एक अनजान इंसान का एहसान

 

Pregnant Indian woman tearfully reaching toward an elderly railway porter as a moving train departs from the station.


शादी को तीन साल हो चुके थे, लेकिन नीलम के चेहरे की खुशी उस दिन कुछ अलग ही थी। वह माँ बनने वाली थी और घर में हर कोई आने वाले बच्चे के इंतजार में खुश था।


नीलम अपने पति रोहित के साथ शहर में रहती थी। रोहित एक निजी कंपनी में नौकरी करता था और अक्सर काम के सिलसिले में बाहर रहता था। नीलम की गर्भावस्था का आठवाँ महीना शुरू होने वाला था, इसलिए उसकी माँ ने फोन करके कहा था,


“बेटी, अब ज्यादा दिन अकेली मत रहना। कुछ समय के लिए मायके चली आ। यहाँ तेरी देखभाल अच्छे से हो जाएगी।”


नीलम भी मन ही मन यही चाहती थी। उसने अपना कुछ जरूरी सामान एक बड़े बैग में रखा और रोहित ने उसके लिए ट्रेन का टिकट करवा दिया।


जिस दिन उसे जाना था, रोहित को अचानक ऑफिस के जरूरी काम से दूसरे शहर जाना पड़ा। उसने नीलम से कहा,


“तुम चिंता मत करो। स्टेशन तक मेरा दोस्त मनोज तुम्हें छोड़ देगा। वह तुम्हारा सामान ट्रेन में रखवा देगा।”


नीलम ने मुस्कुराकर हामी भर दी।


मनोज उसे स्टेशन लेकर पहुँचा। स्टेशन पर काफी भीड़ थी। नीलम के पास दो बड़े बैग, एक छोटा सूटकेस और हाथ में एक पर्स था।


मनोज ने टिकट देखकर कहा,


“तुम्हारी ट्रेन आने में अभी काफी समय है। मैं तुम्हें यहाँ बैठा देता हूँ।”


नीलम ने कहा,


“भैया, बस सामान ट्रेन में रखवा देना। मैं अकेले नहीं उठा पाऊँगी।”


मनोज ने कहा,


“हाँ-हाँ, चिंता मत करो।”


वह नीलम को प्लेटफॉर्म की एक बेंच पर बैठाकर सामान पास में रख गया। लेकिन कुछ देर बाद उसके फोन पर किसी का जरूरी कॉल आ गया।


वह जल्दी से नीलम के पास आया और बोला,


“मुझे अभी जाना पड़ेगा। ट्रेन आने पर कोई कुली कर लेना। स्टेशन पर बहुत कुली मिल जाएंगे।”


नीलम कुछ कह पाती, उससे पहले ही वह चला गया।


नीलम ने चारों तरफ देखा।


लोग अपने-अपने सामान के साथ भाग रहे थे। कोई परिवार के साथ था, कोई बच्चों के साथ। कोई ट्रेन पकड़ने की जल्दी में था तो कोई किसी को विदा करने आया था।


नीलम ने अपने पेट पर हाथ रखा।


“बेटा, बस थोड़ी परेशानी है। नाना-नानी के घर पहुँचते ही सब ठीक हो जाएगा।”


उसने खुद को समझाया।


थोड़ी देर बाद उसने देखा कि एक बुजुर्ग कुली उसके पास खड़ा था।


उसकी उम्र लगभग साठ-पैंसठ साल रही होगी। शरीर बहुत कमजोर था। कपड़े पुराने थे और सिर पर लाल रंग की फीकी पड़ी पगड़ी थी। हाथों की नसें साफ दिखाई दे रही थीं।


उसने विनम्रता से पूछा,


“बिटिया, सामान उठवा दूँ?”


नीलम ने पूछा,


“कितने पैसे लेंगे?”


बुजुर्ग ने कहा,


“जितना ठीक समझो बिटिया। बस कुछ दे देना।”


नीलम ने उसे गौर से देखा।


उसकी आवाज में कोई बनावटीपन नहीं था। बस एक जरूरत थी।


नीलम ने कहा,


“पचास रुपये दूँगी। लेकिन सामान ट्रेन के अंदर तक रखना होगा।”


बुजुर्ग ने तुरंत सिर हिला दिया।


“हाँ बिटिया, बिल्कुल रख दूँगा।”


नीलम ने सामान उसकी तरफ कर दिया।


बुजुर्ग ने पहले बड़ा बैग उठाया। बैग भारी था। उठाते समय उसके चेहरे पर दर्द साफ दिखाई दिया, लेकिन उसने कोई शिकायत नहीं की।


नीलम बोली,


“बाबा, रहने दीजिए। बहुत भारी है।”


वह मुस्कुराया।


“भारी तो है बिटिया, लेकिन पेट से ज्यादा भारी नहीं।”


नीलम उसकी बात सुनकर चुप हो गई।


उसने पूछा,


“आपकी उम्र कितनी है?”


बुजुर्ग ने हल्की हँसी के साथ कहा,


“उम्र पूछकर क्या करोगी बिटिया? अब तो बस जितने दिन शरीर चलता है, उतने दिन काम करना है।”


नीलम ने देखा कि उसके पैरों में घिसी हुई चप्पलें थीं।


वह बोली,


“आपके घर में कोई नहीं है क्या?”


बुजुर्ग कुछ पल चुप रहा।


फिर बोला,


“है बिटिया... एक पोती है। बहू-बेटा दोनों नहीं रहे। वही है मेरे जीने की वजह।”


नीलम की आँखें भर आईं।


उसने धीरे से पूछा,


“पोती कितनी बड़ी है?”


“दस साल की।”


“पढ़ती है?”


बुजुर्ग की आँखों में पहली बार चमक आई।


“हाँ बिटिया। खूब पढ़ती है। कहती है दादा, मैं बड़ी होकर मास्टरनी बनूँगी।”


नीलम मुस्कुराई।


“जरूर बनेगी।”


बुजुर्ग ने सिर हिलाया।


“बस भगवान इतना कर दे कि उसकी पढ़ाई न छूटे।”


इतना कहकर उसने सामान उठाया और आगे बढ़ गया।


नीलम उसके पीछे धीरे-धीरे चल रही थी।


कुछ दूर जाकर रेलवे की घोषणा हुई कि ट्रेन का प्लेटफॉर्म बदल दिया गया है।


नीलम घबरा गई।


उसकी ट्रेन अब दूसरे प्लेटफॉर्म से आने वाली थी।


बुजुर्ग ने तुरंत कहा,


“चल बिटिया, पुल पार करना पड़ेगा।”


वह सामान लेकर सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।


नीलम धीरे-धीरे उसके पीछे चलने लगी।


गर्भ के कारण उसके लिए सीढ़ियाँ चढ़ना मुश्किल था।


बुजुर्ग बार-बार पीछे मुड़कर देखता और कहता,


“धीरे चल बिटिया, गिरना मत।”


नीलम बोली,


“आप अपना ध्यान रखिए बाबा। आप भी तो बहुत थक गए हैं।”


वह मुस्कुराया।


“हमारी चिंता मत कर। तू बस अपने बच्चे को संभाल।”


पुल पार करके वे दूसरे प्लेटफॉर्म पर पहुँचे।


ट्रेन आने की घोषणा हो चुकी थी।


लोग अचानक तेज हो गए।


बुजुर्ग ने सामान उठाकर नीलम के डिब्बे की तरफ दौड़ने की कोशिश की।


लेकिन उसका शरीर उसका साथ नहीं दे रहा था।


वह दो कदम दौड़ता और फिर सांस लेने के लिए रुक जाता।


नीलम ने कहा,


“बाबा, सामान मुझे दे दीजिए। आप रहने दीजिए।”


बुजुर्ग ने सिर हिलाया।


“नहीं बिटिया। मैंने पैसे लिए हैं। काम पूरा करके ही लूँगा।”


नीलम ने पहली बार महसूस किया कि वह आदमी सिर्फ मजदूर नहीं था।


वह अपनी इज्जत बचाकर जीने वाला इंसान था।


ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आ गई।


नीलम ने अपना कोच ढूँढा।


उसका डिब्बा काफी आगे था।


वह किसी तरह वहाँ पहुँची।


बुजुर्ग ने एक-एक करके सामान अंदर रख दिया।


नीलम सीट के पास जाकर बैठ गई।


तभी ट्रेन ने धीरे-धीरे चलना शुरू कर दिया।


नीलम ने पर्स खोला और पचास रुपये निकालने लगी।


लेकिन हड़बड़ी में नोट नीचे गिर गया।


उसने जल्दी से उसे उठाया।


जब तक वह दरवाजे तक पहुँची, ट्रेन चल चुकी थी।


बुजुर्ग प्लेटफॉर्म पर खड़ा था।


नीलम ने हाथ बाहर निकालकर उसे पैसे देने की कोशिश की।


बुजुर्ग ट्रेन के साथ दौड़ने लगा।


नीलम चिल्लाई,


“बाबा... रुकिए...!”


लेकिन वह दौड़ता रहा।


नीलम ने देखा कि उसके हाथ में कुछ नहीं था।


उसने अपनी मुट्ठी आगे बढ़ाई और कहा,


“बाबा, आपके पैसे!”


बुजुर्ग ने दौड़ते-दौड़ते मुस्कुराकर सिर हिलाया।


फिर उसने दोनों हाथ जोड़ दिए।


और दूर से आशीर्वाद देने के अंदाज में हाथ उठा दिया।


नीलम की आँखों से आँसू बहने लगे।


वह खिड़की के पास खड़ी होकर उस बूढ़े आदमी को तब तक देखती रही, जब तक वह भीड़ में गायब नहीं हो गया।


उसके पास उसका नाम नहीं था।


उसका घर कहाँ था, यह नहीं पता था।


वह किस जगह बैठता था, यह भी नहीं पता था।


बस इतना पता था कि उस आदमी ने उसके मुश्किल समय में उसका साथ दिया था।


नीलम ने रास्ते भर सोचा,


“उसने मेरे लिए इतना किया और बदले में कुछ लिया भी नहीं।”


मायके पहुँचने के बाद नीलम ने माँ को पूरी बात बताई।


माँ ने कहा,


“बेटी, शायद भगवान ने उसे तुम्हारी मदद के लिए भेजा था।”


नीलम ने कहा,


“माँ, मैं उसका कर्ज जरूर चुकाऊँगी।”


अगले ही सप्ताह नीलम अपने भाई के साथ उसी स्टेशन पर गई।


उसने कई कुलियों से उस बुजुर्ग के बारे में पूछा।


किसी ने कहा,


“शायद दूसरे प्लेटफॉर्म पर काम करता होगा।”


किसी ने कहा,


“यहाँ बहुत कुली हैं बहन, नाम पता हो तो ढूँढना आसान होता।”


नीलम ने कई दिनों तक उसे खोजा।


लेकिन वह नहीं मिला।


उसने स्टेशन के आसपास भी पूछताछ की।


किसी को कुछ पता नहीं था।


समय बीतता गया।


नीलम ने एक बेटे को जन्म दिया।


उसका बेटा स्वस्थ था।


जब पहली बार उसने अपने बच्चे को गोद में लिया तो उसे उसी बुजुर्ग की बात याद आई—


“तू बस अपने बच्चे को संभाल।”


नीलम की आँखों से आँसू निकल आए।


उसने उसी दिन मन में एक फैसला किया।


वह जब भी किसी जरूरतमंद को देखेगी, उसकी मदद करेगी।


धीरे-धीरे उसने जरूरतमंद बच्चों की पढ़ाई में मदद करनी शुरू कर दी। कभी किसी बुजुर्ग के लिए दवा खरीद देती, कभी किसी मजदूर को खाना खिला देती।


लेकिन हर बार मदद करने के बाद उसके मन में एक ही बात आती—


“यह उस बुजुर्ग के एहसान का बदला नहीं है।”


कई साल बीत गए।


एक दिन नीलम अपने बेटे के साथ उसी स्टेशन से गुजर रही थी।


उसका बेटा अब स्कूल में पढ़ता था।


स्टेशन पर उतरते ही नीलम की नजर प्लेटफॉर्म पर बैठे एक बूढ़े कुली पर पड़ी।


एक पल के लिए उसका दिल जोर से धड़कने लगा।


वह दौड़कर उसके पास गई।


लेकिन वह कोई दूसरा व्यक्ति था।


नीलम कुछ देर वहीं खड़ी रही।


उसने अपनी आँखें पोंछीं।


बेटे ने पूछा,


“माँ, आप रो क्यों रही हो?”


नीलम ने बेटे का हाथ पकड़ा और कहा,


“बेटा, बहुत साल पहले एक बाबा ने तुम्हारी माँ की मदद की थी।”


“कौन बाबा?”


नीलम ने मुस्कुराकर कहा,


“जिसका नाम मुझे आज तक नहीं पता।”


बेटे ने पूछा,


“फिर आपने उनका एहसान कैसे चुकाया?”


नीलम कुछ पल चुप रही।


फिर बोली,


“शायद चुका ही नहीं पाई।”


बेटे ने मासूमियत से कहा,


“तो उन्हें ढूँढ लो ना।”


नीलम की आँखें भर आईं।


वह बोली,


“कुछ लोग जिंदगी में सिर्फ एक बार मिलते हैं बेटा। लेकिन उनका किया हुआ काम पूरी जिंदगी हमारे साथ रहता है।”


उस दिन नीलम ने स्टेशन के बाहर बैठे कई जरूरतमंद लोगों के लिए भोजन खरीदा।


लेकिन खाना बाँटते समय भी उसके मन में वही बुजुर्ग था।


वही कमजोर शरीर।


वही थकी हुई आँखें।


वही शब्द—


“भारी तो है बिटिया, लेकिन पेट से ज्यादा भारी नहीं।”


नीलम ने आसमान की तरफ देखा और मन ही मन कहा,


“बाबा, अगर आप कहीं भी हैं तो भगवान आपको खुश रखे। आपने उस दिन सिर्फ मेरा सामान नहीं उठाया था... आपने एक डरती हुई गर्भवती औरत को हिम्मत दी थी। आपने मुझे सिखाया था कि इंसान की असली कीमत उसके कपड़ों, उम्र या हालत से नहीं होती... उसके कर्मों से होती है।”


कहते हैं जिंदगी में कुछ रिश्ते नाम से बनते हैं और कुछ रिश्ते एक छोटी-सी मदद से।


कुछ लोग हमारे अपने नहीं होते, फिर भी मुश्किल वक्त में अपनों से बढ़कर साथ दे जाते हैं।


नीलम आज भी जरूरतमंदों की मदद करती है।


लेकिन उसके मन में एक बात हमेशा रहती है—


उस बूढ़े कुली का कर्ज शायद वह कभी नहीं चुका पाएगी।


क्योंकि कुछ एहसान पैसों से नहीं उतरते।


कुछ कर्ज इंसान को पूरी जिंदगी अच्छा इंसान बनकर चुकाने पड़ते हैं।


सीख:

किसी की मदद छोटी या बड़ी नहीं होती। कभी-कभी हमारी छोटी-सी मदद किसी के जीवन की सबसे बड़ी परेशानी को आसान कर देती है। इसलिए जब भी किसी जरूरतमंद को हमारी सहायता की जरूरत हो, अगर संभव हो तो उसका हाथ थाम लेना चाहिए। हो सकता है हम उसका एहसान कभी न चुका पाएँ, लेकिन उसकी अच्छाई को किसी और तक पहुँचाकर उस नेक काम को आगे जरूर बढ़ा सकते हैं।



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