वो मुझसे आगे निकल जाती थी। कॉलेज में, नौकरी में… हर जगह! अब देखो, सब उसे पागल समझते हैं।”
उसकी दोस्त हँस पड़ी।
“लेकिन तूने किया क्या?”
राधिका ने कॉफी का कप मेज़ पर रखते हुए कहा—
“पहले उसे कैफे में कॉफी में हल्की-सी दवा दी… फिर उसके घरवालों को यकीन दिलाया कि वो मानसिक रूप से ठीक नहीं है। बाकी काम उन दवाइयों ने कर दिया।”
आदित्य के हाथ काँपने लगे। उसकी आँखों में गुस्सा और दर्द दोनों भर आए।
उसने तुरंत मोबाइल निकाला… और सारी बातें रिकॉर्ड कर लीं।
उस रात घर में सब इकट्ठा थे। सिया के माता-पिता, आदित्य और कुछ करीबी लोग।
आदित्य ने बिना कुछ कहे टीवी स्क्रीन पर वीडियो चला दिया।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
राधिका की वही हँसती हुई आवाज़ गूँज रही थी।
वीडियो खत्म होते ही सबकी नज़रें राधिका पर टिक गईं।
कुछ पल वो चुप रही… फिर अचानक चीख पड़ी—
“हाँ! मैंने किया ये सब! मैं उससे जलती थी! बचपन से लेकर आज तक, हर बार वो मुझसे आगे रही। जब मैंने तीन बार एग्जाम दिया और फेल हो गई… वो एक बार में पास हो गई। जब मुझे नौकरी नहीं मिली… उसे लाखों का पैकेज मिल गया। और ऊपर से… आदित्य भी उसे ही चाहता था!”
उसकी आँखों में गुस्सा था, लेकिन आवाज़ में टूटन।
सिया की आँखों से आँसू बहने लगे। वो काँपती हुई आवाज़ में बोली—
“राधिका… मैंने तो कभी तुम्हारा बुरा नहीं चाहा। तुम मेरी सबसे अच्छी दोस्त थीं। मैं तो तुम्हारी हर जीत पर खुश होती थी… तुमने दोस्ती के नाम पर मुझे ज़हर दिया…”
कमरे में खामोशी छा गई।
राधिका के पास कोई जवाब नहीं था।
उसका सिर झुक गया।
आँखों से आँसू गिरने लगे… लेकिन अब पछतावे का समय निकल चुका था।
उस दिन सिर्फ एक साज़िश का पर्दाफाश नहीं हुआ था —
एक दोस्ती भी हमेशा के लिए खत्म हो गई थी।
दर्द से उबरती हुई सिया...
सिया को रिहैब सेंटर में भर्ती कराया गया।
शुरुआत के दिन उसके लिए बहुत कठिन थे।
पहले दिन उसका पूरा शरीर काँप रहा था। हाथ ठंडे पड़ जाते, माथे पर पसीना आ जाता। वो बेचैन होकर बार-बार कहती,
“मुझे वो दवा चाहिए… प्लीज़…”
उसकी आवाज़ में दर्द था, लाचारी थी। डॉक्टर समझाते, नर्स उसे संभालतीं, लेकिन उसकी आँखों में डर साफ दिखाई देता था।
दूसरे दिन उसकी बेचैनी आँसुओं में बदल गई।
वो बिना वजह रोती रहती। कभी अपने माता-पिता को याद करती, कभी खुद को दोष देती।
“मैं इतनी कमजोर कैसे हो गई…?”
वो खुद से सवाल करती और फिर चुप हो जाती।
तीसरे दिन उसके अंदर गुस्सा उमड़ आया।
वो तकिये फेंक देती, चीज़ों को दूर धकेल देती।
“सबने मुझे धोखा दिया… किसी ने सच क्यों नहीं बताया…?”
उसकी आवाज़ में टूटे हुए भरोसे की चुभन थी।
लेकिन इन सब के बीच एक चीज़ कभी नहीं बदली — आदित्य का साथ।
वो हर दिन समय पर आता। कमरे में चुपचाप बैठ जाता।
सिया का काँपता हुआ हाथ अपने हाथों में लेकर धीरे से कहता,
“तुम अकेली नहीं हो… मैं यहीं हूँ… जब तक तुम पूरी तरह ठीक नहीं हो जाती, मैं कहीं नहीं जाऊँगा।”
कभी वो उसके लिए उसकी पसंद की किताब लाता, कभी बस चुपचाप उसके पास बैठा रहता।
जब सिया रोती, तो वो उसके आँसू पोंछ देता।
जब सिया गुस्सा करती, तो वो बिना नाराज़ हुए उसकी बातें सुनता।
धीरे-धीरे दवाइयों का असर कम होने लगा।
उसकी साँसें पहले से शांत होने लगीं।
चेहरे की घबराहट कम होने लगी।
एक दिन उसने खिड़की से बाहर झाँककर हल्की-सी मुस्कान दी।
आदित्य ने महीनों बाद उसकी आँखों में वो पुरानी चमक देखी — वही आत्मविश्वास, वही मासूमियत।
उस दिन सिया ने धीमे से कहा,
“शायद… मैं सच में ठीक हो रही हूँ…”
और आदित्य ने जवाब दिया,
“नहीं… तुम सिर्फ ठीक नहीं हो रही… तुम पहले से भी ज्यादा मजबूत बन रही हो।”
छह महीने बाद…
सिया अब पूरी तरह स्वस्थ हो चुकी थी।
उसकी आँखों में फिर से वही पुरानी चमक लौट आई थी, जो कभी खो गई थी।
चेहरे पर सुकून था, और दिल में एक नया विश्वास।
एक शाम, हल्की हवा चल रही थी। सूरज ढल रहा था और आसमान सुनहरे रंग में रंगा हुआ था। आदित्य ने सिया को उसी जगह बुलाया, जहाँ कभी उसने उसे पहली बार मुस्कुराते हुए देखा था।
आदित्य धीरे-धीरे उसके सामने आया। उसकी आँखों में घबराहट भी थी और प्यार भी।
वह सिया के सामने घुटनों पर बैठ गया।
उसकी आवाज़ हल्की काँप रही थी।
“सिया… क्या तुम मेरे साथ पूरी ज़िंदगी चलोगी?
क्या तुम हर खुशी और हर मुश्किल में मेरा हाथ थामोगी?”
सिया कुछ पल उसे देखती रही। उसकी आँखें भर आईं।
आँसू गालों पर धीरे-धीरे बहने लगे।
वह बोली —
“जब मैं खुद को भी पहचान नहीं पा रही थी…
जब मैं टूट चुकी थी…
जब मुझे अपने ही अस्तित्व पर शक होने लगा था…
तब तुमने मेरा साथ नहीं छोड़ा।
तुमने मुझे अपनाया… संभाला…
मुझे यकीन दिलाया कि मैं कमजोर नहीं हूँ।
हाँ आदित्य… मैं तुम्हारे साथ पूरी ज़िंदगी चलना चाहती हूँ।”
आदित्य ने उसके हाथ को थाम लिया। उस पल में सिर्फ सुकून था।
कुछ समय बाद दोनों की शादी बहुत सादगी से हुई।
कोई दिखावा नहीं, कोई शोर नहीं — सिर्फ अपने लोग और सच्ची खुशियाँ।
रिसेप्शन के दिन सिया ने मंच पर खड़े होकर सबकी तरफ देखा।
उसकी आवाज़ धीमी थी, लेकिन भावनाओं से भरी हुई।
“एक समय था… जब मुझे खाने से डर लगता था।
एक समय था… जब मैं खुद को खो चुकी थी।
मुझे लगता था मेरी ज़िंदगी खत्म हो गई है।
लेकिन आज…
मुझे प्यार मिला है।
मुझे भरोसा मिला है।
मुझे वो इंसान मिला जिसने मेरे टूटे हुए हिस्सों को फिर से जोड़ दिया।
और सबसे बड़ी बात —
आज मुझे मेरा सच मिल गया है।
मुझे मेरा आत्मविश्वास वापस मिल गया है।”
हॉल में सन्नाटा था।
कई लोगों की आँखें नम थीं।
आदित्य ने आगे बढ़कर सिया का हाथ थाम लिया।
अब उनके बीच डर नहीं था — सिर्फ विश्वास और प्यार था।
और उस दिन से उनकी ज़िंदगी एक नए, सच्चे और मजबूत रिश्ते की शुरुआत बन गई।
कहानी का संदेश:
जलन इंसान की सोच पर ऐसा पर्दा डाल देती है कि उसे सही और गलत में फर्क नजर नहीं आता।
सच्चा प्यार मुश्किलों से भागता नहीं, बल्कि हर परिस्थिति में मजबूती से साथ निभाता है।
सच भले ही देर से सामने आए, लेकिन जब आता है तो हर झूठ को बेनकाब कर देता है।

Post a Comment