बहू नहीं, बेटी मिली
“हम बेटे के पास रहने तो जा रहे हैं, लेकिन मन में एक डर-सा बैठा हुआ है। पता नहीं बहू हमें अपने साथ रख पाएगी या नहीं। आजकल की लड़कियाँ अपनी जिंदगी में इतनी व्यस्त रहती हैं कि उन्हें बूढ़े सास-ससुर की जिम्मेदारी कहाँ पसंद आती है।”
कमला जी ने सामान समेटते हुए अपने पति हरिशंकर जी से कहा।
हरिशंकर जी ने पत्नी की ओर देखा और बोले,
“तुम बेवजह चिंता कर रही हो। हमने बहू को अभी ठीक से जाना ही कहाँ है? केवल उसके कपड़े देखकर किसी इंसान के स्वभाव का फैसला करना ठीक नहीं।”
कमला जी चुप हो गईं, लेकिन उनके मन की चिंता कम नहीं हुई।
हरिशंकर जी सरकारी नौकरी से रिटायर हो चुके थे। उनका बेटा रोहित दूसरे शहर में नौकरी करता था। रोहित की शादी रिया से हुई थी। दोनों एक ही कंपनी में काम करते थे। पहले दोस्ती हुई और फिर वही दोस्ती प्यार में बदल गई।
रोहित ने जब रिया से शादी करने की बात घर में बताई थी, तब कमला जी थोड़ी परेशान हुई थीं।
वह अपने बेटे के लिए ऐसी बहू चाहती थीं जो पारंपरिक हो, घर के रीति-रिवाज समझती हो और परिवार को सबसे आगे रखती हो।
लेकिन रिया को देखकर उनकी सोच और भी मजबूत हो गई थी।
शादी के समय रिया आधुनिक कपड़ों में थी। उसके छोटे बाल थे और बातचीत करने का तरीका भी कमला जी से बिल्कुल अलग था।
कमला जी ने मन ही मन सोचा था,
“पता नहीं यह लड़की हमारे घर के माहौल में कभी ढल पाएगी या नहीं।”
लेकिन बेटे की खुशी के लिए उन्होंने कुछ नहीं कहा।
शादी के बाद रोहित और रिया अपने शहर चले गए और कमला जी तथा हरिशंकर जी अपने छोटे शहर में ही रहने लगे।
रोहित अक्सर फोन करता।
“माँ, पापा, आप दोनों मेरे पास आकर क्यों नहीं रहते? घर बड़ा है। आप दोनों अकेले रहते हैं तो मुझे चिंता होती है।”
कमला जी हर बार कोई न कोई बहाना बना देतीं।
“अभी हम ठीक हैं बेटा। तुम्हारी नौकरी भी बहुत व्यस्त है। हम यहाँ आराम से हैं।”
लेकिन असली वजह कुछ और थी।
कमला जी के मन में रिया को लेकर संदेह था।
फिर एक दिन हरिशंकर जी की तबीयत थोड़ी बिगड़ गई। डॉक्टर ने उन्हें अकेले न रहने की सलाह दी।
रोहित को जब यह बात पता चली तो उसने साफ कह दिया,
“अब आप दोनों मेरे पास ही रहेंगे। मैं आपको अकेला नहीं छोड़ सकता।”
इस बार हरिशंकर जी ने भी बेटे की बात मान ली।
दोनों अपना जरूरी सामान लेकर रोहित के शहर के लिए निकल पड़े।
स्टेशन पर रोहित और रिया उन्हें लेने आए।
रिया ने झुककर दोनों के पैर छुए और बोली,
“माँ जी, पापा जी, सफर में कोई परेशानी तो नहीं हुई?”
कमला जी ने कहा,
“नहीं बेटा।”
रिया ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“चलिए, घर चलते हैं। मैंने आपके कमरे की सारी चीजें आपकी जरूरत के हिसाब से रखी हैं।”
घर पहुँचते ही कमला जी ने चारों तरफ नजर दौड़ाई।
घर साफ-सुथरा और बहुत व्यवस्थित था।
रिया ने दोनों को पानी दिया और बोली,
“आप दोनों पहले आराम कीजिए। मैंने आपके लिए खाना बनाया है।”
कमला जी ने आश्चर्य से पूछा,
“तुमने खुद बनाया है?”
रिया मुस्कुराई।
“जी माँ जी। रोहित से आपकी पसंद पूछकर बनाया है।”
कुछ देर बाद रिया खाना लेकर आई।
थाली में दाल, सब्जी, रोटी, चावल और खीर देखकर कमला जी हैरान रह गईं।
“इतना सब बनाने की क्या जरूरत थी?”
रिया बोली,
“आप पहली बार हमारे साथ रहने आई हैं। आपकी पसंद का खाना बनाना तो मेरा फर्ज है।”
कमला जी ने खाना खाया।
स्वाद बिल्कुल वैसा था जैसा उन्हें पसंद था।
उन्होंने अनायास कहा,
“बहुत अच्छा बनाया है।”
रिया के चेहरे पर खुशी आ गई।
“सच में?”
“हाँ बेटा।”
लेकिन कमला जी के मन में अभी भी एक सवाल था।
क्या यह सिर्फ दिखावा था या सच में रिया के मन में उनके लिए अपनापन था?
इसका जवाब उन्हें आने वाले दिनों में मिलने वाला था...
कुछ दिन बीत गए।
कमला जी ध्यान से रिया के व्यवहार को देखने लगीं।
रिया सुबह अपने ऑफिस की तैयारी करती, रोहित और घर के बाकी काम संभालती और ऑफिस जाने से पहले सास-ससुर की जरूरत की चीजें व्यवस्थित करके जाती।
कमला जी को सबसे ज्यादा आश्चर्य तब हुआ जब उन्हें पता चला कि रिया को उनकी छोटी-छोटी पसंद भी याद रहने लगी थी।
एक दिन कमला जी की दवा खत्म हो गई।
उन्होंने किसी को बताया भी नहीं।
शाम को ऑफिस से लौटते ही रिया ने पूछा,
“माँ जी, आपकी दवा खत्म हो गई है क्या?”
कमला जी चौंक गईं।
“तुम्हें कैसे पता?”
रिया ने कहा,
“मैंने देखा था कि आज आखिरी गोली बची थी।”
कमला जी बोलीं,
“मैंने सोचा था रोहित कल ले आएगा।”
रिया ने तुरंत अपना बैग रखा।
“आपको कल तक इंतजार क्यों करना चाहिए?”
वह दवा लेने चली गई।
कमला जी खिड़की से उसे जाते हुए देखती रहीं।
उनके मन में पहली बार सवाल उठा,
“क्या मैं इस लड़की को बिना जाने ही गलत समझती रही?”
दूसरे दिन रिया ने हरिशंकर जी के कमरे में एक छोटा रेडियो रख दिया।
हरिशंकर जी ने उसे देखते ही पूछा,
“यह कहाँ से आया?”
रिया मुस्कुराई।
“आपको पुराने गाने सुनना पसंद हैं न? रोहित ने बताया था।”
हरिशंकर जी की आँखों में चमक आ गई।
“तुम्हें याद रहा?”
रिया ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया,
“आपकी पसंद की बात हो तो कैसे भूल सकती हूँ?”
कमला जी चुपचाप यह सब देखती रहीं।
अब उन्हें रिया के कपड़े नहीं, उसका व्यवहार दिखाई देने लगा था।
एक दिन रिया ऑफिस से लौटकर सीधे कमला जी के पास बैठ गई।
“माँ जी, आज आप बहुत चुप हैं। तबीयत तो ठीक है?”
कमला जी ने कहा,
“हाँ बेटा, मैं ठीक हूँ।”
रिया ने उनका हाथ पकड़कर कहा,
“अगर कोई परेशानी हो तो मुझे जरूर बताइएगा। अब आप अकेली नहीं हैं।”
यह बात कमला जी के दिल में उतर गई।
धीरे-धीरे दोनों के बीच दूरी कम होने लगी।
एक दिन रिया ने रसोई में काम करते हुए कहा,
“माँ जी, आपकी दाल में जो स्वाद आता है, वह मेरे हाथ में नहीं आता। मुझे बनाना सिखाइए।”
कमला जी हँस पड़ीं।
“तुम तो मुझसे भी अच्छा खाना बनाती हो।”
रिया बोली,
“अच्छा खाना बनाना अलग बात है माँ जी। माँ के हाथ का स्वाद सीखना अलग बात है।”
कमला जी पहली बार खुलकर मुस्कुराईं।
अब वह रिया के साथ घंटों बातें करने लगी थीं।
एक दिन रोहित ऑफिस के काम से परेशान होकर घर आया।
रिया ने उसके चेहरे को देखते ही पूछा,
“क्या हुआ?”
रोहित बोला,
“ऑफिस में काम बहुत बढ़ गया है। समझ नहीं आ रहा सब कैसे संभालूँ।”
रिया ने कहा,
“तुम चिंता मत करो। घर मैं संभाल लूँगी।”
कमला जी ने दोनों को देखा।
उनका बेटा अपनी पत्नी से केवल प्यार ही नहीं करता था, बल्कि उसका सम्मान भी करता था।
उन्हें समझ आने लगा कि रोहित ने रिया को सिर्फ अपनी पसंद से नहीं चुना था। उसने उसे समझकर चुना था।
कुछ समय बाद रोहित को दूसरे शहर में कई महीनों के लिए काम पर जाना पड़ा।
वह परेशान था।
“रिया, मैं माँ-पापा को तुम्हारे भरोसे कैसे छोड़ दूँ?”
रिया ने मुस्कुराकर कहा,
“तुम उनकी चिंता मत करो। मैं हूँ न।”
कमला जी ने यह बात सुन ली।
उनके दिल में कुछ बदल चुका था।
लेकिन रिया के लिए उनके मन की एक पुरानी बात अभी बाकी थी।
कमला जी चाहती थीं कि एक दिन वह रिया से अपने मन की बात जरूर कहें।
और वह दिन भी जल्द आने वाला था...
रोहित के दूसरे शहर जाने के बाद रिया ने घर की सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली।
वह नौकरी भी करती और सास-ससुर का भी पूरा ध्यान रखती।
कमला जी अब रिया को ध्यान से देखतीं तो उन्हें हर बार अपनी पुरानी सोच पर शर्म आती।
एक दिन उन्होंने रिया को अपने पास बुलाया।
“बेटा, मेरे मन में तुमसे कुछ कहने की बात है।”
रिया उनके पास बैठ गई।
“जी माँ जी, बताइए।”
कमला जी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“जब तुम इस घर में शादी करके आई थी, तब मैंने तुम्हें तुम्हारे कपड़ों और बालों से देखकर तुम्हारे बारे में बहुत कुछ सोच लिया था।”
रिया चुपचाप सुनती रही।
कमला जी बोलीं,
“मुझे लगता था कि आधुनिक कपड़े पहनने वाली लड़की शायद परिवार की जिम्मेदारी नहीं समझ पाएगी। मुझे डर था कि तुम हमें अपने साथ नहीं रख पाओगी।”
रिया की आँखें नम हो गईं।
कमला जी ने कहा,
“लेकिन तुमने मुझे गलत साबित कर दिया।”
रिया ने धीरे से कहा,
“माँ जी, सच बताऊँ तो मुझे भी डर लगता था।”
रिया की बात सुनकर कमला जी ने हैरानी से उसकी ओर देखा और पूछा,
“तुम्हें किस बात का डर था?”
रिया बोली,
“मुझे लगता था कि शायद आप मुझे कभी स्वीकार नहीं करेंगी। मैं सोचती थी कि आपको मेरे कपड़े, मेरी नौकरी और मेरा रहन-सहन पसंद नहीं आएगा।”
कमला जी की आँखों से आँसू निकल पड़े।
उन्होंने रिया को अपने गले लगा लिया।
“बेटा, गलती मेरी थी। मैंने तुम्हें समझने की कोशिश ही नहीं की।”
रिया ने भी उन्हें गले लगा लिया।
“माँ जी, अब पुरानी बातें छोड़ दीजिए।”
कमला जी बोलीं,
“नहीं बेटा, आज मैं खुद से एक वादा करना चाहती हूँ। अब मैं किसी इंसान को उसके कपड़ों से नहीं, उसके व्यवहार से पहचानूँगी।”
हरिशंकर जी पास बैठे मुस्कुरा रहे थे।
उन्होंने कहा,
“मैंने तुम्हें पहले ही समझाया था।”
कमला जी हँसते हुए बोलीं,
“हाँ, लेकिन तुम्हारी बात समझने में मुझे थोड़ा समय लग गया।”
कुछ दिनों बाद रोहित वापस घर आया।
दरवाजे पर पहुँचते ही उसने देखा कि उसकी माँ और रिया रसोई में साथ बैठी बातें कर रही थीं।
रोहित ने मजाक करते हुए कहा,
“लगता है मेरी माँ और मेरी पत्नी की दोस्ती मुझसे ज्यादा हो गई है।”
कमला जी बोलीं,
“तेरी पत्नी नहीं, मेरी बेटी है।”
रोहित मुस्कुरा दिया।
उसने रिया की ओर देखा और कहा,
“मैंने कहा था न माँ, रिया बहुत अच्छी है।”
कमला जी ने कहा,
“हाँ बेटा, लेकिन अच्छी बहू को पहचानने में मुझे देर लग गई।”
तभी रिया चाय लेकर आई।
कमला जी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“अब यह चाय तुम नहीं, मैं बनाऊँगी।”
रिया हँस पड़ी।
“माँ जी, आज क्या हुआ?”
कमला जी ने प्यार से रिया का हाथ पकड़ते हुए कहा,
“आज मुझे अपनी बेटी के लिए चाय बनाने का मन कर रहा है।”
घर में हँसी गूँज उठी।
हरिशंकर जी ने कहा,
“देखो कमला, जिस बहू से तुम्हें डर लगता था, आज उसी के लिए चाय बना रही हो।”
कमला जी बोलीं,
“क्योंकि अब समझ आ गया है कि रिश्ते कपड़ों से नहीं, दिल से पहचाने जाते हैं।”
रिया ने मुस्कुराकर सास के पैर छुए।
कमला जी ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा,
“खुश रहो बेटी।”
उस दिन घर में कोई बड़ा उत्सव नहीं था। लेकिन चार लोगों के दिल में बहुत बड़ी खुशी थी।
एक गलतफहमी खत्म हो चुकी थी।
एक रिश्ता मजबूत हो चुका था।
और एक बहू सच में बेटी बन चुकी थी।
सीख:
किसी इंसान के कपड़े, बाल, नौकरी या आधुनिक जीवनशैली देखकर उसके संस्कारों का फैसला नहीं करना चाहिए। संस्कार उसके व्यवहार, सम्मान और रिश्तों के प्रति जिम्मेदारी से दिखाई देते हैं। कई बार हमारी सबसे बड़ी गलती यही होती है कि हम किसी को समझने से पहले ही उसके बारे में अपनी राय बना लेते हैं।

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