जिसे घर ने ठुकराया

 

Emotional Indian family standing together with an adopted daughter after forgiveness and reconciliation in a beautiful modern traditional home.


"इस घर का दरवाज़ा तुम्हारे लिए कभी नहीं खुलेगा… समझीं?"


लोहे का भारी गेट ज़ोर से बंद हुआ तो उसकी आवाज़ पूरे मोहल्ले में गूँज गई। गेट के बाहर खड़ी नंदिनी कुछ पल तक उसी बंद दरवाज़े को देखती रही। उसके हाथ में एक छोटा-सा बैग था और आँखों में अनगिनत सवाल। उसने एक बार फिर घंटी बजाने के लिए हाथ बढ़ाया, लेकिन फिर धीरे से वापस खींच लिया।


उसी समय पीछे से एक बुज़ुर्ग महिला की आवाज़ आई।


"बेटी... कब तक यूँ ही खड़ी रहोगी?"


नंदिनी ने पलटकर देखा। सामने सफेद सूती साड़ी पहने एक वृद्ध महिला थीं। चेहरे पर अपनापन था और आँखों में अनुभव की गहराई।


"माँ जी... मैं किसी का इंतज़ार नहीं कर रही... बस हिम्मत जुटा रही हूँ।"


महिला मुस्कुराकर बोलीं, 

"बेटी, दरवाज़े लकड़ी और लोहे के नहीं, दिल के खुलते हैं। जब दिल ही बंद हो जाए, तो घंटी बजाने का कोई मतलब नहीं रहता।"


यह सुनते ही नंदिनी की आँखें भर आईं।


वह सड़क किनारे बनी बेंच पर बैठ गई। कुछ देर बाद वृद्ध महिला भी उसके पास आकर बैठ गईं।


"अगर बुरा न मानो तो बता सकती हो, बात क्या है?"


नंदिनी ने गहरी साँस ली।


"मैं इसी घर की बहू हूँ..."


वृद्ध महिला की आँखें आश्चर्य से फैल गईं। उन्होंने अविश्वास भरी नज़रों से नंदिनी को देखा।


"क्या? तुम इस घर की बहू हो?" उन्होंने हैरानी से पूछा।


नंदिनी ने हल्के से सिर झुका लिया। उसकी आँखों से एक आँसू गाल पर लुढ़क आया।


"जी, माँ जी," उसने धीमे स्वर में कहा। "तीन साल पहले मेरी शादी इसी घर में हुई थी। लेकिन आज... आज मुझे इसी घर से निकाल दिया गया।"


महिला ने हैरानी से उसकी ओर देखा।


"बेटी, आखिर ऐसा क्या हुआ कि बात घर छोड़ने तक पहुँच गई?" वृद्ध महिला ने नर्म आवाज़ में पूछा।


नंदिनी ने काँपती आवाज़ में कहना शुरू किया—


"माँ जी, मेरी शादी आरव से तीन साल पहले हुई थी। आरव एक बड़ी कंपनी में इंजीनियर हैं। शादी के शुरुआती दिन किसी सपने से कम नहीं थे। सासू माँ मुझे अपनी बेटी कहकर बुलाती थीं। ससुर जी हर छोटी-बड़ी बात में मेरा हौसला बढ़ाते थे। आरव मेरा बहुत ख्याल रखते थे। मुझे सच में लगता था कि भगवान ने मुझे दूसरा परिवार दे दिया है।"


वृद्ध महिला मुस्कुराईं।

"फिर ऐसा क्या हुआ कि आज तुम इस घर के बाहर खड़ी हो?"


नंदिनी की मुस्कान पल भर में गायब हो गई। उसने गहरी साँस ली और भर्राई हुई आवाज़ में कहा,


"फिर मेरी ज़िंदगी में एक ऐसा हादसा हुआ, जिसने सब कुछ बदल दिया..."


"कैसा हादसा, बेटी?" वृद्ध महिला ने चिंता से पूछा।


नंदिनी कुछ पल चुप रही।


"एक दिन ऑफिस से लौटते समय मेरा सड़क हादसा हो गया। कई दिनों तक अस्पताल में मेरा इलाज चला। डॉक्टरों ने मेरी जान तो बचा ली, लेकिन उन्होंने एक ऐसी बात कही जिसने मेरी पूरी दुनिया उजाड़ दी..."


वृद्ध महिला की धड़कन जैसे थम गई।


"डॉक्टर ने क्या कहा?"


नंदिनी ने काँपते होंठों से जवाब दिया,


"डॉक्टर ने कहा कि अब मैं कभी माँ नहीं बन सकूँगी..."


यह सुनते ही वृद्ध महिला कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत हो गईं। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि नंदिनी को ज़्यादा दर्द उस हादसे ने दिया था या अपने ही लोगों के बदले हुए व्यवहार ने।


नंदिनी ने गहरी साँस ली। उसकी आँखें नम हो गईं। उसने धीमी आवाज़ में कहा,

"माँ जी... बस यहीं से मेरी ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई। उस हादसे के बाद घर के लोगों का व्यवहार भी बदल गया। जो लोग पहले मुझे बेटी कहते थे, वही मुझे बोझ समझने लगे।"


वृद्ध महिला चुपचाप सुनती रहीं।


"सासू माँ ने मुझसे बात करना कम कर दिया। रिश्तेदार ताने देने लगे—'वंश कैसे चलेगा?'... 'घर का चिराग कौन देगा?'"


वृद्ध महिला ने धीरे से पूछा, "और तुम्हारे पति? उन्होंने तुम्हारा साथ नहीं दिया, बेटी?"


नंदिनी की आँखों से आँसू छलक पड़े। उसने काँपते हुए स्वर में कहा, "उन्होंने मेरा साथ देने की बहुत कोशिश की, माँ जी। कई बार मेरे लिए सबसे लड़ भी पड़े। लेकिन घर में रोज़-रोज़ होने वाले झगड़े, रिश्तेदारों के ताने और माँ की ज़िद ने उन्हें भी अंदर से तोड़ दिया। वह मुझे खोना नहीं चाहते थे, लेकिन अपने परिवार के सामने बेबस हो गए थे।"


वृद्ध महिला ने दुखी होकर पूछा, "फिर क्या हुआ?"


नंदिनी ने गहरी साँस ली और बोली, "एक दिन सासू माँ ने सबके सामने साफ़ कह दिया—'जिस बहू से इस घर का वारिस न मिले, उसे इस घर में रहने का कोई अधिकार नहीं।' उनके ये शब्द सुनकर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।"


वृद्ध महिला ने हैरानी से पूछा, "और तुम्हारे ससुर जी? क्या उन्होंने कुछ नहीं कहा?"


नंदिनी की आवाज़ भर्रा गई। "उन्होंने मेरा साथ देने की कोशिश की थी। उन्होंने माँ जी को बहुत समझाया कि किसी स्त्री की पहचान सिर्फ माँ बनने से नहीं होती। लेकिन घर में उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं था। आखिरकार वे भी खामोश होकर रह गए।"


इतने में घर का गेट खुला।


अंदर से एक महिला तेज़ कदमों से बाहर आई। उनकी नज़र जैसे ही नंदिनी पर पड़ी, उनका चेहरा गुस्से से तमतमा उठा।


"अरे... तुम अभी तक गई नहीं?"


यह नंदिनी की सास, कमला देवी थीं।


उन्होंने गुस्से से कहा—


"अब तमाशा मत बनाओ। हमने जो फैसला किया है, वही रहेगा।"


नंदिनी कुछ बोलती, उससे पहले वृद्ध महिला उठ खड़ी हुईं।


"बेटी से ऐसे बात करते हुए शर्म नहीं आती?"


कमला देवी ने उन्हें घूरकर देखा।


"आप बीच में मत पड़िए। यह हमारे घर का मामला है।"


वृद्ध महिला ने कमला देवी की आँखों में देखते हुए शांत लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा,

"गलत बात जहाँ होगी, वहाँ बोलना मेरा भी अधिकार है।"  


कमला देवी ने तिरस्कार से कहा—


"लगता है आप इस लड़की को जानती ही नहीं हैं। आपको पता भी है यह कौन है?"


"हाँ, मैं इतना ज़रूर जानती हूँ कि यह वही लड़की है जिसने अभी तक आपके बारे में एक भी गलत शब्द नहीं कहा। घर से निकाले जाने के बाद भी इसने आपके लिए कोई शिकायत नहीं की। ऐसी संस्कारी बेटी बहुत कम मिलती है।"


वृद्ध महिला की बात सुनकर कमला देवी कुछ पल के लिए निरुत्तर हो गईं। उनके पास कहने के लिए कोई शब्द नहीं बचे।


तभी अंदर से एक कार आकर रुकी।


उसमें से एक अधेड़ उम्र के सज्जन उतरे।


उन्हें देखते ही कमला देवी का चेहरा उतर गया।


"भैया... आप?"


वे सीधे नंदिनी के पास पहुँचे।


"बेटी, मुझे सब पता चल गया।"


नंदिनी ने झुककर उनके पैर छुए।


ये कमला देवी के बड़े भाई, हरिनारायण जी थे।


उन्होंने अपनी बहन की तरफ देखा।


"कमला... क्या यह सच है कि तुमने इसे सिर्फ इसलिए घर से निकाल दिया क्योंकि यह माँ नहीं बन सकती?"


कमला देवी ने नज़रें चुरा लीं।


"भैया... वंश भी कोई चीज़ होती है।"


हरिनारायण जी की आवाज़ कठोर हो गई।


"वंश इंसानियत से बड़ा नहीं होता।"


उन्होंने आरव को आवाज़ दी।


कुछ ही क्षणों में आरव बाहर आया।


उसकी आँखें लाल थीं।


"मामा जी..."


हरिनारायण जी ने आरव की आँखों में देखते हुए गंभीर स्वर में कहा,


"आरव, मैं तुमसे एक सवाल पूछना चाहता हूँ। सच-सच जवाब देना।"


आरव ने सिर झुकाकर कहा, "जी, मामा जी।"


हरिनारायण जी ने कुछ पल रुककर पूछा,


"मान लो, उस हादसे में नंदिनी नहीं, बल्कि तुम घायल हुए होते... और डॉक्टर कहते कि तुम कभी पिता नहीं बन सकते। तब बताओ, क्या तुम्हें लगता है कि नंदिनी तुम्हारा साथ छोड़ देती? 


आरव की नज़रें झुक गईं। उसके होंठ काँपे, लेकिन मुँह से एक भी शब्द नहीं निकला।


तभी नंदिनी ने दृढ़ आवाज़ में कहा,


"नहीं, मामा जी... मैं ऐसा कभी नहीं करती। मेरे लिए शादी सिर्फ संतान पाने का रिश्ता नहीं है, बल्कि सुख-दुख में जीवनभर साथ निभाने का वचन है।"


हरिनारायण जी मुस्कुराए।


"सुन लिया कमला?"


कमला देवी के चेहरे पर कोई जवाब नहीं था।


उसी समय गली के बाहर एक छोटी बच्ची रोती हुई भागती आई।


उसके पीछे लोग दौड़ रहे थे।


बच्ची सड़क पार करने ही वाली थी कि तेज़ रफ्तार ट्रक सामने से आता दिखाई दिया...


नंदिनी ने बिना एक पल सोचे दौड़ लगाई...


और अगले ही क्षण उसने बच्ची को अपनी बाँहों में उठाकर सड़क के दूसरी ओर धक्का दे दिया...


लेकिन खुद सड़क पर गिर पड़ी...


ट्रक उसके बिल्कुल पास से चीखती आवाज़ के साथ गुज़र गया...


पूरी गली की साँसें थम गईं...


नंदिनी सड़क पर गिरी हुई थी। उसके हाथ और माथे पर हल्की चोट आई थी, लेकिन उसकी पहली नज़र उसी छोटी बच्ची पर गई।


"बेटा... तुम्हें कहीं चोट तो नहीं लगी?"


बच्ची डर के मारे रो रही थी। उसने नंदिनी से लिपटते हुए कहा, "आंटी... आपने मुझे बचा लिया..."


कुछ ही पल में बच्ची की माँ दौड़ती हुई वहाँ पहुँची। उसने अपनी बेटी को सीने से लगाया और फिर नंदिनी के सामने हाथ जोड़ दिए।


"बेटी... अगर तुम नहीं होती तो आज मैं अपनी बच्ची को खो देती। तुम्हारा यह एहसान मैं जिंदगी भर नहीं भूलूँगी।"


आसपास खड़े सभी लोग नंदिनी की बहादुरी की तारीफ़ करने लगे।


कमला देवी भी यह सब देख रही थीं। उनके चेहरे का कठोर भाव पहली बार डगमगाया।


उसी समय हरिनारायण जी ने धीमे स्वर में कहा,


"कमला... जिस लड़की को तुम इस घर के लिए अपशकुन समझ रही थीं, उसने किसी और के घर का चिराग बुझने से बचा लिया।"


यह सुनते ही कमला देवी की आँखें झुक गईं।


आरव दौड़कर नंदिनी के पास आया।


"नंदिनी, तुम्हें चोट लगी है। चलो, अस्पताल चलते हैं।"


नंदिनी मुस्कुराई।


"मैं ठीक हूँ... पहले बच्ची को संभालो।"


आरव की आँखों से आँसू बह निकले।


"तुम हमेशा दूसरों के बारे में सोचती हो... और मैं तुम्हें बचा भी नहीं पाया।"


नंदिनी ने उसका हाथ पकड़ लिया।


"पति-पत्नी हार-जीत नहीं देखते... बस साथ निभाते हैं।"


यह सुनकर ससुर जी, गोपाल प्रसाद, जो अब तक चुप थे, आगे बढ़े।


उन्होंने पहली बार ऊँची आवाज़ में कहा,


"बस! अब बहुत हो गया।"


सबकी नज़र उनकी ओर उठ गई।


उन्होंने कमला देवी की तरफ देखा।


"आज तक मैंने घर की शांति के लिए चुप्पी साधे रखी, लेकिन आज मेरी चुप्पी भी अपराध बन गई।"


कमला देवी हैरानी से उन्हें देखने लगीं।


"आप...?"


"हाँ, कमला। जिस बहू ने इस घर को बेटी बनकर संभाला, बीमारी में मेरी सेवा की, मेरे लिए दवा का समय कभी नहीं भूली... आज तुमने उसी को घर से निकाल दिया।"


उन्होंने गहरी साँस ली।


"अगर औलाद होना ही किसी औरत की पहचान है, तो दुनिया की हजारों निःसंतान महिलाएँ क्या सम्मान के लायक नहीं हैं?"


गली में खड़े लोग भी उनकी बात सुन रहे थे।


कमला देवी की आँखों में आँसू आ गए।


उन्हें अचानक वह दिन याद आया जब उन्हें हार्ट अटैक आया था। पूरे अस्पताल में रातभर नंदिनी ही उनके सिरहाने बैठी रही थी। अपने घर तक नहीं गई थी।


उन्हें याद आया कि कैसे नंदिनी ने उनकी पसंद का खाना बनाना सीखा, उनकी दवाइयों का ध्यान रखा, और हर त्योहार पर सबसे पहले उनके पैर छुए।


उन्होंने अपने दोनों हाथों से चेहरा ढक लिया।


"मैं... मैं बहुत बड़ी गलती कर बैठी..."


धीरे-धीरे वह नंदिनी के सामने आकर खड़ी हो गईं।


काँपती आवाज़ में बोलीं,


"बेटी... क्या तुम मुझे माफ़ कर पाओगी?"


नंदिनी कुछ नहीं बोली।


कमला देवी उसके सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो गईं।


"मैंने तुम्हारे साथ बहुत अन्याय किया। समाज के डर में मैं इंसानियत भूल गई। मुझे माफ़ कर दो।"


यह देखकर गली के लोग भी भावुक हो गए।


नंदिनी ने तुरंत उनके जुड़े हुए हाथ पकड़ लिए।


"माँ... हाथ जोड़कर मुझे शर्मिंदा मत कीजिए।"


कमला देवी फूट-फूटकर रो पड़ीं और नंदिनी को गले लगा लिया।


आरव की आँखों से खुशी के आँसू बह निकले।


हरिनारायण जी मुस्कुरा रहे थे।


गोपाल प्रसाद ने कहा,


"आज से इस घर में फिर कभी किसी की कीमत उसकी कमी से नहीं, उसके गुणों से होगी।"


कुछ महीने बीत गए।


घर का माहौल पूरी तरह बदल चुका था।


कमला देवी अब हर जगह गर्व से कहती थीं,


"यह मेरी बहू नहीं, मेरी बेटी है।"


एक दिन नंदिनी ने संकोच से कहा,


"पापा जी... मैं आप सबसे एक बात करना चाहती हूँ।"


"बोलो बेटी," गोपाल प्रसाद मुस्कुराए।


"मैं और आरव एक बच्ची को गोद लेना चाहते हैं। दुनिया में बहुत से बच्चे हैं जिन्हें सिर्फ एक परिवार की ज़रूरत है। अगर आप सबकी अनुमति हो..."


कमला देवी ने उसकी बात पूरी होने से पहले ही कहा,


"अनुमति नहीं... यह तो हमारा सौभाग्य होगा।"


कुछ समय बाद घर में एक नन्ही-सी बच्ची आई।


उसका नाम रखा गया "आशा"।


जिस घर में कभी वारिस की चर्चा होती थी, वहाँ अब हर दिन उस बच्ची की हँसी गूँजती थी।


कमला देवी उसे गोद में लेकर अक्सर कहतीं,


"रिश्ते खून से नहीं, प्रेम से बनते हैं।"


नंदिनी मुस्कुराकर उन्हें देखती और सोचती—


ईश्वर कभी किसी की खुशियाँ नहीं छीनता। वह केवल उनके आने का रास्ता बदल देता है।



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