रिश्तों की डोर
“सविता, आज तुम्हारी बहन का फोन आया था। वह अपनी बेटी के लिए रिश्ता बता रही थी।”
रमेश जी ने शाम को घर में कदम रखते ही अपनी पत्नी से कहा।
सविता जी रसोई से बाहर आईं और बोलीं, “अच्छा! लड़का क्या करता है?”
रमेश जी ने जवाब देते हुए कहा,
“बेटा बैंक में नौकरी करता है। परिवार भी अच्छा है। घर बड़ा है और संयुक्त परिवार है।”
सविता जी कुछ पल चुप रहीं।
“संयुक्त परिवार है?” उन्होंने पूछा।
“हाँ। लड़के के माता-पिता के साथ उसकी दादी, चाचा-चाची और उनके बच्चे भी उसी घर में रहते हैं।” रमेश जी ने बताया।
सविता जी ने गहरी साँस ली।
“तो फिर हमारी बेटी के लिए थोड़ा मुश्किल होगा।”
“क्यों?” रमेश जी ने हैरानी से पूछा।
“क्योंकि आजकल की लड़कियाँ अकेले रहना पसंद करती हैं। अपनी नौकरी, अपनी आजादी… हर किसी को अपना तरीका चाहिए। इतने बड़े परिवार में हमारी बेटी कैसे रह पाएगी?” सविता जी ने अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा।
रमेश जी मुस्कराए।
“हमारी बेटी कोई इतनी कमजोर भी नहीं है। पढ़ी-लिखी है, समझदार है और सबसे बड़ी बात, उसे रिश्तों की समझ है।”
सविता जी ने कहा, “समझ तो है, लेकिन रिश्ते निभाना और रिश्तों के बीच रहना दो अलग बातें हैं।”
रमेश जी ने पत्नी की ओर देखा।
“इसलिए फैसला हम नहीं करेंगे। पहले नंदिनी से पूछेंगे। आखिर जिंदगी उसे बितानी है, तो उसकी राय सबसे जरूरी है।”
उनकी एक ही बेटी थी—नंदिनी।
नंदिनी एक निजी विद्यालय में अध्यापिका थी। स्वभाव से शांत, समझदार और मिलनसार थी। उसे किताबें पढ़ने का बहुत शौक था। वह अपनी माँ की तरह हर रिश्ते को दिल से महत्व देती थी।
उसका छोटा भाई मोहित कॉलेज में पढ़ता था।
रात को खाना खाने के बाद रमेश जी ने नंदिनी को अपने पास बुलाया।
“बेटा, तुम्हारे लिए एक रिश्ता आया है।”
नंदिनी मुस्कराई।
“पापा, आप भी ना… अचानक से!”
सविता जी ने नंदिनी की ओर देखते हुए कहा, “बेटा, लड़का अच्छा है। अच्छी नौकरी करता है और परिवार भी संस्कारी है। बस परिवार थोड़ा बड़ा है।”
नंदिनी ने उत्सुकता से पूछा, “कितना बड़ा है माँ?”
सविता जी ने जवाब दिया, “दादा-दादी, चाचा-चाची और उनके बच्चे… सब एक ही घर में साथ रहते हैं।”
नंदिनी कुछ देर सोचती रही।
फिर बोली, “माँ, परिवार बड़ा है तो क्या हुआ? पहले मिल तो लीजिए। किसी इंसान के बारे में बिना मिले कैसे फैसला कर सकते हैं?”
रमेश जी ने खुश होकर कहा, “बस यही तो मैं कह रहा था।”
“लेकिन पापा,” नंदिनी ने गंभीर होकर कहा, “एक बात मेरी भी है।”
“क्या?”
“शादी के बाद अगर मैं किसी बात से असहमत होऊँ तो क्या अपनी बात कह पाऊँगी?”
रमेश जी कुछ क्षण चुप रहे।
“बिल्कुल। बेटा, शादी का मतलब अपनी आवाज खो देना नहीं होता।”
नंदिनी के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
“तो फिर मैं लड़के और उसके परिवार से मिलना चाहती हूँ।”
कुछ दिनों बाद रविवार को लड़के वाले नंदिनी के घर आए।
लड़के का नाम था आदित्य।
उसके साथ उसके माता-पिता—विनोद जी और मीना जी—दादी शारदा देवी, चाचा सुरेश जी, चाची कमला जी और छोटी बहन पायल भी आई थी।
नंदिनी को कमरे से बुलाया गया।
वह हल्की पीली साड़ी पहनकर सबके सामने आई।
सबसे पहले शारदा देवी ने उसे गौर से देखा।
“बेटी, इधर आकर बैठो।”
नंदिनी उनके पास जाकर बैठ गई।
शारदा देवी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“डरो मत। हम तुम्हें देखने नहीं आए हैं।”
नंदिनी ने आश्चर्य से उनकी ओर देखा।
शारदा देवी हँस पड़ीं।
“हम अपने घर के लिए एक सदस्य ढूँढ़ने आए हैं, नौकरानी नहीं।”
कमरे में बैठे सभी लोग मुस्करा दिए।
नंदिनी के चेहरे पर भी मुस्कान आ गई।
मीना जी ने नंदिनी की ओर देखते हुए पूछा, “बेटी, तुम्हारी नौकरी है?”
नंदिनी ने विनम्रता से जवाब दिया, “जी, मैं स्कूल में पढ़ाती हूँ।”
मीना जी ने फिर पूछा, “शादी के बाद भी नौकरी जारी रखना चाहोगी?”
नंदिनी ने थोड़ी झिझक के साथ कहा, “जी, मैं नौकरी जारी रखना चाहती हूँ।”
मीना जी ने बिना किसी संकोच के मुस्कराते हुए कहा, “तो फिर जरूर जारी रखना। हमारी तरफ से तुम्हें कोई रोक-टोक नहीं होगी।”
नंदिनी ने हैरानी से उन्हें देखा।
“लेकिन घर…”
मीना जी मुस्कराते हुए बोलीं, “घर सिर्फ बहू का नहीं होता बेटी, घर सबका होता है।”
नंदिनी के मन में पहली बार इस परिवार के लिए सम्मान पैदा हुआ।
तभी विनोद जी बोले, “लेकिन एक बात हम पहले ही साफ कर देना चाहते हैं।”
नंदिनी ध्यान से उनकी ओर देखने लगी।
“हमारे परिवार में सब लोग एक-दूसरे के साथ मिलकर रहते हैं। किसी को परेशानी हो तो बात छिपाई नहीं जाती। हम चाहते हैं कि बहू भी परिवार का हिस्सा बने, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह अपनी पहचान खो दे।”
नंदिनी ने धीरे से कहा, “जी।”
आदित्य अब तक चुप बैठा था।
शारदा देवी ने उसकी ओर देखा।
“अरे बेटा, तू भी कुछ पूछ ले।”
आदित्य थोड़ा झेंपते हुए नंदिनी की ओर देखकर बोला,
“आपको अगर कभी लगे कि मेरे परिवार की कोई बात आपको परेशान कर रही है, तो क्या आप मुझसे खुलकर कहेंगी?”
नंदिनी ने उसकी ओर देखा।
“अगर आप भी मेरी बात बिना गुस्सा हुए सुनेंगे तो जरूर कहूँगी।”
आदित्य मुस्कराया।
“वादा रहा।”
दोनों परिवारों में हँसी फैल गई।
रिश्ता पसंद आ गया।
कुछ ही दिनों बाद दोनों की शादी तय हो गई।
शादी की तैयारियाँ शुरू हो गईं।
नंदिनी की माँ कभी साड़ी संभालतीं तो कभी बेटी के लिए सामान रखतीं।
एक रात नंदिनी माँ के पास बैठी थी।
सविता जी ने पूछा, “डर लग रहा है?”
नंदिनी कुछ पल चुप रही।
“थोड़ा डर तो लग रहा है, माँ,” नंदिनी ने धीमी आवाज़ में कहा।
“किस बात का डर है, बेटी?” सविता जी ने प्यार से पूछा।
“नए घर का, माँ। वहाँ इतने सारे लोग होंगे। पता नहीं मैं सबके साथ तालमेल बिठा पाऊँगी या नहीं और सबको खुश रख पाऊँगी या नहीं,” नंदिनी ने अपनी चिंता जताते हुए कहा।
माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“बेटी, शादी का मतलब सबको खुश रखना नहीं है।”
नंदिनी ने आश्चर्य से माँ की ओर देखा।
“फिर?”
“शादी का मतलब है, एक-दूसरे को समझना। हर दिन किसी एक की जीत नहीं होती। कभी तुम पीछे हटोगी, कभी सामने वाला। लेकिन ध्यान रखना, समझौता तभी अच्छा है जब दोनों तरफ से हो।”
नंदिनी ने माँ को गले लगा लिया।
आखिरकार नंदिनी की शादी आदित्य से हो गई।
विदाई के समय सविता जी की आँखों से आँसू बह रहे थे।
“माँ, रोना मत,” नंदिनी ने अपनी नम आँखों को पोंछते हुए कहा।
सविता जी ने बेटी को सीने से लगाते हुए भर्राई आवाज़ में कहा, “मैं कैसे न रोऊँ?”
नंदिनी ने माँ के आँसू पोंछे और हल्की मुस्कान के साथ बोली, “आपने ही तो कहा था कि नया घर भी अपना घर बनाना।”
“हाँ बेटी,” सविता जी ने आँसू रोकने की कोशिश करते हुए कहा।
नंदिनी ने माँ को गले लगाकर कहा, “तो मैं वहाँ जाकर अपना घर बनाने की कोशिश करूँगी।”
सविता जी ने बेटी को गले लगा लिया।
ससुराल पहुँचते ही नंदिनी का जोरदार स्वागत हुआ।
दादी शारदा देवी ने आरती उतारी।
“आओ बहू, घर में कदम रखो।”
नंदिनी ने चावल का कलश गिराया और अंदर आई।
पहले कुछ दिन रस्मों और मेहमानों में निकल गए।
नंदिनी सबके साथ घुलने-मिलने की कोशिश करती रही।
कभी वह दादी के पास बैठती, कभी चाची की रसोई में मदद करती, कभी पायल के साथ बातें करती।
लेकिन धीरे-धीरे उसे समझ आने लगा कि बड़े परिवार में हर व्यक्ति का स्वभाव अलग होता है।
चाची कमला जी थोड़ी सख्त थीं।
चाचा सुरेश जी कम बोलते थे।
पायल बहुत चंचल थी।
दादी शारदा देवी अनुशासन पसंद करती थीं।
और आदित्य?
वह हर बात को शांत होकर समझने की कोशिश करता था।
एक दिन नंदिनी स्कूल जाने के लिए तैयार हो रही थी।
कमला चाची ने कहा,
“बहू, आज घर में पूजा है। तुम स्कूल से थोड़ा जल्दी आ जाना।”
“जी चाची।”
“और हाँ, पूजा के बाद घर में रिश्तेदार आएँगे। शाम का खाना भी बनाना होगा।”
नंदिनी ने घड़ी देखी।
“जी, मैं कोशिश करूँगी कि समय पर आ जाऊँ।”
कमला चाची बोलीं,
“कोशिश नहीं बहू, आना ही पड़ेगा।”
नंदिनी ने कुछ नहीं कहा।
स्कूल में उस दिन वार्षिक कार्यक्रम की तैयारी थी। प्रधानाचार्य ने उसे कुछ जरूरी काम सौंप दिया।
जब तक नंदिनी घर पहुँची, शाम के सात बज चुके थे।
घर में मेहमान बैठे थे।
कमला चाची नाराज थीं।
“बहू, हमने कहा था जल्दी आना।”
नंदिनी ने हाथ जोड़कर कहा,
“चाची, स्कूल में जरूरी काम था। मैंने फोन भी किया था।”
कमला चाची ने थोड़े नाराज़ स्वर में कहा,
“घर की जिम्मेदारी भी जरूरी होती है।”
नंदिनी चुप हो गई।
उस रात उसने आदित्य से कहा,
“मुझे लगता है कि मैं आपकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पा रही हूँ।”
आदित्य ने पूछा,
“तुम्हें ऐसा क्यों लग रहा है? किसने कहा कि तुम हमारी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर रही हो?”
नंदिनी ने धीमी आवाज़ में कहा,
“चाची नाराज थीं। उन्हें लगता है कि मैं घर की जिम्मेदारियाँ ठीक से नहीं निभा पा रही हूँ।”
आदित्य ने प्यार से समझाते हुए कहा,
“चाची नाराज थीं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तुम गलत हो। तुमने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की है।”
नंदिनी की आँखें भर आईं।
“लेकिन मैं चाहती हूँ कि सब मुझे स्वीकार करें।”
आदित्य ने कहा,
“तुम सबको खुश करने की कोशिश मत करो। बस ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी निभाओ।”
नंदिनी ने सिर हिला दिया।
कुछ सप्ताह बीत गए।
धीरे-धीरे नंदिनी घर की दिनचर्या समझने लगी।
वह सुबह उठकर दादी के लिए चाय बनाती, पायल को कॉलेज के लिए तैयार होने में मदद करती और फिर स्कूल चली जाती।
लेकिन एक बात उसे परेशान कर रही थी।
घर के बड़े फैसलों में बहुओं की राय नहीं ली जाती थी।
एक दिन दादी ने घर की मरम्मत का फैसला किया।
नंदिनी ने सुझाव दिया कि रसोई की जगह थोड़ी बदली जाए ताकि कमला चाची को काम करने में आसानी हो।
दादी ने कहा,
“बहू, अभी तुम नई हो। तुम्हें इन बातों की जानकारी नहीं है।”
नंदिनी चुप हो गई।
उसे बुरा लगा।
लेकिन उसने बात मन में नहीं रखी।
अगले दिन उसने कमला चाची से कहा,
“चाची, कल मेरी बात से आपको लगा हो कि मैं ज्यादा बोल रही हूँ तो माफ कीजिएगा।”
कमला चाची ने उसकी ओर देखा।
“तुम्हें बुरा लगा?”
नंदिनी ने धीरे से सिर हिलाते हुए कहा,
“थोड़ा।”
कमला चाची ने फिर पूछा,
“क्यों?”
नंदिनी ने विनम्रता से कहा,
“क्योंकि मैं इस घर को अपना मानना चाहती हूँ। इसलिए कुछ अच्छा करने का मन करता है।”
कमला चाची कुछ नहीं बोलीं।
लेकिन उनके चेहरे का भाव बदल गया।
एक दिन अचानक शारदा देवी की तबीयत खराब हो गई।
घर में अफरा-तफरी मच गई।
डॉक्टर ने उन्हें आराम करने की सलाह दी।
कुछ दिनों तक उन्हें दवाइयों और खाने का विशेष ध्यान रखना था।
मीना जी हर समय उनके पास रहती थीं।
नंदिनी भी स्कूल से लौटने के बाद दादी के पास बैठती।
एक रात दादी ने पूछा,
“बहू, तू थक नहीं जाती?”
नंदिनी ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया,
“थकती हूँ दादी।”
शारदा दादी ने हैरानी से पूछा,
“फिर भी यहाँ बैठी रहती है?”
नंदिनी ने प्यार से दादी का हाथ पकड़ते हुए कहा,
“आप मेरे घर की सबसे बड़ी सदस्य हैं। अगर आप बीमार होंगी तो मैं कैसे आराम कर सकती हूँ?”
दादी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तू जानती है, जब मैं इस घर में आई थी न, तब मेरे ऊपर भी बहुत जिम्मेदारियाँ थीं।”
“सच?”
“हाँ। तब मैं भी डरती थी। लेकिन मेरी सास ने मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ा।”
दादी कुछ देर चुप रहीं।
“शायद इसीलिए मैं भी अपनी बहुओं से बहुत कुछ उम्मीद करती रही। मुझे लगता था कि जो मैंने सहा, वही उन्हें भी सहना चाहिए।”
नंदिनी ने धीरे से कहा,
“लेकिन दादी, समय बदल गया है।”
शारदा देवी मुस्कराईं।
“तू यही बात मुझे समझाना चाहती थी?”
“जी… लेकिन डरती थी।”
दादी हँस पड़ीं।
“अब मत डरना।”
अगले दिन दादी ने पूरे परिवार को बुलाया।
“आज से घर के हर बड़े फैसले में घर की बहुओं की भी राय ली जाएगी।”
सुरेश जी ने कहा,
“माँ, यह अचानक?”
“अचानक नहीं बेटा। देर से समझ आया है।”
उन्होंने कमला और मीना की ओर देखा।
“हमने हमेशा कहा कि परिवार की एकता जरूरी है। लेकिन एकता का मतलब यह नहीं कि एक ही व्यक्ति हर फैसला करे।”
फिर उन्होंने नंदिनी की ओर देखा।
“नई बहू ने मुझे यह बात समझाई है।”
नंदिनी तुरंत बोली,
“दादी, मैंने तो कुछ नहीं…”
“चुप,” दादी हँसते हुए बोलीं, “तूने मुझे कुछ नहीं समझाया। तूने मुझे अपने व्यवहार से समझाया है।”
कमला चाची की आँखें भर आईं।
कमला चाची ने नंदिनी का हाथ अपने हाथों में लेते हुए भावुक होकर कहा,
“बहू, मुझे तुमसे माफी माँगनी है।”
नंदिनी ने हैरानी से उनकी ओर देखते हुए पूछा,
“चाची?”
कमला चाची की आँखें नम हो गईं। उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा,
“मैं तुम्हें हमेशा परखती रही। मुझे लगता था कि नई बहू अगर ज्यादा पढ़ी-लिखी हो तो घर से दूर हो जाती है। लेकिन तुमने साबित कर दिया कि पढ़ाई इंसान को रिश्तों से दूर नहीं करती, बल्कि सही रिश्ते समझना सिखाती है।”
नंदिनी ने चाची को गले लगा लिया।
समय बीतता गया।
नंदिनी अब परिवार का हिस्सा बन चुकी थी।
लेकिन एक दिन उसके सामने एक नई चुनौती आ गई।
स्कूल में उसे शहर के दूसरे स्कूल में प्रधानाचार्य के पद के लिए चयनित किया गया।
यह उसके लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी।
लेकिन नई नौकरी के लिए उसे रोज़ लगभग एक घंटे दूर जाना पड़ता।
नंदिनी खुश भी थी और परेशान भी।
उसने सबसे पहले आदित्य से बात की।
“मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या करूँ।”
आदित्य ने कहा,
“तुम्हारा सपना है। तुम्हें जरूर जाना चाहिए।”
नंदिनी ने चिंता भरे स्वर में पूछा,
“लेकिन घर?”
आदित्य मुस्कराते हुए बोला,
“घर हम सब संभाल लेंगे।”
नंदिनी ने पूछा,
“अगर किसी को परेशानी हुई तो?”
आदित्य ने कहा,
“तो हम बैठकर बात करेंगे।”
अगली शाम पूरे परिवार के सामने नंदिनी ने अपनी नौकरी की बात बताई।
कुछ पल शांति रही।
कमला चाची बोलीं,
“रास्ता लंबा है।”
नंदिनी ने सिर झुका लिया।
तभी दादी बोलीं,
“तो क्या हुआ?”
सब उनकी ओर देखने लगे।
“हमने बहू को घर सँभालने के लिए बहू बनाया है या उसके सपने रोकने के लिए?”
विनोद जी मुस्कराए।
“माँ सही कह रही हैं।”
मीना जी ने कहा,
“नंदिनी, तुम नौकरी करो। घर के काम बाँट लेंगे।”
पायल तुरंत बोली,
“भाभी की जगह मैं सुबह दादी को दवा दे दिया करूँगी।”
मोहित जैसा देवर नहीं था, पर घर के छोटे बच्चे भी आगे आ गए।
कमला चाची ने मुस्कराते हुए कहा,
“और रात के खाने की चिंता मत करना। मैं देख लूँगी।”
नंदिनी की आँखों से आँसू निकल पड़े।
दादी ने कहा,
“रो क्यों रही है?”
नंदिनी बोली,
“आज मुझे समझ आया कि परिवार बड़ा होना समस्या नहीं है। समस्या तब होती है जब परिवार में कोई किसी की बात समझना न चाहे।”
दादी ने मुस्कराकर कहा,
“और यही बात हमेशा याद रखना।”
कुछ महीनों बाद नंदिनी ने अपनी नई नौकरी शुरू कर दी।
उसका आत्मविश्वास बढ़ता गया।
एक दिन उसे स्कूल की ओर से सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम में परिवार के सभी लोग पहुँचे।
नंदिनी को मंच पर बुलाया गया।
जब उसे सम्मान मिला तो उसकी आँखें अपने परिवार को खोज रही थीं।
सामने दादी शारदा देवी बैठी थीं।
दादी ने दोनों हाथ उठाकर उसे आशीर्वाद दिया।
नंदिनी की आँखें भर आईं।
कार्यक्रम के बाद दादी ने उसे गले लगाकर कहा,
“बहू, आज तूने सिर्फ हमारा नाम नहीं रोशन किया, तूने मुझे भी बदल दिया।”
नंदिनी बोली,
“दादी, आपने मुझे भी बदल दिया।”
“कैसे?”
“आपने मुझे सिखाया कि परिवार में सिर्फ अधिकार नहीं, जिम्मेदारी भी होती है। और आपने यह भी सिखाया कि बड़े होने का मतलब हमेशा सही होना नहीं होता। कभी-कभी छोटों की बात सुनना भी जरूरी होता है।”
दादी की आँखों में आँसू आ गए।
कुछ साल बाद वही घर पहले से भी ज्यादा खुशहाल हो गया।
जहाँ पहले हर काम के लिए एक व्यक्ति की ओर देखा जाता था, अब सब मिलकर काम करते थे।
त्योहारों पर बहुएँ मिलकर पकवान बनातीं।
पुरुष घर के काम में हाथ बँटाते।
बच्चे दादी के पास बैठकर कहानियाँ सुनते।
और नंदिनी?
वह अब सिर्फ घर की बहू नहीं थी।
वह पूरे परिवार की बेटी बन चुकी थी।
एक दिन सविता जी अपनी बेटी से मिलने उसके ससुराल आईं।
उन्होंने घर का माहौल देखा तो उनकी आँखें भर आईं।
उन्होंने नंदिनी से कहा,
“बेटी, तू सच में अपना घर बना पाई।”
नंदिनी मुस्कराई।
“माँ, मैंने अकेले नहीं बनाया।”
“फिर?”
“सबने मिलकर बनाया।”
दादी शारदा देवी पास ही बैठी थीं।
उन्होंने कहा,
“सविता, तुम्हारी बेटी ने हमें एक बात सिखाई है।”
सविता जी ने पूछा,
“क्या?”
दादी बोलीं,
“रिश्ते दीवार नहीं होते कि सिर्फ एक तरफ से खड़े किए जाएँ। रिश्ते तो पुल होते हैं, जिन्हें दोनों तरफ से बनाया जाता है।”
नंदिनी ने दादी का हाथ पकड़ लिया।
दादी आगे बोलीं,
“घर में अगर सिर्फ बहू बदलेगी तो घर नहीं बदलेगा। अगर सिर्फ सास बदलेगी तो भी घर नहीं बदलेगा। थोड़ा दोनों को बदलना पड़ेगा। थोड़ा बहू समझे, थोड़ा सास समझे। थोड़ा पति पत्नी की बात सुने और थोड़ा पत्नी पति के परिवार को समझे। तभी परिवार मजबूत बनता है।”
सविता जी मुस्कराईं।
“आप बिल्कुल सही कह रही हैं।”
दादी ने हँसते हुए कहा,
“और हाँ, अब मेरी एक और इच्छा है।”
सब उनकी ओर देखने लगे।
“क्या?”
“अगले त्योहार पर नंदिनी ही घर की पूजा करवाएगी।”
नंदिनी ने हाथ जोड़ लिए।
“दादी, मैं?”
“हाँ तू।”
“लेकिन घर में आप सबसे बड़ी हैं।”
दादी बोलीं,
“बड़ी हूँ, इसलिए तो कह रही हूँ। अब समय है कि अगली पीढ़ी को भी आगे बढ़ाया जाए।”
पूरा परिवार तालियाँ बजाने लगा।
नंदिनी की आँखों से खुशी के आँसू बहने लगे।
उसने मन ही मन अपनी माँ को याद किया।
उसे माँ की वह बात याद आई—
“शादी का मतलब सबको खुश रखना नहीं है। शादी का मतलब है, एक-दूसरे को समझना।”
आज उसे उस बात का सही अर्थ समझ आ गया था।
रिश्ते तभी खूबसूरत बनते हैं जब उनमें प्यार के साथ सम्मान हो, अधिकार के साथ जिम्मेदारी हो और उम्मीदों के साथ समझ भी हो।
किसी एक इंसान से यह उम्मीद करना कि वह पूरी तरह बदलकर परिवार में घुल जाए, शायद सही नहीं है।
बदलाव दोनों तरफ से हो तो रिश्ता बोझ नहीं रहता, सहारा बन जाता है।
क्योंकि…
रिश्तों की डोर जितनी मजबूती से दोनों हाथों से पकड़ी जाती है, उतनी ही खूबसूरती से जिंदगी को बाँधती है।
मित्रों, आपका क्या मानना है? क्या शादी के बाद सिर्फ बहू को ही बदलना चाहिए, या परिवार को भी नई बहू के अनुसार थोड़ा बदलना चाहिए? अपने विचार जरूर बताइए।

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