माँ के सम्मान के लिए
"मेरी शादी के मंडप में मेरी माँ का अपमान किया गया... लेकिन उस दिन जो सच सामने आया, उसने सबकी दुनिया बदल दी"
मेरा नाम सोनाली मिश्रा है।
मेरी उम्र तीस साल है।
आज से लगभग चार साल पहले मेरी जिंदगी में एक ऐसा दिन आया था जिसे मैं कभी भूल नहीं सकती।
वह दिन मेरी शादी का दिन था।
हर लड़की की तरह मैंने भी उस दिन के लिए बहुत सारे सपने सजाए थे।
नई जिंदगी...
नया परिवार...
नई शुरुआत...
लेकिन मुझे नहीं पता था कि उसी दिन मुझे अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला लेना पड़ेगा।
और वह फैसला सिर्फ मेरी जिंदगी नहीं, बल्कि कई लोगों की सोच भी बदलने वाला था।
शादी शहर के सबसे बड़े बैंक्वेट हॉल में हो रही थी।
पूरा हॉल रोशनी से जगमगा रहा था।
हर तरफ फूलों की सजावट थी।
सैकड़ों मेहमान मौजूद थे।
मेरे होने वाले पति का नाम विक्रम था।
हमारी सगाई को आठ महीने हो चुके थे।
विक्रम पढ़ा-लिखा था, अच्छी नौकरी करता था और देखने में भी अच्छा था।
मैंने सोचा था कि वह अच्छा इंसान भी होगा।
लेकिन इंसान की असली पहचान अक्सर मुश्किल समय में ही होती है।
मेरी माँ शारदा देवी थीं।
उन्होंने अकेले मुझे पाला था।
जब मैं आठ साल की थी, तब मेरे पिता का निधन हो गया था।
उसके बाद माँ ने लोगों के घरों में खाना बनाया, कपड़े सिले, और कई छोटे-मोटे काम किए।
उन्होंने खुद भूखा रहकर मुझे पढ़ाया।
आज मैं एक बड़ी कंपनी में मैनेजर थी।
जो कुछ भी थी, माँ की वजह से थी।
शादी की रस्में शुरू होने वाली थीं।
मैं दुल्हन के कमरे में बैठी थी।
माँ बार-बार आकर मेरा माथा चूम रही थीं।
उनकी आँखों में खुशी के आँसू थे।
उन्होंने कहा,
"बेटी, आज तुम्हारे पापा होते तो बहुत खुश होते।"
मैंने उनका हाथ पकड़ लिया।
"माँ, आज जो भी हूँ, आपकी वजह से हूँ।"
माँ मुस्कुरा दीं।
कुछ देर बाद जयमाला की तैयारी शुरू हुई।
सभी मेहमान मुख्य हॉल में इकट्ठा हो गए।
डीजे पर हल्का संगीत बज रहा था।
हँसी-मजाक का माहौल था।
तभी विक्रम की बुआ ने माइक उठाया।
शुरुआत में वे मजेदार बातें कर रही थीं।
सब लोग हँस रहे थे।
लेकिन अचानक उनकी नजर मेरी माँ पर गई।
उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,
"सच कहूँ तो हमें उम्मीद नहीं थी कि इतना बड़ा रिश्ता ऐसे घर में होगा।"
कुछ लोग चौंके।
कुछ लोग चुप रहे।
फिर उन्होंने आगे कहा,
"लेकिन क्या करें, आजकल डिग्री और नौकरी सब बदल देती है।"
हॉल में कुछ लोगों की हल्की हँसी सुनाई दी।
मेरी माँ का चेहरा उतर गया।
वे सिर झुकाकर खड़ी रहीं।
लेकिन बात यहीं नहीं रुकी।
विक्रम के चाचा भी पीछे नहीं रहे।
उन्होंने मुस्कुराते हुए मेरी माँ की ओर देखा और कहा,
"अरे भाभी जी, अब तो आपकी बेटी इतने बड़े घर की बहू बनने जा रही है। अब आपको काम करने की क्या जरूरत पड़ेगी?"
कुछ लोग हल्का-सा मुस्कुरा दिए।
लेकिन फिर उन्होंने व्यंग्य भरे लहजे में आगे कहा,
"हाँ, बस झाड़ू-पोंछा और बर्तन माँजने की आदत छोड़ने में थोड़ा समय जरूर लगेगा।"
इतना सुनते ही कई लोगों की हँसी गूँज उठी।
कुछ लोग खुलकर हँसने लगे, जबकि कुछ असहज होकर चुपचाप एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
उधर मेरी माँ सिर झुकाकर खड़ी थीं, और उनकी आँखों में अपमान के आँसू चमकने लगे थे।
मैंने दूर से माँ का चेहरा देखा।
उनकी आँखें भर आई थीं।
लेकिन वे कुछ नहीं बोलीं।
क्योंकि उन्होंने पूरी जिंदगी अपमान सहकर ही तो मुझे बड़ा किया था।
मैंने तुरंत विक्रम की तरफ देखा।
मुझे उम्मीद थी कि वह कुछ कहेगा।
कम से कम इतना तो कहेगा कि बस कीजिए।
लेकिन वह मुस्कुरा रहा था।
और सबसे दर्दनाक बात यह थी कि वह भी दूसरों के साथ हँस रहा था।
उस पल मेरे अंदर कुछ टूट गया।
मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे दिल पर चोट मार दी हो।
मैंने खुद से पूछा,
"क्या मैं सच में ऐसे इंसान के साथ पूरी जिंदगी बिताना चाहती हूँ?"
मैं धीरे-धीरे मंच की तरफ बढ़ी।
पूरा हॉल मुझे देखने लगा।
मैंने माइक अपने हाथ में लिया।
मेरे हाथ काँप रहे थे।
लेकिन मेरी आवाज़ बिल्कुल साफ थी।
"मैं कुछ कहना चाहती हूँ।"
हॉल शांत हो गया।
सभी लोग मेरी तरफ देखने लगे।
मैंने माँ की तरफ देखा।
फिर बोली,
"जिस महिला का अभी मजाक बनाया गया है, उसी महिला ने मुझे यहाँ तक पहुँचाया है।"
सन्नाटा छा गया।
"जब मेरी स्कूल की फीस भरने के लिए पैसे नहीं थे, तब इन्होंने अपनी चूड़ियाँ बेच दी थीं।"
"जब मैं बीमार पड़ जाती थी, तब ये पूरी-पूरी रात मेरे सिरहाने बैठकर मेरी देखभाल करती थीं।"
"जब दुनिया ने हमसे मुँह मोड़ लिया था, तब भी इन्होंने मेरा हाथ नहीं छोड़ा और हर मुश्किल में मेरे साथ खड़ी रहीं।"
मेरी आवाज़ भर्रा गई।
लेकिन मैं रुकी नहीं।
"आज अगर मैं इस मंच पर खड़ी हूँ तो सिर्फ मेरी माँ की वजह से।"
पूरा हॉल शांत था।
किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कुछ कहने की।
फिर मैंने विक्रम की तरफ देखा।
"और जिस आदमी से मेरी शादी होने वाली है, वह मेरी माँ का अपमान होते देखकर हँस रहा है।"
विक्रम का चेहरा उतर गया।
"अगर कोई मेरी माँ का सम्मान नहीं कर सकता, तो वह कभी मेरा सम्मान भी नहीं कर सकता।"
विक्रम बोला,
"सोनाली, बात को इतना बड़ा मत बनाओ।"
मैंने सिर हिलाया।
"यही तो सबसे बड़ी समस्या है, विक्रम। तुम्हें मेरी माँ का अपमान कोई बड़ी बात ही नहीं लग रही।"
उसके बाद मैंने वह बात कही जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी।
"मैं यह शादी नहीं करूँगी।"
पूरा हॉल स्तब्ध रह गया।
कुछ लोगों के हाथों से गिलास छूट गए।
कुछ लोग खड़े हो गए।
मेरी माँ घबरा गईं।
"बेटी, क्या कर रही हो?"
मैंने उनका हाथ पकड़ लिया।
"माँ, मैं अपना घर बना सकती हूँ।"
"लेकिन आपका सम्मान खोकर नहीं।"
इतना सुनते ही माँ रो पड़ीं।
विक्रम के पिता गुस्से में बोले,
"तुम हमारी बेइज्जती कर रही हो।"
मैंने शांत स्वर में जवाब दिया,
"बेइज्जती मैंने नहीं की।"
"शुरुआत आपने की थी।"
कुछ देर के लिए पूरा हॉल बिल्कुल शांत हो गया।
तभी अचानक एक बुजुर्ग मेहमान खड़े हुए।
वे मेरे कॉलेज के पुराने प्रिंसिपल थे।
उन्होंने कहा,
"आज इस लड़की ने वह किया है जो हर किसी में करने की हिम्मत नहीं होती।"
फिर उन्होंने मेरी माँ की तरफ देखकर कहा,
"बहन जी, आपने बहुत अच्छी बेटी को जन्म दिया है।"
धीरे-धीरे कई लोग खड़े हो गए।
कई महिलाओं की आँखों में आँसू थे।
एक महिला बोली,
"किसी का काम छोटा नहीं होता।"
दूसरे व्यक्ति ने कहा,
"सम्मान इंसान का होता है, पेशे का नहीं।"
पहली बार उस शाम तालियाँ बजीं।
और वे तालियाँ मेरे लिए नहीं थीं।
वे मेरी माँ के सम्मान के लिए थीं।
मेरी माँ रोते हुए मेरे गले लग गईं।
उस दिन शादी नहीं हुई।
लेकिन उस दिन मुझे अपनी सबसे बड़ी जीत मिली।
घर लौटते समय माँ बार-बार कह रही थीं,
"मेरी वजह से तुम्हारी शादी टूट गई।"
मैंने उनका हाथ पकड़कर कहा,
"नहीं माँ।"
"आपकी वजह से मेरी जिंदगी बच गई।"
आज चार साल बीत चुके हैं।
मैं खुश हूँ।
सफल हूँ।
और सबसे बड़ी बात...
मुझे अपने उस फैसले पर आज भी कोई पछतावा नहीं है।
क्योंकि शादी टूटने का दर्द कुछ समय का होता है।
लेकिन आत्मसम्मान खोने का दर्द पूरी जिंदगी रहता है।
और जिस घर में माँ का सम्मान न हो...
वहाँ बेटी की खुशियाँ भी कभी सुरक्षित नहीं रहतीं।

Post a Comment