बहू को भी अपनापन चाहिए

 

Pregnant Indian woman receiving emotional support and love from her husband and mother-in-law at home


“बहू को इतनी छूट देने की क्या जरूरत है? हमारे घर की बहुएँ ऐसे नहीं रहतीं।”


सावित्री देवी ने अपनी बहू काव्या की तरफ देखते हुए कहा।


काव्या चुपचाप खड़ी रही।


उसके हाथ में चाय का कप था और आँखों में कई सवाल।


पास बैठे उसके पति निखिल ने अपनी माँ की ओर देखा और फिर काव्या को।


“माँ, काव्या कोई गलत बात तो नहीं कह रही। डॉक्टर ने भी कहा है कि उसे आराम चाहिए।”


सावित्री देवी ने तुरंत जवाब दिया,


“डॉक्टर ने आराम करने को कहा है, घर छोड़ने को नहीं। और वैसे भी गर्भावस्था कोई बीमारी नहीं है।”


काव्या ने धीरे से कहा,


“मम्मी जी, मैंने घर छोड़ने की बात नहीं की। मैं सिर्फ कुछ दिनों के लिए निखिल के साथ रहना चाहती हूँ।”


“क्यों?”


सावित्री देवी ने तीखी नजरों से पूछा।


“यह घर क्या तुम्हें पसंद नहीं है?”


काव्या ने सिर झुका लिया।


“ऐसी बात नहीं है मम्मी जी।”


“तो फिर?”


काव्या कुछ बोल नहीं पाई।


निखिल अपनी पत्नी का चेहरा देख रहा था।


वह समझ रहा था कि काव्या के मन में बहुत कुछ जमा हो चुका है।


लेकिन वह यह भी जानता था कि उसकी माँ के सामने काव्या अपने मन की बात खुलकर नहीं कह पाएगी।


निखिल ने धीरे से कहा,


“माँ, मैं काव्या को अपने साथ शहर ले जाना चाहता हूँ। मेरी नौकरी भी वहीं है। डॉक्टर भी मेरे पास है। मैं उसका ध्यान रख सकूँगा।”


सावित्री देवी हँस पड़ीं।


“अरे वाह! अब बेटा अपनी पत्नी का ध्यान रखेगा और माँ-बाप किसके भरोसे रहेंगे?”


निखिल ने शांत स्वर में अपनी माँ से कहा,

“माँ, आप और पापा अकेले नहीं हैं। रोहित भी तो है।”


सावित्री देवी ने तुरंत जवाब दिया,

“रोहित अपनी नौकरी में रहता है। घर के काम कौन देखेगा?”


निखिल चुप हो गया।


सावित्री देवी ने बात आगे बढ़ाई,


“काव्या इस घर की बहू है। उसे यहीं रहना चाहिए। हमने भी बच्चों को जन्म दिया है। क्या हमें किसी पति के साथ रहने की जरूरत पड़ी थी?”


काव्या ने पहली बार अपनी सास की तरफ सीधे देखा।


उसकी आँखें नम थीं।


“मम्मी जी, मैं आपकी जगह नहीं लेना चाहती। बस अपने जीवन के इस समय को अपने तरीके से जीना चाहती हूँ।”


सावित्री देवी का चेहरा कठोर हो गया।


“यही तो आजकल की लड़कियों की समस्या है। शादी के बाद भी अपनी मर्जी चलानी है।”


काव्या चुप रही।


निखिल ने उसकी तरफ देखा।


उसे लगा जैसे उसकी पत्नी कुछ कहना चाहती है, लेकिन शब्द उसका साथ नहीं दे रहे।


कुछ देर बाद निखिल ने कहा,


“ठीक है माँ, हम बाद में बात करेंगे।”


वह उठकर बाहर चला गया।


काव्या भी अपने कमरे में चली गई।


दरवाजा बंद करते ही वह बिस्तर पर बैठ गई।


उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े।


उसने अपने पेट पर हाथ रखा।


“मेरा बच्चा… मैं तुम्हारे लिए ही तो मजबूत बनना चाहती हूँ।”


काव्या की शादी को लगभग एक साल हुआ था।


वह एक छोटे शहर के शिक्षित परिवार से आई थी।


उसके मायके में माता-पिता ने हमेशा उसे अपने फैसले लेने की आजादी दी थी।


वह पढ़ी-लिखी थी।


उसे किताबें पढ़ना पसंद था।


उसे पौधे लगाने का शौक था।


उसे संगीत सुनना अच्छा लगता था।


वह अपने पति के साथ बैठकर बातें करना पसंद करती थी।


लेकिन शादी के बाद उसकी जिंदगी धीरे-धीरे बदल गई।


ससुराल में बहुत सारे नियम थे।


कपड़े कैसे पहनने हैं।


किसके सामने कितना बोलना है।


किस समय खाना खाना है।


घर में कौन-सा खाना बनेगा।


किस कमरे में कितनी देर बैठना है।


यहाँ तक कि उसे फोन पर अपनी सहेलियों से कितनी देर बात करनी है, इस पर भी सवाल होने लगे।


काव्या ने कभी विरोध नहीं किया।


उसने सोचा,


“नया घर है। धीरे-धीरे सब मुझे समझने लगेंगे।”


उसने घर के तौर-तरीके सीखने शुरू किए।


सास की पसंद का खाना बनाना सीखा।


ससुर की चाय का समय याद रखा।


देवर रोहित की पसंद की सब्जी बनाना सीखा।


निखिल के लिए उसकी पसंद की चीजें बनाती।


किसी को शिकायत का मौका नहीं दिया।


लेकिन एक चीज उसे अंदर से परेशान करती थी।


उसे कभी यह महसूस नहीं हुआ कि यह घर उसका भी है।


एक दिन उसने अपनी सास से कहा,


“मम्मी जी, अगर आपको ठीक लगे तो मैं अपनी किताबों के लिए कमरे में एक छोटी-सी अलमारी लगवा लूँ?”


सावित्री देवी ने तुरंत कहा,


“किताबें पढ़ने का इतना समय कहाँ से मिलेगा? घर के काम देखो। ये सब शादी से पहले की आदतें हैं।”


काव्या ने मुस्कुराकर बात टाल दी।


एक बार उसने घर की बालकनी में तुलसी के साथ कुछ फूलों के पौधे लगा दिए।


सावित्री देवी ने पूछा,


“ये सब किसने लगाया?”


काव्या ने धीरे से जवाब दिया,

“मैंने मम्मी जी।”


सावित्री देवी ने हैरानी से पूछा,

“क्यों?”


काव्या ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

“बस मम्मी जी, मुझे पौधे अच्छे लगते हैं।”


सावित्री देवी ने पौधों को देखते हुए कहा,

“इन सब में रोज पानी कौन देगा?”


काव्या ने तुरंत कहा,

“मैं दे दूँगी मम्मी जी।”


सावित्री देवी ने थोड़े व्यंग्य भरे अंदाज में कहा,

“फिर घर के बाकी काम कौन करेगा?”


काव्या ने पौधों की तरफ देखा और चुपचाप उन्हें हटाकर एक कोने में रख दिया।


उसने अपने छोटे-छोटे शौक छोड़ने शुरू कर दिए।


फिर उसकी जिंदगी में एक नई खुशी आई।


काव्या गर्भवती थी।


जब उसने निखिल को यह खबर दी तो निखिल की आँखें खुशी से भर आईं।


उसने काव्या का हाथ पकड़कर कहा,


“काव्या, अब हमारी जिंदगी सच में बदलने वाली है।”


काव्या मुस्कुरा दी।


“हाँ, लेकिन मुझे डर भी लग रहा है।”


निखिल ने चिंतित होकर उसकी तरफ देखा और पूछा, “किस बात का?”


काव्या ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा, “मुझे नहीं पता मैं सब संभाल पाऊँगी या नहीं।”


निखिल ने कहा,


“मैं हूँ ना।”


काव्या ने उसी दिन पहली बार राहत महसूस की।


उसे लगा कि अब सब अच्छा होगा।


लेकिन उसकी परेशानी यहीं खत्म नहीं हुई।


गर्भावस्था के दौरान उसे कई बार कमजोरी महसूस होती।


डॉक्टर ने पौष्टिक खाना, पर्याप्त पानी, आराम और तनाव कम रखने की सलाह दी थी।


काव्या ने घर में अपनी सास से कहा,


“मम्मी जी, डॉक्टर ने कहा है कि मुझे समय पर खाना चाहिए।”


सावित्री देवी बोलीं,


“हमारे जमाने में कौन समय देखकर खाना खाता था?”


काव्या ने धीरे से जवाब दिया,

“लेकिन मम्मी जी, डॉक्टर ने कहा है।”


सावित्री देवी ने उसकी बात काटते हुए कहा,

“डॉक्टर तो बहुत कुछ कहते हैं। तुम बस ज्यादा सोचती हो।”


काव्या ने चुपचाप खाना खा लिया।


एक दिन उसे फल खाने का मन हुआ।


उसने बाजार से कुछ फल मंगवाए।


सावित्री देवी ने फल देखकर पूछा,


“इतने सारे फल?”


“मम्मी जी, डॉक्टर ने कहा है कि फल खाया करूँ।” काव्या ने धीरे से जवाब दिया।


“घर में सबके लिए आए हैं या सिर्फ तुम्हारे लिए?” सावित्री देवी ने थोड़ी नाराज़गी भरे स्वर में पूछा।


काव्या कुछ कह नहीं पाई।


“सबके लिए हैं, मम्मी जी।” काव्या ने धीमी आवाज़ में जवाब दिया।


सावित्री देवी बोलीं,


“ठीक है, पहले पापा जी और रोहित को दे देना।”


काव्या ने सिर हिला दिया।


उस रात उसने अपने हिस्से का फल नहीं खाया।


वह अपने कमरे में बैठी पेट पर हाथ फेर रही थी।


“बच्चे, तुम मेरे अंदर हो इसलिए तुम्हें कभी किसी चीज की कमी नहीं होने दूँगी।”


लेकिन उसके पास साधन होने के बावजूद निर्णय लेने की आजादी नहीं थी।


निखिल ने कई बार फोन पर पूछा,


“तुम ठीक हो?”


काव्या हर बार कहती,


“हाँ।”


वह उसे परेशान नहीं करना चाहती थी।


लेकिन एक दिन निखिल घर आया तो उसने काव्या का चेहरा देखकर पूछा,


“तुम इतनी कमजोर क्यों लग रही हो?”


काव्या ने नजरें चुराते हुए धीमी आवाज में कहा,

“कुछ नहीं।”


निखिल ने उसकी बात पर विश्वास नहीं किया। उसने चिंता भरे स्वर में कहा,

“काव्या, मुझे सच बताओ।”


काव्या की आँखें भर आईं।


“निखिल, मैं तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ।”


निखिल कुछ देर चुप रहा।


फिर बोला,


“मुझे भी लगता है कि तुम्हें मेरे साथ रहना चाहिए।”


काव्या ने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा,

“तो फिर?”


निखिल ने थोड़ी चिंता के साथ कहा,

“माँ शायद नहीं मानेंगी।”


काव्या ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,


“मुझे पता है।”


निखिल ने उसे भरोसा दिलाते हुए कहा,

“मैं उनसे बात करूँगा।”


काव्या ने दृढ़ता से कहा,

“इस बार मैं तुम्हारे साथ जाना चाहती हूँ।”


निखिल ने उसका हाथ पकड़ लिया।


“ठीक है।”


लेकिन बात इतनी आसान नहीं थी।


जब निखिल ने अपनी माँ से कहा कि वह काव्या को अपने साथ ले जाएगा, तो सावित्री देवी भड़क गईं।


“नहीं!”


निखिल: “लेकिन माँ…”


सावित्री देवी: “मैंने कह दिया ना।”


निखिल: “माँ, उसकी हालत देखो।”


सावित्री देवी: “उसकी हालत ठीक है।”


निखिल: “डॉक्टर ने आराम बताया है।”


सावित्री देवी: “आराम चाहिए तो यहीं कमरे में करे।”


निखिल ने गहरी साँस ली।


“माँ, मैं उसका पति हूँ। उसकी जिम्मेदारी मेरी भी है।”


सावित्री देवी ने कहा,


“जिम्मेदारी सिर्फ पति की नहीं होती। ससुराल की भी होती है।”


तभी काव्या कमरे में आ गई।


“मम्मी जी, मैं आपसे एक बात कहना चाहती हूँ।”


“कहो।”


काव्या ने खुद को संभाला।


“मैंने इस घर में आने के बाद आपकी बहुत-सी बातें मानी हैं। आपकी पसंद का पहनावा अपनाया। घर के नियम माने। अपनी पसंद की बहुत-सी चीजें छोड़ दीं।”


सावित्री देवी चुप रहीं।


“मैंने कभी यह नहीं कहा कि आपके घर में बहुत नियम हैं। मैंने सोचा कि मैं नई हूँ, मुझे समझना चाहिए।”


काव्या की आवाज भर्रा गई।


“लेकिन अब मेरे अंदर एक बच्चा है। मैं चाहती हूँ कि इस बच्चे के आने से पहले मैं खुद को खुश रखूँ।”


“क्या हम तुम्हें दुखी रखते हैं?” सावित्री देवी ने हैरानी से पूछा।


काव्या ने कुछ पल सोचा और फिर धीरे से बोली,

“आप जानबूझकर नहीं रखतीं मम्मी जी।”


“फिर?” सावित्री देवी ने सवालिया नजरों से उसकी ओर देखते हुए पूछा।


“लेकिन मुझे इस घर में अपने मन की बात कहने में डर लगता है।” काव्या ने नम आँखों से कहा।


सावित्री देवी के चेहरे पर आश्चर्य था।


काव्या आगे बोली,


“मुझे डर लगता है कि अगर मैंने अपनी पसंद का खाना माँगा तो कोई कहेगा मैं नखरे कर रही हूँ।”


“अगर मैं थककर थोड़ा आराम करूँ तो लगेगा मैं काम से बच रही हूँ।”


“अगर मैं निखिल के साथ बैठकर हँसूँ तो लगेगा मैं मर्यादा भूल रही हूँ।”


“अगर मैं अपनी पसंद के कपड़े पहनूँ तो लगेगा मैं घर के संस्कार भूल गई।”


“और अगर मैं अपने पति के साथ रहना चाहूँ तो लगेगा कि मैं ससुराल से दूर भाग रही हूँ।”


कमरे में सन्नाटा छा गया।


काव्या ने अपने पेट पर हाथ रखा।


“मम्मी जी, मैं आपसे दूर नहीं जाना चाहती। मैं सिर्फ अपने बच्चे के लिए थोड़ा सुकून चाहती हूँ।”


सावित्री देवी कुछ कहने वाली थीं कि काव्या के ससुर महेश जी बोले,


“बहू, तुम्हें लगता है कि हम तुम्हारा ध्यान नहीं रखते?”


काव्या ने सम्मान से कहा,


“पिताजी, आपने मुझे कभी भूखा नहीं रखा। रहने के लिए घर दिया। जरूरत की चीजें दीं। लेकिन कभी-कभी इंसान को सिर्फ सामान नहीं चाहिए होता।”


महेश जी ने पूछा,


“फिर क्या चाहिए?”


काव्या की आँखों से आँसू बहने लगे।


“अपनापन।”


वह कुछ पल रुकी।


“मुझे चाहिए कि कोई पूछे—बहू, तुम कैसी हो?”


“कोई कहे—आज काम मत करो, आराम कर लो।”


“कोई पूछे—तुम्हें क्या खाना है?”


“कोई कहे—चलो थोड़ी देर बाहर घूम आते हैं।”


“और सबसे ज्यादा…”


उसने निखिल की तरफ देखा।


“मुझे अपने पति का साथ चाहिए।”


निखिल की आँखें भी नम हो गईं।


काव्या बोली,


“मैं माँ बनने जा रही हूँ। यह सिर्फ मेरी जिम्मेदारी नहीं है। निखिल भी पिता बनने जा रहा है। वह भी इस बच्चे की पहली हलचल महसूस करना चाहता है। उसके साथ डॉक्टर के पास जाना चाहता है। उसकी पहली किक महसूस करना चाहता है।”


महेश जी चुपचाप अपनी पत्नी की ओर देखने लगे।


काव्या ने कहा,


“आपने कहा कि आपकी पीढ़ी ने सब कुछ सह लिया। हो सकता है आपने सहा हो। लेकिन क्या हर अगली पीढ़ी को भी वही सहना जरूरी है?”


सावित्री देवी का चेहरा बदलने लगा।


काव्या ने आगे कहा,


“मैं आपकी परंपराओं का अपमान नहीं कर रही। लेकिन अगर किसी परंपरा की वजह से किसी इंसान का मन टूट रहा हो, उसका स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा हो, तो क्या उसमें थोड़ा बदलाव नहीं होना चाहिए?”


कमरे में फिर खामोशी छा गई।


निखिल ने अपनी माँ से कहा,


“माँ, काव्या आपको छोड़कर नहीं जा रही। वह सिर्फ मेरे पास रहना चाहती है।”


सावित्री देवी ने कोई जवाब नहीं दिया।


काव्या अपने कमरे में चली गई।


उसने अपना सामान निकालना शुरू कर दिया।


कुछ कपड़े।


कुछ किताबें।


अपनी डायरी।


कुछ छोटी-छोटी चीजें जो वह शादी के बाद मायके से लाई थी।


वह सामान रख ही रही थी कि दरवाजे पर उसकी सास आकर खड़ी हो गईं।


काव्या ने उनकी तरफ देखा।


सावित्री देवी कुछ पल चुप रहीं।


फिर बोलीं,


“कितने कपड़े रख रही हो?”


काव्या ने धीमे से कहा,


“जितने जरूरी हैं।”


सावित्री देवी की नजर पास रखी किताबों पर पड़ी। उन्होंने किताबों की ओर इशारा करते हुए पूछा,

“और ये किताबें?”


काव्या ने किताबों को संभालकर बैग में रखते हुए कहा,

“हाँ, ये भी ले जाऊँगी।”


सावित्री देवी ने किताबों को देखा।


फिर पूछा,


“तुम्हें सच में पढ़ना पसंद है?”


काव्या ने पहली बार हल्की मुस्कान के साथ कहा,


“बहुत।”


सावित्री देवी ने कुछ नहीं कहा।


वह कमरे से बाहर चली गईं।


काव्या ने सोचा शायद उन्होंने उसकी बात नहीं समझी।


लेकिन थोड़ी देर बाद सावित्री देवी वापस आईं।


उनके हाथ में एक प्लेट थी।


उसमें कटे हुए फल थे।


उन्होंने प्लेट काव्या के सामने रख दी।


“खा लो।”


काव्या हैरानी से उन्हें देखने लगी।


“मम्मी जी…”


सावित्री देवी ने फल की प्लेट उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा,

“डॉक्टर ने फल खाने को कहा है ना?”


काव्या की आँखों में आँसू आ गए।


सावित्री देवी ने धीरे से कहा,


“शायद मैं अपनी जिंदगी को तुम्हारी जिंदगी समझ बैठी थी।”


काव्या कुछ बोल नहीं पाई।


सावित्री देवी उसके पास बैठ गईं।


“मैंने भी बहुत कुछ सहा था। इसलिए मुझे लगता रहा कि वही सब सही है।”


उन्होंने काव्या के सिर पर हाथ रखा।


“लेकिन मैंने यह नहीं सोचा कि मेरी बहू को वही सब सहना जरूरी नहीं है।”


काव्या रोते हुए उनकी गोद में सिर रखकर बैठ गई।


“मम्मी जी, मैं आपसे दूर नहीं होना चाहती।”


सावित्री देवी की आँखें भी नम हो गईं।


“तुम दूर नहीं जा रही बहू।”


उन्होंने कहा,


“तुम अपने पति के पास जा रही हो। और जब मन करे वापस आ जाना।”


निखिल दरवाजे पर खड़ा सब सुन रहा था।


उसके चेहरे पर राहत थी।


सावित्री देवी ने निखिल की तरफ देखकर कहा,


“लेकिन एक बात याद रखना।”


“जी माँ।”


“अपनी पत्नी का ध्यान रखना। सिर्फ डॉक्टर की दवाइयों से नहीं। उसके मन का भी।”


निखिल ने मुस्कुराकर कहा,


“माँ, मैं रखूँगा।”


काव्या ने आँसू पोंछे।


उस दिन पहली बार उसे लगा कि शायद यह घर पूरी तरह उसका नहीं था, लेकिन उसके अंदर बदलाव की शुरुआत जरूर हो गई थी।


कुछ महीनों बाद काव्या ने एक स्वस्थ बेटी को जन्म दिया।


जब सावित्री देवी पहली बार अपनी पोती को गोद में लेकर बैठीं तो उनकी आँखों में आँसू थे।


उन्होंने काव्या से कहा,


“बहू, मैंने तुम्हें सिर्फ घर संभालने वाली लड़की समझ लिया था।”


काव्या मुस्कुराई।


“और अब?”


सावित्री देवी ने बच्ची को सीने से लगाते हुए कहा,


“अब समझ आई है कि बहू भी किसी की बेटी होती है।”


काव्या ने उनका हाथ पकड़ लिया।


उसके मन में अब कोई शिकायत नहीं थी।


क्योंकि कभी-कभी रिश्ते बदलने के लिए बड़े झगड़े नहीं, सिर्फ एक-दूसरे के दर्द को समझना जरूरी होता है।


कहानी की सीख:


बहू से यह उम्मीद करना कि वह घर की हर परंपरा अपनाए, गलत नहीं है।


लेकिन यह उम्मीद करना कि वह अपनी पसंद, अपने आराम, अपने सपने और अपनी भावनाएँ पूरी तरह छोड़ दे—यह सही नहीं।


शादी के बाद लड़की सिर्फ किसी घर की जिम्मेदारी नहीं बनती।


वह उस घर की सदस्य बनती है।


और सदस्य बनने के लिए उसे सिर्फ कर्तव्य नहीं, अपनापन भी चाहिए।


मां बनने के समय एक महिला को सबसे ज्यादा जरूरत होती है—प्यार, सम्मान, मानसिक शांति और अपने जीवनसाथी के साथ की।


अगर सास अपनी बहू को बहू नहीं, बेटी की तरह समझे और बहू भी सास को सिर्फ सास नहीं, एक इंसान समझे, तो कई घर टूटने से बच सकते हैं।


क्योंकि रिश्ते नियमों से नहीं,


समझ और अपनापन से मजबूत होते हैं।



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