माँ का अकेलापन
अरुण ने अपनी माँ विमला देवी को अकेले बैठे देखा तो प्यार से पूछा,
“माँ, आप फिर अकेली बैठी हैं? चलिए न, मेरे साथ थोड़ी देर बाहर बैठिए।”
विमला देवी ने हल्की मुस्कान के साथ बेटे की ओर देखा और बोलीं,
“नहीं बेटा, तुम लोग बातें कर रहे हो। मैं यहीं ठीक हूँ।”
अरुण ने माँ के पास बैठते हुए पूछा,
“लेकिन माँ, आप हमसे दूर क्यों रहती हैं?”
विमला देवी ने अपने बेटे अरुण की तरफ देखा और हल्की-सी मुस्कान दे दी।
“दूर तो तुम लोग हो गए हो बेटा… मैं तो यहीं हूँ।”
अरुण कुछ समझ नहीं पाया।
उसने माँ के चेहरे को ध्यान से देखा। आँखों में शिकायत नहीं थी, लेकिन एक ऐसा खालीपन जरूर था जिसे शब्दों में समझाना मुश्किल था।
अरुण ने बात बदलते हुए कहा,
“माँ, मैं ऑफिस के लिए निकल रहा हूँ। आपको कुछ चाहिए तो बता देना।”
“नहीं बेटा, कुछ नहीं चाहिए।”
अरुण चला गया।
विमला देवी फिर उसी कुर्सी पर बैठ गईं।
उनके सामने घर का बड़ा-सा आँगन था। आँगन में उनके पोते-पोतियाँ खेलते थे, बहू रसोई में व्यस्त रहती थी और बेटा अपने काम में।
घर में सब कुछ था।
सिर्फ उनके लिए समय नहीं था।
विमला देवी की उम्र लगभग पैंसठ साल थी। पति के गुजर जाने के बाद उन्होंने अपने बेटे अरुण को अकेले ही पाल-पोसकर बड़ा किया था।
अरुण जब छोटा था, तब घर की हालत बहुत अच्छी नहीं थी।
विमला देवी दूसरों के घरों में सिलाई का काम करती थीं। कई बार खुद खाना छोड़ देतीं, लेकिन बेटे की फीस समय पर भरती थीं।
अरुण को स्कूल में किसी चीज की जरूरत होती तो वह बिना बताए अपनी माँ की पुरानी संदूकची में रखे कपड़ों के बीच से पैसे ढूँढ़ने लगता।
एक दिन उसे पता चला कि उसकी माँ ने उसकी परीक्षा की फीस भरने के लिए अपनी चाँदी की पायल बेच दी थी।
वह रोते हुए बोला,
“माँ, आपने अपनी पायल क्यों बेच दी?”
विमला देवी ने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा,
“पायल फिर आ जाएगी बेटा, लेकिन अगर तुम्हारी पढ़ाई रुक गई तो वह समय वापस नहीं आएगा।”
अरुण ने उसी दिन मन में ठान लिया था कि वह बड़ा होकर अपनी माँ को कभी दुख नहीं देगा।
वह पढ़ा।
नौकरी लगी।
शादी हुई।
घर बना।
बच्चे हुए।
लेकिन जिंदगी की भागदौड़ में वह एक बात भूल गया।
जिस माँ ने उसके लिए अपना जीवन लगा दिया था, अब उसे अपने बेटे की जरूरत थी।
अरुण की पत्नी नेहा बुरी लड़की नहीं थी। वह घर संभालती थी, बच्चों की देखभाल करती थी और अपने काम में व्यस्त रहती थी।
लेकिन उसे विमला देवी की कुछ आदतें पसंद नहीं थीं।
वह अक्सर कहती,
“माँजी, आप बच्चों को हर बात में मत टोका कीजिए।”
“माँजी, उन्हें अपने तरीके से रहने दीजिए।”
“माँजी, आजकल जमाना बदल गया है।”
विमला देवी चुप हो जातीं।
उन्हें बच्चों को टोकने का शौक नहीं था।
बस उन्हें डर लगता था कि कहीं बच्चे वही गलतियाँ न कर दें जो उन्होंने जिंदगी में देखी थीं।
पोता रोहन मोबाइल में लगा रहता तो वह कहतीं,
“बेटा, थोड़ी देर आँखों को आराम दे दिया करो।”
पोती रिया खाना छोड़ देती तो कहतीं,
“बेटी, खाना मत छोड़ा करो।”
छोटा आरव घर के सामान से खेलता तो वह प्यार से समझातीं,
“बेटा, इसे मत गिराना।”
लेकिन बच्चों को लगता कि दादी हर समय उन्हें रोकती रहती हैं।
धीरे-धीरे बच्चे भी दादी के कमरे में जाना कम करने लगे।
नेहा को भी लगता कि घर में रहने वाली बुजुर्ग महिला की वजह से बच्चों की आजादी कम हो रही है।
अरुण ऑफिस से लौटता तो अक्सर थका हुआ होता।
विमला देवी उसके पास बैठकर दो बातें करना चाहतीं।
“बेटा, आज खाना खाया?”
“हाँ माँ।”
“ऑफिस में काम कैसा रहा?”
“ठीक रहा माँ।”
“तुम्हारे चेहरे पर थकान लग रही है।”
“माँ, बहुत थका हूँ। बाद में बात करता हूँ।”
और वह अपने कमरे में चला जाता।
विमला देवी उसे जाते हुए देखती रहतीं।
कई बार वह सोचतीं,
“मेरा बेटा सच में बहुत थक जाता होगा।”
वह कभी शिकायत नहीं करती थीं।
एक दिन विमला देवी ने नेहा से कहा,
“बहू, अगर तुम्हें ठीक लगे तो मैं बच्चों के साथ थोड़ा बैठ जाया करूँ?”
नेहा ने बिना उनकी तरफ देखे कहा,
“माँजी, बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। आप अपने कमरे में आराम किया कीजिए।”
विमला देवी चुप हो गईं।
कुछ देर बाद उन्होंने पूछा,
“मेरे कमरे में बैठने के अलावा मैं कर भी क्या सकती हूँ बहू?”
नेहा ने कोई जवाब नहीं दिया।
उस दिन विमला देवी ने पहली बार महसूस किया कि उनका अपना घर अब उनके लिए घर कम और रहने की जगह ज्यादा बन गया है।
उन्होंने अपनी पुरानी संदूकची खोली।
उसमें अरुण के बचपन की कई चीजें थीं।
उसकी पहली स्कूल ड्रेस।
पहला पुरस्कार।
एक टूटी हुई खिलौना कार।
और एक छोटी-सी कॉपी।
कॉपी के पहले पन्ने पर अरुण ने बचपन में टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था—
“मेरी माँ दुनिया की सबसे अच्छी माँ है।”
विमला देवी ने वह पन्ना छुआ।
आँखों से आँसू निकल आए।
उन्होंने धीरे से कहा,
“बेटा… माँ तो आज भी वही है।”
लेकिन अब बेटा बदल गया था।
कुछ दिनों बाद अरुण ने देखा कि उसकी माँ अक्सर घर से बाहर जाने लगी थीं।
वह पूछता,
“माँ, कहाँ जा रही हो?”
विमला देवी मुस्कुराकर कहतीं,
“बस बेटा, थोड़ी देर बाहर बैठने।”
अरुण ने हैरानी से पूछा,
“कहाँ जा रही हैं माँ?”
विमला देवी ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया,
“पास ही बेटा, थोड़ी देर बैठकर वापस आ जाऊँगी।”
अरुण ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया।
एक दिन उसके ऑफिस का काम जल्दी खत्म हो गया।
वह घर पहुँचा तो माँ कमरे में नहीं थीं।
उसने नेहा से पूछा,
“माँ कहाँ गई हैं?”
“पता नहीं। शायद बाहर गई होंगी।”
अरुण ने माँ को फोन किया।
फोन नहीं उठा।
उसे थोड़ी चिंता हुई।
वह उन्हें ढूँढ़ने निकल पड़ा।
पास के मंदिर में देखा।
नहीं थीं।
बगीचे में देखा।
नहीं थीं।
फिर उसे सड़क के किनारे एक पुरानी सार्वजनिक पुस्तकालय की बेंच दिखाई दी।
विमला देवी वहाँ बैठी थीं।
उनके हाथ में वही पुरानी कॉपी थी।
अरुण धीरे-धीरे उनके पास गया।
“माँ…”
विमला देवी चौंक गईं।
“अरे बेटा, तुम यहाँ?”
“माँ, आप यहाँ क्यों बैठी हैं?”
विमला देवी ने नजरें झुकाते हुए धीरे से कहा,
“बस ऐसे ही।”
अरुण ने उनके पास बैठते हुए पूछा,
“घर में क्यों नहीं बैठतीं?”
विमला देवी कुछ क्षण चुप रहीं।
फिर बोलीं,
“घर में सब अपने-अपने काम में व्यस्त रहते हैं बेटा। यहाँ कम से कम कोई यह तो नहीं कहता कि मैं किसके बीच बैठी हूँ।”
अरुण के पास कोई जवाब नहीं था।
उसने माँ की गोद में रखी कॉपी देखी।
“यह क्या है?”
विमला देवी ने कॉपी बंद कर दी।
“कुछ नहीं।”
अरुण ने कॉपी अपने हाथ में ले ली।
उसने पहला पन्ना खोला।
वही शब्द लिखे थे—
“मेरी माँ दुनिया की सबसे अच्छी माँ है।”
अरुण का गला भर आया।
“माँ, आपने इसे अभी तक संभालकर रखा है?”
विमला देवी ने कहा,
“बेटा, माँ अपने बच्चों की छोटी-सी चीज भी कैसे भूल सकती है?”
अरुण की आँखें झुक गईं।
उसे अचानक अपने बचपन की बहुत सारी बातें याद आने लगीं।
उसे याद आया कि जब उसे बुखार होता था तो माँ पूरी रात उसके सिरहाने बैठती थीं।
जब स्कूल की फीस भरने के पैसे नहीं होते थे, तब माँ अपनी जरूरतें छोड़ देती थीं।
जब वह परीक्षा में कम नंबर लाता था, तब माँ उसे डाँटने के बजाय कहती थीं,
“अगली बार मेहनत कर लेना।”
जब उसकी पहली नौकरी लगी थी, तब माँ ने मंदिर जाकर भगवान को धन्यवाद दिया था।
और आज वही माँ अपने घर में बैठने के लिए जगह ढूँढ़ रही थी।
अरुण ने माँ का हाथ पकड़ लिया।
“माँ, घर चलिए।”
विमला देवी ने हैरानी से पूछा,
“क्यों बेटा?”
अरुण ने भावुक होकर कहा,
“क्योंकि आपका घर आपका इंतजार कर रहा है।”
विमला देवी ने हल्की मुस्कान के साथ पूछा,
“सच?”
अरुण ने सिर झुका लिया।
“हाँ माँ… लेकिन शायद घर को यह बात समझने में बहुत देर हो गई।”
दोनों घर लौट आए।
घर पहुँचते ही अरुण ने नेहा और बच्चों को अपने पास बुलाया।
“मुझे तुम सब से एक बात करनी है।”
नेहा ने पूछा,
“क्या हुआ?”
अरुण ने माँ की तरफ देखा।
“तुम सबने कभी सोचा है कि इस घर में सबसे अकेला कौन है?”
बच्चे एक-दूसरे को देखने लगे।
अरुण बोला,
“हम सबके पास किसी न किसी से बात करने के लिए कोई है। तुम्हारे पास मैं हूँ, मेरे पास तुम लोग हो, बच्चों के पास स्कूल के दोस्त हैं।”
फिर उसने माँ की तरफ इशारा किया।
“लेकिन माँ के पास कौन है?”
कमरे में खामोशी छा गई।
अरुण ने कहा,
“हम कहते हैं कि माँ हर बात में रोकती हैं। माँ पुरानी सोच की हैं। माँ ज्यादा बोलती हैं। लेकिन हमने कभी यह नहीं सोचा कि वह बोलती ही इसलिए हैं क्योंकि उन्हें हमसे बात करने की इच्छा होती है।”
नेहा की आँखें झुक गईं।
अरुण ने आगे कहा,
“हमने माँ को खाना दिया, कमरा दिया, कपड़े दिए। लेकिन क्या हमने उन्हें अपना समय दिया?”
कोई जवाब नहीं आया।
“हम सोचते हैं कि बुजुर्गों को बस दवा, खाना और आराम चाहिए। लेकिन सच यह है कि उन्हें सबसे ज्यादा अपने लोगों की जरूरत होती है।”
विमला देवी चुपचाप सब सुन रही थीं।
अरुण ने माँ के सामने जाकर कहा,
“माँ, मुझे माफ कर दीजिए।”
विमला देवी ने तुरंत उसके सिर पर हाथ रख दिया।
“माँ अपने बच्चों से नाराज कब रहती है बेटा?”
तभी रिया दौड़कर दादी के पास गई।
“दादी…”
“हाँ बेटी?”
“आज से मैं आपके कमरे में आपके पास बैठूँगी।”
रोहन भी बोला,
“और दादी, आप मुझे वो वाली कहानी सुनाना जिसमें राजकुमार जंगल में खो जाता है।”
आरव ने कहा,
“दादी, मेरे साथ कैरम खेलोगी?”
विमला देवी की आँखों से आँसू बहने लगे।
लेकिन इस बार वे आँसू दुख के नहीं थे।
वे उस खुशी के आँसू थे जिसे पाने के लिए उन्होंने बहुत इंतजार किया था।
नेहा रसोई में गई और थोड़ी देर बाद चाय और नाश्ता लेकर आई।
“माँजी, यह आपके लिए।”
विमला देवी ने मुस्कुराकर पूछा,
“मेरे लिए?”
“जी माँजी।”
नेहा उनके पास बैठ गई।
“माँजी, मुझे भी आपसे बहुत कुछ सीखना है।”
विमला देवी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“बहू, घर सीखने से नहीं… साथ रहने से बनता है।”
उस दिन घर का माहौल बदल गया।
अब बच्चों को दादी की कहानियों का इंतजार रहने लगा।
नेहा कभी-कभी उनसे पुराने समय की बातें पूछती।
अरुण ऑफिस से लौटकर सीधे माँ के कमरे में जाता।
“माँ, आज क्या किया?”
और विमला देवी घंटों अपने बेटे से बातें करतीं।
एक दिन अरुण ने मुस्कुराते हुए पूछा,
“माँ, अब आप उस पुस्तकालय वाली बेंच पर नहीं जातीं?”
विमला देवी ने हँसते हुए कहा,
“अब जरूरत नहीं पड़ती बेटा।”
“क्यों?”
“क्योंकि अब मेरे पास अपना घर है।”
अरुण ने माँ का हाथ पकड़ लिया।
“घर तो आपका हमेशा से था माँ।”
विमला देवी ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,
“घर दीवारों से नहीं बनता बेटा… जब अपने लोग साथ बैठें, तब घर घर लगता है।”
अरुण ने माँ को गले लगा लिया।
उस दिन उसे समझ आया कि बुजुर्गों को महँगे कपड़े, बड़ी चीजें या बहुत पैसा नहीं चाहिए।
उन्हें चाहिए—
दो मिनट की बातचीत।
एक प्यार भरी आवाज।
कभी उनके पास बैठना।
उनकी पुरानी बातों को सुनना।
उनकी सलाह को सम्मान देना।
और सबसे जरूरी…
उन्हें यह महसूस कराना कि वे आज भी परिवार का जरूरी हिस्सा हैं।
सीख:
बुजुर्ग घर का बोझ नहीं होते। वे उस पेड़ की तरह होते हैं जिसकी छाँव में पूरा परिवार बड़ा होता है। हो सकता है उनकी शाखाओं पर अब फल कम लगते हों, लेकिन उनकी छाया आज भी उतनी ही जरूरी होती है।
जिस उम्र में उन्हें सबसे ज्यादा अपने बच्चों की जरूरत होती है, उसी उम्र में उन्हें अकेला मत कीजिए।
क्योंकि जिस अकेलेपन को आज आप उनके हिस्से में डालेंगे, वही अकेलापन कल आपकी जिंदगी का हिस्सा भी बन सकता है।

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