जिसने फ़र्ज़ निभाया वही अपना निकला

 

Elderly Indian mother holding the hand of a young man while two sons stand nearby in a family inheritance discussion inside a traditional Indian home.


“इंसान अक्सर यह सोचकर निश्चिंत हो जाता है कि जिन लोगों के लिए उसने अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया है, वे मुश्किल समय में उसका साथ कभी नहीं छोड़ेंगे। लेकिन जीवन का सच यह है कि रिश्तों की असली पहचान सुख में नहीं, बल्कि उस समय होती है जब इंसान कमजोर पड़ जाता है। तब पता चलता है कि कौन अपना है और कौन सिर्फ अपना होने का दिखावा करता रहा...”


“मम्मी जी, ये घर आखिर किसके नाम करने वाली हैं आप?”


रजनी देवी की बड़ी बहू ने सीधे सवाल किया।


कमरे में बैठे सभी लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।


रजनी देवी ने शांत स्वर में कहा, “जिसका हक होगा, उसी को मिलेगा।”


“हक?” छोटे बेटे नीरज ने व्यंग्य से कहा, “हम दोनों बेटे जिंदा हैं, फिर और किसका हक हो सकता है?”


रजनी देवी ने कोई जवाब नहीं दिया।


उसी समय दरवाजे की घंटी बजी।


घर का नौकर दौड़कर दरवाजा खोलने गया।


कुछ ही पल बाद एक साधारण कपड़े पहने युवक अंदर आया।


उसे देखते ही रजनी देवी के चेहरे पर मुस्कान आ गई।


“आ गया बेटा?”


“जी माँ जी।”


युवक ने झुककर उनके पैर छुए।


यह देखकर दोनों बेटों के चेहरे उतर गए।


क्योंकि वे जानते थे कि यह युवक कोई रिश्तेदार नहीं था।


उसका नाम दीपक था।


और पिछले दस वर्षों से वह इसी घर में रह रहा था।


लेकिन उसकी कहानी इस घर से बहुत पहले शुरू हुई थी।



रजनी देवी के पति सुरेश जी सरकारी स्कूल में शिक्षक थे।


दो बेटे थे—अमित और नीरज।


दोनों की पढ़ाई पर उन्होंने खूब खर्च किया।


अच्छे स्कूल, अच्छे कॉलेज, हर सुविधा दी।


उन्हें हमेशा लगता था कि बुढ़ापे में यही दोनों बेटे उनका सहारा बनेंगे।


लेकिन समय ने कुछ और ही सोच रखा था।


एक वर्ष बरसात के मौसम में सुरेश जी एक सड़क दुर्घटना का शिकार हो गए।


कई महीनों तक अस्पताल में भर्ती रहे।


उसी अस्पताल में एक दुबला-पतला किशोर लड़का रोज दिखाई देता था।


वह कभी मरीजों को पानी पिला रहा होता, कभी किसी बुजुर्ग को व्हीलचेयर पर बैठाकर ले जा रहा होता।


उसका नाम दीपक था।


वह अस्पताल के बाहर चाय की दुकान पर काम करता था।


माँ-बाप दोनों का देहांत हो चुका था।


कोई अपना नहीं था।


फिर भी उसके चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती थी।


एक दिन रात के समय सुरेश जी की तबीयत अचानक बिगड़ गई।


रजनी देवी घबरा गईं।


उन्होंने कई बार अपने दोनों बेटों को फोन किया।


लेकिन एक ने कहा, “माँ, मैं मीटिंग में हूँ।”


दूसरे ने कहा, “मैं शहर से बाहर हूँ।”


रजनी देवी अकेली रोने लगीं।


तभी दीपक वहाँ आया।


“माँ जी, आप चिंता मत कीजिए।”


उसने डॉक्टर बुलाया, दवा लाया और पूरी रात सुरेश जी के पास बैठा रहा।


उस रात के बाद दीपक रोज उनकी मदद करने लगा।


सुरेश जी अक्सर प्यार से दीपक के सिर पर हाथ फेरते हुए कहते,


“बेटा, हमारा तुझसे कोई खून का रिश्ता तो नहीं है, फिर भी तू हमारे लिए इतना सब कुछ क्यों करता है?”


दीपक हल्की मुस्कान के साथ जवाब देता,


“बाबूजी, हर रिश्ता खून से नहीं बनता। कुछ रिश्ते इंसानियत, अपनापन और दिल के भाव से भी बन जाते हैं। आपने मुझे सहारा दिया है, सम्मान दिया है... अब आपकी सेवा करना मेरा फ़र्ज़ है।”


धीरे-धीरे अस्पताल से छुट्टी मिल गई।


लेकिन सुरेश जी अब पहले जैसे स्वस्थ नहीं रहे।


रजनी देवी और सुरेश जी ने दीपक को अपने घर आने का निमंत्रण दिया।


पहले तो उसने मना किया।


लेकिन बहुत समझाने पर मान गया।


वह घर में रहने लगा।


दिन में काम करता और रात को पढ़ाई।


सुरेश जी ने उसकी पढ़ाई का खर्च उठाया।


कुछ वर्षों में दीपक ने स्नातक की पढ़ाई पूरी कर ली।


उधर दोनों बेटे नौकरी लगने के बाद दूसरे शहरों में बस गए।


शुरू-शुरू में फोन आते रहे।


फिर त्योहारों तक सीमित हो गए।


और बाद में त्योहार भी छूट गए।



समय बीतता गया।


सुरेश जी की तबीयत फिर बिगड़ने लगी।


इस बार बीमारी गंभीर थी।


रजनी देवी ने फिर दोनों बेटों को खबर दी।


लेकिन कोई नहीं आया।


कभी बच्चों की परीक्षा का बहाना।


कभी ऑफिस का काम।


कभी विदेश यात्रा।


उधर दीपक दिन-रात उनकी सेवा करता रहा।


दवा, अस्पताल, जांच, खाना—सब कुछ।


एक रात सुरेश जी ने उसका हाथ पकड़ लिया।


“दीपक...”


“जी बाबूजी।”


“अगर अगले जन्म में भगवान मुझे बेटा दे, तो तेरे जैसा दे।”


दीपक की आँखें भर आईं।


“ऐसा मत कहिए बाबूजी।”


“नहीं बेटा... आज दिल की बात कह रहा हूँ।”


कुछ दिनों बाद सुरेश जी दुनिया छोड़ गए।


उनकी चिता को अग्नि भी दीपक ने ही दी।


क्योंकि दोनों बेटे अंतिम समय तक नहीं पहुँच पाए।



तेरहवीं के बाद दोनों बेटे घर आए।


और आते ही संपत्ति की चर्चा शुरू हो गई।


“माँ, अब घर और जमीन का बँटवारा कर दीजिए।”


अमित ने कहा।


रजनी देवी चुप रहीं।


फिर उन्होंने अलमारी से एक फाइल निकाली।


“ये तुम्हारे पिता की वसीयत है।”


वकील ने वसीयत पढ़कर सुनाई।


संपूर्ण मकान और जमीन रजनी देवी के नाम थी।


और उनके बाद सब कुछ दीपक को मिलने वाला था।


यह सुनते ही दोनों बेटे भड़क उठे।


“एक गैर आदमी के नाम सब कुछ?”


“हम आखिर किसलिए हैं?”


रजनी देवी की आँखों में आँसू आ गए।


उन्होंने कहा,


“तुम लोग सिर्फ जन्म से मेरे बेटे हो।”


“लेकिन बेटे होने का फर्ज दीपक ने निभाया है।”


“जिस दिन तुम्हारे पिता अस्पताल में जिंदगी और मौत से लड़ रहे थे, उस दिन तुम दोनों अपने-अपने कामों में व्यस्त थे।”


“जिस दिन मुझे तेज बुखार था, उस दिन दीपक पूरी रात मेरे सिरहाने बैठा रहा।”


“जिस दिन घर में राशन खत्म था, उसी ने अपनी बचत लाकर मेरे हाथ में रख दी।”


“और जिस दिन तुम्हारे पिता की आँखें बंद हुईं, उस दिन भी वे दरवाजे की तरफ देखकर तुम्हारा इंतजार कर रहे थे।”


कमरे में सन्नाटा छा गया।


रजनी देवी ने आगे कहा,


“रिश्ते सिर्फ खून से नहीं बनते।”


“रिश्ते त्याग, सेवा और प्रेम से बनते हैं।”


“दीपक ने कभी कुछ माँगा नहीं।”


“लेकिन उसने वह सब दिया है, जो एक सच्चा बेटा देता है।”


दीपक की आँखों से आँसू बहने लगे।


वह बोला,


“माँ जी, मुझे कुछ नहीं चाहिए।”


लेकिन रजनी देवी ने उसका हाथ पकड़ लिया।


“बेटा, ये संपत्ति नहीं... तुम्हारे बाबूजी का आशीर्वाद है।”


“और इसे पाने का अधिकार तुमने अपने कर्मों से कमाया है।”


दोनों बेटे सिर झुकाकर खड़े रह गए।


क्योंकि उस दिन पहली बार उन्हें समझ आया कि...


सिर्फ जन्म देना किसी को अपना नहीं बनाता।


अपना वह होता है जो कठिन समय में बिना किसी स्वार्थ के साथ खड़ा रहता है।


और जो रिश्ते निभाता है, वही वास्तव में परिवार कहलाने का अधिकार रखता है।


जीवन में कई लोग हमारे साथ चलते हैं, लेकिन सच्चा अपना वही होता है जो हमारे बुरे समय में भी हमारा हाथ छोड़कर नहीं जाता।



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