माँ का सबसे बड़ा डर
"मेरा बेटा सिर्फ तीन दिन का था, लेकिन उसे सीने से लगाकर मैं पूरी रात रोती रही।"
रात के लगभग ढाई बजे थे।
पूरा घर गहरी नींद में सो रहा था।
कमरे की हल्की पीली रोशनी में बस दो लोग जाग रहे थे।
मैं...
और मेरा तीन दिन का बेटा।
उसकी छोटी-सी उंगलियाँ मेरी उंगली को कसकर पकड़े हुए थीं।
वह बिल्कुल निश्चिंत होकर मेरी गोद में सो रहा था।
मैं उसे लगातार देखे जा रही थी।
उसके माथे को चूमती, उसके गालों को सहलाती और बार-बार उसे अपने सीने से लगा लेती।
अचानक मेरी आँखों से आँसू बहने लगे।
फिर धीरे-धीरे सिसकियाँ निकलने लगीं।
और कुछ ही देर में मैं फूट-फूटकर रोने लगी।
बगल में सोई मेरी माँ घबरा गई।
वह तुरंत उठकर बैठ गई।
"क्या हुआ बेटा? तबीयत तो ठीक है ना?"
मैंने सिर हिलाया।
"हाँ मम्मी, मैं ठीक हूँ।"
माँ ने मेरे आँसू पोंछते हुए फिर पूछा,
"फिर क्यों रो रही हो बेटा?"
मैंने अपने बेटे की तरफ देखा और रोते हुए कहा,
"मम्मी, एक दिन यह बड़ा हो जाएगा।"
माँ मुस्कुराई।
"अरे, यह तो खुशी की बात है।"
लेकिन मैं और रोने लगी।
"नहीं मम्मी... एक दिन यह अपने पैरों पर खड़ा होगा, अपने सपने पूरे करेगा, अपनी दुनिया बसाएगा... और शायद तब इसे मेरी उतनी ज़रूरत नहीं रहेगी जितनी आज है।"
यह कहते-कहते मेरा गला भर आया।
"अभी तो यह हर पल मेरी गोद में रहता है, मेरी आवाज़ सुनकर शांत हो जाता है... लेकिन सोचती हूँ कि एक दिन यह इतना बड़ा हो जाएगा कि अपनी सारी बातें किसी और से करेगा, अपनी खुशियाँ किसी और के साथ बाँटेगा..."
मैं फूट-फूटकर रो पड़ी।
"मम्मी, मैं इसे इतना प्यार करती हूँ कि इसके बिना रहने की कल्पना भी नहीं कर पा रही..."
माँ कुछ पल मुझे देखती रही।
फिर उन्होंने गहरी साँस ली।
"बेटा, यही तो जिंदगी है। बच्चे हमारे पास हमेशा रहने के लिए नहीं आते।"
मैंने बेटे को और कसकर सीने से लगा लिया।
"लेकिन मैं इसके बिना नहीं रह पाऊँगी।"
माँ की आँखें भी भर आईं।
उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
"जब तुम छोटी थीं, तब मैं भी यही सोचती थी।"
मैं चुप हो गई।
माँ आगे बोलीं,
"जब तुम पहली बार स्कूल गई थीं, मैं घंटों रोई थी।"
"जब कॉलेज के लिए दूसरे शहर गईं, तब भी मैं कई रात सो नहीं पाई थी।"
"और जब तुम्हारी शादी हुई..."
यह कहते-कहते उनकी आवाज भर्रा गई।
"उस दिन तो लगा था जैसे मेरे शरीर का कोई हिस्सा मुझसे अलग हो गया हो।"
मैंने पहली बार उनकी आँखों में वह दर्द देखा जो शायद उन्होंने कभी बताया नहीं था।
मैं धीरे से बोली,
"मम्मी, आपने मुझे कभी यह सब क्यों नहीं बताया?"
माँ मुस्कुरा दीं।
"क्योंकि माँ का काम अपने आँसू दिखाना नहीं, बच्चों को हिम्मत देना होता है।"
कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
बेटा मेरी गोद में चैन से सो रहा था।
मैं उसे देख रही थी।
माँ मुझे देख रही थीं।
और शायद हम दोनों अपने-अपने समय में लौट गई थीं।
इतने में दरवाजा खुला।
मेरे पति की नींद भी टूट चुकी थी।
वह अंदर आए और बोले,
"अरे, यहाँ रात के तीन बजे माँ-बेटी की मीटिंग चल रही है क्या?"
माँ हल्का सा हँस दीं।
मैंने उन्हें सारी बात बता दी।
उन्होंने बेटे को गोद में लिया और मुस्कुराकर बोले,
"तुम अभी से बीस-पच्चीस साल आगे की चिंता कर रही हो?"
मैंने नाराज़ होकर कहा,
"तुम नहीं समझोगे।"
वह शांत स्वर में बोले,
"नहीं, मैं समझता हूँ।"
फिर उन्होंने बेटे के माथे को चूमा।
"लेकिन सोचो, अगर हम इसे हमेशा अपने पास ही रखना चाहें तो क्या यह अपने सपने पूरे कर पाएगा?"
मैं कुछ नहीं बोली।
उन्होंने कहा,
"हम बच्चों को अपने लिए नहीं पालते।"
"हम उन्हें इतना मजबूत बनाते हैं कि वे अपनी जिंदगी खुद जी सकें।"
"और जब वे उड़ना सीख जाएँ, तब हमें उनके पंख काटने नहीं, बल्कि उन्हें आशीर्वाद देना चाहिए।"
उनकी बात मेरे दिल में उतर गई।
उस रात मैं बहुत देर तक जागती रही।
मैंने अपने बेटे को देखा।
उसकी छोटी-सी हथेलियाँ।
उसकी मासूम मुस्कान।
उसकी धीमी साँसें।
और फिर अचानक मुझे एहसास हुआ।
मैं भविष्य के डर में आज की खुशियाँ खो रही थी।
जो बच्चा अभी मेरी गोद में है, वह अभी मेरा है।
जो पल अभी मेरे पास हैं, वही सबसे कीमती हैं।
कल क्या होगा, यह समय तय करेगा।
लेकिन आज...
आज मुझे उसे जी भरकर प्यार करना है।
सुबह होने लगी।
खिड़की से सूरज की पहली किरण कमरे में आई।
माँ चाय बनाने चली गईं।
पति फिर से सो गए।
और मैं अपने बेटे को सीने से लगाए मुस्कुरा रही थी।
उस दिन मैंने एक बात सीखी।
माँ-बाप बच्चों को खोते नहीं हैं।
वे बस उन्हें धीरे-धीरे दुनिया को सौंपते हैं।
और सच्चा प्रेम बाँधकर रखने में नहीं,
बल्कि उड़ने की आज़ादी देने में होता है।
क्योंकि बच्चे हमारी संपत्ति नहीं होते।
वे हमारे जीवन की सबसे सुंदर जिम्मेदारी होते हैं।
और शायद हर माँ के दिल में कहीं न कहीं यह इच्छा हमेशा रहती है—
"बेटा हो या बेटी,
बस इतना हो कि बड़े होकर भी कभी माँ का हाथ पकड़ना न भूले।"

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