विश्वास का लौटता हुआ कर्ज
मेरे हाथों में रखा वह पुराना नीला बैग अचानक बहुत भारी लगने लगा था, जबकि उसके भीतर सिर्फ कुछ कागज़ और एक डायरी थी। सामने बैठे युवक की आँखों में बेचैनी थी और वह बार-बार मेरी तरफ देखकर जैसे कुछ कहने की हिम्मत जुटा रहा था।
मैं रेलवे स्टेशन के प्रतीक्षालय में बैठा था। मेरी ट्रेन आने में अभी समय था। मैं सरकारी बैंक में काम करता था और एक जरूरी मीटिंग के सिलसिले में दूसरे शहर जा रहा था। घर पर पत्नी सीमा और बेटा रोहन मेरी राह देख रहे थे।
इतने में वह युवक मेरे सामने आकर खड़ा हो गया।
"सर... क्या मैं आपसे दो मिनट बात कर सकता हूँ?" उसने संकोच से पूछा।
मैंने उसकी तरफ देखा। उम्र मुश्किल से बाईस-तेईस साल होगी। कपड़े साफ थे, लेकिन पुराने। चेहरे पर थकान साफ दिखाई दे रही थी।
"हाँ, बोलो बेटा।"
उसने जेब से कुछ कागज़ निकाले और मेरी तरफ बढ़ा दिए।
"सर, मैं भीख नहीं माँग रहा। मुझे सिर्फ मदद चाहिए। अगर आपको लगे कि मैं झूठ बोल रहा हूँ, तो आप मना कर दीजिए।"
मैंने कागज़ देखे। वे किसी इंजीनियरिंग कॉलेज की फीस की रसीदें और प्रवेश पत्र थे।
"नाम क्या है तुम्हारा?" मैंने पूछा।
"राघव मिश्रा।"
"क्या परेशानी है?"
उसकी आँखें भर आईं।
"सर, मेरा चयन इंजीनियरिंग कॉलेज में हो गया है। पिताजी का देहांत दो साल पहले हो गया। माँ लोगों के घरों में खाना बनाती हैं। रिश्तेदारों ने कहा कि इतना पढ़-लिखकर क्या करोगे, कोई नौकरी कर लो। लेकिन मैं पढ़ना चाहता हूँ। फीस जमा करने की आखिरी तारीख कल है।"
मैं चुपचाप उसकी बातें सुनता रहा।
"कितने पैसे चाहिए?" मैंने पूछा।
"पच्चीस हजार रुपये।"
मेरे हाथ अनायास अपने बैग पर चले गए। उस बैग में ठीक तीस हजार रुपये थे। मैं वह रकम अपने घर की मरम्मत के लिए लेकर जा रहा था। बरसात में छत टपकने लगी थी और सीमा कई दिनों से कह रही थी कि इस बार काम जरूर करवा लेना।
मैं दुविधा में पड़ गया।
मन कह रहा था कि कहीं यह धोखा न हो।
लेकिन उसकी आँखों में जो डर था, वह बनावटी नहीं लग रहा था।
"अगर मैं पैसे दे दूँ, तो वापस कर पाओगे?" मैंने पूछा।
उसने तुरंत जवाब नहीं दिया।
कुछ पल बाद बोला, "सर, अभी तो मेरे पास कुछ नहीं है। लेकिन अगर जिंदगी ने मौका दिया, तो आपका एक-एक रुपया लौटाऊँगा। अगर न लौटा पाया, तो खुद को कभी माफ नहीं करूँगा।"
उसकी आवाज काँप रही थी।
मैंने बैग खोला।
पच्चीस हजार रुपये निकाले और उसकी तरफ बढ़ा दिए।
वह स्तब्ध रह गया।
"सर... आप मुझे जानते तक नहीं।"
"इंसान को पहचानने के लिए हमेशा सालों की पहचान जरूरी नहीं होती," मैंने मुस्कराकर कहा, "बस इतना याद रखना कि मेहनत और ईमानदारी मत छोड़ना।"
उसने झुककर मेरे पैर छू लिए।
उसकी आँखों से गिरे आँसू मेरे जूतों पर टपक पड़े।
"आपका नाम, सर?"
"महेश त्रिपाठी।"
"मैं आपको कभी नहीं भूलूँगा।"
मैंने अपना विजिटिंग कार्ड उसे दे दिया और ट्रेन आने पर चला गया।
घर पहुँचा तो सीमा ने पूछा, "मरम्मत के पैसे दे आए?"
मैंने सारी बात सच-सच बता दी।
सीमा कुछ देर तक मुझे देखती रही।
फिर बोली, "तुम भी ना... हर किसी पर भरोसा कर लेते हो।"
मैंने हँसने की कोशिश की।
"हो सकता है मैं मूर्ख हूँ।"
सीमा ने गहरी साँस ली।
"अगर लड़का सच बोल रहा होगा, तो भगवान उसका भला करे।"
दिन बीतते गए।
करीब दो महीने बाद एक पत्र आया।
"आदरणीय सर, मैं राघव हूँ। कॉलेज में दाखिला हो गया है। आपके कारण मेरा सपना टूटने से बच गया। माँ ने आपके लिए बहुत दुआएँ भेजी हैं।"
उस पत्र के साथ कॉलेज का पहचान पत्र की प्रति भी थी।
मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई।
धीरे-धीरे यह सिलसिला बन गया।
हर कुछ महीनों में उसका एक छोटा सा पत्र आता।
वह अपनी पढ़ाई के बारे में बताता।
माँ की तबीयत का हाल लिखता।
मेरे बेटे रोहन के लिए शुभकामनाएँ भेजता।
मैं कभी-कभी अपनी हैसियत के अनुसार दो-चार हजार रुपये भेज देता।
सीमा अब नाराज़ नहीं होती थी।
वह खुद पूछती, "राघव का कोई पत्र आया क्या?"
चार साल बाद उसका पत्र आया।
"सर, मेरी नौकरी लग गई है।"
उस दिन मुझे ऐसा लगा जैसे अपने बेटे की सफलता की खबर मिली हो।
फिर उसका दूसरा पत्र आया।
वह विदेश जा रहा था।
उसने लिखा था—
"आपने मुझ पर भरोसा किया था। मैं उस भरोसे को कभी टूटने नहीं दूँगा।"
समय अपनी रफ्तार से चलता रहा।
रोहन की पढ़ाई पूरी हो गई।
उसकी शादी की बातें शुरू हो गईं।
इसी बीच मेरी नौकरी से सेवानिवृत्ति भी हो गई।
पेंशन से घर चल रहा था।
रोहन की शादी तय हुई तो खर्चों की चिंता फिर सिर उठाने लगी।
मैं हिसाब लगाता और चुप हो जाता।
सीमा समझ जाती।
"सब ठीक हो जाएगा," वह कहती।
लेकिन कैसे होगा, यह हम दोनों नहीं जानते थे।
शादी में सिर्फ बीस दिन बचे थे कि एक कुरियर आया।
उसमें एक लिफाफा था।
मैंने खोला।
अंदर एक चेक था।
राशि देखकर मेरे हाथ काँप गए।
पचास लाख रुपये।
साथ में एक पत्र था।
"आदरणीय पिताजी,
आपने कभी मुझे पराया नहीं समझा। जिस दिन पूरी दुनिया मुझ पर शक कर रही थी, उस दिन आपने मुझ पर विश्वास किया था।
आपके पच्चीस हजार रुपये ने सिर्फ मेरी फीस नहीं भरी थी, उसने मेरी जिंदगी बदल दी थी।
आज जो कुछ हूँ, आपकी वजह से हूँ।
यह कोई एहसान चुकाना नहीं है, क्योंकि आपका कर्ज कभी नहीं उतर सकता।
यह राशि रोहन भैया की शादी के लिए मेरी तरफ से छोटा सा उपहार है।
माँ को प्रणाम।
आपका बेटा, राघव"
पत्र पढ़ते-पढ़ते मेरी आँखें नम हो गईं।
सीमा मेरे पास खड़ी थी।
वह भी रो रही थी।
"देखा," उसने धीमे से कहा, "तुम मूर्ख नहीं थे।"
शादी की तैयारियाँ चल रही थीं कि घर के बाहर कई गाड़ियों का काफिला आकर रुका।
एक सजे-धजे युवक ने उतरकर सीधे मेरे पास आकर मेरे पैर छू लिए।
मैं उसे पहचान नहीं पाया।
उसने मुस्कराकर कहा,
"पिताजी, राघव को भूल गए क्या?"
मैंने उसे सीने से लगा लिया।
वह अब बड़ा अधिकारी बन चुका था।
उसकी पत्नी और छोटी बेटी भी साथ थीं।
सीमा ने उसे गले लगा लिया।
रोहन उसे बड़े भाई की तरह घर के अंदर ले गया।
शादी के पूरे समारोह में राघव सबसे आगे रहा।
मेहमानों का स्वागत करना हो, खरीदारी करनी हो, व्यवस्थाएँ देखनी हों या रिश्तेदारों की खातिरदारी, वह हर काम ऐसे कर रहा था जैसे यह उसके अपने घर की शादी हो।
लोग मुझसे पूछते,
"ये आपका कौन लगता है?"
मैं मुस्कराकर कहता,
"रिश्ते खून से ही बनें, यह जरूरी नहीं होता।"
शादी बहुत अच्छे से संपन्न हुई।
शादी की सारी रस्में पूरी होने के बाद घर का माहौल धीरे-धीरे शांत होने लगा।
राघव के वापस लौटने का दिन भी आ गया था।
घर से निकलते समय उसकी आँखें सबसे ज्यादा नम थीं।
रोहन ने उसे गले लगाकर कहा,
"तुम सिर्फ दोस्त या भाई नहीं हो। तुम इस घर का हिस्सा हो।"
कुछ दिनों बाद उसे वापस विदेश लौटना था।
हवाई अड्डे पर विदा करते समय उसने मेरा हाथ पकड़ लिया।
"पिताजी, अगर उस दिन आप मुझ पर भरोसा नहीं करते, तो शायद मैं आज किसी छोटी दुकान पर काम कर रहा होता।"
मैंने उसकी तरफ देखा।
"नहीं बेटा," मैंने कहा, "अगर तुम्हारे भीतर मेहनत और ईमानदारी नहीं होती, तो मेरा भरोसा भी बेकार चला जाता।"
उसने मेरी आँखों में देखते हुए कहा,
"दुनिया में अच्छे लोग अभी भी हैं। इसलिए दुनिया खूबसूरत है।"
मैंने उसके सिर पर हाथ फेर दिया।
विमान धीरे-धीरे आसमान की ओर बढ़ गया।
मैं बहुत देर तक उसे देखता रहा।
उस पल मुझे लगा कि इंसान द्वारा किया गया सच्चा विश्वास कभी व्यर्थ नहीं जाता।
हर मदद लौटकर पैसे के रूप में नहीं आती, लेकिन जो मदद किसी की जिंदगी बदल दे, वह किसी न किसी रूप में जरूर वापस आती है।
और तब समझ आता है कि दुनिया अभी भी सिर्फ स्वार्थ पर नहीं, बल्कि भरोसे, इंसानियत और नेक दिल लोगों की वजह से चल रही है।

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