जिस बहू को दबाना चाहते थे, वही पूरे परिवार पर भारी पड़ गई
"देख लेना, अगर अभी से इसे काबू में नहीं किया तो आने वाले समय में यही लड़की हमारे सिर पर चढ़कर नाचेगी।"
सावित्री देवी ने गुस्से में अपने बेटे अरुण से कहा।
अरुण चुपचाप बैठा रहा।
उसकी पत्नी निशा सामने आंगन में कपड़े सुखा रही थी।
सावित्री देवी फिर बोलीं, "बहू को जितनी छूट दोगे, उतनी ही सिर चढ़ेगी। घर की औरतों को हमेशा सीमा में रखना पड़ता है।"
तभी अरुण के पिता रघुनाथ जी भी बोल पड़े।
"तुम्हारी माँ सही कह रही है। हमारे जमाने में बहुएं सास-ससुर के सामने आंख उठाकर बात तक नहीं करती थीं।"
अरुण ने धीरे से कहा,
"पिताजी, हर बात में निशा को दोष देना ठीक नहीं है।"
"ओहो... अब तो बीवी की तरफदारी भी होने लगी।"
सावित्री देवी ताना मारते हुए बोलीं।
निशा ने सारी बातें सुन लीं लेकिन कुछ नहीं बोली।
वह जानती थी कि जवाब देने का मतलब होगा नया झगड़ा।
कई वर्षों से वह इसी घर में रह रही थी।
घर का हर काम करती थी।
सास-ससुर की सेवा करती थी।
देवर की पढ़ाई में मदद करती थी।
लेकिन बदले में उसे कभी सम्मान नहीं मिला।
कारण सिर्फ एक था।
वह अपने अधिकारों की बात करती थी।
वह गलत को गलत कहने की हिम्मत रखती थी।
यही बात घर वालों को पसंद नहीं थी।
कुछ समय पहले अरुण ने अपने दोस्त के साथ मिलकर व्यापार शुरू किया था।
व्यापार में घाटा हो गया।
कर्ज बढ़ने लगा।
तब रघुनाथ जी ने एक योजना बनाई।
उन्होंने निशा के मायके से मिले सारे गहने अपने पास रख लिए।
बहाना बनाया गया कि कुछ दिनों के लिए गिरवी रखे जा रहे हैं।
निशा ने विश्वास करके गहने दे दिए।
उसे लगा परिवार मुश्किल में है तो उसे भी साथ देना चाहिए।
लेकिन सच्चाई कुछ और थी।
गहने गिरवी नहीं रखे गए थे।
उन्हें बेच दिया गया था।
और उस पैसे का बड़ा हिस्सा छोटे बेटे विकास के लिए नई दुकान खरीदने में लगा दिया गया।
निशा को इस बात की कोई जानकारी नहीं थी।
वह लगातार सोचती रही कि एक दिन गहने वापस आ जाएंगे।
लेकिन महीनों बीत गए।
फिर साल गुजर गया।
जब भी वह गहनों के बारे में पूछती, कोई न कोई बहाना बना दिया जाता।
एक दिन घर में कुछ मेहमान आए।
बातों-बातों में विकास की पत्नी ने हंसते हुए कहा,
"दीदी, आपकी वजह से ही तो हमारी दुकान चल रही है।"
निशा चौंक गई।
"मेरी वजह से?"
"अरे... छोड़िए ना।"
विकास की पत्नी अचानक चुप हो गई।
लेकिन निशा के मन में शक पैदा हो चुका था।
उसने धीरे-धीरे सच जानने की कोशिश शुरू की।
कई दिनों तक वह चुप रही।
फिर उसे एक पुरानी फाइल मिली।
उस फाइल में गहनों की बिक्री की रसीदें रखी थीं।
रसीदों पर रघुनाथ जी के हस्ताक्षर थे।
निशा के हाथ कांपने लगे।
उसकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया।
जिस परिवार के लिए उसने सब कुछ कुर्बान कर दिया था, उसी परिवार ने उसके भरोसे को बेच दिया था।
उस रात वह सो नहीं पाई।
उसके भीतर कुछ टूट चुका था।
अगले दिन उसने पूरे परिवार को बैठक में बुलाया।
सब लोग इकट्ठा हुए।
रघुनाथ जी ने पूछा,
"क्या बात है?"
निशा ने फाइल मेज पर रख दी।
"पहले आप लोग ये बताइए कि मेरे गहने कहां हैं?"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
सावित्री देवी बोलीं,
"फिर वही बात शुरू कर दी?"
निशा ने रसीदें उनके सामने रख दीं।
"अब झूठ बोलिए।"
सबके चेहरे उतर गए।
अरुण भी हैरान था।
उसे भी पूरी सच्चाई नहीं पता थी।
रघुनाथ जी गुस्से में बोले,
"तो क्या हुआ अगर बेच दिए? घर के काम में ही तो पैसे लगे।"
निशा की आंखों में आंसू थे।
लेकिन इस बार उसकी आवाज मजबूत थी।
"घर के काम में नहीं, आपके पसंदीदा बेटे के काम में लगे।"
विकास सिर झुकाकर खड़ा था।
सावित्री देवी बोलीं,
"बहू, घर परिवार में ऐसी बातें होती रहती हैं।"
निशा हंस पड़ी।
वह हंसी दर्द से भरी हुई थी।
"धोखा भी अब परिवार की परंपरा बन गया है क्या?"
किसी के पास जवाब नहीं था।
निशा ने आगे कहा,
"आज तक मैंने इस घर को अपना घर समझा। लेकिन आप लोगों ने मुझे सिर्फ इस्तेमाल किया।"
अरुण शर्मिंदा था।
उसने पहली बार अपने माता-पिता के खिलाफ आवाज उठाई।
"आप लोगों ने बहुत गलत किया है।"
सावित्री देवी चीख पड़ीं।
"तू भी बीवी के साथ हो गया?"
अरुण बोला,
"मैं सच के साथ हूं।"
उस दिन घर में बड़ा विवाद हुआ।
लेकिन निशा अब डरने वाली नहीं थी।
उसने कानूनी सलाह ली।
अपने सारे दस्तावेज इकट्ठा किए।
गहनों की रसीदें, शादी के फोटो, खरीदारी के बिल।
सब कुछ सुरक्षित कर लिया।
जब परिवार को पता चला कि निशा कानूनी कार्रवाई कर सकती है तो उनके होश उड़ गए।
जो लोग उसे कमजोर समझते थे, अब वही डरने लगे।
गांव और रिश्तेदारी में धीरे-धीरे सच्चाई फैलने लगी।
लोग बातें करने लगे।
रघुनाथ जी की प्रतिष्ठा गिरने लगी।
विकास की दुकान भी नुकसान में जाने लगी।
क्योंकि लोग उस परिवार पर भरोसा नहीं करते थे।
कुछ महीनों बाद हालात ऐसे बने कि परिवार को निशा के सारे गहनों की कीमत वापस करनी पड़ी।
सिर्फ इतना ही नहीं।
उसे लिखित रूप में माफी भी मांगनी पड़ी।
जिस दिन सारे पैसे और सामान वापस मिला, उस दिन निशा ने सबकी तरफ देखा।
उसके चेहरे पर कोई घमंड नहीं था।
सिर्फ आत्मसम्मान था।
वह बोली,
"औरत का सम्मान करना सीखिए।"
"वह चुप रहती है तो इसका मतलब यह नहीं कि वह कमजोर है।"
"वह परिवार बचाने के लिए सहती है।"
"लेकिन जब उसके आत्मसम्मान पर चोट पहुंचती है, तब वही औरत अपने अधिकारों के लिए खड़ी होना भी जानती है।"
इतना कहकर निशा वहां से चली गई।
उसने अपने लिए नया घर लिया।
नई नौकरी शुरू की।
नई जिंदगी शुरू की।
पीछे छूट गया एक ऐसा परिवार जिसने रिश्तों की कीमत नहीं समझी।
और आगे था एक नया सफर।
जहां निशा किसी की बहू बनकर नहीं, बल्कि अपनी पहचान के साथ जी रही थी।

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