सिर्फ 30 सेकंड का फैसला
रात 1:38 बजे — सिविल अस्पताल, कानपुर
इमरजेंसी वार्ड के बाहर रखी लोहे की बेंच पर एक सफाई कर्मचारी चुपचाप बैठा था।
उसकी नीली वर्दी पूरी तरह भीगी हुई थी। पसीना और पानी दोनों एक-दूसरे में घुल चुके थे। हाथों में फिनाइल की तेज़ गंध बसी हुई थी। आँखों के नीचे काले घेरे साफ दिखाई दे रहे थे।
उसका नाम था रामनिवास।
उम्र पचपन साल।
वह पिछले बारह वर्षों से इसी सरकारी अस्पताल में सफाई कर्मचारी था।
उसने धीरे से अपनी जेब से पुरानी घड़ी निकाली। शीशा टूटा हुआ था, लेकिन सुइयाँ अब भी चल रही थीं।
"एक बजकर अड़तीस मिनट..."
उसने मन ही मन कहा और फिर सिर पीछे टिकाकर गहरी साँस ली।
उसी समय इमरजेंसी का दरवाज़ा खुला।
दो वार्ड बॉय स्ट्रेचर लेकर तेज़ी से अंदर दौड़े। उनके पीछे एक महिला रोते हुए भाग रही थी।
"डॉक्टर साहब... मेरे पति को बचा लीजिए..."
पूरे अस्पताल में भागदौड़ मची हुई थी।
लेकिन इस अफरा-तफरी के बीच भी रामनिवास फिर से उठ खड़ा हुआ।
उसने झटपट पोछा उठाया और स्ट्रेचर के पहियों से फैले खून के निशान साफ करने लगा।
कोई उसे देख नहीं रहा था।
कोई उसका नाम नहीं जानता था।
लेकिन अगर वह पाँच मिनट सफाई न करता, तो वही लोग शिकायत करते कि अस्पताल गंदा है।
करीब बीस मिनट बाद सब कुछ थोड़ा शांत हुआ।
रामनिवास वापस उसी बेंच पर बैठ गया।
उसने अपना टिफिन खोला।
अंदर दो सूखी रोटियाँ और थोड़ा सा आलू का भुर्ता रखा था।
पहला कौर ही तोड़ा था कि तभी एक नर्स दौड़ती हुई आई।
"रामू भैया... जल्दी आइए... ऑपरेशन थिएटर के बाहर सफाई करनी है।"
उसने बिना कुछ बोले टिफिन बंद किया।
रोटी वापस डिब्बे में रख दी।
और फिर उसी तेजी से नर्स के पीछे चल पड़ा।
करीब चालीस मिनट बाद वह वापस लौटा।
रोटियाँ अब बिल्कुल ठंडी हो चुकी थीं।
उसने मुस्कुराकर खुद से कहा—
"चलो... ठंडी ही सही... पेट तो भर जाएगा।"
लेकिन किस्मत को शायद आज यह भी मंजूर नहीं था।
जैसे ही उसने पहला निवाला मुँह तक पहुँचाया, अस्पताल के मुख्य गेट पर अचानक शोर मच गया।
"एक्सीडेंट केस... रास्ता खाली करो..."
एक साथ तीन एम्बुलेंस अस्पताल के अंदर दाखिल हुईं।
सायरन की आवाज़ पूरे परिसर में गूँजने लगी।
रामनिवास फिर उठ खड़ा हुआ।
इस बार उसने टिफिन भी बंद नहीं किया।
वैसा ही खुला छोड़कर दौड़ पड़ा।
करीब डेढ़ घंटे तक अस्पताल में अफरा-तफरी का माहौल बना रहा।
किसी के सिर से खून बह रहा था।
किसी की बाँह टूट गई थी।
कोई अपने परिजन को पुकार रहा था।
डॉक्टर, नर्स, वार्ड बॉय...
सब अपनी-अपनी जगह भाग रहे थे।
और उनके बीच एक आदमी बिना रुके लगातार फर्श साफ कर रहा था।
वही...
रामनिवास।
उसके पैरों में दर्द था।
कमर कई बार सीधी करने की कोशिश की, लेकिन समय नहीं था।
एक जगह सफाई खत्म होती, दूसरी जगह बुलावा आ जाता।
करीब तीन बजे जाकर अस्पताल में थोड़ी शांति लौटी।
रामनिवास फिर उसी बेंच पर आकर बैठा।
इस बार उसने टिफिन उठाया।
रोटियाँ पूरी तरह सूख चुकी थीं।
उसने एक कौर खाया।
तभी सामने से अस्पताल के वरिष्ठ डॉक्टर डॉ. विनोद सक्सेना आते दिखाई दिए।
उनके साथ दो जूनियर डॉक्टर भी थे।
डॉ. सक्सेना ने दूर से देखा—
रामनिवास बेंच पर बैठा है।
उन्होंने बिना कुछ पूछे ऊँची आवाज़ में कहा—
"रामनिवास!"
वह तुरंत खड़ा हो गया।
"जी साहब।"
डॉ. विनोद सक्सेना ने कड़े स्वर में कहा,
"रामनिवास! अभी बैठने का समय है?"
रामनिवास ने तुरंत सिर झुकाकर जवाब दिया,
"साहब... बस खाना..."
डॉ. सक्सेना ने सख्त आवाज़ में कहा,
"पहले ड्यूटी करो, फिर खाना खाना। मरीज इंतज़ार नहीं करते।"
रामनिवास ने धीरे से "जी" कहा।
उसने टिफिन बंद किया।
और फिर चुपचाप आगे बढ़ गया।
डॉक्टर आगे निकल गए।
लेकिन उनके जाते ही जूनियर डॉक्टरों में से एक बोला—
"सर, बेचारा शायद काफी देर से काम कर रहा है।"
डॉ. सक्सेना ने बिना पीछे देखे जवाब दिया—
"अस्पताल में भावनाओं से नहीं, अनुशासन से काम चलता है।"
रामनिवास ने यह बात सुन ली।
लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
उसने सिर्फ अपना सिर थोड़ा और झुका लिया।
करीब चार बजे बारिश शुरू हो गई।
छत से टपकती बूंदें अस्पताल के बरामदे तक आने लगीं।
रामनिवास गीले फर्श पर फिसलन रोकने के लिए बार-बार पोछा लगा रहा था।
इसी दौरान मेडिकल कॉलेज का एक इंटर्न छात्र अपने दोस्तों के साथ वहाँ पहुँचा।
उसने देखा—
रामनिवास एक मिनट के लिए दीवार से टिककर आँखें बंद किए खड़ा है।
उसने हँसते हुए कहा—
"देखो... ड्यूटी के बीच में आराम फरमा रहे हैं।"
उसके दोस्त भी मुस्कुरा दिए।
इंटर्न ने मोबाइल निकाला।
वीडियो रिकॉर्ड करना शुरू कर दिया।
वीडियो में सिर्फ इतना दिखाई दे रहा था कि एक सफाई कर्मचारी आँखें बंद किए दीवार से टिककर खड़ा है।
वीडियो के पीछे की सच्चाई किसी को दिखाई नहीं दे रही थी।
सिर्फ तीस सेकंड की रिकॉर्डिंग।
फिर उसने वीडियो अपने दोस्तों के ग्रुप में भेज दिया।
कैप्शन लिखा—
"सरकारी नौकरी... काम कम, आराम ज्यादा।"
कुछ ही मिनटों में वीडियो दूसरे ग्रुपों में पहुँच गया।
किसी ने लिखा—
"इसी वजह से अस्पतालों की हालत खराब है।"
किसी ने लिखा—
"ऐसे लोगों को निकाल देना चाहिए।"
किसी ने हँसने वाला इमोजी भेज दिया।
किसी ने गुस्से वाला।
लेकिन किसी ने यह नहीं पूछा—
"क्या यह आदमी सचमुच कामचोर है... या सिर्फ थक गया है?"
उधर...
रामनिवास को इस बात का बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि उसका तीस सेकंड का वीडियो अब पूरे अस्पताल में घूम रहा है।
वह तो फिर से उसी काम में लग गया था।
उसे बस इतना पता था कि आज घर पहुँचने में फिर देर होगी।
और उसकी बेटी पूजा शायद उसका इंतज़ार करते-करते सो जाएगी।
रात 4:52 बजे — सिविल अस्पताल, कानपुर
बारिश अब भी रुक-रुककर हो रही थी।
इमरजेंसी वार्ड के बाहर लगी पीली लाइट की रोशनी गीले फर्श पर पड़ रही थी।
रामनिवास अपने हाथों में कूड़े का बड़ा बैग लिए मेडिकल वेस्ट रूम की तरफ जा रहा था।
हर कदम के साथ उसके घुटनों में दर्द महसूस हो रहा था।
पिछले चौबीस घंटों में शायद ही उसे दस मिनट बैठने का मौका मिला था।
उसी समय उसकी जेब में रखा पुराना मोबाइल बजा।
स्क्रीन पर लिखा था—
"पूजा बिटिया"
उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
उसने तुरंत कॉल उठा ली।
"हाँ बेटा..."
दूसरी तरफ से धीमी आवाज़ आई—
"पापा... अभी भी अस्पताल में हो?"
रामनिवास ने मुस्कुराते हुए कॉल रिसीव की।
"हाँ बेटा।" उन्होंने प्यार से कहा।
पूजा ने धीमी आवाज़ में पूछा,
"आपने खाना खा लिया?"
रामनिवास कुछ पल चुप रहा।
फिर झूठ बोल दिया—
"हाँ, खा लिया।"
असलियत यह थी कि उसका टिफिन अब भी वैसे ही रखा था।
दोनों रोटियाँ सख्त हो चुकी थीं।
पूजा मुस्कुराकर बोली—
"अच्छा है। मम्मी कह रही थीं कि खाली पेट मत रहना।"
रामनिवास ने स्नेह से पूछा,
"तू सोई नहीं अभी तक?"
पूजा हल्का-सा मुस्कुराई।
"आपके आने का इंतज़ार कर रही थी।"
रामनिवास की आँखें भर आईं।
"पगली... मेरी चिंता मत किया कर। तुझे पढ़ाई करनी है।"
पूजा ने धीमी आवाज़ में कहा, "पापा..."
रामनिवास मुस्कुराए। "हाँ बेटा?"
पूजा थोड़ी झिझकते हुए बोली, "अगले हफ्ते स्कूल की लैब फीस जमा करनी है।"
रामनिवास एकदम चुप हो गया।
उसे पहले से पता था।
राशि थी तीन हजार आठ सौ रुपये।
उसकी जेब में इस समय सिर्फ पाँच सौ सत्तर रुपये थे।
लेकिन उसने अपनी बेटी को चिंता नहीं होने दी।
"जमा हो जाएगी बेटा।"
"सच?" पूजा ने मासूमियत से पूछा।
"तेरे पापा ने आज तक तुझे किसी चीज़ के लिए मना किया है?"
रामनिवास ने हल्की मुस्कान के साथ कहा।
पूजा हँस पड़ी।
"नहीं।" पूजा हँसते हुए बोली।
"बस फिर। अब आराम से सो जा।" रामनिवास ने प्यार से समझाया।
"ठीक है पापा... और हाँ..." पूजा ने झिझकते हुए कहा।
"क्या?" रामनिवास ने पूछा।
"आप दुनिया के सबसे अच्छे पापा हो।" पूजा की आवाज़ भर्रा गई।
कॉल कट गई।
रामनिवास कुछ सेकंड तक मोबाइल की काली स्क्रीन देखता रहा।
उसने धीरे से उसे जेब में रखा।
फिर आसमान की तरफ देखा।
जैसे मन ही मन भगवान से कह रहा हो—
"बस मेरी बेटी का सपना मत टूटने देना।"
उसी समय अस्पताल के प्रशासनिक भवन में एक अलग माहौल था।
इंटर्न द्वारा बनाई गई वीडियो अब कई डॉक्टरों तक पहुँच चुकी थी।
कमेंट लगातार बढ़ रहे थे।
"ड्यूटी के समय सो रहा है।"
"ऐसे कर्मचारी अस्पताल की बदनामी हैं।"
"कार्रवाई होनी चाहिए।"
अस्पताल के प्रशासन अधिकारी राजीव माथुर ने वीडियो देखा।
उन्होंने बिना कुछ पूछे कहा—
"सुबह होते ही इसे मेरे ऑफिस में भेजना।"
करीब पाँच बजकर पैंतीस मिनट पर...
रामनिवास आखिरकार पाँच मिनट के लिए अपने स्टोर रूम में पहुँचा।
उसने दरवाज़ा बंद किया।
एक कोने में रखी प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठ गया।
धीरे से टिफिन खोला।
रोटियाँ अब पत्थर जैसी हो चुकी थीं।
उसने एक टुकड़ा तोड़ा।
मुँह में रखा।
लेकिन चबाया नहीं गया।
उसने पास रखी पानी की बोतल से थोड़ा पानी पीकर किसी तरह निगल लिया।
तभी बाहर से आवाज़ आई—
"रामनिवास!"
वह तुरंत उठ गया।
"जी!"
"जल्दी आओ। ब्लड बैंक के बाहर सफाई करनी है।"
उसने बिना शिकायत किए टिफिन फिर बंद कर दिया।
आज तीसरी बार।
करीब छह बजे...
अस्पताल की कैंटीन खुल चुकी थी।
कुछ डॉक्टर चाय पी रहे थे।
उसी समय इंटर्न लड़का अपने दोस्तों के साथ बैठा था।
वह हँसते हुए बोला—
"यार, मेरे वीडियो पर तो दो सौ से ज्यादा रिएक्शन आ गए।"
सभी हँस पड़े।
तभी वहीं बैठे एक बुजुर्ग वार्ड बॉय हरिदास ने उनकी बातें सुन लीं।
वह धीरे-धीरे उनके पास आया।
"बेटा..."
इंटर्न ने सिर उठाया।
"जी?"
"जिस आदमी का वीडियो बनाया है... उसका नाम जानते हो?"
इंटर्न ने लापरवाही से कंधे उचकाए।
"नहीं।"
हरिदास ने उसकी आँखों में देखते हुए फिर पूछा,
"उसकी कहानी जानते हो?"
इंटर्न हल्का-सा मुस्कुराया।
"ज़रूरत क्या है?"
हरिदास ने गहरी साँस ली।
"ज़रूरत इसलिए है... क्योंकि जिस आदमी पर तुम हँस रहे हो... उसने पिछले साल मेरी जान बचाई थी।"
टेबल पर अचानक सन्नाटा छा गया।
इंटर्न ने पहली बार गंभीर होकर पूछा—
"कैसे?"
हरिदास ने जवाब नहीं दिया।
सिर्फ इतना कहा—
"पूरी बात सुनोगे... तो शायद आज रात नींद नहीं आएगी।"
इतना कहकर वह वहाँ से चला गया।
इंटर्न के चेहरे की मुस्कान पहली बार गायब हुई।
करीब सात बजकर दस मिनट पर...
अस्पताल में दिन की शिफ्ट शुरू हो चुकी थी।
नए कर्मचारी आ गए थे।
लेकिन रामनिवास अब भी काम कर रहा था।
तभी एक चपरासी उसके पास आया।
"रामनिवास जी।"
रामनिवास ने पलटकर पूछा, "हाँ?"
"साहब ने बुलाया है।"
रामनिवास ने हैरानी से पूछा, "कौन साहब?"
"प्रशासन अधिकारी... राजीव माथुर।"
रामनिवास ने एक पल के लिए आँखें बंद कीं।
उसे समझते देर नहीं लगी।
शायद वीडियो की बात उसके कानों तक पहुँच चुकी थी।
उसने अपने हाथ धोए।
वर्दी सीधी की।
टोपी पहनी।
और धीमे कदमों से प्रशासनिक भवन की ओर चल पड़ा।
उसे नहीं पता था...
उसके बारे में फैसला लगभग तय किया जा चुका है।
लेकिन उसे यह भी नहीं पता था कि अगले कुछ मिनटों में एक ऐसा इंसान उस कमरे में आने वाला है...
जो पूरी कहानी की दिशा बदल देगा।
प्रशासन अधिकारी राजीव माथुर के कमरे के बाहर कुर्सियों की लंबी कतार लगी थी।
कोई छुट्टी के आवेदन के लिए आया था।
कोई वेतन से जुड़ी शिकायत लेकर।
लेकिन एक कुर्सी पर बैठे रामनिवास सबसे शांत थे।
उनकी नज़रें ज़मीन पर थीं।
तभी चपरासी बाहर आया।
"रामनिवास जी... साहब बुला रहे हैं।"
उन्होंने धीरे से दरवाज़ा खोला।
कमरे के अंदर राजीव माथुर के अलावा मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. विनोद सक्सेना, नर्सिंग सुपरवाइज़र सुनीता मैडम, और मानव संसाधन विभाग के दो अधिकारी बैठे थे।
टेबल पर एक मोबाइल रखा था।
स्क्रीन पर वही वीडियो रुकी हुई थी।
राजीव माथुर ने सीधे पूछा—
"रामनिवास... ये वीडियो तुम्हारी है?"
रामनिवास ने बिना बहाना बनाए सिर झुका दिया।
"जी... मैं ही हूँ।"
प्रशासन अधिकारी राजीव माथुर ने मोबाइल की स्क्रीन रामनिवास की ओर घुमाते हुए पूछा,
"रामनिवास, ड्यूटी के समय दीवार से टिककर आँखें बंद क्यों की थीं?"
रामनिवास कुछ बोलने ही वाले थे कि डॉ. सक्सेना ने कहा—
"पहले जवाब दीजिए।"
रामनिवास ने शांत स्वर में कहा—
"साहब... बस एक मिनट के लिए चक्कर आ गया था।"
राजीव माथुर ने भौंहें सिकोड़ते हुए पूछा, "चक्कर?"
रामनिवास ने सिर झुकाकर जवाब दिया, "जी।"
डॉ. विनोद सक्सेना ने कुर्सी से थोड़ा आगे झुकते हुए पूछा, "इतनी तबीयत खराब थी तो छुट्टी क्यों नहीं ली?"
रामनिवास हल्का-सा मुस्कुराया।
वह मुस्कान दर्द से भरी थी।
"सरकारी अस्पताल में सफाई वाला छुट्टी ले ले... तो उसकी जगह कौन आएगा साहब?"
कमरे में कुछ पल की चुप्पी छा गई।
राजीव माथुर ने फिर पूछा—
"कल से लगातार ड्यूटी कर रहे हो?"
रामनिवास ने सिर झुकाकर जवाब दिया, "जी साहब।"
राजीव माथुर ने फिर पूछा, "कितने घंटे?"
रामनिवास ने कुछ पल हिसाब लगाकर धीमी आवाज़ में कहा, "लगभग... तेईस घंटे।"
नर्सिंग सुपरवाइज़र ने आश्चर्य से पूछा—
"तेईस घंटे?"
रामनिवास ने सिर हिलाया।
"रात वाली शिफ्ट का कर्मचारी नहीं आया था। कहा गया था कि कुछ देर और रुक जाओ।"
राजीव माथुर ने फाइल से नज़र उठाकर पूछा—
"तो क्या एजेंसी ने ओवरटाइम देने का वादा किया था?"
रामनिवास ने धीमे से जवाब दिया—
"जी साहब... कहा तो था।"
"मिला?" राजीव माथुर ने फिर पूछा।
रामनिवास कुछ पल चुप रहे। फिर हल्की मुस्कान के साथ बोले—
"नहीं साहब... अभी तक नहीं मिला।"
राजीव माथुर ने सामने रखी फाइल खोली।
रिकॉर्ड देखा।
फिर भौंहें सिकुड़ गईं।
पिछले तीन महीनों में रामनिवास ने सबसे ज़्यादा अतिरिक्त ड्यूटी की थी।
लेकिन ओवरटाइम के भुगतान का कॉलम लगभग खाली था।
उन्होंने तुरंत अकाउंट सेक्शन की ओर देखा।
"ये कैसे हुआ?"
कोई जवाब नहीं दे पाया।
उसी समय दरवाज़े पर दस्तक हुई।
बाहर से एक परिचित आवाज़ आई।
"साहब... मैं हरिदास हूँ। अंदर आ सकता हूँ?"
अंदर आए...
वही बुजुर्ग वार्ड बॉय हरिदास।
उन्होंने हाथ जोड़कर कहा—
"साहब... अगर इजाज़त हो तो मैं कुछ कहना चाहता हूँ।"
राजीव माथुर ने कुर्सी की ओर इशारा किया।
"बैठिए।"
हरिदास बैठे नहीं।
वह खड़े-खड़े ही बोले—
"साहब... वीडियो तो सिर्फ तीस सेकंड की है। लेकिन मैं इस आदमी को बारह साल से जानता हूँ।"
कमरे में सबकी नज़रें उनकी ओर उठ गईं।
"दो साल पहले मेरी हार्ट अटैक की हालत हो गई थी। रात की ड्यूटी थी। मैं गिर पड़ा था।"
"उस समय एम्बुलेंस तक पहुँचाने वाला कोई नहीं मिला।"
"यही रामनिवास मुझे अपनी पीठ पर उठाकर इमरजेंसी तक लेकर गया था।"
रामनिवास तुरंत बोले—
"अरे हरिदास जी... रहने दीजिए..."
"नहीं रामू..."
हरिदास की आवाज़ भर्रा गई।
"आज अगर मैं चुप रहा... तो जिंदगी भर शर्मिंदा रहूँगा।"
उन्होंने आगे कहा—
"साहब... जिस दिन अस्पताल में ऑक्सीजन पाइप फटा था... सबसे पहले अंदर कौन भागा था?"
किसी ने जवाब नहीं दिया।
"रामनिवास।"
"जिस दिन बच्चों के वार्ड में आग जैसी स्थिति बनी थी... सिलेंडर बाहर किसने निकाले थे?"
फिर सन्नाटा।
"रामनिवास।"
"और पिछले साल बारिश में बेसमेंट भर गया था... पूरी रात पानी निकालने वाला कौन था?"
अब डॉ. सक्सेना का चेहरा बदलने लगा था।
हरिदास ने गहरी साँस ली।
"साहब... इस आदमी की सबसे बड़ी गलती क्या है जानते हैं?"
सब उनकी ओर देखने लगे।
"ये कभी अपने काम का शोर नहीं मचाता।"
कमरे में पहली बार किसी की आँखें झुक गईं।
उसी समय बाहर से तेज़ आवाज़ आई—
"कोई डॉक्टर है? जल्दी आइए!"
सभी चौंककर बाहर दौड़े।
इमरजेंसी के बाहर एक आठ-नौ साल का बच्चा स्ट्रेचर पर लाया गया था।
उसकी माँ बुरी तरह रो रही थी।
बच्चे को तेज़ दौरा पड़ा था।
चारों तरफ अफरा-तफरी मच गई।
डॉक्टर तुरंत इलाज में लग गए।
बच्चे की माँ घबराकर बार-बार बेहोश होने जैसी हालत में थी।
तभी रामनिवास चुपचाप पास गया।
कैंटीन से पानी लाया।
उसे कुर्सी पर बैठाया।
धीरे से बोला—
"बहन जी... हिम्मत रखिए। डॉक्टर पूरी कोशिश कर रहे हैं।"
महिला फूट-फूटकर रोने लगी।
"मेरे बेटे को कुछ हो गया तो मैं भी नहीं बचूँगी।"
रामनिवास ने कुछ नहीं कहा।
बस उसके सिर पर हाथ रख दिया।
दस मिनट बाद डॉक्टर बाहर आए।
"अब खतरे की बात नहीं है।"
महिला खुशी से रो पड़ी।
उसने सबसे पहले डॉक्टरों का धन्यवाद किया।
फिर उसकी नज़र रामनिवास पर गई।
"भैया... अगर आप मुझे संभालते नहीं... तो मैं टूट जाती।"
रामनिवास सिर्फ मुस्कुरा दिए।
वह बिना कुछ बोले वापस अपने पोछे की तरफ लौट गए।
राजीव माथुर यह सब दूर खड़े देख रहे थे।
उन्होंने पहली बार महसूस किया...
कुछ लोग अस्पताल में सिर्फ सफाई नहीं करते।
वे टूटते हुए लोगों का हौसला भी साफ़ रखते हैं।
उसी समय एक जूनियर कर्मचारी दौड़ता हुआ आया।
"साहब... जिस लड़के ने वीडियो बनाई थी... वह भी बाहर आया है।"
राजीव माथुर ने पूछा—
"क्यों?"
"वो कह रहा है... उसे आपसे ज़रूरी बात करनी है।"
कमरे में मौजूद किसी को अंदाज़ा नहीं था...
अगले कुछ मिनटों में एक ऐसी सच्चाई सामने आने वाली है, जो अब तक किसी ने नहीं सुनी थी।
कमरे का दरवाज़ा धीरे से खुला।
अंदर लगभग चौबीस-पच्चीस साल का एक युवक आया।
सफेद एप्रन पहने हुए।
चेहरे पर घबराहट साफ दिखाई दे रही थी।
वही मेडिकल इंटर्न...
अभिषेक।
जिसने रामनिवास का वीडियो रिकॉर्ड किया था।
उसके हाथ में मोबाइल था।
लेकिन इस बार वह मोबाइल किसी को दिखाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी गलती स्वीकार करने के लिए लाया था।
राजीव माथुर ने गंभीर स्वर में पूछा—
"हाँ, क्या कहना है?"
अभिषेक ने एक गहरी साँस ली।
फिर धीरे से बोला—
"सर... वीडियो मैंने बनाई थी।"
कमरे में बैठे सभी लोग उसकी तरफ देखने लगे।
उसने सिर झुका लिया।
"मुझे लगा था कि ये ड्यूटी में लापरवाही कर रहे हैं। इसलिए बिना सोचे वीडियो बना ली।"
"लेकिन..."
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
"अभी बाहर हरिदास अंकल से पूरी बात सुनी। फिर नर्सों से भी पूछा। तब पता चला कि ये कल सुबह से लगातार काम कर रहे हैं।"
वह रामनिवास की तरफ मुड़ा।
"अंकल..."
"मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई।"
रामनिवास शांत खड़े रहे।
अभिषेक ने अपना मोबाइल आगे बढ़ाया।
"सर..."
"मैंने अभी उसी ग्रुप में लिख दिया है कि वीडियो अधूरी सच्चाई दिखा रही थी। और मैंने वीडियो भी डिलीट कर दी है।"
राजीव माथुर ने मोबाइल देखा।
सचमुच...
वीडियो हट चुकी थी।
उसकी जगह अभिषेक ने लिखा था—
> "मैंने बिना पूरी बात जाने वीडियो साझा कर दी। यह मेरी गलती थी। रामनिवास जी पिछले कई घंटों से लगातार ड्यूटी कर रहे थे। मैं उनसे और आप सभी से क्षमा चाहता हूँ।"
कुछ ही मिनटों में उसी ग्रुप में प्रतिक्रियाएँ आने लगीं।
— "हमें पूरी बात नहीं पता थी।"
— "अगर ऐसा है तो उनके साथ गलत हुआ।"
— "इतनी लंबी ड्यूटी किसी से नहीं करानी चाहिए।"
लेकिन रामनिवास के चेहरे पर कोई खुशी नहीं थी।
उन्होंने धीरे से कहा—
"सर..."
"अगर इजाज़त हो तो मैं अब घर चला जाऊँ?"
राजीव माथुर ने आश्चर्य से पूछा—
"तुम्हें किसी बात का गुस्सा नहीं आया?"
रामनिवास हल्का-सा मुस्कुराए।
"साहब..."
"गरीब आदमी अगर हर बात का गुस्सा करने लगे... तो रोज़ नौकरी बदलनी पड़ेगी।"
कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।
उन्होंने आगे कहा—
"बस एक दुख है..."
राजीव माथुर ने उनकी ओर देखते हुए पूछा—
"क्या दुख है, रामनिवास?"
रामनिवास की आँखें भर आईं। उन्होंने धीमे स्वर में कहा—
"वीडियो बनाने से पहले अगर कोई एक बार मुझसे पूछ लेता..."
उन्होंने एक पल के लिए रुककर कमरे में बैठे सभी लोगों की ओर देखा।
"'रामनिवास, सब ठीक तो है?'..."
उनकी आवाज़ भर्रा गई।
"तो शायद इतना सब नहीं होता, साहब।"
यह कहते-कहते उनकी आँखें नम हो गईं।
उसी समय अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. विनोद सक्सेना अपनी कुर्सी से उठे।
धीरे-धीरे रामनिवास के सामने आए।
कुछ पल तक उन्हें देखते रहे।
फिर बोले—
"रामनिवास..."
"मुझे याद है, तीन साल पहले मेरी माँ भर्ती थीं।"
रामनिवास ने सिर उठाया।
डॉक्टर आगे बोले—
"रात को उन्होंने मुझे बताया था कि एक सफाई कर्मचारी रोज़ बिना कहे उन्हें गर्म पानी लाकर देता था।"
"वो तुम थे... है ना?"
रामनिवास झेंप गए।
"जी... अम्मा जी को ठंड लगती थी।"
डॉ. सक्सेना की आँखें भर आईं।
"उन्होंने मुझे तुम्हारा नाम कभी नहीं बताया।"
"आज समझ आया कि वो तुम ही थे।"
उन्होंने बिना कुछ सोचे अपना हाथ आगे बढ़ाया।
"मुझे माफ़ कर दो।"
रामनिवास घबरा गए।
"अरे साहब... ऐसा मत कहिए।"
"नहीं..."
डॉ. सक्सेना बोले—
"गलती मेरी थी। मैंने भी वीडियो देखकर फैसला बना लिया।"
करीब आधे घंटे बाद अस्पताल के कॉन्फ्रेंस हॉल में सभी विभागों की छोटी-सी बैठक बुलाई गई।
राजीव माथुर ने घोषणा की—
"आज से कोई भी सफाई कर्मचारी या वार्ड बॉय लगातार बारह घंटे से ज़्यादा ड्यूटी नहीं करेगा।"
"ओवरटाइम का भुगतान हर महीने समय पर होगा।"
"रात की ड्यूटी करने वाले कर्मचारियों के लिए अलग विश्राम कक्ष बनाया जाएगा।"
"और..."
उन्होंने थोड़ी देर रुककर कहा—
"किसी भी कर्मचारी पर कार्रवाई करने से पहले उसकी बात सुनी जाएगी।"
पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा।
लेकिन सबसे पीछे खड़ा रामनिवास ताली नहीं बजा रहा था।
वह सिर्फ चुपचाप मुस्कुरा रहा था।
शायद इसलिए...
क्योंकि उसे अपनी जीत से ज़्यादा खुशी इस बात की थी कि अब उसके बाद काम करने वालों को शायद इतनी तकलीफ़ नहीं झेलनी पड़ेगी।
उधर...
अभिषेक अस्पताल की कैंटीन में अकेला बैठा था।
उसके सामने चाय का कप रखा था।
लेकिन वह उसे छू भी नहीं रहा था।
उसे बार-बार एक ही बात याद आ रही थी—
सिर्फ तीस सेकंड की वीडियो...
...और किसी इंसान की पूरी इज़्ज़त दाँव पर लग गई थी।
उसने मन ही मन फैसला किया—
आज के बाद वह किसी के बारे में बिना सच्चाई जाने कभी राय नहीं बनाएगा।
उसी समय...
रामनिवास ने अपनी जेब से मोबाइल निकाला।
घर फोन लगाया।
दूसरी तरफ उसकी बेटी पूजा ने फोन उठाया।
"पापा..."
रामनिवास मुस्कुराए। "हाँ बेटा।"
पूजा ने फिर पूछा, "आज कब आओगे?"
रामनिवास मुस्कुराए।
"आज..."
"आज शायद थोड़ा जल्दी आ जाऊँ।"
पूजा खुशी से चिल्ला उठी—
"सच?"
रामनिवास हँसते हुए बोले, "हाँ।"
पूजा खिलखिलाकर बोली, "तो मैं आपका इंतज़ार करूँगी।"
फोन कट गया।
रामनिवास की आँखों में चमक आ गई।
उन्हें बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था...
कि घर पहुँचने पर उनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा आश्चर्य उनका इंतज़ार कर रहा है।
तंग गली के आख़िरी मोड़ पर बने छोटे से मकान के बाहर रामनिवास रुके।
आज कई महीनों बाद वह समय से पहले घर पहुँचे थे।
दरवाज़ा आधा खुला था।
अंदर से हँसी की हल्की आवाज़ आ रही थी।
उन्होंने जैसे ही दरवाज़ा खोला, उनकी बेटी पूजा दौड़ती हुई आई।
"पापा!"
वह उनसे लिपट गई।
रामनिवास ने उसके सिर पर हाथ फेरा।
"आज तो मेरी बिटिया जाग रही है।"
पूजा मुस्कुराई।
"आज आपका इंतज़ार जो करना था।"
अंदर उनकी पत्नी सरोज रसोई से बाहर आईं।
चेहरे पर बीमारी की थकान थी, लेकिन आँखों में सुकून था।
उन्होंने कहा—
"आज खाना गरम है... ठंडा नहीं।"
रामनिवास ने पहली बार महसूस किया कि साधारण-सी बात भी कितनी बड़ी खुशी हो सकती है।
वे हाथ-मुँह धोकर कमरे में बैठे ही थे कि बाहर किसी गाड़ी के रुकने की आवाज़ आई।
पूजा ने खिड़की से झाँका।
"पापा... अस्पताल से कोई आया है।"
रामनिवास चौंक गए।
उन्होंने बाहर निकलकर देखा।
अस्पताल के प्रशासन अधिकारी राजीव माथुर, डॉ. विनोद सक्सेना, हरिदास और इंटर्न अभिषेक खड़े थे।
रामनिवास घबरा गए।
"साहब... सब ठीक तो है?"
राजीव माथुर मुस्कुराए।
"आज हम शिकायत लेकर नहीं आए..."
"...शुक्रिया कहने आए हैं।"
इतना कहकर उन्होंने एक लिफाफा रामनिवास के हाथ में रखा।
रामनिवास ने खोला।
उसमें एक पत्र था।
ऊपर अस्पताल की मुहर लगी थी।
उन्होंने पढ़ना शुरू किया—
> "श्री रामनिवास जी,
आपकी ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और वर्षों की निस्वार्थ सेवा को देखते हुए अस्पताल प्रबंधन आपको 'श्रेष्ठ कर्मचारी सम्मान' प्रदान करता है। साथ ही आपके वे सभी ओवरटाइम भुगतान, जो अब तक लंबित थे, तत्काल जारी किए जाते हैं।"
रामनिवास की आँखें नम हो गईं।
उन्होंने लिफाफे में रखा दूसरा कागज़ देखा।
वह बैंक का चेक था।
पिछले कई महीनों का रुका हुआ ओवरटाइम।
कुल राशि...
₹68,500।
उनके हाथ काँपने लगे।
उन्होंने धीरे से पूछा—
"साहब... ये... सच है?"
राजीव माथुर बोले—
"हाँ रामनिवास।"
"गलती हमारी थी। उसे सुधारना भी हमारी जिम्मेदारी है।"
उसी समय अभिषेक आगे आया।
उसके हाथ में एक छोटा-सा बैग था।
उसने वह बैग पूजा की तरफ बढ़ाया।
पूजा ने हैरानी से देखा।
"ये क्या है?"
अभिषेक मुस्कुराया।
"तुम्हारी पढ़ाई के लिए।"
बैग में नई किताबें थीं।
एक अच्छी लैब किट।
और एक स्टेथोस्कोप।
पूजा की आँखें चमक उठीं।
"सच में... ये सब मेरे लिए?"
अभिषेक ने सिर हिलाया।
"हाँ।"
"और एक बात..."
वह रामनिवास की तरफ मुड़ा।
"अंकल... उस दिन मैंने आपका सिर्फ थका हुआ चेहरा देखा था।"
"आज आपकी पूरी ज़िंदगी देख ली।"
"धन्यवाद... आपने मुझे इंसान पहचानना सिखा दिया।"
हरिदास हँसते हुए बोले—
"मैंने कहा था न... पूरी कहानी सुनोगे तो नींद नहीं आएगी।"
सबके चेहरों पर हल्की मुस्कान आ गई।
दो दिन बाद...
अस्पताल के मुख्य प्रवेश द्वार के पास एक नया बोर्ड लगाया गया।
उस पर बड़े अक्षरों में लिखा था—
"हर कर्मचारी सम्मान का हकदार है।
किसी की एक गलती देखने से पहले उसके सौ अच्छे काम याद रखिए।"
उस बोर्ड के नीचे अस्पताल के सभी कर्मचारियों की एक सामूहिक तस्वीर लगी थी।
उस तस्वीर में डॉक्टर भी थे।
नर्सें भी थीं।
वार्ड बॉय भी।
और सबसे पीछे...
हल्की मुस्कान के साथ खड़े थे रामनिवास।
इस बार किसी ने उन्हें तस्वीर से काटा नहीं था।
कुछ महीने बीत गए।
पूजा ने अपनी बोर्ड परीक्षा में पूरे जिले में स्थान बनाया।
जब उसे सम्मानित किया गया, तो मंच से उसने सिर्फ एक बात कही—
"लोग कहते हैं कि मेरे पापा सफाई कर्मचारी हैं।"
"मुझे इस बात पर गर्व है।"
"उन्होंने सिर्फ अस्पताल का फर्श साफ नहीं किया..."
"उन्होंने मुझे ईमानदारी से जीना सिखाया है।"
पूरा सभागार तालियों से गूँज उठा।
पहली पंक्ति में बैठे रामनिवास की आँखों से आँसू बह निकले।
इस बार उन्होंने उन्हें नहीं रोका।
क्योंकि ये आँसू हार के नहीं...
सम्मान के थे।
दोस्तों,
हम अक्सर किसी इंसान को उसके जीवन के सिर्फ तीस सेकंड देखकर पहचान लेने की गलती कर बैठते हैं।
लेकिन उन तीस सेकंड के पीछे कई बार तीस साल का संघर्ष, ईमानदारी और त्याग छिपा होता है।
इसलिए अगली बार किसी पर उंगली उठाने से पहले उसकी पूरी कहानी सुनने की कोशिश कीजिए।
हो सकता है, जिसे आप कमजोर समझ रहे हों... वही किसी और की दुनिया संभाले हुए हो।

Post a Comment