बहू मशीन नहीं है

 

Neha, a working Indian woman, receives emotional support from her husband and daughter as her remorseful mother-in-law seeks reconciliation in a warm family setting.


नेहा एक पढ़ी-लिखी और आत्मनिर्भर लड़की थी। शादी के बाद जब वह अपने पति अमन के साथ उसके माता-पिता के घर आई, तब उसने मन में यही सोचा था कि वह अपने नए परिवार को अपना परिवार समझकर चलेगी।


उसके ससुर हरिनारायण जी रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी थे और सास कमला देवी घर की मुखिया थीं। अमन का बड़ा भाई राकेश, उसकी पत्नी सुनीता और उनके दो बच्चे भी उसी घर में रहते थे।


घर बड़ा था, परिवार बड़ा था और जिम्मेदारियाँ भी कम नहीं थीं।


नेहा एक निजी कंपनी में नौकरी करती थी। ऑफिस की नौकरी के साथ घर की जिम्मेदारियों को निभाने में उसे कभी परेशानी नहीं हुई, क्योंकि वह मानती थी कि परिवार में रहने का मतलब एक-दूसरे का साथ देना होता है।


लेकिन धीरे-धीरे उसे महसूस होने लगा कि इस घर में जिम्मेदारियाँ बराबर बाँटी नहीं गई थीं।


कमला देवी ने घर के कामों का ऐसा बँटवारा कर रखा था कि भारी से भारी जिम्मेदारी नेहा के हिस्से में आती थी।


सुनीता को बस बच्चों और अपने कमरे तक सीमित काम दिए गए थे।


नेहा को घर की सफाई, रसोई, कपड़े, मेहमानों की चाय, सास-ससुर की दवाइयाँ और न जाने कितने छोटे-बड़े काम करने पड़ते थे।


ऑफिस से लौटने के बाद भी उसे चैन नहीं मिलता था।


एक दिन नेहा ने थके हुए स्वर में अमन से कहा,


"अमन, मैं बहुत थक जाती हूँ। ऑफिस का काम खत्म करके घर आती हूँ तो फिर रसोई में लग जाती हूँ। क्या हम घर के काम के लिए कोई मदद नहीं रख सकते?"


अमन कुछ पल चुप रहा।


वह अपनी पत्नी की परेशानी समझता था, लेकिन उसे अपनी माँ के स्वभाव का भी पता था।


उसने धीरे से कहा,


"नेहा, मैं माँ से बात करता हूँ। तुम चिंता मत करो।"


नेहा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,


"मैं तुमसे घर का काम छोड़ने को नहीं कह रही। बस इतना चाहती हूँ कि काम थोड़ा बाँट दिया जाए। आखिर मैं भी इंसान हूँ।"


अमन ने उसका हाथ पकड़कर कहा,


"मैं समझता हूँ।"


लेकिन बात करना इतना आसान नहीं था।


कमला देवी ने जब सुना कि अमन घर में काम करने वाली महिला रखने की बात कर रहा है तो वह नाराज हो गईं।


उन्होंने कहा,


"हमारे जमाने में औरतें चार-चार बच्चों को पालती थीं और पूरे घर का काम करती थीं। आजकल की बहुओं को थोड़ी सी नौकरी क्या मिल गई, घर का काम भारी लगने लगा।"


अमन ने समझाने की कोशिश की,


"माँ, नेहा नौकरी भी करती है। अगर थोड़ी मदद मिल जाए तो उसे आसानी होगी।"


कमला देवी ने तुरंत जवाब दिया,


"तुम्हें अपनी पत्नी की चिंता है, अपनी माँ की नहीं। घर में नौकरानी रखकर पैसे बर्बाद करने की जरूरत नहीं है।"


हरिनारायण जी भी वहीं बैठे थे।


उन्होंने पत्नी की तरफ देखकर कहा,


"कमला ठीक ही तो कह रही है। घर की बहू घर का काम करेगी तो घर में बरकत रहेगी।"


नेहा ने सब सुन लिया।


उसने कोई जवाब नहीं दिया।


वह चुपचाप अपने कमरे में चली गई।


उसके मन में एक सवाल बार-बार उठ रहा था—


"क्या नौकरी करने के बाद भी मैं सिर्फ इस घर की बहू हूँ, मेरी अपनी कोई थकान नहीं?"


लेकिन उसने खुद को समझाया।


"परिवार है, थोड़ा बहुत तो करना ही पड़ेगा।"


नेहा ने समझौता करना जारी रखा।


लेकिन समस्या काम की नहीं थी।


समस्या यह थी कि जितना वह करती जाती, उतनी ही उससे अपेक्षाएँ बढ़ती जातीं।


एक दिन ऑफिस से लौटते ही उसकी सास ने कहा,


"बहू, तुम्हारे आने में इतनी देर क्यों हुई?"


नेहा ने कहा,


"माँजी, ऑफिस में जरूरी काम था। मैनेजर ने एक रिपोर्ट पूरी करने को कहा था।"


कमला देवी बोलीं,


"तुम्हारे ऑफिस का काम कभी खत्म नहीं होता क्या? घर भी कोई चीज है।"


नेहा चुप रही।


उसे भूख लगी थी, सिर दर्द कर रहा था और पैर दर्द से भारी हो रहे थे।


फिर भी वह रसोई में चली गई।


उसी समय सुनीता अपने बच्चों के साथ कमरे से बाहर आई।


कमला देवी ने प्यार से पूछा,


"बहू, बच्चों ने खाना खा लिया?"


सुनीता ने मुस्कुराते हुए कहा,


"नहीं माँजी, मैं अभी खिलाने वाली थी।"


कमला देवी ने तुरंत कहा,


"ठीक है, तुम बच्चों को देखो। खाना नेहा बना देगी।"


नेहा ने यह बात सुन ली।


उसने कुछ नहीं कहा।


लेकिन उसकी आँखों में नमी आ गई।


उसे पहली बार लगा कि इस घर में काम करने वाली बहू और आराम करने वाली बहू के बीच कोई फर्क नहीं रखा जाता, बल्कि काम करने वाली से और ज्यादा काम करवाया जाता है।


कुछ दिनों बाद नेहा की बेटी परी स्कूल से लौटकर सीधे रसोई में आ गई।


उसने माँ को लगातार काम करते देखा तो पूछा,


"मम्मा, आप ऑफिस से आने के बाद भी काम करती हो?"


नेहा मुस्कुराई,


"हाँ बेटा, घर का काम भी तो करना होता है।"


परी ने मासूमियत से पूछा,


"फिर पापा घर क्यों नहीं करते?"


नेहा के पास उस सवाल का कोई जवाब नहीं था।


अमन ने बेटी की बात सुन ली।


उसने उसी समय कहा,


"करते हैं बेटा, पापा भी करेंगे।"


परी ने कहा,


"तो मम्मा को इतना थका हुआ क्यों देखता हूँ?"


अमन चुप हो गया।


उस रात अमन ने नेहा से कहा,


"तुम सही कहती थीं। मुझे तुम्हारा साथ देना चाहिए।"


नेहा ने कहा,


"मुझे तुम्हारी मदद नहीं, तुम्हारा साथ चाहिए। अगर तुम अपनी माँ से मेरे लिए नहीं बोलोगे तो मैं अकेली पड़ जाऊँगी।"


अमन ने उसका हाथ पकड़कर कहा,


"अब ऐसा नहीं होगा।"


लेकिन अगले दिन जब अमन ने फिर अपनी माँ से बात की तो कमला देवी ने साफ कह दिया,


"अगर बहू को घर के काम इतने भारी लगते हैं तो नौकरी छोड़ दे।"


यह बात नेहा के कानों तक पहुँची।


उसने पहली बार दृढ़ स्वर में कहा,


"माँजी, नौकरी मेरे लिए सिर्फ पैसे कमाने का जरिया नहीं है। यह मेरी मेहनत, मेरी पहचान और मेरे आत्मसम्मान का हिस्सा है।"


कमला देवी गुस्से से बोलीं,


"तो फिर घर कौन संभालेगा?"


नेहा ने शांत स्वर में कहा,


"घर हम सब मिलकर संभालेंगे।"


सुनीता वहीं खड़ी थी।


नेहा ने उसकी तरफ देखकर कहा,


"भाभी, अगर मैं ऑफिस के बाद रसोई संभाल सकती हूँ तो आप भी कुछ जिम्मेदारी ले सकती हैं।"


सुनीता को यह बात पसंद नहीं आई।


वह बोली,


"मुझे मेरे बच्चों से फुर्सत नहीं मिलती।"


नेहा ने कहा,


"और मुझे नौकरी से। फिर भी मैं कोशिश करती हूँ।"


कमला देवी ने तुरंत नेहा को डाँट दिया,


"बहुत जवाब देने लगी हो।"


नेहा की आँखों में आँसू आ गए।


लेकिन इस बार उसने आँसू पोंछ लिए।


वह बोली,


"माँजी, जवाब देना मेरा उद्देश्य नहीं है। मैं बस इतना चाहती हूँ कि मेरी मजबूरी को भी समझा जाए।"


हरिनारायण जी ने अखबार नीचे रखते हुए कहा,


"कमला, बहू की बात में कुछ गलत नहीं है।"


कमला देवी ने पति की ओर घूरकर देखा।


"आप भी अब बहू की तरफ हो गए?"


हरिनारायण जी चुप हो गए।


अमन ने पहली बार अपनी माँ के सामने दृढ़ होकर कहा,


"माँ, पत्नी का साथ देना बीवी का गुलाम बनना नहीं होता।"


कमला देवी को यह बात बहुत बुरी लगी।


उन्होंने गुस्से में कहा,


"तुम्हें अपनी पत्नी इतनी ही प्यारी है तो अलग रह लो।"


घर में सन्नाटा छा गया।


नेहा ने अमन की ओर देखा।


वह चाहती थी कि अमन कुछ न कहे।


लेकिन अमन ने शांत स्वर में कहा,


"अगर अलग रहने से घर में शांति रहती है और नेहा को सम्मान मिलता है, तो मुझे इसमें कोई बुराई नहीं लगती।"


कमला देवी ने गुस्से में कहा,


"तो निकल जाओ दोनों।"


नेहा ने कुछ नहीं कहा।


उसने सिर्फ अपनी बेटी परी को अपने पास बुलाया।


अमन ने भी किसी बहस को आगे नहीं बढ़ाया।


उसने पत्नी और बेटी का हाथ पकड़ा और बोला,


"चलो नेहा।"


नेहा की आँखों में आँसू थे।


वह घर छोड़ना नहीं चाहती थी।


लेकिन वह अपना आत्मसम्मान भी नहीं छोड़ सकती थी।


दोनों एक छोटे से किराए के मकान में रहने लगे।


घर छोटा था।


सुविधाएँ कम थीं।


लेकिन वहाँ एक चीज बहुत बड़ी थी—


सुकून।


नेहा नौकरी से लौटती तो अमन खाना बनाने में उसका हाथ बँटाता।


कभी अमन सब्जी काटता तो कभी नेहा रोटी बनाती।


कभी नेहा थक जाती तो अमन बेटी परी को खाना खिला देता।


परी भी धीरे-धीरे समझने लगी कि घर चलाना सिर्फ माँ की जिम्मेदारी नहीं होती।


एक दिन परी ने अपनी कॉपी में कुछ लिखकर नेहा को दिखाया।


उसमें लिखा था—


"मेरी मम्मा बहुत बहादुर हैं। वह ऑफिस भी जाती हैं और घर भी संभालती हैं। मेरे पापा अच्छे हैं क्योंकि वह मम्मा का साथ देते हैं।"


नेहा की आँखों से आँसू बह निकले।


उसने बेटी को गले लगा लिया।


उधर कमला देवी के घर की स्थिति बदलने लगी।


सुनीता को अब अकेले घर के काम संभालने पड़ रहे थे।


वह पहले जितना काम नेहा के हिस्से में डाल देती थी, अब उसका सामना खुद करना पड़ रहा था।


कुछ ही समय में उसे एहसास हुआ कि नेहा ने कितनी जिम्मेदारियाँ चुपचाप उठाई थीं।


हरिनारायण जी की तबीयत भी खराब रहने लगी।


कमला देवी के घुटनों में दर्द बढ़ गया।


उन्होंने कई बार अमन को फोन करने की सोची, लेकिन उनका अहंकार उन्हें रोक देता।


एक दिन कमला देवी सीढ़ियों से उतरते समय गिर गईं।


उनके पैर में गंभीर चोट आ गई।


सुनीता घबरा गई।


हरिनारायण जी खुद ठीक से चल नहीं पा रहे थे।


अस्पताल में डॉक्टर ने कहा,


"घुटने का ऑपरेशन करना पड़ेगा।"


कमला देवी की आँखों के सामने अपने दोनों बेटों का बचपन घूम गया।


उन्हें याद आया कि अमन हमेशा उनकी बात मानता था।


उन्हें याद आया कि नेहा ने कभी उनके सामने ऊँची आवाज नहीं की थी।


उन्होंने यह भी याद किया कि कितनी बार उन्होंने नेहा की थकान को नजरअंदाज किया था।


उनकी आँखों से आँसू निकल आए।


उन्होंने धीमे से कहा,


"काश मैंने उस लड़की को समझा होता।"


हरिनारायण जी ने उनका हाथ पकड़कर कहा,


"गलती हम दोनों की थी।"


कमला देवी ने रोते हुए पूछा,


"क्या वह हमें माफ करेगी?"


हरिनारायण जी बोले,


"माफी माँगने के लिए पहले अहंकार छोड़ना पड़ेगा।"


कमला देवी चुप हो गईं।


कुछ दिनों बाद नेहा को अपनी सास की तबीयत के बारे में पता चला।


अमन से उसने कहा,


"चलो माँजी को देखने चलते हैं।"


अमन ने आश्चर्य से पूछा,


"तुम जाओगी?"


नेहा ने कहा,


"वह मेरी सास हैं। हमारे बीच जो हुआ, वह अपनी जगह है। लेकिन बीमारी में किसी को अकेला छोड़ देना मेरी परवरिश नहीं है।"


दोनों अस्पताल पहुँचे।


कमला देवी ने जैसे ही नेहा को देखा, उनकी आँखों से आँसू निकल पड़े।


वह कुछ बोल नहीं पाईं।


नेहा उनके पास बैठ गई।


उसने उनके पैर पर हाथ रखा और कहा,


"माँजी, कैसी तबीयत है?"


कमला देवी रोते हुए बोलीं,


"बहू, मुझे माफ कर दे।"


नेहा कुछ पल चुप रही।


फिर उसने कहा,


"माँजी, मैंने आपको कभी अपना दुश्मन नहीं समझा। मैं सिर्फ चाहती थी कि आप मुझे बहू समझने से पहले एक इंसान समझें।"


कमला देवी फूट-फूटकर रोने लगीं।


उन्होंने नेहा का हाथ पकड़ लिया।


"तूने मेरे साथ इतना सब होने के बाद भी मेरा हाथ नहीं छोड़ा।"


नेहा ने कहा,


"रिश्ते गलतियों से टूटते हैं, लेकिन समझदारी से सुधर भी सकते हैं।"


हरिनारायण जी ने अमन की ओर देखा।


उन्होंने कहा,


"बेटा, उस दिन हमने तुम्हें घर से निकाल दिया था। आज समझ आया कि घर दीवारों से नहीं, अपनों के सम्मान से बनता है।"


अमन की आँखें भी नम हो गईं।


कुछ देर बाद कमला देवी ने नेहा से कहा,


"क्या तुम वापस घर आओगी?"


नेहा ने मुस्कुराकर कहा,


"माँजी, वापस आना तभी संभव होगा जब घर में पुराने नियम वापस नहीं आएँगे।"


कमला देवी ने सिर हिलाया।


"अब कोई नियम नहीं होगा। काम सब मिलकर करेंगे। तुम्हारी नौकरी तुम्हारी जिम्मेदारी है और घर हम सबकी।"


नेहा ने उनकी ओर देखा।


इस बार उसके चेहरे पर सुकून था।


वह तुरंत पुराने घर में वापस नहीं गई।


उसने साफ कहा,


"रिश्ता वापस बनाने में थोड़ा समय लगेगा। लेकिन मैं कोशिश जरूर करूँगी।"


कमला देवी ने कहा,


"मुझे मंजूर है।"


कुछ महीनों बाद दोनों परिवारों के बीच संबंध पहले से बेहतर हो गए।


अमन अपने माता-पिता से मिलने जाता।


नेहा भी बेटी को लेकर उनसे मिलने जाती।


अब कमला देवी जब नेहा को काम करते देखतीं तो तुरंत कहतीं,


"बहू, रहने दे। तू ऑफिस से आई है, पहले आराम कर।"


और जब नेहा कहती,


"माँजी, मैं कर देती हूँ।"


तो कमला देवी मुस्कुराकर कहतीं,


"नहीं बहू, घर सिर्फ तुम्हारा नहीं है।"


नेहा के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ जाती।


परी अपनी दादी को देखकर कहती,


"दादी, अब आप मेरी मम्मा को डाँटती नहीं हो?"


कमला देवी उसे गले लगाकर कहतीं,


"अब तेरी मम्मा मेरी बहू नहीं, मेरी बेटी है।"


परी मुस्कुराकर बोली,


"तो अब दादी भी अच्छी हो गईं।"


सभी हँस पड़े।


नेहा ने महसूस किया कि परिवार में बदलाव हमेशा लड़ाई से नहीं आता।


कभी-कभी अपनी बात सम्मान के साथ रखने से भी बदलाव की शुरुआत होती है।


सीख:


बहू नौकरी करती है तो इसका मतलब यह नहीं कि घर की सारी जिम्मेदारियाँ उसी की हो जाती हैं।


वह कमाने वाली है, लेकिन मशीन नहीं।


वह बहू है, लेकिन सबसे पहले एक इंसान है।


जिस घर में बहू के काम को कर्तव्य और उसकी नौकरी को केवल अतिरिक्त सुविधा समझा जाता है, वहाँ रिश्तों में धीरे-धीरे दूरी आने लगती है।


घर तभी खुशहाल रहता है, जब जिम्मेदारियाँ भी बाँटी जाएँ और सम्मान भी।


बहू से घर संभालने की उम्मीद रखने से पहले उसके कंधों पर रखी जिम्मेदारियों का वजन समझना जरूरी है।



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