अनपढ़, मगर सबसे बड़ा इंसान
बरसों पहले एक छोटे से गाँव में रामस्वरूप और उनकी पत्नी कमला अपने चार बच्चों के साथ रहते थे। तीन बेटे थे—सबसे बड़ा अभिषेक, मझला रघु और सबसे छोटा विवेक। सबसे छोटी एक बेटी थी—गुड़िया।
रामस्वरूप किसान थे। आमदनी बहुत अधिक नहीं थी, लेकिन बच्चों की पढ़ाई में उन्होंने कभी कमी नहीं आने दी। उनका सपना था कि चारों बच्चे पढ़-लिखकर सम्मान की जिंदगी जिएँ।
अभिषेक बचपन से ही पढ़ाई में तेज था। हर परीक्षा में पहले नंबर पर आता। विवेक भी उससे कम नहीं था। दोनों भाइयों की तारीफ पूरे गाँव में होती थी।
लेकिन रघु...
रघु का मन किताबों में नहीं लगता था। वह कभी खेतों में चला जाता, कभी किसी बूढ़े की मदद करने लग जाता, कभी किसी घायल जानवर को घर उठा लाता। पढ़ाई में कमजोर था, इसलिए घरवालों की डाँट भी सबसे ज्यादा उसी को पड़ती थी।
अक्सर पिता गुस्से में कहते, "देख अपने दोनों भाइयों को... और एक तू है। न पढ़ाई, न कोई सपना।"
रघु बस मुस्कुरा देता। "बाबूजी, कोशिश तो करता हूँ।"
समय बीता।
अभिषेक डॉक्टर बन गया। विवेक सरकारी इंजीनियर बन गया।
दोनों की अच्छी नौकरी लगी और शहर में रहने लगे। उन्होंने अपनी पसंद की लड़कियों से शादी कर ली।
गुड़िया की भी शादी एक अच्छे परिवार में हो गई।
लेकिन रघु...
वह गाँव में ही रह गया। कभी मजदूरी करता, कभी खेतों में काम करता। महीने भर मेहनत करने के बाद भी जितना कमाता, उससे बस घर का खर्च चलता।
पिता को उसकी सबसे ज्यादा चिंता रहती।
"मेरे मरने के बाद इसका क्या होगा?"
यही सोचते-सोचते एक दिन रामस्वरूप इस दुनिया से चले गए।
पूरा घर टूट गया।
अब कमला देवी अकेली थीं।
उन्होंने बहुत सोच-विचार करके अपने ही गाँव की एक सीधी-सादी लड़की सीमा से रघु की शादी कर दी।
लोग हँसने लगे।
"इतनी अच्छी लड़की की शादी एक मजदूर से कर दी?"
"बेचारी की किस्मत खराब है।"
लेकिन सीमा ने कभी शिकायत नहीं की।
पहली रात उसने रघु से सिर्फ एक बात कही।
"मुझे बड़े घर की नहीं... बड़े दिल वाले इंसान की तलाश थी।"
रघु की आँखें भर आईं।
अगले ही दिन से उसकी जिंदगी बदल गई।
अब वह सुबह सूरज निकलने से पहले उठ जाता।
दिनभर मेहनत करता।
रात को भी गाँव वालों के खेतों में पानी लगाने चला जाता।
दोस्त बुलाते—
"चल रघु... आज चौपाल पर बैठते हैं।"
रघु हँसकर कहता—
"अब समय मेरा नहीं रहा। अब कोई मेरा इंतजार करता है।"
एक दोस्त ने मजाक उड़ाया—
"बीवी का गुलाम बन गया है।"
रघु मुस्कुराया।
"पहले मैं अकेला था। भूखा भी सो जाता तो किसी को फर्क नहीं पड़ता था। अब मेरी पत्नी मेरे भरोसे आई है। कल बच्चे भी होंगे। उनके सपनों की जिम्मेदारी मेरी है।"
फिर बोला—
"गरीब होना शर्म की बात नहीं... जिम्मेदारी से भागना शर्म की बात है।"
यह बात सुनकर सब चुप हो गए।
उधर शहर में रहने वाले दोनों भाई अच्छी तनख्वाह कमाने लगे।
महँगी गाड़ियाँ...
बड़े मकान...
शानदार जिंदगी...
धीरे-धीरे उन्हें लगने लगा कि गाँव की जमीन का बँटवारा कर लेना चाहिए।
एक दिन दोनों गाँव पहुँचे।
उन्होंने माँ से कहा—
"अब बँटवारा कर देते हैं।"
कमला देवी ने बहुत समझाया।
"बेटा, घर मत बाँटो।"
लेकिन दोनों नहीं माने।
वकील बुला लिया गया।
गुड़िया भी मायके आ गई।
रघु सुबह मजदूरी पर जाने लगा तो बड़े भाई ने रोक लिया।
"आज मत जा।"
रघु बोला—
"काम पर नहीं जाऊँगा तो शाम का चूल्हा कैसे जलेगा?"
छोटे भाई ने कहा—
"पहले बँटवारा कर लेते हैं।"
रघु बोला—
"जो ठीक लगे कर लो। शाम को आकर जहाँ कहोगे अंगूठा लगा दूँगा।"
गुड़िया हँसते हुए बोली—
"तुम कभी नहीं सुधरोगे।"
आखिर सब बैठ गए।
कुल बारह बीघा जमीन थी।
दोनों भाइयों ने पाँच-पाँच बीघा अपने नाम कर ली।
बची दो बीघा और पुश्तैनी मकान रघु के हिस्से में रख दिया गया।
वकील कागज तैयार करने लगा।
तभी रघु ने पूछा—
"एक बात पूछूँ?"
सबने उसकी ओर देखा।
"हमारी गुड़िया का हिस्सा कहाँ है?"
दोनों भाई हँस पड़े।
"अरे बहनों का हिस्सा कहाँ होता है?"
रघु कुछ देर चुप रहा।
फिर बोला—
"अगर बेटी का इस घर पर कोई हक नहीं... तो बचपन में उसे बेटा कहकर क्यों बुलाते थे?"
पूरा कमरा शांत हो गया।
रघु ने वकील से कहा—
"मेरे हिस्से की सारी जमीन मेरी बहन गुड़िया के नाम कर दीजिए।"
सब हैरान रह गए।
बड़े भाई ने पूछा—
"और तू?"
रघु मुस्कुराया।
फिर अपनी माँ की ओर देखकर बोला—
"मेरे हिस्से में माँ रहेगी।"
सीमा तुरंत उठी।
वह अपनी सास के पास जाकर बैठ गई।
"माँ जहाँ रहेंगी... वहीं हमारा घर होगा।"
कमला देवी रो पड़ीं।
गुड़िया दौड़कर रघु से लिपट गई।
"भैया... मुझे माफ कर दो। मैंने हमेशा आपको छोटा समझा।"
रघु ने उसके सिर पर हाथ रखा।
"बहन कभी पराई नहीं होती। शादी सिर्फ घर बदलती है... रिश्ते नहीं।"
उसकी बातें सुनकर दोनों बड़े भाई शर्मिंदा हो गए।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
कुछ महीनों बाद माँ की तबीयत बहुत खराब हो गई।
डॉक्टर बेटे ने कहा—
"मुझे अस्पताल जाना है।"
इंजीनियर बेटे ने कहा—
"मेरी मीटिंग है।"
रघु तीन दिन तक माँ के सिरहाने बैठा रहा।
दवा दी।
खाना खिलाया।
रात-रात भर जागता रहा।
माँ ठीक हुईं तो बोलीं—
"जिसे लोग अनपढ़ कहते हैं... उसने रिश्तों की सबसे बड़ी किताब पढ़ रखी है।"
दोनों भाई सिर झुकाए खड़े थे।
उन्होंने रघु के पैर पकड़ लिए।
"हमें माफ कर दे।"
रघु ने तुरंत उन्हें गले लगा लिया।
"भाई कभी अलग नहीं होते। अलग तो सिर्फ उनके अहंकार हो जाते हैं।"
उस दिन तीनों भाइयों ने मिलकर बँटवारे के सारे कागज फाड़ दिए।
गुड़िया बोली—
"आज बाबूजी होते तो सबसे ज्यादा खुश होते।"
कमला देवी ने चारों बच्चों को गले लगाया और कहा—
"जिस घर में संपत्ति से ज्यादा रिश्तों की कीमत हो... वहाँ भगवान हमेशा बसते हैं।"
उस दिन के बाद उस घर में कभी बँटवारे की बात नहीं हुई।
लोग आज भी उस परिवार का उदाहरण देते हैं और कहते हैं—
"डिग्री इंसान को बड़ा बना सकती है, लेकिन संस्कार ही उसे महान बनाते हैं।"

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