सम्मान माँगा नहीं, कमाया जाता है
“कई बार इंसान यह सोच लेता है कि जिन लोगों ने जीवन भर उसका साथ नहीं दिया, वे मुसीबत खत्म होते ही अपने आप बदल जाएंगे। उसे लगता है कि खून के रिश्ते कभी पूरी तरह टूट नहीं सकते। लेकिन समय यह सिखा देता है कि रिश्ता सिर्फ नाम का नहीं, निभाने का भी होता है। जो लोग ज़रूरत के समय साथ छोड़ देते हैं, वे अक्सर खुशियों के समय अपना हक जताने सबसे पहले आ जाते हैं।”
निशा अपने छोटे से घर के बरामदे में बैठी शादी के कार्ड देख रही थी। उसका बेटा आदित्य अगले महीने शादी करने वाला था। घर में खुशी का माहौल था। रिश्तेदारों को फोन किए जा रहे थे और शादी की तैयारियां जोरों पर चल रही थीं।
तभी उसका मोबाइल बजा।
स्क्रीन पर नाम देखकर निशा कुछ पल के लिए चुप रह गई।
फोन उसकी बड़ी ननद सविता का था।
“हैलो भाभी, सुना है आदित्य की शादी तय हो गई है?” सविता ने फोन पर पूछा।
“हाँ दीदी, अगले महीने शादी है। सब कुछ इतनी जल्दी तय हुआ कि आपको बताने का मौका ही नहीं मिला।” निशा ने विनम्रता से कहा।
“अच्छा! हमें तो किसी और से यह खबर मिली। लगता है अब हमारी कोई अहमियत ही नहीं रही तुम्हारे घर में।” सविता ने नाराज़गी जताते हुए कहा।
निशा कुछ समझाने ही वाली थी कि सविता बिना रुके बोलती चली गई।
“देखो भाभी, हम कोई दूर के रिश्तेदार नहीं हैं। आदित्य की बुआ होने के नाते हमारी भी एक इज्जत और जगह है। शादी में हमारा पूरा मान-सम्मान होना चाहिए। लड़की वालों के सामने हमारी खातिरदारी में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए। मिलनी में मेरे लिए अच्छा सा सोने का सेट रखना और मेरे पति के लिए भी बढ़िया उपहार होना चाहिए। बच्चों के लिए भी अच्छे ब्रांडेड कपड़े और गिफ्ट जरूर रखना। आखिर हम कोई आम मेहमान थोड़े ही हैं।”
निशा चुपचाप उनकी बातें सुनती रही। फोन के दूसरी तरफ सविता लगातार अपनी अपेक्षाएँ और हिदायतें देती जा रही थी, जबकि निशा के मन में बीते वर्षों की अनेक यादें एक-एक करके ताज़ा होने लगी थीं।
फोन रखने के बाद उसके मन में कई पुराने घाव फिर हरे हो गए।
बारह साल पहले की बात थी।
उसके पति राजेश एक सड़क दुर्घटना में अचानक दुनिया छोड़ गए थे।
उस समय आदित्य सिर्फ चौदह साल का था और उसकी छोटी बेटी प्रिया आठ साल की।
पति की मृत्यु के बाद निशा पूरी तरह टूट गई थी।
उसे उम्मीद थी कि परिवार उसका सहारा बनेगा।
लेकिन हुआ बिल्कुल उल्टा।
राजेश के जाने के कुछ ही दिनों बाद ससुराल वालों का व्यवहार बदलने लगा।
सविता और उसके पति अक्सर सास-ससुर को भड़काते रहते।
वे कहते, “अब राजेश नहीं रहे। निशा और उसके बच्चों का खर्च कौन उठाएगा? इन्हें अलग कर दीजिए।”
धीरे-धीरे माहौल इतना खराब हो गया कि निशा को बच्चों के साथ घर छोड़ना पड़ा।
किराए के छोटे से मकान में उसने नई जिंदगी शुरू की।
राजेश एक बैंक में अधिकारी थे। उनकी जगह निशा को नौकरी मिल गई।
उसने दिन-रात मेहनत की।
कभी बच्चों की फीस की चिंता, कभी घर का किराया।
कई बार ऐसा हुआ कि उसने खुद नए कपड़े नहीं खरीदे, लेकिन बच्चों की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी।
इन बारह वर्षों में सविता ने शायद ही कभी फोन किया हो।
न बच्चों की पढ़ाई पूछी।
न उनकी बीमारी में साथ दिया।
न किसी त्योहार पर हालचाल लिया।
आदित्य ने इंजीनियरिंग पूरी की और एक बड़ी कंपनी में नौकरी करने लगा।
प्रिया भी पढ़ाई में बहुत होशियार निकली।
धीरे-धीरे निशा की मेहनत रंग लाने लगी।
फिर एक दिन आदित्य ने अपनी माँ को बताया कि वह अपनी सहकर्मी अनुष्का से शादी करना चाहता है।
अनुष्का समझदार और संस्कारी लड़की थी।
निशा को भी वह बहुत पसंद आई।
दोनों परिवार मिले और रिश्ता तय हो गया।
शादी की खबर फैलते ही वही रिश्तेदार अचानक सक्रिय हो गए जो वर्षों से गायब थे।
कोई सलाह देने लगा।
कोई अपनी अहमियत बताने लगा।
कोई विशेष सम्मान की मांग करने लगा।
एक दिन सविता बिना बताए घर आ पहुँची।
साथ में उसके पति और दोनों बच्चे भी थे।
घर में बैठते ही उसने कहा,
“भाभी, शादी में हमारी जिम्मेदारी सबसे बड़ी होगी। आखिर हम बुआ हैं।”
निशा मुस्कुराकर चाय बनाने चली गई।
तभी सविता की नजर नए फर्नीचर पर पड़ी।
“अरे वाह! लगता है खूब पैसे आ गए हैं।”
उसके स्वर में अपनापन कम और जलन ज्यादा थी।
निशा ने बात टाल दी।
कुछ देर बाद सविता बोली,
“वैसे हमने सोचा है कि शादी में हमें अलग से सम्मान मिलना चाहिए। आखिर समाज में हमारी भी इज्जत है।”
आदित्य वहीं बैठा था।
वह अब तक चुप था।
लेकिन इस बार उसने शांत स्वर में कहा,
“बुआ जी, सम्मान कमाया जाता है, माँगा नहीं जाता।”
उसकी बात सुनते ही कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया।
सविता हैरानी से आदित्य का चेहरा देखने लगी। शायद उसे उम्मीद नहीं थी कि हमेशा चुप रहने वाला आदित्य आज इतनी स्पष्ट बात कहेगा।
आदित्य ने आगे कहा,
“जब पापा हमें छोड़कर चले गए थे, तब माँ बिल्कुल अकेली पड़ गई थीं। उस कठिन समय में उन्हें सहारे और अपनेपन की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी। लेकिन तब न आपने हमारा हाल पूछा, न हमारी परेशानियों में साथ खड़ी हुईं। माँ ने अकेले संघर्ष करके हमें पाला, पढ़ाया और इस मुकाम तक पहुँचाया है।”
उसने एक पल रुककर कहा,
“अगर उन मुश्किल दिनों में आपने हमारा साथ दिया होता, हमारा हौसला बढ़ाया होता, तो आज हम पूरे दिल से आपका सम्मान करते और गर्व से कहते कि हमारी बुआ हर सुख-दुख में हमारे साथ खड़ी रहीं। लेकिन सिर्फ रिश्ते का नाम भर होने से कोई सम्मान का अधिकारी नहीं बन जाता।”
सविता के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था। वह चुपचाप सिर झुकाकर बैठी रह गई।
आदित्य की आँखों में वर्षों का दर्द साफ दिखाई दे रहा था।
“माँ ने हमें अकेले पाला है। हमारी हर सफलता में उनका संघर्ष है। इसलिए इस शादी में सबसे बड़ा सम्मान अगर किसी का होगा तो सिर्फ माँ का।”
सविता और उसके पति एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
उनके पास कोई जवाब नहीं था।
कुछ देर बाद वे बहाना बनाकर चले गए।
उनके जाने के बाद निशा की आँखें भर आईं।
पहली बार उसे लगा कि उसके बच्चों ने उसके संघर्ष को सचमुच समझा है।
शादी का दिन भी आ गया।
सभी मेहमान आए।
हँसी-खुशी का माहौल था।
आदित्य ने स्टेज पर सबके सामने अपनी माँ का हाथ पकड़कर कहा,
“आज मैं जो कुछ भी हूँ, अपनी माँ की वजह से हूँ। उन्होंने माँ और पिता दोनों की जिम्मेदारी निभाई है।”
पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा।
निशा की आँखों से आँसू बह निकले।
लेकिन ये दुख के नहीं, गर्व के आँसू थे।
उधर सविता भी भीड़ में खड़ी थी।
आज उसे एहसास हो रहा था कि रिश्तों का सम्मान सिर्फ खून के रिश्ते होने से नहीं मिलता।
उसके लिए समय पर साथ देना पड़ता है।
निशा ने किसी से बदला नहीं लिया।
उसने सिर्फ अपनी खुशियों को उन लोगों के भरोसे छोड़ना बंद कर दिया जो केवल स्वार्थ के समय रिश्ते याद करते थे।
उस दिन उसे महसूस हुआ कि सच्चे रिश्ते वही होते हैं जो मुश्किल समय में हाथ थामें, न कि सफलता मिलने पर अधिकार जताने आ जाएँ।
दोस्तों, आपका क्या मानना है?
क्या आदित्य ने अपनी बुआ को सही जवाब दिया?
क्या केवल खून का रिश्ता होने से सम्मान मिल जाना चाहिए, या सम्मान के लिए रिश्ते निभाना भी जरूरी है?
अपनी राय अवश्य साझा कीजिए।

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