बहू भी इंसान है
“बहू के चेहरे पर थकान दिखाई दे रही हो, तो उसे काम का बहाना समझना चाहिए या उसके दर्द को समझना चाहिए?”
रेखा ने रसोई में चाय का कप रखा और कुछ पल के लिए दीवार का सहारा लेकर खड़ी हो गई। उसकी आंखों के नीचे काले घेरे साफ दिखाई दे रहे थे। चेहरे पर थकान थी, लेकिन होंठों पर वही हल्की मुस्कान थी, जो वह घरवालों को दिखाने की कोशिश करती थी।
रेखा की शादी को चार साल हो चुके थे। उसका पति मोहित एक निजी कंपनी में नौकरी करता था। घर में उसकी सास शारदा देवी, ससुर हरिशंकर जी और तीन साल की बेटी परी थी।
रेखा सुबह से लेकर रात तक घर के कामों में लगी रहती थी।
रसोई, कपड़े, सफाई, सास-ससुर की दवाइयां, पति की जरूरतें और सबसे ज्यादा परी की देखभाल।
परी बहुत चंचल बच्ची थी। रात में कई बार उठ जाती थी। कभी पानी मांगती, कभी अपनी गुड़िया ढूंढती और कभी बिना किसी वजह के रोने लगती।
हर बार रेखा ही उठती।
मोहित की नौकरी ऐसी थी कि उसे जल्दी ऑफिस जाना पड़ता था। रेखा उसे जगाना नहीं चाहती थी, इसलिए वह अकेले ही परी को संभालती रहती।
कई रातों से उसकी नींद पूरी नहीं हुई थी।
उस दिन मोहित ने रेखा को चाय बनाते हुए देखा तो उसके चेहरे की थकान देखकर परेशान हो गया।
“रेखा, तुम ठीक हो?”
रेखा ने तुरंत मुस्कुराकर कहा,
“हाँ, मैं बिल्कुल ठीक हूँ।”
मोहित ने कहा,
“तुम ठीक नहीं हो। तुम्हारी आंखें बता रही हैं कि तुमने ठीक से नींद नहीं ली।”
रेखा कुछ कहती, उससे पहले शारदा देवी वहां आ गईं।
उन्होंने बहू को देखा और बोलीं,
“क्या हुआ अब? इतनी थकी हुई क्यों घूम रही हो?”
मोहित ने कहा,
“माँ, परी रात में कई बार उठी थी। रेखा की नींद पूरी नहीं हुई। मैं सोच रहा था कि इसे थोड़ा आराम करने दूं।”
शारदा देवी का चेहरा तुरंत बदल गया।
“आराम? बहू को आराम की इतनी जरूरत कब से पड़ने लगी?”
मोहित ने शांत स्वर में कहा,
“माँ, जरूरत पड़ती है। आखिर रेखा भी इंसान है।”
शारदा देवी बोलीं,
“हमने भी बच्चे पाले हैं। क्या हम आराम करते थे? तुम्हें और तुम्हारी बहन को पालते समय मैंने कभी किसी से नहीं कहा कि मुझे नींद चाहिए।”
रेखा चुपचाप खड़ी रही।
मोहित बोला,
“माँ, आपने बहुत कुछ सहकर हमें पाला है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि रेखा भी वही परेशानी झेले।”
शारदा देवी ने ताना मारते हुए कहा,
“बहू के आते ही बेटा मां को समझाने लगा। यही होता है जब पत्नी ज्यादा सिर चढ़ जाती है।”
रेखा ने तुरंत कहा,
“मम्मी जी, आप गलत मत समझिए। मैं मोहित को आपके खिलाफ कभी नहीं करती।”
शारदा देवी बोलीं,
“तुम्हें कुछ करने की जरूरत ही नहीं है। तुम्हारी शक्ल देखकर मेरा बेटा सब समझ जाता है।”
मोहित को गुस्सा आ गया।
“माँ, रेखा ने कभी आपसे शिकायत नहीं की। फिर आप उसे गलत क्यों समझती हैं?”
इसी बीच हरिशंकर जी वहां आ गए।
उन्होंने सारी बात सुन ली थी।
वह मुस्कुराकर बोले,
“शारदा, अगर बहू थकी हुई है तो उसे थोड़ा आराम करने दो। घर का काम कहीं भाग नहीं जाएगा।”
शारदा देवी बोलीं,
“आप तो हमेशा बहू की तरफदारी करते हैं।”
हरिशंकर जी हंसकर बोले,
“मैं बहू की नहीं, सही बात की तरफदारी करता हूँ।”
शारदा देवी वहां से चली गईं।
मोहित ने रेखा की तरफ देखा।
“तुम आज आराम करना।”
रेखा ने धीरे से कहा,
“आप माँ से मत उलझिए। मैं संभाल लूंगी।”
मोहित ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा,
“तुम हर चीज अकेले संभालने की कोशिश मत किया करो।”
रेखा मुस्कुराई।
“घर अपना है ना, इसलिए संभाल लेती हूँ।”
मोहित कुछ नहीं बोला।
उसे पहली बार महसूस हुआ कि रेखा इस घर में सिर्फ काम नहीं कर रही थी, बल्कि अपनी नींद, अपनी इच्छाएं और अपनी सुविधा तक छोड़ रही थी।
रेखा थोड़ी देर बाद कमरे में चली गई।
परी को शारदा देवी के पास छोड़कर वह लेट गई।
लेकिन शारदा देवी का मन शांत नहीं था।
वह बड़बड़ाते हुए हरिशंकर जी से बोलीं,
“आजकल की बहुओं को तो बस आराम चाहिए। हमने तो पूरी जिंदगी काम करते हुए निकाल दी।”
हरिशंकर जी ने अखबार नीचे रखा।
“तुमने काम किया, इसका मतलब यह नहीं कि बहू भी थक नहीं सकती।”
शारदा देवी बोलीं,
“आपको तो बहू की तकलीफ दिखाई देती है, मेरी नहीं।”
हरिशंकर जी ने गंभीर होकर कहा,
“तुम्हारी तकलीफ मुझे भी दिखाई देती है। लेकिन किसी और की तकलीफ को नजरअंदाज करके अपनी तकलीफ बड़ी साबित करना सही नहीं है।”
शारदा देवी चुप हो गईं।
उधर रेखा की आंख लग चुकी थी।
परी दादी के साथ खेल रही थी।
हरिशंकर जी ने परी को गोद में लिया और बोले,
“चल मेरी गुड़िया, आज दादा के साथ खेलेगी।”
परी खिलखिलाकर हंस पड़ी।
हरिशंकर जी ने शारदा देवी की तरफ देखकर कहा,
“देखो, बच्ची भी खुश है और बहू भी थोड़ी देर आराम कर रही है। इसमें बुरा क्या है?”
शारदा देवी ने कोई जवाब नहीं दिया।
लेकिन उनके मन में एक बात जरूर थी—
“अगर बहू रोज ऐसे आराम करने लगी, तो घर का काम कौन करेगा?”
उन्हें अभी यह समझ नहीं आया था कि जिस बहू के आराम को वह घर का नुकसान समझ रही थीं, वही बहू आने वाले दिनों में उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा सहारा बनने वाली थी।
और इसी घर में जल्द ही ऐसा कुछ होने वाला था, जो शारदा देवी की सोच को जड़ से बदल देगा।
रेखा की आंख खुली तो कमरे में परी की खिलखिलाने की आवाज आ रही थी।
वह उठकर बाहर आई तो देखा कि हरिशंकर जी परी के साथ खेल रहे थे।
हरिशंकर जी ने मुस्कुराकर कहा,
“बहू, नींद पूरी हुई?”
रेखा ने कहा,
“नहीं पापा जी, लेकिन अब ठीक लग रहा है।”
हरिशंकर जी बोले,
“तो और आराम कर लो।”
रेखा ने तुरंत कहा,
“नहीं पापा जी, अब मैं खाना बना देती हूँ।”
वह रसोई में चली गई।
शारदा देवी ने उसे देखा और बोलीं,
“देखा, मैंने तो कहा ही था कि ज्यादा आराम करने की आदत अच्छी नहीं होती।”
रेखा ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह चुपचाप खाना बनाने लगी।
परी भी रसोई के पास आकर खड़ी हो गई।
“मम्मी, मुझे भूख लगी है।”
रेखा ने गैस बंद की और परी के लिए खाना निकालने लगी।
शारदा देवी बोलीं,
“बहू, पहले घरवालों का खाना देखो। बच्ची को बाद में खिला देना।”
रेखा ने मुस्कुराकर कहा,
“मम्मी जी, इसे भी भूख लगी है।”
हरिशंकर जी ने दूर से कहा,
“शारदा, बच्ची को पहले खिला देगी तो कोई पहाड़ नहीं टूट जाएगा।”
शारदा देवी चुप हो गईं।
रेखा ने परी को खाना खिलाया।
फिर सबके लिए खाना लगाया।
खाना खत्म होने के बाद वह बर्तन समेटने लगी।
हरिशंकर जी ने कहा,
“रेखा, तुम भी बैठ जाओ।”
रेखा बोली,
“पहले रसोई साफ कर दूं।”
हरिशंकर जी ने कहा,
“रसोई कल भी साफ हो सकती है।”
रेखा हंसकर बोली,
“आपको तो बस मेरा आराम चाहिए।”
हरिशंकर जी बोले,
“हाँ, क्योंकि तुम्हें खुद अपने आराम की चिंता नहीं है।”
रेखा मुस्कुराई।
शारदा देवी यह सब देख रही थीं।
उनके मन में हल्की चिढ़ थी।
उन्हें लग रहा था कि हर कोई रेखा की तारीफ करता है।
लेकिन रेखा ने कभी अपने लिए कुछ मांगा नहीं था।
कुछ दिनों बाद शारदा देवी की तबीयत खराब हो गई।
उन्हें कमजोरी और चक्कर की शिकायत होने लगी।
रेखा तुरंत उन्हें डॉक्टर के पास लेकर गई।
डॉक्टर ने दवा लिखी और कहा,
“समय पर खाना खाइए, दवा लीजिए और ज्यादा तनाव मत लीजिए।”
रेखा ने सारी दवाइयां संभालकर रखीं।
उसने एक कागज पर दवा का समय लिखकर शारदा देवी के कमरे में लगा दिया।
शारदा देवी बोलीं,
“इतना सब करने की जरूरत नहीं है।”
रेखा मुस्कुराई।
“आप मेरी सास हैं। आपकी देखभाल करना मेरी जिम्मेदारी है।”
शारदा देवी ने पहली बार रेखा को गौर से देखा।
“तुम्हें मेरी बातें बुरी नहीं लगतीं?”
रेखा कुछ पल चुप रही।
फिर बोली,
“लगती हैं मम्मी जी।”
शारदा देवी चौंक गईं।
“फिर भी तुम इतना सब क्यों करती हो?”
रेखा ने कहा,
“क्योंकि आपका गुस्सा अलग है और मेरा रिश्ता अलग।”
शारदा देवी कुछ बोल नहीं पाईं।
लेकिन उनका मन पूरी तरह नहीं बदला था।
एक दिन रेखा बाजार से भारी सामान लेकर लौटी।
दोनों हाथों में थैले थे।
परी दौड़कर आई।
“मम्मी, मुझे गोद में लो।”
रेखा ने सामान नीचे रखा और बेटी को गोद में उठा लिया।
शारदा देवी ने यह देखा तो बोलीं,
“सामान कौन उठाएगा? बहू तो बच्ची को लेकर घूम रही है।”
रेखा ने तुरंत परी को नीचे उतारा और सामान उठाने लगी।
हरिशंकर जी ने कहा,
“शारदा, बच्ची को मां की गोद चाहिए थी। सामान थोड़ी देर बाद भी उठाया जा सकता था।”
शारदा देवी बोलीं,
“आपको तो बस बहू की चिंता रहती है।”
हरिशंकर जी ने शांत स्वर में कहा,
“क्योंकि तुम उसकी थकान नहीं देखती।”
रेखा ने बात बदल दी।
“पापा जी, रहने दीजिए।”
उस रात मोहित ने रेखा से पूछा,
“तुम परेशान हो?”
रेखा ने कहा,
“नहीं।”
मोहित ने पूछा, “सच?”
रेखा ने कुछ देर बाद कहा,
“कभी-कभी लगता है कि मैं चाहे जितना कर लूं, मम्मी जी को हमेशा कम ही लगता है।”
मोहित ने कहा,
“तुम्हें हर किसी को खुश करने की जरूरत नहीं।”
रेखा बोली,
“मैं खुश करने के लिए नहीं करती। बस चाहती हूँ कि घर में शांति रहे।”
मोहित ने उसका हाथ पकड़कर पूछा,
“और तुम्हारी शांति?”
रेखा चुप हो गई।
उसने पास सो रही परी की तरफ देखा।
“मेरी शांति तो यही है।”
मोहित ने कहा,
“लेकिन तुम्हारी भी अपनी जिंदगी है।”
रेखा ने हल्की मुस्कान दी।
कुछ दिनों बाद परी को तेज बुखार हो गया।
रेखा पूरी रात उसके पास बैठी रही।
परी बार-बार मां का हाथ पकड़कर कहती,
“मम्मी, आप सोना मत।”
रेखा उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहती,
“मम्मी यहीं है बेटा।”
मोहित ने कहा,
“रेखा, मैं बैठता हूँ। तुम थोड़ा आराम कर लो।”
रेखा बोली,
“नहीं, वह मुझे ढूंढ रही है।”
उसी समय शारदा देवी कमरे के दरवाजे पर आकर खड़ी हो गईं।
उन्होंने देखा कि रेखा की आंखें लाल थीं, चेहरा थका हुआ था, लेकिन बेटी को देखकर उसके चेहरे पर चिंता थी।
शारदा देवी को अपना बचपन याद नहीं आया।
उन्हें अपना मातृत्व याद आया।
जब मोहित बीमार पड़ता था, तब वह भी पूरी रात उसके सिरहाने बैठती थीं।
लेकिन फिर उन्हें अपनी सास की बातें भी याद आईं।
“बच्चा बीमार है तो क्या हुआ, घर का काम तो करना ही पड़ेगा।”
शारदा देवी ने मन ही मन सोचा,
“क्या मैं भी वही गलती कर रही हूँ?”
उन्हें पहली बार अपने व्यवहार पर शर्म महसूस हुई।
परी कुछ दिनों में ठीक हो गई।
लेकिन रेखा की कमजोरी बढ़ती जा रही थी।
एक दिन वह रसोई में सब्जी काट रही थी।
अचानक उसकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया।
चाकू हाथ से गिर गया।
वह दीवार पकड़कर खड़ी हुई।
मोहित दौड़कर आया।
“रेखा!”
रेखा ने कहा,
“कुछ नहीं हुआ।”
मोहित ने उसका चेहरा देखा।
“तुम्हें चक्कर आ रहा है।”
हरिशंकर जी भी आ गए।
उन्होंने तुरंत कहा,
“इसे डॉक्टर के पास ले जाओ।”
शारदा देवी भी दरवाजे पर खड़ी थीं।
उनकी नजर रेखा के पीले चेहरे पर टिक गई।
उन्हें पहली बार डर लगा।
डॉक्टर ने जांच के बाद कहा,
“बहुत ज्यादा थकान है। इसे पूरा आराम चाहिए। नींद पूरी नहीं होगी तो कमजोरी और बढ़ेगी।”
मोहित ने सिर झुका लिया।
शारदा देवी भी चुप थीं।
डॉक्टर की एक बात उनके मन में बार-बार गूंज रही थी—
“इसे पूरा आराम चाहिए।”
घर लौटते समय शारदा देवी ने रेखा को देखा।
वह कुछ कहना चाहती थीं।
लेकिन शब्द नहीं निकल रहे थे।
उन्हें पता था कि अब सिर्फ बहू की थकान नहीं, उनकी अपनी सोच भी सवालों के घेरे में थी।
रेखा घर पहुंची तो मोहित उसे सीधे कमरे में ले गया।
“तुम अब कोई काम नहीं करोगी।”
रेखा बोली,
“लेकिन घर का काम?”
मोहित ने कहा,
“घर का काम मैं देख लूंगा।”
हरिशंकर जी बोले,
“और मैं भी हूँ।”
शारदा देवी कुछ पल तक चुपचाप खड़ी रहीं।
फिर उन्होंने कहा,
“काम मैं कर लूंगी।”
मोहित ने माँ की तरफ देखा।
“माँ, आपकी तबीयत भी ठीक नहीं रहती।”
शारदा देवी बोलीं,
“तो क्या हुआ? थोड़ा-बहुत काम कर सकती हूँ।”
रेखा ने कहा,
“मम्मी जी, मैं ठीक हो जाऊंगी। आप परेशान मत होइए।”
शारदा देवी ने उसकी तरफ देखा।
“तुम हर बार यही कहती हो।”
रेखा चुप हो गई।
शारदा देवी कमरे से बाहर चली गईं।
रसोई में जाकर उन्होंने खाना बनाना शुरू किया।
सब्जी काटते समय अचानक उनके हाथ रुक गए।
उन्हें रेखा की बात याद आई—
“मैं खुश करने के लिए नहीं करती। बस चाहती हूँ कि घर में शांति रहे।”
शारदा देवी की आंखों में आंसू आ गए।
उन्हें महसूस हुआ कि रेखा ने कभी उनसे बदला नहीं लिया।
उन्होंने जितनी बार उसे ताने दिए, उसने उतनी ही बार उनकी जरूरत पूरी की।
उन्होंने जितनी बार उसे आराम करने से रोका, उसने उतनी ही बार उनके आराम का ध्यान रखा।
और आज वही बहू थककर गिर पड़ी थी।
शारदा देवी ने पहली बार खुद से पूछा,
“क्या मैं सच में उसके साथ वही कर रही थी, जो कभी मेरी सास ने मेरे साथ किया था?”
हरिशंकर जी रसोई में आए।
उन्होंने पत्नी को चुपचाप खड़े देखा।
“क्या हुआ?”
शारदा देवी की आंखों से आंसू निकल आए।
“मैं गलत थी।”
हरिशंकर जी ने कुछ नहीं कहा।
शारदा देवी बोलीं,
“मैंने बहू की थकान को नाटक समझा। मुझे लगता रहा कि वह काम से बचना चाहती है। लेकिन वह तो खुद को खत्म करके भी घर संभालती रही।”
हरिशंकर जी ने कहा,
“गलती मान लेना ही बदलाव की पहली सीढ़ी है।”
शारदा देवी बोलीं,
“मुझे डर लग रहा है कि कहीं बहुत देर तो नहीं हो गई।”
हरिशंकर जी मुस्कुराए।
“जब तक इंसान अपनी गलती समझ जाए, तब तक देर नहीं होती।”
शारदा देवी रेखा के कमरे में गईं।
रेखा बिस्तर पर लेटी थी।
परी उसके पास बैठी अपनी गुड़िया से खेल रही थी।
शारदा देवी धीरे से बोलीं,
“बहू…”
रेखा उठने लगी।
“मम्मी जी, आप बैठिए।”
शारदा देवी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम लेटी रहो।”
रेखा ने हैरानी से उन्हें देखा।
शारदा देवी की आंखें भर आई थीं।
“मुझे तुमसे कुछ कहना है।”
रेखा चुपचाप उन्हें देखने लगी।
शारदा देवी बोलीं,
“मुझे माफ कर दो।”
रेखा तुरंत उठकर बैठ गई।
“मम्मी जी, आप ऐसा क्यों कह रही हैं?”
शारदा देवी बोलीं,
“क्योंकि मैं तुम्हें समझ नहीं पाई।”
रेखा की आंखों में आंसू आ गए।
“मैंने तुम्हारी थकान को आलस समझा। तुम्हारी चुप्पी को चालाकी समझा। तुम्हारे आराम को कामचोरी समझा।”
शारदा देवी ने उसका हाथ अपने दोनों हाथों में ले लिया।
“मुझे लगता था कि बहू को ज्यादा आराम मिलेगा तो वह घर की जिम्मेदारियों से दूर हो जाएगी।”
वह रोते हुए बोलीं,
“लेकिन मैंने यह नहीं देखा कि तुम पहले ही अपनी जरूरतों से ज्यादा इस घर को दे चुकी थी।”
रेखा ने धीरे से कहा,
“मम्मी जी, आप रोइए मत।”
शारदा देवी ने कहा,
“नहीं बहू। आज मुझे रो लेने दो। शायद इतने दिनों से जो गलती मेरे अंदर जमा थी, वह आज बाहर निकल रही है।”
रेखा ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“मैंने आपको कभी पराया नहीं समझा।”
शारदा देवी ने उसकी तरफ देखा।
“लेकिन मैंने तुम्हें पराया समझ लिया था।”
रेखा की आंखों से आंसू बहने लगे।
शारदा देवी ने उसे गले लगा लिया।
“आज से तुम सिर्फ मेरे बेटे की पत्नी नहीं हो। तुम मेरी बेटी हो।”
रेखा भी उनसे लिपट गई।
दरवाजे पर खड़े मोहित और हरिशंकर जी यह दृश्य देख रहे थे।
मोहित मुस्कुराया।
हरिशंकर जी ने कहा,
“अब घर सच में घर बन गया।”
परी दौड़कर आई।
“दादी, मम्मी रो क्यों रही हैं?”
शारदा देवी ने परी को गोद में उठा लिया।
“मम्मी को खुशी के आंसू आए हैं।”
परी बोली,
“तो दादी भी मत रो।”
शारदा देवी हंस पड़ीं।
“अब नहीं रोऊंगी।”
मोहित ने मजाक में कहा,
“माँ, इसका मतलब अब रेखा को सुबह से काम पर नहीं लगाओगी?”
शारदा देवी ने उसे घूरकर देखा।
“तू अपनी पत्नी का वकील बनना बंद कर।”
मोहित हंसते हुए बोला,
“लेकिन अब तो मेरी माँ खुद बहू की वकील बन गई हैं।”
हरिशंकर जी बोले,
“यह बदलाव जरूरी था।”
शारदा देवी ने कहा,
“हाँ। मैंने बहुत देर से समझा कि बहू को बेटी कहना आसान है, लेकिन उसे बेटी जैसा सम्मान देना जरूरी है।”
रेखा ने कहा,
“मम्मी जी, घर में कोई बड़ा-छोटा नहीं होता। सबको एक-दूसरे का ध्यान रखना चाहिए।”
शारदा देवी ने सिर हिलाया।
“तुम सही कहती हो।”
कुछ समय बाद रेखा पूरी तरह ठीक हो गई।
लेकिन अब घर की व्यवस्था बदल चुकी थी।
परी को संभालने में शारदा देवी भी रेखा का साथ देतीं।
मोहित घर के कामों में हाथ बंटाता।
हरिशंकर जी भी जब मौका मिलता, रसोई या बाजार का काम संभाल लेते।
रेखा अब भी घर का काम करती थी, लेकिन उसे यह महसूस नहीं होता था कि सब कुछ सिर्फ उसी की जिम्मेदारी है।
एक दिन शारदा देवी ने रेखा से कहा,
“बहू, तुम थक गई हो तो आराम कर लो। रसोई मैं संभाल लूंगी।”
रेखा ने मुस्कुराकर कहा,
“मम्मी जी, आप भी थक जाएं तो आराम कर लेना।”
दोनों हंस पड़ीं।
हरिशंकर जी ने दूर से कहा,
“अब समझ आया कि घर में प्यार बांटने से काम कम नहीं होता, बल्कि दिल हल्का होता है।”
शारदा देवी ने कहा,
“और मैंने यह भी समझ लिया कि जिस बहू को हम सम्मान देते हैं, वही बहू बुढ़ापे में हमारा सबसे बड़ा सहारा बन सकती है।”
मोहित बोला,
“माँ, यह बात पहले समझ जातीं तो इतना बड़ा ड्रामा ही नहीं होता।”
शारदा देवी ने उसे हल्की चपत लगाते हुए कहा,
“तू चुप कर।”
पूरा घर हंसी से भर गया।
रेखा ने परी को अपनी गोद में लिया।
परी ने दादी की तरफ देखकर कहा,
“दादी, अब मम्मी को डांटना नहीं।”
शारदा देवी ने मुस्कुराकर कहा,
“नहीं बेटा। अब दादी मम्मी को डांटेंगी नहीं, उनका ध्यान रखेंगी।”
रेखा की आंखों में खुशी के आंसू आ गए।
उसे लगा जैसे उसने सिर्फ एक सास का दिल नहीं जीता था, बल्कि एक मां पा ली थी।
और शारदा देवी ने भी उस दिन जाना कि बहू को हर समय कसौटी पर कसने से वह अपनी नहीं बनती।
उसे अपना समझने से वह दिल से अपनी बनती है।
सीख:
हर पीढ़ी को अपनी पिछली पीढ़ी की गलतियों को दोहराना जरूरी नहीं है। अगर हमें कभी किसी ने तकलीफ दी थी, तो उस तकलीफ को आगे बढ़ाने के बजाय वहीं रोक देना चाहिए। बहू भी इंसान है, उसे भी थकान होती है, उसे भी आराम चाहिए और उसे भी सम्मान चाहिए। जिस घर में सास बहू की तकलीफ समझती है और बहू सास की उम्र और जरूरतों को समझती है, वहां रिश्ते सिर्फ निभाए नहीं जाते, बल्कि दिल से जिए जाते हैं।

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