माँ का घर
बस्ती के पुराने बस अड्डे पर बैठी वह बुज़ुर्ग महिला अपनी गोद में रखा कपड़े का छोटा-सा थैला बार-बार ठीक कर रही थी। उसकी आँखें हर आती-जाती बस पर टिक जातीं, फिर धीरे-धीरे बुझ जातीं। वहाँ मौजूद किसी भी व्यक्ति को नहीं पता था कि वह पिछले तीन दिनों से उसी बेंच पर बैठी थी। उसने न किसी से शिकायत की थी, न किसी से मदद माँगी थी। बस एक ही बात कहती थी—"मेरा बेटा आएगा... उसने कहा था, यहीं इंतज़ार करना।"
उसी समय वहाँ एक सफेद कार आकर रुकी। कार से लगभग बत्तीस साल की एक युवती उतरी। उसका नाम था नैना सक्सेना। वह देश की जानी-मानी इंटीरियर डिज़ाइनर थी। बड़े-बड़े होटल और आलीशान घर सजाने वाली नैना की अपनी ज़िंदगी अंदर से पूरी तरह सूनी थी।
उसकी माँ का निधन तब हो गया था जब वह सिर्फ दस साल की थी। पिता ने उसे पढ़ाया-लिखाया, लेकिन कुछ साल पहले वे भी दुनिया छोड़ गए। तब से नैना अकेली रहती थी। बड़ा-सा घर, सफल करियर, बैंक बैलेंस... सब कुछ था, लेकिन घर लौटने पर कोई पूछने वाला नहीं था—"खाना खाया?"
नैना की नज़र उस बुज़ुर्ग महिला पर पड़ी।
"माँजी, आप यहाँ कब से बैठी हैं?"
महिला मुस्कुराईं।
"बस... बेटा आने वाला है।"
पास की चाय की दुकान वाले ने धीरे से कहा, "बिटिया, इनका बेटा इन्हें तीन दिन पहले यहाँ छोड़ गया था। कहकर गया था कि टिकट लेने जा रहा हूँ। फिर लौटा ही नहीं।"
नैना का दिल काँप गया।
वह महिला के पास बैठ गई।
"माँजी... अगर आपका बेटा वापस नहीं आया... तो क्या आप मेरे साथ चलेंगी?"
बुज़ुर्ग महिला ने हैरानी से उसकी ओर देखा। उनकी आँखों में अनगिनत सवाल थे।
"बेटी... तुम कौन हो?"
नैना की आवाज़ भर्रा गई। उसने मुस्कुराने की कोशिश की और बोली,
"मैं... एक ऐसी लड़की हूँ, जिसे बरसों से माँ की ज़रूरत है।"
महिला की पलकों पर आँसू छलक आए। उन्होंने काँपते हाथ से नैना के सिर को सहलाया और धीमे स्वर में कहा,
"मेरा नाम सावित्री है, बेटी।"
नैना ने भावुक होकर उनका हाथ अपने हाथों में ले लिया।
"और मेरा नाम नैना है... अगर आप चाहें, तो आज से मैं आपको 'माँ' कहकर बुलाऊँ?"
उस दिन नैना सावित्री देवी को अपने घर ले आई।
घर में कदम रखते ही सावित्री देवी ने सबसे पहले मंदिर में दीपक जलाया।
सावित्री देवी ने पूरे घर पर एक गहरी नज़र डाली। चमचमाता फर्श, महँगे फर्नीचर और खूबसूरत सजावट के बीच भी उन्हें एक अजीब-सी खामोशी महसूस हुई। उन्होंने हल्की मुस्कान के साथ नैना की ओर देखा और बोलीं,
"बेटी, घर कितना भी बड़ा और सुंदर क्यों न हो, अगर उसमें अपनापन और अपनों की हँसी न हो, तो वह सिर्फ़ मकान रह जाता है। इस घर में सब कुछ है... बस घर जैसी खुशबू नहीं है।"
नैना कुछ पल चुप रही। उसकी आँखें नम हो गईं। उसने धीमी आवाज़ में जवाब दिया,
"क्योंकि इस घर में कभी माँ नहीं रही... और माँ के बिना घर, घर जैसा कहाँ लगता है।"
सावित्री देवी ने उसी दिन रसोई संभाल ली।
उन्होंने दाल बनाई, लौकी की सब्ज़ी बनाई और गरम-गरम फुल्के सेंके।
नैना कई साल बाद ज़मीन पर बैठकर खाना खा रही थी।
पहला कौर खाते ही उसकी आँखें भर आईं।
सावित्री देवी ने प्यार से नैना की थाली में एक और गरम फुल्का रख दिया।
"क्या हुआ, बेटा?" उन्होंने स्नेह से पूछा।
नैना की आँखें नम हो गईं। उसने काँपते हाथों से कौर मुँह तक ले जाते हुए धीमी आवाज़ में कहा, "माँ... मुझे याद ही नहीं कि आख़िरी बार किसी ने मुझे इतने प्यार से कब अपने हाथों से खाना खिलाया था।"
सावित्री देवी ने मुस्कुराते हुए उसके सिर पर ममता भरा हाथ फेर दिया।
"अब पुरानी बातें भूल जा। आज से तेरी थाली कभी खाली नहीं रहेगी। जब तक मैं हूँ, तुझे रोज़ अपने हाथों से प्यार से खाना खिलाऊँगी।"
दिन बीतने लगे।
नैना अब पहले जैसी नहीं रही।
वह समय पर खाना खाने लगी।
ऑफिस से जल्दी घर लौटने लगी।
दोनों साथ बैठकर चाय पीतीं।
कभी पुरानी फ़िल्में देखतीं।
कभी पार्क में घूमने जातीं।
पड़ोसी पूछते, "ये आपकी माँ हैं?"
नैना गर्व से कहती, "हाँ... दिल से।"
एक दिन नैना ने पूछा,
"माँ... आपका बेटा कभी मिलने नहीं आया?"
सावित्री देवी कुछ देर चुप रहीं।
फिर बोलीं,
"उसका नाम रोहित है।"
"बहू को मैं पसंद नहीं थी।"
"उसे लगता था कि मैं बोझ हूँ।"
"एक दिन उसने कहा कि तीर्थ यात्रा पर चलेंगे।"
"मैं खुश हो गई।"
"लेकिन बस अड्डे पर छोड़कर चला गया।"
"मैंने सोचा... शायद कोई मजबूरी होगी।"
"इंतज़ार करती रही।"
"फिर समझ आ गया... उसने मुझे छोड़ दिया है।"
नैना की मुट्ठियाँ भींच गईं।
"कैसा बेटा था वो!"
सावित्री देवी मुस्कुरा दीं।
"बुरा नहीं था।"
"बस... किसी की बातों में आ गया।"
कुछ दिनों बाद नैना को पता चला कि सावित्री देवी को दिल की गंभीर बीमारी है।
डॉक्टर ने कहा,
"इनका ऑपरेशन जल्दी करना पड़ेगा।"
"देर हुई तो ख़तरा बढ़ जाएगा।"
सावित्री देवी ने साफ़ मना कर दिया।
"इतने पैसे मत खर्च करो।"
"मैं बहुत जी चुकी हूँ।"
नैना की आँखों में आँसू आ गए।
"जब मैं अकेली थी, तब आपने मुझे जीना सिखाया।"
"अब आपकी बारी है।"
"मैं आपको कुछ नहीं होने दूँगी।"
ऑपरेशन की तारीख तय हो गई।
उसी दिन अस्पताल में एक आदमी भागता हुआ आया।
वह रोहित था।
उसे किसी रिश्तेदार से पता चला था कि उसकी माँ अस्पताल में हैं।
माँ को देखते ही उसके कदम रुक गए।
वह फूट-फूटकर रोने लगा।
"माँ... मुझे माफ़ कर दो।"
"मैं बहुत बड़ा पाप कर बैठा।"
सावित्री देवी ने उसकी ओर देखा।
सावित्री देवी ने नम आँखों से रोहित की तरफ़ देखा। उनकी आवाज़ में दर्द भी था और सवाल भी।
"रोहित... इतने साल कहाँ था तू?" उन्होंने धीमे स्वर में पूछा।
रोहित फूट-फूटकर रो पड़ा। उसने सिर झुकाते हुए कहा, "माँ... मैं डर गया था। अपनी गलती का सामना करने की हिम्मत नहीं थी। हर दिन आपके पास लौटना चाहता था, लेकिन शर्म मुझे हर बार रोक देती थी। मैं जानता था कि मैंने बहुत बड़ा पाप किया है।"
रोहित माँ के पैरों में गिर पड़ा।
नैना गुस्से से भर उठी।
"जिस माँ को आपने बस अड्डे पर छोड़ दिया था, आज उसी माँ के लिए रो रहे हैं?"
रोहित सिर झुकाकर बोला,
"मुझे सज़ा मिलनी चाहिए।"
"लेकिन एक बार माफ़ कर दीजिए।"
ऑपरेशन सफल रहा।
सावित्री देवी धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगीं।
अब उनके सामने सबसे कठिन फैसला था।
एक तरफ़ अपना बेटा।
दूसरी तरफ़ नैना, जिसने बिना किसी रिश्ते के उन्हें माँ का सम्मान दिया।
सावित्री देवी ने दोनों को अपने पास बुलाया। उनकी आँखें नम थीं, लेकिन आवाज़ में माँ का अपनापन और दृढ़ता साफ़ झलक रही थी।
उन्होंने पहले रोहित की ओर देखा और प्यार से बोलीं,
"रोहित..."
"जी माँ..." रोहित ने सिर झुका लिया।
सावित्री देवी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
"तुम मेरे बेटे हो, और यह सच कभी नहीं बदल सकता। मैंने तुम्हें जन्म दिया है, तुम्हें अपने आँचल में पालकर बड़ा किया है।"
कुछ पल रुककर उन्होंने गहरी साँस ली।
"लेकिन बेटा सिर्फ़ जन्म लेने से नहीं बनता। बेटा वह होता है जो अपने माँ-बाप का साथ हर परिस्थिति में निभाए, उनका सम्मान करे और उन्हें कभी अकेला न छोड़े।"
फिर उन्होंने नैना का हाथ अपने हाथों में लिया और मुस्कुराकर कहा,
"नैना मेरी कोख से पैदा नहीं हुई, और न ही मैं इसकी जन्म देने वाली माँ हूँ। लेकिन इसने मुझे वह सम्मान, अपनापन और प्यार दिया है, जो कई बार अपने भी नहीं दे पाते। इसने बिना किसी स्वार्थ के मुझे माँ कहा, मेरा हाथ थामा और मुझे अपना घर दिया। इसलिए आज से तुम दोनों मेरे बच्चे हो। रोहित मेरा खून है, और नैना मेरे दिल का रिश्ता। मेरे लिए तुम दोनों की जगह बराबर है, क्योंकि सच्चे रिश्ते खून से नहीं, प्रेम और अपनापन से बनते हैं।"
रोहित की आँखों से आँसू बह निकले।
वह नैना के सामने हाथ जोड़कर बोला,
"अगर हो सके... मुझे भी अपनी बहन मान लेना।"
नैना ने आगे बढ़कर उसे गले लगा लिया।
एक वर्ष बाद उसी पुराने बस अड्डे के सामने एक नया भवन बनकर तैयार हुआ।
बड़े अक्षरों में लिखा था—
"माँ का घर"
यहाँ उन बुज़ुर्ग माताओं को आश्रय मिलता था जिन्हें उनके अपने छोड़ चुके थे।
लेकिन यह सिर्फ़ वृद्धाश्रम नहीं था।
यहाँ कॉलेज के छात्र आते थे।
अनाथ बच्चे आते थे।
नौकरी के लिए दूसरे शहरों में रहने वाले युवक-युवतियाँ आते थे।
हर किसी को यहाँ एक माँ मिल जाती थी।
इस संस्था की स्थापना नैना ने की थी।
और उसकी पहली संचालिका थीं—सावित्री देवी।
उद्घाटन के दिन सावित्री देवी ने मंच से कहा,
"औलाद पैदा करने से कोई माँ नहीं बनती, और जन्म लेने से कोई बेटा नहीं बनता। रिश्ते तब बनते हैं जब कोई बिना स्वार्थ के किसी का हाथ थाम ले।"
पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा।
नैना ने मंच पर जाकर सावित्री देवी के पैर छुए।
सावित्री देवी ने उसे गले लगा लिया।
उनकी आँखों में आँसू थे, लेकिन इस बार उन आँसुओं में अकेलापन नहीं, अपनापन था।
क्योंकि कुछ रिश्ते खून से नहीं, करुणा से जन्म लेते हैं। और जब किसी को माँ मिल जाती है, तो उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा खालीपन हमेशा के लिए भर जाता है।

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