जब डर ने आवाज़ पाई

 

Emotional moment inside an Indian police station where two sisters seek help from a police officer


रसोई में चूल्हा जल रहा था,

दाल की हल्की-सी खुशबू हवा में घुल रही थी।


अनु के हाथ चल तो रहे थे,

पर मन कहीं और अटका हुआ था।


तभी मोबाइल बजा।


स्क्रीन पर नाम उभरा — रीमा।


अनु के होंठों पर अपने-आप हल्की-सी मुस्कान आ गई।

मन में आया—

आज अचानक छोटी बहन को मेरी याद कैसे आ गई?


उसने जल्दी से फोन उठाया,

कान से लगाते हुए बोली—

“अरे… आज अचानक कैसे फोन किया?”


दूसरी तरफ़ से कोई जवाब नहीं आया।


बस…

एक काँपती हुई साँस।


फिर थोड़ी देर बाद…

एक और टूटी हुई साँस।


और फिर—

दबा-दबा सा रोना,

जैसे कोई अपने आँसुओं को आवाज़ देने से डर रहा हो।


अनु का दिल उसी पल बैठ गया।


“रीमा? बोल… क्या हुआ?”


कई सेकंड बाद आवाज़ आई—

“दी… मैं ठीक नहीं हूँ।”


इतना कहना ही जैसे उसके बस में था।


अनु ने गैस बंद कर दी।

हाथ काँपने लगे।


“रीमा, सच बता।

डर मत… मैं हूँ।”


रीमा ने जैसे खुद को समेटते हुए कहा—

“आज दोपहर एक नंबर से कॉल आया।

वो आदमी…

मुझे नाम से बुला रहा था।”


अनु की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।

“नाम से?”


“हाँ दी…

वो मेरी हर बात जानता था।

मेरे कॉलेज जाने का टाइम…

पापा के ऑफिस से लौटने का समय…

यह तक कि मैं रात को किस कमरे में सोती हूँ…”


रीमा की आवाज़ काँप रही थी।

“उसने कहा—

अगर मैंने उसकी बात नहीं मानी

तो मेरी फोटो सब जगह डाल देगा।”


अनु की आँखें भर आईं।

“तूने क्या कहा?”


“मैं कुछ नहीं कह पाई दी…”

रीमा फूट-फूटकर रो पड़ी।

“मुझे उसकी बातें सुनकर ऐसा लगा

जैसे उसने मेरी रूह को गंदा कर दिया हो।”


कुछ पल की ख़ामोशी।


फिर रीमा ने टूटे हुए स्वर में कहा—

“उसने कहा है…

आज रात वो मुझसे मिलने आएगा।”


अनु की मुट्ठियाँ भींच गईं।

आँसू गालों पर थे,

पर आवाज़ में लोहा उतर आया।


“बस।

अब तू एक पल भी उससे नहीं डरेगी।”


“लेकिन दी…”

“कोई लेकिन नहीं!”


अनु ने गहरी साँस ली।

“तू मुझे उसकी सारी कॉल रिकॉर्डिंग भेज।

हर मैसेज।

अभी।”


फोन रखते ही

अनु की आँखों से आँसू बह निकले।


वो आँसू डर के नहीं थे…

गुस्से के थे।


शाम को जब उसके पति घर आए,

अनु ने बिना कुछ कहे

रिकॉर्डिंग चला दी।


कमरे में

घिन और सन्नाटा फैल गया।


उस रात कोई ठीक से सो नहीं पाया।


सुबह होते ही

अनु और उसका पति

रीमा को लेकर पुलिस स्टेशन पहुँचे।


रीमा की उँगलियाँ काँप रही थीं,

पर इस बार वो अकेली नहीं थी।


पुलिस ने सब सुना।

सब समझा।


जाँच में पता चला—

वो लड़का

उसी मोहल्ले में रहता था।


उसने रीमा को कमजोर समझा था।

अकेली लड़की।

डर जाएगी।


पर वो यह भूल गया था—

जब डर चुप न रहकर बोल उठता है,

तो वही डर ताक़त बन जाता है।


जब उसे हथकड़ी लगी,

तो रीमा की आँखें भर आईं।


पर इस बार आँसू डर के नहीं थे…

हल्के होने के थे।


घर लौटते हुए

रीमा ने अनु से कहा—

“दी…

अगर तू मेरी बात को हल्के में ले लेती

तो शायद मैं खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाती।”


अनु ने रीमा का सिर अपने कंधे पर रख दिया।

उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए धीरे से बोली—


“याद रखना, रीमा…

हमारी चुप्पी ही

उन जैसे लोगों की सबसे बड़ी ताक़त बन जाती है।”


आज भी हमारे समाज में

ऐसे बीमार सोच वाले लोग मौजूद हैं,

जो लड़कियों के डर को

अपना हथियार बना लेते हैं।


लेकिन अब वक्त बदल रहा है।


अब लड़कियाँ सिर्फ़ सहने के लिए नहीं बनी हैं।

अब वे डर को पहचानती हैं,

उसका नाम लेती हैं

और बिना झुके

उसे पुलिस स्टेशन तक ले जाती हैं।


और वहीं जाकर—

डर अपनी आख़िरी साँस लेता है।





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