माँ की खट्टर-पट्टर

 

Elderly Indian mother receiving love and respect from her sons and daughters-in-law at home


एक छोटे से शहर में रामदास जी अपनी पत्नी कमला देवी, दोनों बेटों अमित और सुमित तथा उनकी पत्नियों पूजा और नेहा के साथ रहते थे।


कमला देवी की उम्र लगभग साठ वर्ष हो चुकी थी। उम्र बढ़ने के बावजूद वह घर के छोटे-बड़े काम खुद ही कर लिया करती थीं। रामदास जी कई बार उन्हें समझाते थे,


“कमला, अब तुम्हारी उम्र आराम करने की है। घर में दो-दो बहुएँ हैं। उन्हें काम करने दिया करो।”


कमला देवी हंसकर कहतीं,


“मैं घर का काम नहीं करूंगी तो मेरा मन कैसे लगेगा? जब तक हाथ-पैर चल रहे हैं, अपने बच्चों के लिए कुछ न कुछ करती रहूंगी।”


रामदास जी चुप हो जाते।


कमला देवी की एक आदत थी कि वह घर का कोई काम अधूरा छोड़कर नहीं सोती थीं। कभी-कभी कोई काम बच जाता तो वह उसे रात में पूरा कर लेती थीं।


एक दिन रात के करीब साढ़े ग्यारह बजे कमला देवी रसोई में बर्तन धो रही थीं।


रसोई से बर्तनों की खटखट की आवाज पूरे घर में सुनाई दे रही थी।


बड़ी बहू पूजा अपने कमरे में पति अमित से बोली,


“आप अपनी माँ को समझाइए। इतनी रात को बर्तन धोने की क्या जरूरत है? बर्तनों की आवाज से हमारी नींद उचट जाती है।”


अमित चुप रहा।


पूजा फिर बोली,


“और सिर्फ रात की बात नहीं है। आपकी माँ सुबह चार बजे उठकर फिर खट्टर-पट्टर शुरू कर देती हैं। उसके बाद पाँच बजे पूजा और आरती करने लगती हैं। हमें न रात को चैन से सोने देती हैं और न सुबह सोने देती हैं। आप जाकर माँ को मना क्यों नहीं करते?”


अमित ने कुछ देर पत्नी की ओर देखा और फिर बोला,


“ठीक है, मैं माँ से बात करता हूं।”


वह उठकर कमरे से बाहर निकला।


लेकिन तभी उसे छोटे भाई सुमित के कमरे से भी आवाज सुनाई दी।


नेहा भी अपने पति से वही शिकायत कर रही थी।


“आप अपनी माँ से कहिए कि इतनी रात को बर्तन मत धोया करें। हमें नींद नहीं आती। सुबह चार बजे उठकर घर में आवाजें शुरू कर देती हैं और पाँच बजे पूजा करने लगती हैं। हमें भी आराम चाहिए।”


सुमित भी कमरे से बाहर निकल आया।


अमित और सुमित की नजरें आपस में मिलीं।


अमित ने पूछा,


“तुम भी माँ को समझाने जा रहे हो?”


सुमित ने कहा,


“हां भैया।”


दोनों भाई रसोई की तरफ चल पड़े।


रसोई में पहुँचकर उन्होंने देखा कि उनकी माँ थकी हुई अवस्था में बर्तन धो रही थीं।


कमला देवी ने दोनों बेटों को देखा और पूछा,


“तुम दोनों अभी तक सोए नहीं?”


अमित बोला,


“माँ, आप अकेले बर्तन क्यों धो रही हैं?”


कमला देवी मुस्कुराकर बोलीं,


“बस थोड़े ही तो बचे हैं बेटा। तुम दोनों जाकर सो जाओ।”


सुमित ने बिना कुछ कहे अपने हाथ धोए और बर्तन धोने लगा।


अमित भी उसके साथ खड़ा हो गया।


कमला देवी ने कहा,


“अरे बेटा, तुम लोग रहने दो। मैं कर लूंगी।”


अमित ने माँ की तरफ देखकर कहा,


“नहीं माँ, आज हम भी करेंगे।”


कमला देवी ने चिंता से कहा,

“लेकिन सुबह तुम्हें काम पर भी जाना है।”


सुमित मुस्कुराया और बोला,


“माँ, आपने हमारे लिए बचपन में कितने काम किए थे। तब आपने कभी नहीं कहा कि मैं थक गई हूं। आज अगर हम आपके कुछ बर्तन धो देंगे तो क्या हम थक जाएंगे?”


कमला देवी की आंखें भर आईं।


तीनों मिलकर बर्तन धोने लगे।


कुछ देर बाद सारे बर्तन साफ हो गए।


अमित ने माँ के हाथ पोंछे और कहा,


“अब चलिए माँ, आपको सोना चाहिए।”


दोनों बेटे माँ को उनके कमरे तक लेकर गए।


कमला देवी ने दरवाजा खोला तो देखा कि रामदास जी अभी तक जाग रहे थे।


रामदास जी ने अपनी पत्नी को देखा और बोले,


“आ गई कमला? अब आराम करो।”


दोनों बेटों ने माँ को पलंग पर बैठाया।


अमित बोला,


“माँ, कल हमें थोड़ा जल्दी उठा देना।”


कमला देवी ने पूछा,


“क्यों बेटा?”


सुमित तुरंत बोला,


“हमें भी आपके साथ पूजा करनी है।”


अमित ने कहा,


“और पिताजी के साथ योग भी करेंगे।”


रामदास जी अपने दोनों बेटों को देखकर मुस्कुराने लगे।


कमला देवी ने दोनों बेटों के सिर पर हाथ रखते हुए कहा,


“ठीक है बच्चों, मैं तुम्हें जल्दी उठा दूंगी।”


दोनों बेटे अपने कमरे में चले गए।


लेकिन उनकी पत्नियाँ अभी भी यह सब देख रही थीं।


उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि उनके पति अपनी माँ के साथ इतना काम क्यों करने लगे हैं।



अगले दिन कमला देवी ने अपने दोनों बेटों को सच में जल्दी उठा दिया।


अमित और सुमित उठकर बाहर आए तो उन्होंने देखा कि रामदास जी योग करने की तैयारी कर रहे थे और कमला देवी पूजा की तैयारी कर रही थीं।


अमित ने पिता के पास जाकर कहा,


“पिताजी, आज से हम भी आपके साथ योग करेंगे।”


रामदास जी मुस्कुराकर बोले,


“बहुत अच्छी बात है बेटा।”


उधर कमला देवी पूजा की थाली सजा रही थीं।


सुमित उनके पास जाकर बैठ गया और बोला,


“माँ, आज पूजा में हम भी आपके साथ बैठेंगे।”


कमला देवी अपने दोनों बेटों को देखकर बहुत खुश हुईं।


पूजा और नेहा भी जाग चुकी थीं। उन्होंने देखा कि उनके पति इतनी सुबह उठकर माता-पिता के साथ लगे हुए हैं।


नेहा ने धीरे से पूजा से कहा,


“कल तक तो ये दोनों देर तक सोते थे। अब इन्हें क्या हो गया?”


पूजा बोली,


“पता नहीं।”


दोनों बहुएँ वापस अपने कमरे में चली गईं।


कुछ दिन तक घर में यही क्रम चलता रहा।


कमला देवी रात को घर का काम समेटने लगतीं तो उनके दोनों बेटे उनकी सहायता करने लगते।


एक रात फिर रसोई में कुछ बर्तन बाकी रह गए।


कमला देवी बर्तन धोने के लिए रसोई में जाने लगीं।


तभी अमित भी उठकर उनके पीछे चला गया।


पूजा ने उसे जाते हुए देखा तो पूछा,


“आप कहाँ जा रहे हैं?”


अमित ने कहा,


“माँ के साथ बर्तन धोने।”


पूजा बोली,


“माँ जी तो खुद ही बर्तन धो रही हैं, फिर आपको जाने की क्या जरूरत है?”


अमित ने शांत स्वर में कहा,


“क्योंकि वह मेरी माँ हैं।”


पूजा बोली,


“लेकिन यह तो उनका काम है।”


अमित कुछ पल चुप रहा।


फिर बोला,


“नहीं पूजा, यह सिर्फ माँ का काम नहीं है। यह हमारे घर का काम है।”


पूजा ने कहा,


“लेकिन शादी के बाद तो घर के काम बहुएँ ही करती हैं।”


अमित ने मुस्कुराते हुए कहा,


“बहू घर संभालती है, यह बहुत बड़ी बात है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि माँ को घर के हर काम का बोझ अकेले उठाना चाहिए।”


फिर उसने धीरे से कहा,


“हमने शादी इसलिए भी की थी कि घर में माँ का साथ देने वाला कोई और आ जाएगा। लेकिन अगर अभी तुम लोग नहीं कर पा रही हो तो कोई बात नहीं। मैं अपनी माँ की सहायता कर दूंगा।”


पूजा चुप हो गई।


उधर सुमित भी रसोई में पहुंच गया।


नेहा ने उसे देखा तो पूछा,


“आप भी बर्तन धोने जा रहे हैं?”


सुमित ने कहा,


“हाँ।”


नेहा बोली,


“आपको इसमें कोई परेशानी नहीं है?”


सुमित हंसते हुए बोला,


“जिस माँ ने बचपन में मेरे गंदे कपड़े धोए, मुझे खाना खिलाया, मेरी किताबें संभालीं और मेरी बीमारी में रात-रात भर जागी, उसके बर्तन धोने में मुझे कैसी परेशानी?”


कमला देवी दोनों बेटों की बातें सुन रही थीं।


उन्होंने कहा,


“बस करो बेटा। तुम दोनों जाओ, मैं कर लूंगी।”


अमित बोला,


“नहीं माँ, आज हम करेंगे।”


सुमित ने कहा,


“माँ, आपने जिंदगी भर हमारा काम किया है। अब हमें भी आपका काम करने दीजिए।”


दोनों भाई बर्तन धोने लगे।


कमला देवी एक तरफ खड़ी होकर उन्हें देखती रहीं।


उनकी आंखों में आंसू आ गए।


वह मन ही मन सोच रही थीं,


“बच्चे बड़े हो जाते हैं, लेकिन माँ के लिए तो वे हमेशा बच्चे ही रहते हैं।”


अगले दिन से दोनों भाइयों ने एक नया नियम बना लिया।


घर का काम समय पर पूरा होगा।


अगर बर्तन देर तक पड़े रहेंगे तो वे खुद उन्हें धो देंगे।


अगर माँ किसी काम में लगी होंगी तो वे उनकी मदद करेंगे।


और सुबह माता-पिता के साथ उठेंगे।


अब धीरे-धीरे पूजा और नेहा को भी महसूस होने लगा कि उनके पति अपनी माँ की सेवा करने में बिल्कुल संकोच नहीं करते।


एक रात पूजा ने देखा कि उसने रसोई का काम नहीं किया था और अमित चुपचाप बर्तन धोने चला गया।


वह कुछ देर दरवाजे पर खड़ी रही।


अमित ने उसे देखा और बोला,


“तुम सो जाओ, मैं कर देता हूँ।”


पूजा ने कुछ नहीं कहा।


उसी तरह अगले दिन नेहा ने देखा कि सुमित सुबह उठकर कमला देवी के साथ पूजा की तैयारी कर रहा है।


सुमित ने कहा,


“नेहा, तुम भी आ जाओ। माँ के साथ बैठकर पूजा कर लो।”


नेहा ने पहली बार ध्यान से अपनी सास को देखा।


कमला देवी पूजा की थाली सजा रही थीं।


उनके चेहरे पर थकान थी, लेकिन बच्चों के लिए चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती थी।


नेहा को कुछ याद आया।


उसे अपनी माँ याद आ गई।


उसे याद आया कि उसकी अपनी माँ भी घर में सबसे पहले उठती थीं और सबसे बाद में सोती थीं।


उस दिन नेहा ने पहली बार सोचा,


“अगर मेरी माँ इतनी मेहनत करती थीं तो क्या मेरी सास ने भी अपने बच्चों के लिए ऐसा ही नहीं किया होगा?”


उसके मन में कुछ बदलने लगा।


पूजा के मन में भी धीरे-धीरे वही बात घर करने लगी।


अगले दिन उसने बिना किसी के कहे रसोई का काम जल्दी पूरा कर दिया।


कमला देवी ने पूछा,


“बहू, तुमने इतनी जल्दी सारा काम कर लिया?”


पूजा ने मुस्कुराकर कहा,


“हाँ माँ जी, अब आपको रात में बर्तन धोने की जरूरत नहीं पड़ेगी।”


कमला देवी कुछ पल उसे देखती रहीं।


फिर प्यार से बोलीं,


“भगवान तुम्हें खुश रखे बहू।”


उस दिन पहली बार पूजा को लगा कि सास की मुस्कान में कितनी सच्चाई है।


लेकिन अभी घर में पूरा बदलाव आना बाकी था।


अगले कुछ दिनों में दोनों बहुओं ने ऐसा कदम उठाया, जिससे पूरे घर का वातावरण ही बदल गया।



पूजा ने जब से रात का काम समय पर पूरा करना शुरू किया, कमला देवी को काफी आराम मिलने लगा था।


अब उन्हें रात में देर तक रसोई में खड़े होकर बर्तन नहीं धोने पड़ते थे।


नेहा ने भी अपनी जेठानी को देखकर घर के काम में हाथ बँटाना शुरू कर दिया।


एक दिन कमला देवी ने दोनों बहुओं से कहा,


“तुम दोनों इतना काम क्यों कर रही हो? मैं भी तो घर में हूं।”


पूजा ने मुस्कुराकर कहा,


“माँ जी, आप बहुत सालों से घर संभाल रही हैं। अब हमें भी तो आपकी मदद करनी चाहिए।”


नेहा ने कहा,


“और अब आप हमें काम करने से मत रोकिएगा।”


कमला देवी की आंखें नम हो गईं।


उन्होंने दोनों बहुओं के सिर पर हाथ रखते हुए कहा,


“मुझे काम से ज्यादा इस बात की खुशी है कि तुम दोनों मुझे अपना समझने लगी हो।”


उस दिन के बाद घर में एक नया नियम बन गया।


घर का कोई काम सिर्फ एक व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं होगा।


जो खाली होगा, वह काम में हाथ बंटाएगा।


अब दोनों बहुएँ समय पर रसोई का काम पूरा कर देतीं।


कमला देवी को बार-बार रसोई में जाने की जरूरत नहीं पड़ती।


अगर कभी कोई काम बच भी जाता तो दोनों बेटे भी खुशी से मदद करते।


एक दिन पूजा ने अमित से कहा,


“आपने उस रात माँ के साथ बर्तन धोकर मुझे बहुत बड़ी बात समझा दी।”


अमित ने पूछा,


“क्या?”


पूजा बोली,


“मुझे लगता था कि सास का काम करना बहू की जिम्मेदारी है। लेकिन अब समझ आया कि घर में रहने वाले हर व्यक्ति की जिम्मेदारी होती है कि वह दूसरे का बोझ कम करे।”


अमित मुस्कुराया।


“बस यही बात मैं चाहता था कि तुम समझो।”


उधर नेहा ने भी सुमित से कहा,


“मुझे अपनी गलती समझ आ गई है।”


सुमित ने पूछा,


“कौन सी गलती?”


नेहा बोली,


“मैं माँ की उम्र और उनकी मेहनत को देख ही नहीं रही थी। मुझे सिर्फ अपनी नींद और अपना आराम दिखाई देता था।”


सुमित ने कहा,


“गलती समझ आ जाना ही सबसे बड़ी बात है।”


अब सुबह का वातावरण भी बदल गया था।


कमला देवी पूजा करतीं तो दोनों बहुएँ भी उनके साथ बैठतीं।


रामदास जी योग करते तो उनके दोनों बेटे और बहुएँ भी साथ बैठ जाते।


कमला देवी कभी आरती करतीं तो पूजा और नेहा उनके साथ मिलकर आरती गातीं।


जिस घर में कभी बर्तनों की आवाज परेशानी का कारण बनती थी, उसी घर में अब रसोई से हंसी की आवाज आने लगी थी।


एक दिन रामदास जी ने अपनी पत्नी से कहा,


“कमला, देख रही हो? घर कितना बदल गया।”


कमला देवी मुस्कुराईं।


“हां, लेकिन यह बदलाव मैंने नहीं किया।”


रामदास जी ने पूछा,


“फिर किसने किया?”


कमला देवी ने अपने दोनों बेटों की तरफ देखते हुए कहा,


“मेरे बेटों ने।”


अमित ने तुरंत कहा,


“नहीं माँ, हमने सिर्फ अपना फर्ज निभाया है।”


सुमित बोला,


“माँ, आपने हमें बचपन में संभाला था। अब हमारी बारी है।”


कमला देवी ने कहा,


“बेटा, माँ को अपने बच्चों से सेवा की उम्मीद नहीं होती। उसे सिर्फ सम्मान और अपनापन चाहिए।”


यह सुनकर दोनों बहुओं की आंखें झुक गईं।


पूजा आगे बढ़ी और कमला देवी के पास बैठ गई।


“माँ जी, अब से आप हमें बहू मत समझिएगा।”


कमला देवी ने पूछा,


“तो क्या समझूं?”


पूजा ने मुस्कुराते हुए कहा,


“अपनी बेटियां।”


नेहा भी आगे बढ़ी और बोली,


“हां माँ, हमसे गलती हुई है। हमने आपके काम को तो देखा, लेकिन आपकी थकान नहीं देखी। हमने आपकी आवाज सुनी, लेकिन आपके मन की बात नहीं समझी।”


कमला देवी ने दोनों बहुओं को गले लगा लिया।


“मेरी बच्चियों, रिश्ते गलती से नहीं टूटते। रिश्ते तब टूटते हैं जब लोग अपनी गलती स्वीकार करना छोड़ देते हैं।”


रामदास जी ने दोनों बेटों की तरफ देखकर कहा,


“बेटा, याद रखना, शादी के बाद पत्नी तुम्हारी जिंदगी का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि माता-पिता पीछे छूट जाएं।”


अमित ने कहा,


“पिताजी, अब हम यह बात हमेशा याद रखेंगे।”


सुमित बोला,


“माता-पिता ने हमें जिंदगी दी है। उनका सम्मान करना हमारा कर्तव्य है।”


रामदास जी ने कहा,


“और बहुओं का सम्मान करना भी तुम्हारा कर्तव्य है। घर तभी खुश रहता है जब बेटे माता-पिता और पत्नी दोनों के सम्मान को समझें।”


कमला देवी मुस्कुराईं।


उन्होंने कहा,


“बस, अब मेरा घर पूरा हो गया।”


अमित ने पूछा,


“माँ, पहले क्या कमी थी?”


कमला देवी बोलीं,


“पहले इस घर में लोग साथ रहते थे, लेकिन अब दिल से साथ रहने लगे हैं।”


सभी की आंखों में खुशी के आंसू आ गए।


उस दिन के बाद कमला देवी को कभी यह महसूस नहीं हुआ कि वह घर में बोझ हैं।


बहुएँ उन्हें सास नहीं, माँ कहकर बुलाने लगीं।


बेटे उनके साथ बैठकर बातें करते।


रामदास जी भी अपनी पत्नी के काम में मदद करने लगे।


अब घर में काम को लेकर शिकायत नहीं होती थी।


कोई थक जाता तो दूसरा उसका काम संभाल लेता।


और सबसे बड़ा बदलाव यह था कि घर में सम्मान मांगना नहीं पड़ता था, सम्मान अपने आप मिलने लगा था।


कहानी का सार:


माँ का सम्मान इस बात से कम नहीं होता कि बहू उसका सम्मान नहीं करती।


माँ का सम्मान तब कम होता है, जब उसका अपना बेटा उसके सम्मान के लिए खड़ा नहीं होता।


बहू घर में बाद में आती है, लेकिन माता-पिता बेटे के जीवन में सबसे पहले आते हैं।


इसलिए बेटे का कर्तव्य है कि वह अपनी पत्नी का सम्मान करे, लेकिन अपने माता-पिता के सम्मान और सुख का भी ध्यान रखे।


माता-पिता की सेवा केवल उनके काम करने से नहीं होती।

उनके काम में हाथ बंटाना, उनकी थकान समझना और उन्हें यह एहसास दिलाना भी सेवा है कि—


“माँ-पिताजी, आप हमारे लिए बोझ नहीं हैं।

आप हमारे जीवन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी और सबसे बड़ा आशीर्वाद हैं।”


जन्म का नाता सबसे पहले माता-पिता से जुड़ता है।

इसलिए जीवन में चाहे कितने भी रिश्ते बन जाएं, माता-पिता का सम्मान कभी कम नहीं होना चाहिए।



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