बहू का अनमोल बलिदान

 

A happy Indian family sharing an emotional moment together in a modern home, highlighting love, unity, sacrifice, and family values.


सुबह के पाँच बजे थे।


पूरा घर अभी गहरी नींद में था, लेकिन राधिका की आँखें खुल चुकी थीं।


उसने बिना किसी आवाज़ के रसोई का दरवाज़ा खोला। सबसे पहले गैस पर चाय चढ़ाई। फिर आटा गूँथा, सब्ज़ी काटी, बच्चों के टिफ़िन की तैयारी की और सास-ससुर की दवाइयाँ मेज़ पर सजा दीं।


यह सब उसके लिए कोई नया काम नहीं था।


पिछले सात वर्षों से उसकी हर सुबह बिल्कुल ऐसी ही शुरू होती थी।


राधिका की उम्र बत्तीस साल थी। वह पढ़ी-लिखी थी, लेकिन शादी के बाद उसने नौकरी छोड़ दी थी ताकि पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी संभाल सके।


उसका पति अमन एक निजी कंपनी में नौकरी करता था। आमदनी सीमित थी, लेकिन खर्चे बहुत थे।


घर में सास शारदा देवी, ससुर गोपाल जी, देवर रोहित और ननद काजल रहते थे।


राधिका पूरे घर की धुरी थी, लेकिन किसी की नज़र में उसकी कोई कीमत नहीं थी।


उसे कभी धन्यवाद नहीं मिला।


उसे कभी आराम नहीं मिला।


बस काम... और केवल काम।


थोड़ी देर बाद शारदा देवी रसोई में आईं।


उन्होंने चाय का कप उठाया, एक घूँट लिया और बिना राधिका की तरफ देखे बोलीं,


"दाल में कल नमक ज़्यादा था। ज़रा ध्यान रखा करो।"


राधिका मुस्कुराई।


"जी माँ जी, आज गलती नहीं होगी।"


इतने में देवर रोहित ने कमरे से आवाज़ लगाई,


"भाभी! मेरी सफेद शर्ट प्रेस हुई कि नहीं?"


"अभी लेकर आती हूँ।"


उधर अमन जल्दी-जल्दी तैयार हो रहा था।


"राधिका, मेरी ऑफिस वाली फाइल कहाँ रखी है?"


राधिका दौड़कर अलमारी से फाइल निकाल लाई।


सबकी ज़रूरतें पूरी हो गईं।


लेकिन किसी ने यह नहीं पूछा कि उसने सुबह से कुछ खाया भी है या नहीं।


करीब दस बजे पूरा घर खाली हो गया।


राधिका ने पहली बार चैन की साँस ली।


उसने अपने लिए एक कप चाय बनाई, लेकिन जैसे ही बैठी, मोबाइल की घंटी बज उठी।


स्क्रीन पर लिखा था—


"माँ कॉलिंग..."


उसने तुरंत फोन उठाया।


"हाँ माँ, कैसी हो?"


उधर से काँपती हुई आवाज़ आई,


"बेटी... तेरे पापा को अचानक सीने में दर्द हुआ था। अस्पताल में भर्ती हैं।"


राधिका के हाथ से कप छूट गया।


"क्या...? अभी कैसे हैं?"


"डॉक्टर कह रहे हैं कि ऑपरेशन करना पड़ेगा। लेकिन हमारे पास इतने पैसे नहीं हैं..."


माँ की आवाज़ रोने लगी।


राधिका की आँखें भी भर आईं।


उसने खुद को संभालते हुए कहा,


"माँ, आप चिंता मत करो। मैं कुछ करती हूँ।"


फोन रखते ही वह सीधे अपनी अलमारी के सामने जाकर खड़ी हो गई।


उसने धीरे-धीरे शादी के समय मिले सारे गहने बाहर निकाले।


सोने की चूड़ियाँ...


एक हार...


झुमके...


और मंगलसूत्र के अलावा लगभग सब कुछ।


उन्हें हाथ में लेकर उसकी आँखों के सामने शादी का दिन घूम गया।


लेकिन अगले ही पल उसे अस्पताल में पड़े अपने पिता का चेहरा याद आ गया।


उसने बिना देर किए सब वापस डिब्बे में रख दिया।


शाम को अमन घर लौटा।


राधिका ने सारी बात बता दी।


कुछ देर तक अमन चुप बैठा रहा।


फिर बोला,


"अगर तुम्हें ठीक लगता है तो गहने बेच देते हैं। इंसान की जान गहनों से बड़ी होती है।"


राधिका की आँखें भर आईं।


"मुझे पता था... तुम यही कहोगे।"


लेकिन दोनों जानते थे कि सबसे मुश्किल काम अभी बाकी था।


रात को खाना खाते समय राधिका ने हिम्मत करके बात शुरू की।


"माँ जी... पापा का ऑपरेशन होना है। मैं अपने गहने बेचना चाहती हूँ।"


इतना सुनते ही शारदा देवी का चेहरा बदल गया।


"क्या कहा तुमने?"


"मैंने सोचा कि शादी में मिले गहने बेच दूँ। उनसे पापा के ऑपरेशन का खर्च निकल जाएगा।" राधिका ने शांत स्वर में जवाब दिया।


"सोचना भी मत।" शारदा देवी ने सख्त लहजे में कहा।


शारदा देवी ने बीच में ही रोक दिया।


"शादी के गहने औरत की इज़्ज़त होते हैं। लोग क्या कहेंगे?"


राधिका ने शांत स्वर में कहा,


"माँ जी, अगर गहने अलमारी में बंद रहें और मेरे पापा इलाज के बिना अस्पताल में पड़े रहें... तो उन गहनों का क्या फायदा?"


कुछ पल के लिए पूरा घर शांत हो गया।


गोपाल जी भी चुप थे।


अमन ने धीरे से कहा,


"माँ, इंसान की जान सबसे ज़्यादा ज़रूरी होती है।"


लेकिन शारदा देवी नाराज़ होकर उठ गईं।


"जो करना है, अपनी मर्ज़ी से करो। बाद में मुझे दोष मत देना।"


उस रात राधिका बिल्कुल नहीं सोई।


सुबह सूरज निकलने से पहले ही वह घर से निकल गई।


वह सीधे सुनार की दुकान पहुँची।


सुनार ने गहनों की जाँच की और कीमत बताई।


राधिका ने बिना एक पल सोचे गहने बेच दिए।


उसे जो पैसे मिले, वह सीधे अस्पताल पहुँची और ऑपरेशन के लिए जमा कर दिए।


तीन दिन बाद डॉक्टर मुस्कुराते हुए बाहर आए।


"ऑपरेशन सफल रहा। अब खतरे की कोई बात नहीं है।"


राधिका ने राहत की साँस ली।


उसकी माँ रोते हुए उससे लिपट गईं।


"बेटी... तूने आज फिर साबित कर दिया कि बेटी कभी पराई नहीं होती।"


राधिका की आँखों से भी आँसू बह निकले।


उसे लगा कि उसने अपना सबसे कीमती धन खोया नहीं, बल्कि अपने पिता की ज़िंदगी खरीद ली।


लेकिन उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था...


कि उसके इस फैसले के कारण...


कुछ ही दिनों बाद उसके अपने ससुराल में ऐसा तूफ़ान आने वाला था...


जो पूरे परिवार को हमेशा के लिए बदल देगा।



राधिका के पिता अब धीरे-धीरे स्वस्थ हो रहे थे।


हर बार जब वह अस्पताल जाती, उसके पिता उसका हाथ पकड़कर सिर्फ़ एक ही बात कहते,


"बेटी... तेरे ये एहसान मैं कभी नहीं चुका पाऊँगा।"


राधिका मुस्कुरा देती।


"पापा, बेटी अपने माँ-बाप पर एहसान नहीं करती।"


कुछ दिनों बाद उसके पिता घर लौट आए।


राधिका ने राहत की साँस ली और फिर अपने घर की ज़िम्मेदारियों में पहले की तरह जुट गई।


उसे लगा कि अब सब ठीक हो जाएगा।


लेकिन किस्मत ने उसके लिए कुछ और ही सोच रखा था।


एक शाम अमन बहुत परेशान होकर घर लौटा।


उसके चेहरे की रंगत उड़ी हुई थी।


राधिका ने घबराकर पूछा,


"क्या हुआ? तबीयत तो ठीक है?"


अमन ने बैग नीचे रखा और कुर्सी पर बैठ गया।


"जिस कंपनी में मैं काम करता था... आज अचानक बंद हो गई।"


राधिका के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।


"क्या...?"


अमन ने भारी आवाज़ में कहा,

"मालिक करोड़ों का कर्ज़ छोड़कर भाग गया। हम सबकी नौकरी चली गई।"


कुछ देर के लिए घर में सन्नाटा छा गया।


राधिका ने खुद को संभाला।


"कोई बात नहीं। दूसरी नौकरी मिल जाएगी।"


अमन ने फीकी मुस्कान दी, लेकिन उसके चेहरे पर चिंता साफ़ दिखाई दे रही थी।


उसी समय शारदा देवी कमरे में आईं।


जब उन्हें नौकरी जाने की बात पता चली तो उन्होंने गहरी साँस ली।


"हे भगवान... अब घर कैसे चलेगा?"


गोपाल जी भी चिंतित थे।


उनकी पेंशन बहुत कम थी।


देवर रोहित अभी नौकरी की तलाश में था।


ननद काजल की शादी की बात चल रही थी।


घर का हर खर्च अमन की कमाई से चलता था।


अब अचानक सब कुछ रुक गया था।


अगले कुछ हफ्तों तक अमन हर रोज़ नई-नई कंपनियों में इंटरव्यू देता रहा।


लेकिन हर जगह एक ही जवाब मिलता—


"अभी कोई जगह खाली नहीं है।"


धीरे-धीरे घर की जमा पूँजी भी खत्म होने लगी।


एक दिन राशन वाला दरवाज़े पर आया।


"भाभी जी, पिछले दो महीने का हिसाब बाकी है। अब उधार देना मुश्किल होगा।"


राधिका ने हाथ जोड़कर कहा,


"बस थोड़ा समय और दे दीजिए।"


राशन वाला चला गया।


लेकिन उसकी बातें शारदा देवी ने सुन ली थीं।


उन्होंने गुस्से में कहा,


"यही दिन देखने बाकी रह गए थे।"


राधिका चुप रही।


वह जानती थी कि इस समय बहस से कुछ नहीं बदलेगा।


उस रात उसने अपनी अलमारी खोली।


अब वहाँ गहनों की जगह सिर्फ़ खाली डिब्बे रखे थे।


उसे एक पल के लिए दुख हुआ।


लेकिन अगले ही पल उसने खुद को संभाल लिया।


अगले दिन उसने अपनी शादी की कुछ महँगी साड़ियाँ निकालीं।


फिर घर की पुरानी सजावटी चीज़ें।


और धीरे-धीरे उन्हें बेचकर घर का खर्च चलाने लगी।


लेकिन उसने किसी को कुछ नहीं बताया।


सबको लगता रहा कि घर किसी तरह चल रहा है।


एक महीने बाद काजल की शादी तय हो गई।


पूरा परिवार खुश था।


लेकिन खुशियों के पीछे एक बड़ी चिंता छिपी थी।


लड़के वालों ने साफ़ कहा था,


"हमें दहेज नहीं चाहिए... लेकिन शादी अच्छे से होनी चाहिए।"


घर में एक भी रुपया नहीं बचा था।


रात को शारदा देवी रो रही थीं।


"अब क्या होगा?"


गोपाल जी ने सिर झुका लिया।


"काश... मेरी थोड़ी और बचत होती।"


रोहित गुस्से में बोला,


"शादी अभी टाल देते हैं।"


काजल की आँखों में आँसू आ गए।


"अगर रिश्ता टूट गया तो?"


पूरा घर चिंता में डूब गया।


तभी राधिका धीरे से बोली,


"शादी तय तारीख़ पर ही होगी।"


सबने उसकी ओर देखा।


शारदा देवी ने पूछा,


"लेकिन कैसे?"


राधिका ने शांत स्वर में कहा,


"उसकी चिंता आप मत कीजिए।"


शारदा देवी ने घबराकर पूछा,

"लेकिन इतने पैसे आएँगे कहाँ से?"


राधिका मुस्कुरा दी।


"भगवान कोई न कोई रास्ता ज़रूर निकालेंगे।"


उसकी बात सुनकर किसी को भरोसा नहीं हुआ।


लेकिन अगले ही दिन...


राधिका बिना किसी को बताए घर से निकल गई।


शाम तक वह वापस भी नहीं लौटी।


अमन बार-बार फोन करता रहा।


फोन बंद था।


रात के आठ बजे जब दरवाज़ा खुला...


तो राधिका के हाथ में एक बड़ा लिफाफा था।


उसने वह लिफाफा गोपाल जी के सामने रख दिया।


अंदर पाँच लाख रुपये थे।


पूरा परिवार हैरान रह गया।


अमन ने काँपती आवाज़ में पूछा,


"राधिका... इतने पैसे कहाँ से आए?"


राधिका ने बस इतना कहा,


"काजल की शादी रुकनी नहीं चाहिए।"


लेकिन उसने यह नहीं बताया...


कि इन पैसों के लिए उसने ऐसा कौन-सा फैसला लिया था...


जो सुनकर अगले दिन पूरा परिवार स्तब्ध रह जाने वाला था।



रात भर घर में किसी की आँखों में नींद नहीं थी।


मेज़ पर रखा पाँच लाख रुपये का लिफाफा जैसे हर किसी से एक ही सवाल पूछ रहा था—


आख़िर इतने पैसे आए कहाँ से?


अमन बार-बार राधिका से पूछता रहा,


"राधिका, सच बताओ। तुमने कोई ग़लत काम तो नहीं किया?"


राधिका ने शांत स्वर में कहा,


"अगर मैं कहूँ कि मैंने कोई ग़लत काम नहीं किया, तो क्या तुम मुझ पर भरोसा करोगे?"


अमन ने बिना एक पल सोचे उसका हाथ पकड़ लिया।


"दुनिया कुछ भी कहे, मुझे तुम पर पूरा भरोसा है।"


लेकिन शारदा देवी का मन नहीं मान रहा था।


"कोई बिना वजह पाँच लाख रुपये नहीं देता। ज़रूर कुछ छिपाया जा रहा है।"


राधिका चुप रही।


अगले दिन काजल की शादी की तैयारियाँ शुरू हो गईं।


घर में फिर से रौनक लौट आई।


शादी बहुत अच्छे से संपन्न हुई।


लड़के वाले भी खुश थे।


काजल विदा होते समय राधिका से लिपटकर रो पड़ी।


"भाभी... अगर आप नहीं होतीं तो शायद मेरी शादी कभी नहीं हो पाती।"


राधिका ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,


"खुश रहना... यही मेरे लिए सबसे बड़ा उपहार है।"


लेकिन शादी के दो दिन बाद एक अनजान आदमी घर आया।


उसने गोपाल जी के हाथ में कुछ कागज़ रखे।


"यह बैंक की रसीद है।"


गोपाल जी ने कागज़ पढ़े तो उनके हाथ काँपने लगे।


शारदा देवी घबराकर बोलीं,


"क्या हुआ?"


गोपाल जी की आँखों से आँसू निकल पड़े।


"राधिका ने... अपने मायके का पुश्तैनी मकान बेच दिया।"


पूरा घर स्तब्ध रह गया।


अमन ने अविश्वास से राधिका की ओर देखा।


"यह... यह सच है?"


राधिका ने धीरे से सिर झुका दिया।


"हाँ।"


अमन की आँखें भर आईं।

"लेकिन राधिका... वह घर तो तुम्हारे पापा की आख़िरी निशानी था।"


राधिका ने शांत स्वर में कहा,

"अमन, अब पापा मेरे साथ हैं। उनके लिए उस मकान से ज़्यादा ज़रूरी उनका सम्मान और काजल की ज़िंदगी थी। अगर मेरी एक कुर्बानी से इस घर की खुशियाँ बच सकती थीं, तो मुझे कोई अफ़सोस नहीं है।"


शारदा देवी कुर्सी पर बैठ गईं।


उन्हें यक़ीन ही नहीं हो रहा था कि जिस बहू को उन्होंने हमेशा ताने दिए, उसी ने अपनी सबसे बड़ी विरासत बेचकर इस घर की इज़्ज़त बचा ली।


इतने में राधिका की माँ भी वहाँ आ गईं।


उन्होंने सबके सामने कहा,


"मैंने इसे बहुत रोका था। मैंने कहा था कि यह घर मत बेच। लेकिन इसने मुझसे कहा..."


उनकी आवाज़ भर्रा गई।


"इसने कहा—'माँ, मकान दोबारा बन सकता है, लेकिन अगर मेरी ननद का रिश्ता टूट गया तो उसका विश्वास कभी नहीं लौटेगा।'"


पूररे घर में सन्नाटा छा गया।


अमन की आँखों से आँसू बहने लगे।


वह पहली बार खुद को बहुत छोटा महसूस कर रहा था।


वह राधिका के सामने आकर बोला,


"मुझे माफ़ कर दो। मैं तुम्हारा दर्द कभी समझ ही नहीं पाया।"


राधिका मुस्कुरा दी।


"पति-पत्नी माफ़ी नहीं माँगते... साथ निभाते हैं।"


लेकिन उसी समय दरवाज़े पर एक और दस्तक हुई।


दरवाज़ा खोलते ही सामने बैंक का अधिकारी खड़ा था।


उसने कहा,


"गोपाल जी, अगर अगले पंद्रह दिनों में बैंक का पुराना कर्ज़ नहीं चुकाया गया तो यह मकान नीलाम करना पड़ेगा।"


यह सुनते ही सबके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।


अब परिवार पर एक और बड़ा संकट आ चुका था।


राधिका ने एक बार फिर पूरे परिवार की ओर देखा।


उसकी आँखों में डर नहीं था...


बल्कि एक नया संकल्प था।


उसे पता था कि इस बार भी उसे ही आगे बढ़कर अपने परिवार को टूटने से बचाना होगा।



बैंक अधिकारी के जाते ही घर में सन्नाटा छा गया।


गोपाल जी कुर्सी पर बैठ गए।


उनके हाथ काँप रहे थे।


उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा,


"यह कर्ज़ मैंने पाँच साल पहले लिया था।"


सबने हैरानी से उनकी ओर देखा।


"रोहित का छोटा-सा कारोबार शुरू करवाने के लिए मैंने बैंक से दस लाख रुपये उधार लिए थे। शुरुआत में सब ठीक चला, लेकिन फिर कारोबार बंद हो गया। मैंने किसी को कुछ नहीं बताया। सोचता रहा कि धीरे-धीरे चुका दूँगा। लेकिन ब्याज बढ़ता गया और आज बात यहाँ तक पहुँच गई।"


रोहित का सिर शर्म से झुक गया।


"पापा... मेरी वजह से..."


गोपाल जी ने उसे रोक दिया।


"गलती सिर्फ़ तुम्हारी नहीं थी बेटा। गलती मेरी भी थी। मुझे समय रहते सबको सच बता देना चाहिए था।"


शारदा देवी की आँखों से आँसू बहने लगे।


उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि घर की परेशानियाँ छिपाने से नहीं, मिलकर सामना करने से हल होती हैं।


उधर राधिका चुपचाप सब सुन रही थी।


उसने धीरे से कहा,


"हम यह घर नहीं खोएँगे।"


अमन ने उसकी ओर देखा।


"लेकिन कैसे? अब हमारे पास कुछ भी नहीं बचा।"


राधिका मुस्कुराई।


"सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। हमारे पास हमारा परिवार अभी भी है।"


अगले ही दिन राधिका ने एक बड़ा फैसला लिया।


उसे याद आया कि शादी से पहले वह बहुत अच्छी सिलाई और कढ़ाई करती थी।


उसने घर के बरामदे में एक छोटा-सा बोर्ड लगाया—


"राधिका सिलाई एवं बुटीक सेंटर"


शुरुआत में केवल दो ग्राहक आए।


फिर चार।


फिर दस।


धीरे-धीरे पूरे मोहल्ले में उसकी मेहनत की चर्चा होने लगी।


उसके बनाए कपड़ों की डिज़ाइन लोगों को पसंद आने लगी।


उधर अमन को भी एक नई कंपनी में नौकरी मिल गई।


रोहित ने इस बार छोटी शुरुआत की।


उसने ऑनलाइन कपड़ों की डिलीवरी का काम शुरू किया और राधिका के बनाए कपड़े भी बेचने लगा।


कुछ ही महीनों में घर की आर्थिक स्थिति बदलने लगी।


हर महीने बैंक की किस्त समय पर जाने लगी।


एक साल बाद...


वही बैंक अधिकारी फिर घर आया।


इस बार उसके चेहरे पर मुस्कान थी।


उसने गोपाल जी को एक फ़ाइल देते हुए कहा,


"बधाई हो। आपका पूरा कर्ज़ चुक गया है। अब यह घर पूरी तरह आपका है।"


गोपाल जी की आँखें भर आईं।


उन्होंने फ़ाइल सीने से लगा ली।


उसी शाम पूरे परिवार ने घर की छत पर छोटा-सा कार्यक्रम रखा।


सारे पड़ोसी भी आए।


शारदा देवी सबके सामने खड़ी हुईं।


उन्होंने राधिका का हाथ पकड़ लिया।


उनकी आवाज़ काँप रही थी।


"आज मैं सबके सामने अपनी बहू से माफ़ी माँगना चाहती हूँ।"


पूरा माहौल शांत हो गया।


"मैंने इसे हमेशा सिर्फ़ घर का काम करने वाली बहू समझा। इसके त्याग को कभी नहीं देखा। जब इसने अपने पिता के लिए गहने बेच दिए, तब भी मैंने इसे समझा नहीं। जब इसने मेरी बेटी की शादी बचाने के लिए अपना मायके का घर बेच दिया, तब भी मैं इसके दर्द को नहीं समझ पाई।"


शारदा देवी की आँखों से आँसू बह निकले।


"लेकिन आज मुझे समझ आ गया है कि बहू कभी पराई नहीं होती। अगर बहू घर को अपना मान ले, तो वही घर की सबसे बड़ी ताकत बन जाती है।"


उन्होंने सबके सामने राधिका के पैर छूने की कोशिश की।


राधिका घबरा गई।


उसने तुरंत उन्हें रोक लिया और गले लगा लिया।


"माँ जी, माँ कभी बेटी से माफ़ी नहीं माँगती।"


यह सुनते ही वहाँ मौजूद हर व्यक्ति की आँखें नम हो गईं।


रोहित आगे आया।


"भाभी, आपने मेरे लिए अपना सब कुछ खो दिया। मैं वादा करता हूँ कि आज के बाद इस घर की हर ज़िम्मेदारी मैं भी निभाऊँगा।"


काजल भी अपने पति के साथ आई हुई थी।


उसने मुस्कुराकर कहा,


"आज लोग मुझे मेरी शादी की नहीं, मेरी भाभी की किस्मत वाली ननद कहते हैं।"


अमन ने सबके सामने राधिका का हाथ थाम लिया।


"आज मुझे अपनी पत्नी पर पहले से भी ज़्यादा गर्व है। इसने हमें सिखाया कि परिवार पैसे से नहीं, त्याग और विश्वास से चलता है।"


कुछ ही दिनों बाद राधिका के बुटीक का काम इतना बढ़ गया कि उसने मोहल्ले की पाँच ज़रूरतमंद महिलाओं को भी काम पर रख लिया।


अब वह सिर्फ़ अपने परिवार का सहारा नहीं थी, बल्कि कई और घरों की उम्मीद बन चुकी थी।


एक शाम गोपाल जी बरामदे में बैठे मुस्कुरा रहे थे।


उन्होंने राधिका को बुलाया।


"बेटा, पहले मैं सोचता था कि भगवान ने मुझे बेटा दिया, इसलिए मैं भाग्यशाली हूँ। लेकिन आज लगता है कि उसने मुझे तुम जैसी बहू दी, इसलिए मैं सबसे ज़्यादा भाग्यशाली हूँ।"


राधिका की आँखें भर आईं।


उसने झुककर उनके चरण छुए।


घर के आँगन में हँसी गूँज रही थी।


जहाँ कभी ताने सुनाई देते थे, वहाँ अब सम्मान के शब्द थे।


जहाँ कभी दूरी थी, वहाँ अपनापन था।


राधिका ने आसमान की ओर देखा।


उसे लगा जैसे उसके पिता की सीख आज सच हो गई थी—


"जिस घर में त्याग और प्रेम साथ रहते हैं, वहाँ खुशियाँ देर से सही, लेकिन ज़रूर आती हैं।"


उस दिन के बाद उस घर में किसी ने राधिका को "सिर्फ़ बहू" नहीं कहा।


सब उसे एक ही नाम से बुलाते थे—


"हमारे घर की सबसे बड़ी ताकत।"



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