रिश्तों की असली दौलत

 

Emotional Indian family sharing a heartfelt moment of forgiveness, love, and unity inside a modern home.


"अगर रिश्ते सिर्फ पैसों से चलते, तो आज इस घर में कोई अपना नहीं बचता... और शायद मैं भी नहीं।"


मेरी आवाज़ पूरे हॉल में गूँज गई।


सामने बैठे सभी लोग एक पल के लिए बिल्कुल चुप हो गए। किसी ने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि हमेशा हर बात मुस्कुराकर टाल देने वाला मैं, आज पूरे परिवार के सामने इस तरह खड़ा होकर अपनी बात कहूँगा।


मेरे बड़े भाई राकेश ने गुस्से से मेज़ पर हाथ मारते हुए कहा, "मतलब क्या है तुम्हारी इस बात का, निखिल? क्या कहना चाहते हो तुम?"


मैंने उनकी तरफ देखा, लेकिन जवाब देने से पहले मेरी नज़र पिताजी पर चली गई। सफेद होते बाल, झुकी हुई कमर और काँपते हाथ... आज पहली बार मुझे वो इतने बेबस लगे। माँ लगातार अपनी साड़ी के पल्लू को मरोड़ रही थीं। मेरी पत्नी नेहा चुपचाप एक कोने में खड़ी थी। उसकी आँखों में डर नहीं, बल्कि भरोसा था कि मैं आज सच बोलूँगा।


मैंने धीरे से कहा, "भैया, अगर मेरी बात गलत लगे तो बीच में रोक दीजिएगा। लेकिन आज मैं वो सब कहूँगा जो बरसों से इस घर की दीवारें सुनती रही हैं।"


राकेश हँस पड़े।


"वाह! अब भाषण भी होगा?"


मैंने उनकी हँसी का कोई जवाब नहीं दिया।


"याद है भैया, जब पाँच साल पहले आपकी फैक्ट्री बंद हो गई थी? बैंक वाले रोज़ घर आने लगे थे। पूरा मोहल्ला बातें बना रहा था कि अब राकेश का सब कुछ खत्म हो जाएगा।"


राकेश का चेहरा थोड़ा उतर गया।


मैं आगे बोला, "तब पिताजी ने बिना किसी को बताए अपने रिटायरमेंट के पूरे अठारह लाख रुपये आपको दे दिए थे।"


हॉल में बैठे चाचा और बुआ एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।


राकेश ने तुरंत कहा, "तो क्या हुआ? मैं उनका बेटा हूँ।"


मैंने शांत स्वर में कहा, "बिल्कुल। बेटा होने के नाते आपका हक था। लेकिन आज वही पिताजी अपनी दवा के पैसे माँगते हैं तो उन्हें हिसाब सुनाया जाता है।"


माँ की आँखों से आँसू निकल पड़े।


राकेश की पत्नी सीमा बीच में बोल पड़ी, "देखिए, बातें घुमाइए मत। मुद्दा साफ है। मकान बिकेगा तो हिस्सा बराबर होगा।"


मैंने शांत स्वर में पूछा, "और पिताजी?"


सीमा ने तुरंत कहा, "वो हमारे साथ रह लेंगे।"


मैंने शांत स्वर में पूछा, "कितने दिन?"


सीमा मेरी तरफ देखने लगी। "क्या मतलब?"


मैंने बिना आवाज़ ऊँची किए फिर पूछा, "एक महीना... दो महीने... या जब तक उनकी पेंशन आती रहे?"


सीमा के होंठ हिले, लेकिन कोई जवाब नहीं निकला।


अब पूरा कमरा सन्नाटे में डूब चुका था।


पिताजी ने काँपती आवाज़ में कहा, "निखिल... रहने दे बेटा। मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है।"


मैं उनके पास गया और उनके कंधे पर हाथ रख दिया।


"यही तो आपकी सबसे बड़ी गलती है, पिताजी। आपने कभी शिकायत की ही नहीं।"


मैंने कमरे में मौजूद सभी लोगों की तरफ देखा।


"क्या आप लोगों को याद है, इस घर की एक-एक ईंट कैसे लगी थी?"


किसी ने जवाब नहीं दिया।


"जब मैं दस साल का था, तब पिताजी सुबह नौकरी करते थे और रात को पास की दुकान पर हिसाब लिखते थे। माँ लोगों के घरों में सिलाई करती थीं। कई बार हमने नई किताबें नहीं खरीदीं, पुराने पन्नों पर पढ़ाई की। दिवाली पर नए कपड़े नहीं मिले, लेकिन पिताजी ने कभी हमारी फीस रुकने नहीं दी।"


बुआ की आँखें भर आईं।


मैंने कहा, "उस समय इस घर में पैसे कम थे, लेकिन रिश्ते बहुत अमीर थे।"


फिर मैंने धीरे से पूछा—


"बताइए, आखिर ऐसा क्या बदल गया कि आज पैसे बढ़ गए... और रिश्ते गरीब हो गए?"


यह सवाल किसी के पास नहीं था।


इतने में बाहर से खाँसी की आवाज़ आई।


दरवाज़े पर हमारे पुराने पड़ोसी, शर्मा अंकल खड़े थे।


उन्होंने अंदर आते हुए कहा, "माफ़ करना, दरवाज़ा खुला था... आवाज़ें बाहर तक आ रही थीं।"


पिताजी तुरंत उठे।


"अरे शर्मा जी, आइए..."


शर्मा अंकल ने पिताजी को बैठाया और बोले, "आज मैं भी कुछ कहना चाहता हूँ।"


राकेश ने झुँझलाकर कहा, "ये हमारा पारिवारिक मामला है।"


शर्मा अंकल मुस्कुरा दिए।


"हाँ बेटा, लेकिन तुम्हारे पिताजी सिर्फ तुम्हारे नहीं हैं। इस मोहल्ले ने भी इनके एहसान देखे हैं।"


उन्होंने मेरी तरफ देखा और बोले—


"शायद अब वो बात बताने का समय आ गया है... जो तुम्हारे पिताजी ने पिछले बीस साल से किसी को नहीं बताई।"


पूरा कमरा उनकी ओर देखने लगा।


मैं भी हैरान था।


आख़िर ऐसी कौन-सी बात थी... जो पिताजी ने हम सबसे छिपाकर रखी थी?



शर्मा अंकल की बात सुनकर कमरे में बैठे हर इंसान की नज़र पिताजी पर टिक गई।


पिताजी घबरा गए।


उन्होंने जल्दी से कहा, "शर्मा जी... रहने दीजिए। अब उन बातों का क्या मतलब?"


लेकिन शर्मा अंकल ने पहली बार उनकी बात नहीं मानी।


उन्होंने कुर्सी खींची और धीरे से बैठ गए।


"मतलब है, रामप्रसाद। बहुत मतलब है। क्योंकि आज तुम्हारे बच्चों को पता चलना चाहिए कि जिस आदमी की ज़िंदगी का हिसाब लगाया जा रहा है, उसने कभी अपने किए हुए त्याग का हिसाब नहीं रखा।"


मेरे बड़े भाई राकेश ने अधीर होकर पूछा, "आखिर बात क्या है?"


शर्मा अंकल ने गहरी साँस ली।


"आज से करीब पच्चीस साल पहले की बात है। तुम्हारे पिताजी के पास सिर्फ एक छोटा-सा पुश्तैनी खेत था। उसी खेत को बेचकर ये घर बन सकता था। लेकिन उसी समय इनके छोटे भाई सुरेश का एक्सीडेंट हो गया। डॉक्टर ने कहा था कि तुरंत ऑपरेशन नहीं हुआ तो जान बचाना मुश्किल है।"


बुआ की आँखें फैल गईं।


"हाँ..." उन्होंने धीमे से कहा, "मुझे याद है..."


शर्मा अंकल बोले, "रिश्तेदारों ने साफ मना कर दिया था। किसी ने पैसे नहीं दिए। तब तुम्हारे पिताजी ने बिना एक पल सोचे अपना खेत बेच दिया।"


राकेश ने हैरानी से पिताजी की ओर देखा।


"आपने कभी बताया क्यों नहीं?"


पिताजी हल्का-सा मुस्कुराए।


"बताकर क्या मिलता, बेटा? भाई बच गया, वही बहुत था।"


शर्मा अंकल की आवाज़ भर्रा गई।


"लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।"


उन्होंने मेरी तरफ देखा।


"घर बनाने का सपना टूट गया था। पैसे खत्म हो चुके थे। तब तुम्हारी माँ ने अपने शादी के सारे गहने निकालकर तुम्हारे पिताजी के हाथ में रख दिए।"


माँ ने तुरंत नज़रें झुका लीं।


मैंने पहली बार माँ की आँखों में वह दर्द देखा जिसे उन्होंने हमेशा मुस्कान के पीछे छिपाकर रखा था।


"माँ..."


मेरे मुँह से बस इतना ही निकला।


माँ मुस्कुरा दीं।


"गहने दोबारा बन सकते थे बेटा... लेकिन परिवार टूट जाता तो उसे कौन जोड़ता?"


कमरे में बैठे सभी लोगों की आँखें नम हो गईं।


सीमा, जो कुछ देर पहले ज़मीन के हिस्से की बात कर रही थी, अब बिल्कुल शांत बैठी थी।


तभी चाचा सुरेश अचानक रो पड़े।


वो कुर्सी से उठे और सीधे पिताजी के पैरों में बैठ गए।


"भैया... मुझे माफ़ कर दो।"


पिताजी घबरा गए।


"अरे ये क्या कर रहे हो?"


सुरेश फूट-फूटकर रोने लगे।


"आपने मेरे लिए सब कुछ बेच दिया... और मैं ही पिछले महीने राकेश से कह रहा था कि अब भाई साहब बूढ़े हो गए हैं, मकान बाँट लेना चाहिए। मैं कितना गिर गया, भैया..."


पिताजी ने तुरंत उन्हें उठाकर गले लगा लिया।


दोनों भाई बच्चों की तरह रो रहे थे।


यह देखकर माँ भी अपने आँसू नहीं रोक सकीं।


मैंने सोचा, शायद आज पहली बार इस घर में लोग एक-दूसरे को सुन रहे थे।


लेकिन तभी राकेश ने धीरे से कहा—


"अगर ये सब सच था... तो बैंक का लोन कैसे चुकाया गया? घर आखिर बना कैसे?"


शर्मा अंकल ने उसकी ओर देखा।


"यही तो सबसे बड़ा त्याग था।"


उन्होंने मेज़ पर रखा पानी का गिलास उठाया और एक घूंट पीकर बोले—


"तुम्हारे पिताजी दिन में सरकारी नौकरी करते थे। रात को रेलवे स्टेशन पर माल ढोने का हिसाब लिखते थे। कई-कई रात घर नहीं आते थे।"


मैं और राकेश एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।


हमें कभी पता ही नहीं चला।


शर्मा अंकल बोले—


"तुम लोग सोते रहते थे... और तुम्हारे पिता आधी रात को घर आकर चुपचाप तुम्हारे सिर पर हाथ फेरकर फिर निकल जाते थे।"


पिताजी ने मुस्कुराकर बात काटनी चाही।


"बस भी करो शर्मा जी..."


लेकिन शर्मा अंकल की आँखें भर चुकी थीं।


"नहीं रामप्रसाद... आज नहीं रुकूँगा।"


उन्होंने मेरी तरफ देखा।


"तुम्हें याद है निखिल... जब तुम्हें इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला मिला था?"


मैंने सिर हिलाया।


"हाँ... लेकिन फीस तो पिताजी ने जमा कर दी थी।"


शर्मा अंकल ने धीरे से कहा—


"फीस जमा करने के लिए उन्होंने अपनी शादी की आख़िरी निशानी... अपनी घड़ी भी बेच दी थी।"


मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।


वही सुनहरी घड़ी...


जिसके बारे में पिताजी कहते थे कि कहीं रखकर भूल गए हैं...


असल में उन्होंने उसे मेरे भविष्य के लिए बेच दिया था।


मेरी आँखों से आँसू अपने आप बहने लगे।


मैं पिताजी के सामने जाकर घुटनों के बल बैठ गया।


"पिताजी..."


मेरे पास शब्द नहीं थे।


उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा।


"पगले... बाप अपने बच्चों के लिए यही करता है।"


लेकिन मेरे मन में एक सवाल अभी भी उठ रहा था।


अगर पिताजी ने पूरी ज़िंदगी सिर्फ दिया ही दिया...


तो फिर आज वही इंसान अपने ही घर में बोझ क्यों बन गया?


मैंने तय कर लिया—


आज इस सवाल का जवाब लेकर ही उठूँगा।



मैंने अपने आँसू पोंछे और पूरे कमरे की तरफ देखा।


"आज मैं किसी पर आरोप लगाने नहीं बैठा हूँ। लेकिन एक सवाल ज़रूर पूछूँगा। अगर जवाब मिल गया, तो शायद इस घर की सारी कड़वाहट खत्म हो जाएगी।"


राकेश चुपचाप सिर झुकाए बैठा था।


सीमा की आँखें भी भर आई थीं।


मैंने धीरे से पूछा,


"बताइए... आख़िरी बार आप लोगों ने पिताजी से ये कब पूछा था कि उनकी तबीयत कैसी है?"


कमरे में सन्नाटा छा गया।


किसी के पास जवाब नहीं था।


मैंने दूसरा सवाल किया।


"आख़िरी बार माँ के साथ बैठकर बिना मोबाइल देखे चाय कब पी थी?"


फिर वही ख़ामोशी।


माँ ने धीरे से मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन मुस्कान आँसुओं में खो गई।


मैंने कहा,


"हम सबको लगता है कि हम बहुत अच्छे बेटे-बेटियाँ हैं, क्योंकि हर महीने पैसे दे देते हैं। लेकिन क्या माँ-बाप को सिर्फ पैसों की ज़रूरत होती है?"


पिताजी तुरंत बोले,


"निखिल, बस कर बेटा। बच्चों को मत कोस।"


मैंने उनकी ओर देखा।


"यही तो आपकी सबसे बड़ी अच्छाई है, पिताजी। आपने हमेशा हमारी गलतियाँ भी अपने सिर ले लीं।"


इतने में माँ उठीं।


वो धीरे-धीरे अपने कमरे में गईं और कुछ देर बाद एक पुराना लोहे का डिब्बा लेकर लौटीं।


डिब्बे पर जंग लग चुकी थी।


माँ ने उसे मेज़ पर रखा।


"आज शायद इसे खोलने का समय आ गया है।"


मैं हैरान था।


"इसमें क्या है, माँ?"


उन्होंने चाबी निकाली और ताला खोला।


अंदर कुछ पुराने खत, कुछ फीकी पड़ चुकी तस्वीरें और एक लाल रंग की छोटी-सी कपड़े की पोटली रखी थी।


माँ ने सबसे पहले तस्वीरें निकालीं।


एक तस्वीर में पिताजी ईंटें ढो रहे थे।


दूसरी में माँ सिर पर सीमेंट की तसली उठाए खड़ी थीं।


राकेश हैरान रह गया।


"ये... ये क्या है?"


माँ मुस्कुराईं।


"जिस घर के लिए आज तुम लोग लड़ रहे हो, उसकी आधी ईंटें तुम्हारे पिताजी ने अपने हाथों से उठाई थीं। मज़दूर कम पड़ गए थे, इसलिए छुट्टी लेकर खुद काम किया था।"


राकेश की आँखें भर आईं।


उसने तस्वीर अपने हाथ में ली और देर तक उसे देखता रहा।


फिर माँ ने लाल पोटली खोली।


उसमें एक छोटी-सी चाँदी की पायल थी।


बस एक।


मैंने पूछा,


"दूसरी कहाँ है?"


माँ हल्का-सा हँसीं।


"दूसरी तो बहुत साल पहले बिक गई थी।"


"क्यों?"


"तुम्हारे स्कूल की फीस भरनी थी।"


मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे सीने पर पत्थर रख दिया हो।


मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मेरी पढ़ाई के पीछे माँ ने अपनी आख़िरी निशानी तक बेच दी थी।


राकेश अब खुद को रोक नहीं पाया।


वो माँ के पैरों में बैठ गया।


"माँ... मुझे माफ़ कर दो। मैं इतना अंधा कैसे हो गया?"


माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरा।


"बेटा, गलती इंसान से होती है। लेकिन जो अपनी गलती मान ले, वो बुरा इंसान नहीं होता।"


तभी सीमा अचानक उठी।


वो बिना कुछ बोले अपने कमरे में गई।


सब उसकी तरफ देखने लगे।


कुछ मिनट बाद वो वापस आई।


उसके हाथ में मकान के कागज़ थे।


उसने कागज़ मेज़ पर रख दिए।


"मुझे इस घर में कोई हिस्सा नहीं चाहिए।"


राकेश चौंक गया।


"सीमा... ये क्या कर रही हो?"


सीमा की आवाज़ काँप रही थी।


"जिस घर की नींव त्याग पर रखी गई हो, उस पर लालच का हक नहीं हो सकता।"


कमरे में बैठे सभी लोग उसकी तरफ देखने लगे।


लेकिन तभी...


दरवाज़े की घंटी बजी।


मैंने जाकर दरवाज़ा खोला।


बाहर एक अधेड़ उम्र का आदमी खड़ा था।


उसके हाथ में एक पुरानी फ़ाइल थी।


उसने पूछा,


"क्या यही रामप्रसाद जी का घर है?"


मैंने सिर हिलाते हुए जवाब दिया, "जी हाँ, लेकिन आप कौन हैं?"


उस आदमी ने मुस्कुराकर कहा,


"मेरा नाम महेश सक्सेना है। मैं दिल्ली से आया हूँ।"


मैंने उत्सुक होकर पूछा, "जी, कहिए... मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ?"


उसने फ़ाइल खोलते हुए कहा,


"करीब तीस साल पहले आपके पिताजी ने एक ऐसे इंसान की मदद की थी... जिसे वो शायद आज पहचान भी न पाएँ।"


मैं हैरान रह गया।


पिताजी भी धीरे-धीरे दरवाज़े तक आ गए।


महेश जी ने उन्हें देखते ही हाथ जोड़ दिए।


उनकी आँखें भर आईं।


"रामप्रसाद जी... आपने मुझे तो याद नहीं रखा होगा... लेकिन मैंने आपको कभी नहीं भुलाया।"


पिताजी ने बहुत कोशिश की...


लेकिन वो उन्हें पहचान नहीं पाए।


आख़िर ये आदमी कौन था?


और ऐसा कौन-सा एहसान था... जिसका हिसाब वो तीस साल बाद चुकाने आया था?



दरवाज़े पर खड़े महेश सक्सेना की आँखें लगातार पिताजी के चेहरे पर टिकी थीं।


पिताजी ने कई बार ध्यान से देखा, फिर सिर हिलाकर बोले,


"बेटा, माफ़ करना... मैं पहचान नहीं पा रहा हूँ।"


महेश जी हल्का-सा मुस्कुराए।


"पहचानेंगे भी कैसे? उस समय मेरी उम्र सिर्फ सत्रह साल थी। दुबला-पतला लड़का... फटे हुए कपड़े... और जेब में एक भी रुपया नहीं था।"


कमरे में बैठे सभी लोग चुपचाप उनकी बातें सुनने लगे।


उन्होंने अपनी फ़ाइल खोली और उसमें से एक पुरानी, पीली पड़ चुकी रसीद निकाली।


रसीद के नीचे पिताजी के हस्ताक्षर थे।


पिताजी ने रसीद देखते ही चश्मा ठीक किया।


उनकी आँखें फैल गईं।


"अरे... ये तो..."


महेश जी ने मुस्कुराकर कहा,


"जी, यही वो रसीद है।"


मैं उत्सुक होकर पूछ बैठा,


"आख़िर बात क्या है?"


महेश जी ने गहरी साँस ली।


"मैं बहुत गरीब परिवार से था। बारहवीं में पूरे जिले में पहला स्थान आया था। इंजीनियर बनना चाहता था, लेकिन कॉलेज की फीस भरने के पैसे नहीं थे। मैं हर दरवाज़े पर गया, लेकिन सबने मना कर दिया।"


उन्होंने पिताजी की तरफ देखा।


"किसी ने मुझे आपके पास भेजा था।"


पिताजी तुरंत बोले,


"अरे... तुम वही महेश हो?"


महेश जी की आँखें भर आईं।


"जी..."


उन्होंने आगे कहना शुरू किया।


"मैं आपके पास आया था। आपने मेरी पूरी बात सुनी। फिर अलमारी से एक लिफाफा निकाला और मेरे हाथ में रख दिया।"


मैंने पिताजी की तरफ देखा।


उन्होंने नज़रें झुका लीं।


महेश जी बोले,


"मैंने पूछा था—'अंकल, ये पैसे मैं कब लौटाऊँ?'


तब आपने कहा था—


'जब कभी ज़िंदगी में काबिल बन जाओ, तो मुझे नहीं... किसी और ज़रूरतमंद को लौटा देना।'


पूरा कमरा बिल्कुल शांत हो गया।


मेरे रोंगटे खड़े हो गए।


महेश जी की आवाज़ भर्रा गई।


"उन्हीं पैसों से मैंने कॉलेज की पहली फीस भरी। पढ़ाई पूरी की। नौकरी मिली। फिर अपनी कंपनी शुरू की। आज मेरी कंपनी में पाँच सौ से ज़्यादा लोग काम करते हैं।"


राकेश अवाक् रह गया।


"लेकिन पिताजी ने कभी बताया क्यों नहीं?"


महेश जी मुस्कुरा दिए।


"क्योंकि उन्होंने मदद दिखाई नहीं... निभाई थी।"


मैंने पिताजी की ओर देखा।


वो हमेशा की तरह शांत बैठे थे, जैसे यह कोई बड़ी बात ही न हो।


महेश जी ने फ़ाइल से एक और लिफाफा निकाला।


"रामप्रसाद जी, मैं आपका कर्ज़ चुकाने नहीं आया। आपका कर्ज़ तो मैं सात जन्म में भी नहीं चुका सकता।"


उन्होंने लिफाफा मेज़ पर रख दिया।


"मैं सिर्फ आपका आशीर्वाद लेने आया हूँ।"


मैंने लिफाफा खोला।


अंदर एक चेक था।


राशि देखकर मेरे हाथ काँप गए।


एक करोड़ रुपये।


राकेश और सीमा भी हैरान रह गए।


पिताजी तुरंत बोले,


"नहीं बेटा... ये मैं नहीं ले सकता।"


महेश जी मुस्कुराए।


"मुझे पता था, आप यही कहेंगे। इसलिए ये पैसे आपके लिए नहीं हैं।"


"फिर किसके लिए?"


"मैं आपके नाम से एक ट्रस्ट बनाना चाहता हूँ। ऐसे बच्चों के लिए, जो पैसों की वजह से पढ़ाई छोड़ देते हैं। उसका नाम होगा—'रामप्रसाद शिक्षा सहायता ट्रस्ट।'"


पिताजी की आँखों से पहली बार आँसू बह निकले।


उन्होंने काँपते हाथों से महेश जी का हाथ पकड़ लिया।


"बेटा... इससे बड़ी खुशी मुझे और क्या मिलेगी?"


इतने में माँ ने भगवान की तस्वीर की ओर देखा और धीरे से कहा,


"देखा जी... अच्छे काम कभी व्यर्थ नहीं जाते। बस लौटने में समय लग जाता है।"


कमरे में मौजूद हर व्यक्ति की आँखें नम थीं।


लेकिन उसी समय...


राकेश का मोबाइल बजा।


उसने स्क्रीन देखी तो उसके चेहरे का रंग उड़ गया।


"क्या हुआ?" मैंने पूछा।


उसने काँपती आवाज़ में कहा,


"मेरी फैक्ट्री में... बहुत बड़ा हादसा हो गया है।"


कमरे का माहौल एक पल में बदल गया।


राकेश के हाथ काँप रहे थे।


फोन के दूसरी तरफ़ से लगातार कोई घबराकर कुछ कह रहा था।


राकेश की आँखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।


उसे शायद पहली बार समझ आया था कि पैसा, ज़मीन और हिस्से... सब कुछ एक पल में बदल सकता है।


लेकिन उस हादसे की खबर के बाद जो सच सामने आने वाला था, वह पूरे परिवार की ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल देने वाला था।



राकेश के हाथ काँप रहे थे।


उसने किसी तरह फोन स्पीकर से हटाया और धीमी आवाज़ में कहा,


"मैं... मैं अभी पहुँच रहा हूँ।"


फोन कटते ही पूरे कमरे में बेचैनी फैल गई।


माँ घबराकर बोलीं,


"क्या हुआ बेटा?"


राकेश ने सूखे होंठों पर जीभ फेरी।


"फैक्ट्री में आग लग गई है... गोदाम का बड़ा हिस्सा जल गया।"


सीमा घबराकर राकेश के पास आई। उसकी आवाज़ काँप रही थी।

"कोई... कोई घायल तो नहीं?"


राकेश ने मोबाइल को धीरे से नीचे किया। उसके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।


"अभी पूरी जानकारी नहीं मिली," उसने भारी आवाज़ में जवाब दिया। "मैनेजर बस इतना कह रहा था कि फैक्ट्री में आग लगी है। मैं वहाँ पहुँचकर ही सब कुछ जान पाऊँगा।"


इतना सुनते ही राकेश कुर्सी से उठा और जल्दी-जल्दी बाहर जाने लगा।


तभी पिताजी ने आवाज़ दी,


"रुक जाओ।"


राकेश रुक गया।


पिताजी धीरे-धीरे उसके पास आए और उसके कंधे पर हाथ रख दिया।


"घबराने से मुश्किल छोटी नहीं होती। पहले पानी पी लो, फिर जाना।"


राकेश की आँखें भर आईं।


कुछ देर पहले वही आदमी, जिसके लिए वह घर बाँटने की बातें कर रहा था, आज सबसे पहले उसकी हिम्मत बनकर खड़ा था।


उसने झुककर पिताजी के पैर छू लिए।


"मुझे माफ़ कर दीजिए, पिताजी।"


पिताजी ने उसे गले लगा लिया।


"बेटा, बाप अपने बच्चों से नाराज़ नहीं रहता।"


हम सब तुरंत फैक्ट्री की तरफ निकल पड़े।


वहाँ पहुँचकर देखा तो दमकल की कई गाड़ियाँ लगी थीं।


आग पर काबू पा लिया गया था, लेकिन गोदाम का बड़ा हिस्सा जल चुका था।


राकेश सिर पकड़कर वहीं बैठ गया।


"सब खत्म हो गया..."


उसी समय फैक्ट्री का मैनेजर दौड़ता हुआ आया।


"सर, एक अच्छी खबर भी है।"


राकेश ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।


"क्या?"


"रात की शिफ्ट शुरू होने में अभी समय था, इसलिए अंदर कोई कर्मचारी नहीं था। किसी को चोट नहीं आई।"


सबने राहत की साँस ली।


पिताजी ने आसमान की ओर देखा और धीरे से कहा,


"भगवान का लाख-लाख शुक्र है।"


राकेश रो पड़ा।


"अगर किसी मज़दूर को कुछ हो जाता, तो मैं खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाता।"


उसी समय महेश सक्सेना भी वहाँ पहुँच गए।


उन्होंने फैक्ट्री का हाल देखा और बिना देर किए राकेश के पास आकर बोले,


"हिम्मत मत हारिए।"


राकेश ने उदास होकर कहा,


"अब क्या बचा है?"


महेश जी मुस्कुराए।


"सब कुछ।"


राकेश ने हैरानी से पूछा,

"कैसे?"


महेश जी ने शांत स्वर में कहा,

"फैक्ट्री दोबारा बन सकती है। पैसा फिर आ सकता है। लेकिन जिन लोगों की जान बच गई, वही आपकी सबसे बड़ी पूँजी हैं।"


राकेश चुप हो गया।


महेश जी ने आगे कहा,


"मैं आपकी मदद करूँगा।"


राकेश ने तुरंत सिर हिलाया।


"नहीं... मैं किसी से पैसे नहीं लूँगा।"


महेश जी मुस्कुरा दिए।


"ये पैसे नहीं... एक भरोसा है। जैसे कभी आपके पिताजी ने मुझ पर किया था।"


राकेश की आँखें भर आईं।


उसे पहली बार समझ आया कि मदद लेना कमजोरी नहीं होती, और मदद करना सिर्फ पैसे देना नहीं, बल्कि किसी का हौसला बनना होता है।


अगले कुछ महीनों में फैक्ट्री फिर से खड़ी हो गई।


इस बार पहले से बेहतर।


राकेश ने सबसे पहला काम क्या किया?


उसने फैक्ट्री के सभी कर्मचारियों का बीमा करवाया।


फिर उनके बच्चों की पढ़ाई के लिए एक सहायता कोष बनाया।


जब मैंने उससे पूछा,


"अचानक इतना बड़ा बदलाव कैसे?"


वह मुस्कुराया और बोला,


"मैंने पिताजी से एक बात सीखी है। पैसा कमाने वाला अमीर हो सकता है, लेकिन लोगों का भरोसा कमाने वाला ही सच में बड़ा इंसान होता है।"


उधर महेश जी के सहयोग से 'रामप्रसाद शिक्षा सहायता ट्रस्ट' शुरू हो गया।


पहले ही साल पचास गरीब बच्चों की पढ़ाई का पूरा खर्च उठाया गया।


उद्घाटन के दिन मंच पर पिताजी को बुलाया गया।


उन्होंने माइक हाथ में लिया, लेकिन कुछ पल तक कुछ बोल ही नहीं पाए।


फिर मुस्कुराकर बोले,


"मैंने ज़िंदगी में बस एक बात समझी है—अगर भगवान ने आपको दो रोटियाँ दी हैं, तो कोशिश कीजिए कि एक रोटी किसी भूखे के काम आ जाए। यकीन मानिए, दूसरी रोटी का स्वाद भी तब दोगुना हो जाता है।"


पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा।


मैंने नीचे बैठी माँ की तरफ देखा।


उनकी आँखों में गर्व था।


वही गर्व, जो शायद हर उस पत्नी की आँखों में होता है, जिसने अपने पति को बिना शोर किए दूसरों के लिए जीते देखा हो।


उस दिन घर लौटते समय मैंने महसूस किया कि सचमुच...


रिश्ते पैसों से नहीं, बल्कि त्याग, सम्मान और विश्वास से चलते हैं।


और जिस घर में ये तीनों ज़िंदा हों, वहाँ कोई कभी गरीब नहीं होता।



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