जिस बेटे को निकम्मा समझा गया, वही पूरे परिवार की डूबती नैया का सहारा बना
रसोई से बर्तनों के गिरने की तेज आवाज आई और उसके साथ ही उमा देवी की गुस्से भरी चीख पूरे घर में गूंज उठी।
"बस! अब और नहीं सहा जाता मुझसे। इस लड़के ने मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी है।"
डाइनिंग टेबल पर बैठे परिवार के सभी लोग चौंककर उनकी तरफ देखने लगे।
उमा देवी की उंगली उनके छोटे बेटे अर्जुन की तरफ उठी हुई थी।
अर्जुन चुपचाप सिर झुकाए बैठा था।
उसके बड़े भाई विकास ने भी ताना मारते हुए कहा, "माँ गलत नहीं कह रही हैं। तेरी उम्र के लड़के लाखों कमा रहे हैं और तू पिछले दो साल से घर पर बैठा है।"
"भैया, मैं कोशिश तो कर रहा हूँ..." अर्जुन ने धीरे से कहा।
"किस चीज़ की कोशिश?" विकास हंस पड़ा।
"दिनभर किताबें पढ़ना, कंप्यूटर पर बैठे रहना और बड़े-बड़े सपने देखना?"
पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया।
अर्जुन के पिता महेश जी ने भी कोई विरोध नहीं किया।
सच तो यह था कि पिछले दो सालों से अर्जुन किसी स्थायी नौकरी में नहीं था।
उसने कई इंटरव्यू दिए थे, लेकिन हर बार असफल हो गया।
धीरे-धीरे घरवालों का भरोसा उस पर से उठता जा रहा था।
केवल एक इंसान था जो अब भी उस पर विश्वास करता था।
उसकी भाभी पूजा।
जब भी कोई अर्जुन को ताने देता, पूजा हमेशा उसके पक्ष में खड़ी हो जाती।
लेकिन आज वह भी चुप थी।
अर्जुन ने सबकी बातें सुनीं और बिना कुछ कहे अपने कमरे में चला गया।
उसकी आंखें नम थीं।
उसे दुख बेरोजगारी का नहीं था।
दुख इस बात का था कि उसका अपना परिवार अब उसे बोझ समझने लगा था।
कमरे में पहुंचकर उसने लैपटॉप खोला।
स्क्रीन पर एक प्रोजेक्ट खुला हुआ था जिस पर वह पिछले डेढ़ साल से काम कर रहा था।
एक ऑनलाइन शिक्षा प्लेटफॉर्म।
वह चाहता था कि छोटे शहरों के बच्चों को सस्ती और अच्छी पढ़ाई मिल सके।
लेकिन अब तक उसे कोई निवेशक नहीं मिला था।
सबको लगता था कि वह समय बर्बाद कर रहा है।
उस रात उसने फैसला कर लिया।
अगर अगले तीन महीने में कुछ नहीं हुआ तो वह अपना सपना छोड़ देगा।
दिन गुजरते गए।
घर में ताने बढ़ते गए।
कभी बिजली का बिल आता तो विकास कहता,
"जिसे कमाना नहीं है, कम से कम खर्च तो कम करे।"
कभी कोई रिश्तेदार आता तो उमा देवी दुखी होकर कहतीं,
"बड़ा बेटा तो घर संभाल रहा है, छोटा न जाने कब समझदार बनेगा।"
अर्जुन मुस्कुराने की कोशिश करता लेकिन अंदर से टूटता जा रहा था।
फिर एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसने पूरे परिवार की जिंदगी बदल दी।
महेश जी की फैक्ट्री में अचानक भारी नुकसान हो गया।
एक बड़े ग्राहक ने करोड़ों का भुगतान रोक दिया।
कुछ ही दिनों में कर्जदार घर के चक्कर लगाने लगे।
विकास ने भी जिस कंपनी में निवेश किया था, वहां उसे भारी घाटा हो गया।
घर की आर्थिक स्थिति तेजी से बिगड़ने लगी।
जिस घर में कभी खुशहाली थी, वहां अब चिंता और तनाव का माहौल रहने लगा।
उमा देवी की रातों की नींद उड़ गई।
महेश जी का ब्लड प्रेशर बढ़ गया।
विकास परेशान रहने लगा।
एक रात पूरा परिवार बैठक में बैठा था।
महेश जी की आंखों में आंसू थे।
"शायद हमें यह घर बेचना पड़ेगा।"
यह सुनकर सबके चेहरे उतर गए।
यह वही घर था जिसे महेश जी ने अपनी पूरी जिंदगी की कमाई से बनाया था।
उमा देवी रो पड़ीं।
तभी अर्जुन धीरे से बोला,
"पापा, घर बेचने की जरूरत नहीं पड़ेगी।"
सभी ने उसकी तरफ देखा।
"तुम क्या कर लोगे?" विकास ने व्यंग्य से पूछा।
अर्जुन शांत रहा।
उसने अपना लैपटॉप खोला और स्क्रीन सबके सामने घुमा दी।
"तीन दिन पहले मेरे प्लेटफॉर्म को एक बड़ी कंपनी ने खरीदने का प्रस्ताव दिया है।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
"क्या मतलब?" महेश जी ने पूछा।
अर्जुन ने ईमेल दिखाया।
कंपनी उसके बनाए प्लेटफॉर्म को खरीदना चाहती थी।
राशि देखकर विकास की आंखें फटी रह गईं।
वह रकम फैक्ट्री का पूरा कर्ज चुकाने के लिए पर्याप्त थी।
कुछ देर तक किसी को कुछ समझ नहीं आया।
उमा देवी अविश्वास से अर्जुन को देखती रहीं।
"यह... यह सच है?"
अर्जुन मुस्कुराया।
"हाँ माँ।"
"मैं पिछले दो साल से इसी पर काम कर रहा था।"
उमा देवी की आंखों से आंसू बहने लगे।
उन्हें याद आने लगा कि कैसे उन्होंने बेटे को निकम्मा कहा था।
कैसे रिश्तेदारों के सामने उसका अपमान किया था।
कैसे हर दिन उसे ताने दिए थे।
महेश जी उठे और अर्जुन को गले लगा लिया।
"बेटा, हमें माफ कर देना।"
विकास भी शर्मिंदा था।
उसने पहली बार छोटे भाई के कंधे पर हाथ रखा।
"मुझसे गलती हुई अर्जुन।"
लेकिन सबसे ज्यादा टूट चुकी थीं उमा देवी।
वे अर्जुन के सामने आकर खड़ी हो गईं।
"बेटा, मैंने तुझे सबसे ज्यादा दुख दिया है।"
"मैंने हमेशा तेरा मुकाबला दूसरों से किया।"
"मैं तेरी मेहनत देख ही नहीं पाई।"
अर्जुन ने तुरंत माँ के हाथ पकड़ लिए।
"माँ, अगर आपकी डांट नहीं होती तो शायद मैं हार मान लेता।"
उमा देवी फूट-फूटकर रोने लगीं।
कई महीनों बाद घर में खुशी लौटी।
फैक्ट्री का कर्ज उतर गया।
घर बच गया।
लेकिन सबसे बड़ी बात यह हुई कि परिवार की सोच बदल गई।
उमा देवी अब किसी की सफलता को केवल नौकरी या वेतन से नहीं आंकती थीं।
वे अक्सर पड़ोस की महिलाओं से कहतीं,
"हर इंसान का समय अलग होता है।"
"जिस पौधे को बढ़ने में ज्यादा समय लगता है, वही कई बार सबसे बड़ा पेड़ बनता है।"
कुछ महीनों बाद अर्जुन ने अपने प्लेटफॉर्म का नया संस्करण शुरू किया।
इस बार वह हजारों बच्चों को पढ़ाई में मदद कर रहा था।
उद्घाटन समारोह में मंच पर महेश जी, उमा देवी और पूरा परिवार मौजूद था।
कार्यक्रम खत्म होने के बाद उमा देवी ने माइक उठाया और कहा,
"मैं आज एक बात स्वीकार करना चाहती हूँ।"
"मैंने अपने ही बेटे को निकम्मा समझ लिया था।"
"लेकिन उसी बेटे ने हमें सिखाया कि किसी इंसान की कीमत उसके वर्तमान से नहीं, उसकी मेहनत और इरादों से तय होती है।"
पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा।
अर्जुन की आंखें नम थीं।
उसे अपनी सफलता पर उतना गर्व नहीं था जितना इस बात पर था कि उसने अपने परिवार का विश्वास वापस जीत लिया था।
सीख:
किसी व्यक्ति को उसके कठिन समय के आधार पर कभी नहीं आंकना चाहिए। कई बार जो लोग बाहर से असफल दिखाई देते हैं, वे अंदर ही अंदर ऐसी लड़ाई लड़ रहे होते हैं जो एक दिन उन्हें और उनके पूरे परिवार को नई पहचान दिला देती है। धैर्य, विश्वास और मेहनत का फल देर से जरूर मिलता है, लेकिन मिलता अवश्य है।

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