हिसाब बराबर

 

Emotional Indian family scene showing a daughter-in-law facing unfair blame while her husband and family discuss family conflict and fairness.


“अगर मेरी बेटी अपने ससुराल में खुश नहीं है, तो भला मैं अपनी बहू को क्यों खुश रहने दूं? मेरी बेटी जिस दर्द से गुजर रही है, उसका हिसाब तो बराबर होना ही चाहिए।”


कमला देवी ने अपनी बहू पूजा को घूरते हुए कहा।


पूजा उस समय हाथ में चाय की ट्रे लिए खड़ी थी। सास की बात सुनकर उसके कदम वहीं रुक गए। उसने कुछ पल कमला देवी की तरफ देखा, लेकिन कुछ बोलने की हिम्मत नहीं हुई।


कमला देवी के सामने उनकी बेटी रचना बैठी थी।


रचना की आंखों में गुस्सा था और चेहरे पर नाराजगी।


उसकी शादी को अभी ज्यादा समय नहीं हुआ था, लेकिन इन कुछ महीनों में वह कई बार अपने मायके आ चुकी थी।


हर बार उसका कहना होता था कि उसके ससुराल वाले उसे समझते नहीं।


कभी पति विवेक को लेकर शिकायत होती।


कभी सास को लेकर।


कभी ननद को लेकर।


और इस बार तो उसने साफ कह दिया था कि वह अपने पति के साथ अलग घर में रहना चाहती है।


कमला देवी अपनी बेटी की हर बात को सच मान लेती थीं।


उन्हें लगता था कि उनकी बेटी के साथ बहुत बड़ा अन्याय हो रहा है।


इसलिए अब उनके मन में अपनी बहू पूजा को लेकर भी नाराजगी पैदा हो गई थी।


उन्हें लगता था कि जब उनकी बेटी को वहां चैन नहीं मिल रहा तो सामने वाले परिवार की बेटी को भी यहां चैन से नहीं रहना चाहिए।


कमला देवी की बात सुनकर पूजा ने धीरे से चाय की ट्रे मेज पर रख दी।


“मम्मी जी, चाय रख दी है।”


इतना कहकर वह रसोई की तरफ जाने लगी।


कमला देवी ने पीछे से आवाज लगाई,


“और सुन, ज्यादा बनावटी बनने की जरूरत नहीं है। हमें सब पता है कि कौन कितना खुश है और कौन कितने मजे में रह रहा है।”


पूजा के कदम फिर रुक गए।


उसने पलटकर देखा।


“मम्मी जी, मैंने कुछ गलत किया है क्या?”


कमला देवी बोलीं,


“तुमने क्या गलत किया है, यह मैं नहीं कह रही। लेकिन जब मेरी बेटी वहां दुखी है तो तुम्हें यहां इतना खुश देखकर मुझे अच्छा नहीं लगता।”


पूजा की आंखें भर आईं।


“लेकिन मम्मी जी, दीदी की परेशानी में मेरा क्या दोष है?”


“बहुत बोलने लगी हो तुम।”


तभी रचना भी बोल पड़ी,


“मम्मी, रहने दो। भाभी को क्या पता कि ससुराल में रहना क्या होता है? इन्हें तो यहां सब कुछ आसानी से मिल जाता है।”


पूजा ने कोई जवाब नहीं दिया।


वह चुपचाप रसोई में चली गई।


उसी समय उसका पति निखिल घर के अंदर आया।


उसने पूजा का उतरा हुआ चेहरा देखा तो पूछा,


“क्या हुआ?”


पूजा ने सिर हिलाकर कहा,


“कुछ नहीं।”


“कुछ तो हुआ है,” निखिल ने उसकी तरफ देखते हुए पूछा।


“मम्मी जी नाराज हैं,” पूजा ने धीमी आवाज में जवाब दिया।


“क्यों?” निखिल ने हैरानी से पूछा।


पूजा की आंखों में आंसू आ गए।


“कह रही थीं कि दीदी वहां खुश नहीं हैं तो मैं भी यहां खुश क्यों रहूं।”


निखिल कुछ पल चुप रहा।


फिर बोला,


“तुम चिंता मत करो। मैं बात करता हूं।”


वह बाहर आया।


कमला देवी अभी भी रचना के पास बैठी थीं।


निखिल ने पूछा,


“मम्मी, पूजा से क्यों नाराज हो रही हैं?”


कमला देवी बोलीं,


“तुम्हें अपनी बहन की चिंता नहीं है क्या?”


निखिल ने शांत स्वर में जवाब दिया,

“है।”


कमला देवी ने तुरंत पूछा,

“तो फिर?”


निखिल ने अपनी मां की तरफ देखते हुए कहा,

“तो फिर पूजा को क्यों परेशान कर रही हैं? दीदी की परेशानी में पूजा की क्या गलती है?”


कमला देवी ने नाराज होते हुए कहा,

“क्योंकि तुम्हारी बहन वहां परेशान है। अगर उसे उसके ससुराल में सुख नहीं मिल रहा, तो क्या मैं यहां बैठकर उसकी भाभी को खुश देखती रहूं?”


निखिल ने गहरी सांस ली।


निखिल ने हैरानी से कहा,

“मम्मी, यह कैसी बात कर रही हैं आप? दीदी के ससुराल की परेशानी का बदला आप पूजा से क्यों ले रही हैं?”


कमला देवी ने तुनककर जवाब दिया,

“तुम अपनी पत्नी के लिए बहुत बोलने लगे हो। तुम्हें अपनी बहन का दर्द दिखाई ही नहीं देता।”


निखिल ने गहरी सांस लेते हुए कहा,

“मुझे दीदी का दर्द भी दिखाई देता है और पूजा की बेबसी भी। लेकिन किसी एक के दुख का इलाज दूसरे निर्दोष इंसान को दुखी करना नहीं है।”


सुरेश प्रसाद भी वहां बैठे थे।


उन्होंने कहा,


“बेटा, बात इतनी सीधी नहीं है। लड़की हमारी है। अगर उसे ससुराल में तकलीफ है तो हमें उसके बारे में सोचना पड़ेगा।”


“बिल्कुल पापा। लेकिन पहले यह तो पता चले कि तकलीफ क्या है।”


रचना तुरंत बोली,


“मैं बताती हूं।”


निखिल उसकी तरफ मुड़ा।


“बताइए दीदी।”


“मुझे अपने पति के साथ अलग रहना है,” रचना ने गुस्से में कहा।


निखिल ने हैरानी से अपनी बहन की तरफ देखते हुए पूछा, “क्यों?”


रचना ने मुंह बनाते हुए कहा, “क्योंकि मैं संयुक्त परिवार में नहीं रहना चाहती।”


निखिल ने फिर पूछा, “लेकिन जीजाजी ने ऐसा क्या किया है कि तुम उनसे अलग रहना चाहती हो?”


रचना ने तुरंत जवाब दिया, “वह अपनी मां और भाई को छोड़ना नहीं चाहते।”


निखिल ने शांत स्वर में पूछा, “क्या उन्होंने तुम्हारे साथ कभी मारपीट की है?”


“नहीं,” रचना ने धीरे से कहा।


“कभी तुम्हारा अपमान किया है?” निखिल ने अगला सवाल किया।


रचना ने सिर हिलाते हुए कहा, “नहीं।”


निखिल ने गंभीर होकर पूछा, “क्या तुम्हें खाने-पीने या जरूरत की किसी दूसरी चीज की कमी रखी जाती है?”


रचना कुछ पल चुप रही।


फिर बोली,


“बात सिर्फ इतनी नहीं है।”


निखिल समझ गया कि मामला कुछ और है।


“तो फिर असली बात क्या है?”


रचना चुप हो गई।


कमला देवी ने तुरंत कहा,


“मेरी बेटी की परेशानी समझने की कोशिश मत कर। तू तो हमेशा अपनी पत्नी का पक्ष लेता है।”


निखिल बोला,


“मम्मी, मैं किसी का पक्ष नहीं ले रहा। बस सच जानना चाहता हूं।”


कमला देवी गुस्से में बोलीं,


“तो जाकर उसके पति से पूछ ले।”


निखिल ने कहा,


“ठीक है। मैं अभी पूछता हूं।”


वह कमरे में गया और फोन उठाया।


विवेक को फोन लगाया।


“हेलो जीजाजी, मैं निखिल बोल रहा हूं।”


विवेक ने कहा, “हां निखिल, बोलो।”


निखिल ने कहा, “रचना फिर यहां आ गई है।”


दूसरी तरफ कुछ पल चुप्पी रही।


विवेक ने कहा, “मुझे पता है। इस बार भी वह मुझसे नाराज होकर गई है।”


निखिल ने पूछा, “लेकिन इस बार हुआ क्या है?”


विवेक ने थके हुए स्वर में कहा,


“फिर वही बात। उसे अलग रहना है।”


निखिल ने पूछा,


“लेकिन क्यों?”


विवेक बोला,


“भाई, मैं क्या बताऊं? मैं उसे समझाते-समझाते थक गया हूं।”


निखिल ने गंभीरता से पूछा,

“आप खुलकर बताइए जीजाजी, आखिर बात क्या है? रचना(दीदी) इतनी नाराज होकर बार-बार मायके क्यों चली आती है?”


विवेक ने कहा,


“रचना को लगता है कि मेरी कमाई पर सिर्फ उसका अधिकार होना चाहिए। मैं अपनी मां के लिए पैसे खर्च करूं तो उसे परेशानी होती है। छोटे भाई की मदद करूं तो उसे लगता है कि मैं उसका हक मार रहा हूं।”


निखिल चुप हो गया।


विवेक आगे बोला,


“पिछली बार मैंने अपनी छोटी बहन के लिए एक सूट खरीदा था। बस इसी बात पर इतना झगड़ा हुआ कि पूछो मत।”


निखिल ने थोड़ी देर सोचने के बाद पूछा,


“लेकिन जीजाजी, अपनी बहन के लिए भाई सूट नहीं खरीद सकता?”


विवेक ने शांत स्वर में जवाब दिया,

“मैंने भी रचना से यही कहा था। मैंने उससे कहा था कि जानवी मेरी छोटी बहन है। अगर मैंने उसके लिए एक सूट खरीद दिया तो इसमें गलत क्या है? लेकिन वह मेरी बात समझने को तैयार ही नहीं थी।”


निखिल ने फिर पूछा,

“और इस बार क्या हुआ?”


विवेक ने लंबी सांस लेते हुए कहा,

“इस बार तो बात और भी छोटी थी। मेरी छुट्टी थी और जानवी अपने दोस्तों के साथ फिल्म देखने जाने वाली थी। मैंने सोचा कि मैं भी उसके साथ चला जाता हूं। मैंने रचना से भी कहा कि हम तीनों साथ चलेंगे। लेकिन रचना को यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आई।”


निखिल को सारी बात समझ में आने लगी।


निखिल ने पूछा,

“फिर क्या हुआ?”


विवेक ने जवाब दिया,

“उसने कहा कि जानवी हमेशा हमारे बीच आती है। मैंने भी रचना से यही कहा था कि जानवी मेरी बहन है। कभी-कभी उसके साथ बाहर चला जाऊं तो इसमें क्या गलत है? वह अपने दोस्तों के साथ फिल्म देखने जा रही थी और मेरी भी छुट्टी थी, इसलिए मैंने सोचा कि उसके साथ चला जाता हूं।”


निखिल ने पूछा,

“फिर झगड़ा हुआ?”


विवेक ने दुखी होकर कहा,

“हां, बहुत झगड़ा हुआ। रचना ने कहा कि उसे जानवी का हमारे बीच आना बिल्कुल पसंद नहीं है। मैंने उसे समझाया कि जानवी हमारी जिंदगी में दखल नहीं दे रही, वह सिर्फ अपनी बहन और मेरे साथ फिल्म देखने जा रही है।”


निखिल ने फोन रख दिया।


अब उसके सामने सच्चाई साफ थी।


लेकिन बाहर उसके माता-पिता अपनी बेटी की हर बात पर आंख बंद करके विश्वास कर रहे थे।


वह कमरे से बाहर आया।


कमला देवी ने तुरंत पूछा,


“क्या कहा विवेक ने?”


निखिल कुछ पल चुप रहा।


फिर बोला,


“मम्मी, बात वैसी नहीं है जैसी आप सोच रही हैं।”


कमला देवी ने भौंहें सिकोड़ लीं।


“क्या मतलब?”


“गलती इस बार भी दीदी की है।”


रचना तुरंत खड़ी हो गई।


“भैया!”


निखिल ने उसकी तरफ देखा।


“दीदी, मुझे बुरा लग रहा है कि आपको यह सुनना पड़ रहा है। लेकिन अगर आप गलत हैं तो मैं आपको गलत ही कहूंगा।”


कमला देवी ने गुस्से से कहा,


“तुम्हें अपनी बहन गलत दिखाई देती है और बहू सही?”


निखिल ने शांत स्वर में कहा,


“मम्मी, मुझे रिश्ता बचाना है। किसी एक को सही और दूसरे को गलत साबित करना नहीं।”


कमला देवी ने मुंह फेर लिया।


लेकिन उन्हें अंदाजा नहीं था कि कुछ ही देर बाद उनके अपने घर में ऐसी बात होने वाली थी, जिससे उन्हें अपनी सोच पर दोबारा विचार करना पड़ेगा।



निखिल अपनी बहन रचना की समस्या को समझ चुका था।


उसे पता था कि रचना का पति विवेक बुरा इंसान नहीं था।


वह अपनी पत्नी का सम्मान करता था।


उसकी जरूरतें पूरी करता था।


लेकिन रचना हर छोटी बात को अपने अधिकार से जोड़ने लगी थी।


वह चाहती थी कि विवेक अपनी मां, भाई या बहन पर पैसे खर्च करने से पहले उससे अनुमति ले।


और जब विवेक ऐसा नहीं करता तो दोनों के बीच झगड़ा हो जाता।


निखिल ने कई बार रचना को समझाया था।


लेकिन हर बार कमला देवी बीच में आ जातीं।


“मेरी बेटी है। अगर उसे दुख है तो जरूर कोई वजह होगी।”


यही सोचकर वह रचना को वापस भेज देतीं और निखिल तथा पूजा जाकर उसके ससुराल वालों से बात करके मामला संभालते।


लेकिन कुछ दिनों बाद फिर वही कहानी शुरू हो जाती।


इस बार निखिल ने तय कर लिया था कि वह अपनी बहन को बिना समझाए वापस नहीं भेजेगा।


कमला देवी अभी भी नाराज बैठी थीं।


उन्होंने कहा,


“अगर विवेक इतना ही सही है तो उससे कहो कि मेरी बेटी को अलग करके रखे।”


निखिल ने कहा,


“वह तैयार है।”


कमला देवी चौंक गईं।


“सच?”


“हां।”


रचना के चेहरे पर खुशी आ गई।


“देखा मम्मी! मैंने कहा था न कि भैया मेरी बात समझेंगे।”


लेकिन निखिल ने तुरंत कहा,


“लेकिन उनकी भी एक शर्त है।”


कमला देवी का चेहरा बदल गया।


“क्या शर्त?”


निखिल ने कहा, “मम्मी, विवेक जी का कहना है कि अगर रचना दीदी अपने पति के साथ अलग घर में रहेंगी, तो फिर मुझे भी पूजा को लेकर आप दोनों से अलग रहना होगा।”


कुछ पल के लिए पूरा कमरा शांत हो गया।


कमला देवी ने जैसे ठीक से सुना ही न हो।


“क्या?”


निखिल ने कहा, “विवेक ने कहा है कि अगर रचना को अपने ससुराल में अलग रहना है, तो फिर मैं भी पूजा को लेकर मम्मी-पापा से अलग हो जाऊंगा। उसका कहना है कि जब हम अपनी बेटी को अलग घर में बसाना चाहते हैं, तो फिर अपनी बहू और बेटे को भी उसी तरह अलग रहने देना होगा।”


कमला देवी तुरंत भड़क गईं।


“ये कैसी बात है?” कमला देवी गुस्से में बोलीं। “रचना वहां अपने ससुराल में खुश नहीं है, इसलिए वह अलग रहना चाहती है। लेकिन पूजा ने तो कभी हमसे अलग होने की बात नहीं कही। फिर उसकी और निखिल की जिंदगी क्यों खराब की जाए?”


निखिल ने अपनी मां की तरफ देखते हुए कहा,


“मम्मी, आपने ही तो कहा था कि अगर रचना अपने ससुराल में खुश नहीं है, तो फिर पूजा को भी इस घर में खुश रहने का हक क्यों मिले। लेकिन मम्मी, रचना की परेशानी का बदला पूजा से लेना कहां का इंसाफ है? पूजा ने तो कुछ किया ही नहीं है।”


कमला देवी चुप हो गईं।


निखिल ने आगे कहा,


“विवेक ने वही बात आपके सामने रख दी है।”


सुरेश प्रसाद भी सोच में पड़ गए।


कमला देवी बोलीं,


“लेकिन पूजा ने क्या किया है?”


निखिल ने कहा,


“यही तो मैं इतने समय से कह रहा हूं।”


कमला देवी के पास कोई जवाब नहीं था।


तभी अंदर से पूजा बाहर आई।


उसने निखिल की पूरी बात सुन ली थी।


वह धीरे से बोली,


“निखिल जी।”


निखिल ने उसकी तरफ देखा और पूछा,

“हां?”


पूजा ने थोड़ी देर चुप रहने के बाद कहा,

“अगर रचना दीदी के अलग होने की वजह से हमारा अलग होना जरूरी है, तो आप मुझे बता दीजिए कि हमें कब अलग होना है।”


पूजा की बात सुनकर निखिल हैरान रह गया।


“तुम क्या कह रही हो?” निखिल ने हैरानी से पूछा।


पूजा ने अपनी आंखों में आए आंसुओं को रोकते हुए कहा,

“मैं अपना सामान पैक कर लूंगी। अगर मेरे अलग होने से दीदी का घर बच सकता है, तो मैं इसके लिए भी तैयार हूं।”


कमला देवी भी उसकी तरफ देखने लगीं।


पूजा ने कहा,


“अगर मेरी वजह से दीदी का घर बच सकता है तो मैं अलग रहने के लिए तैयार हूं।”


निखिल ने कहा,


“पूजा, तुम मेरी बात समझ नहीं रही हो।”


“मैं सब समझ रही हूं।”


उसकी आवाज में दर्द था।


“आज तक मैंने इस घर को अपना घर माना। लेकिन अगर अब मेरे यहां रहने से किसी को समस्या है तो मैं अलग हो जाऊंगी।”


कमला देवी अचानक बोलीं,


“अरे नहीं!”


निखिल और पूजा दोनों उनकी तरफ देखने लगे।


कमला देवी ने कहा,


“ऐसे कैसे अलग हो जाओगे?”


निखिल ने हैरानी से पूछा,


“मम्मी, अभी तो आप कह रही थीं कि पूजा को खुश रहने का कोई हक नहीं है।”


कमला देवी चुप हो गईं।


सुरेश प्रसाद ने धीमे स्वर में कहा,


“कमला, बात तो निखिल सही कह रहा है।”


कमला देवी बोलीं,


“लेकिन अपना घर थोड़ी तोड़ेंगे।”


निखिल ने कहा,


“फिर किसी दूसरे का घर क्यों तोड़ना चाहती थीं?”


यह सुनकर कमला देवी की नजरें झुक गईं।


तभी रचना बोल पड़ी,


“मम्मी, आप क्या कर रही हैं? आपने तो कहा था कि आप मेरा साथ देंगी।”


कमला देवी ने पहली बार बेटी की तरफ कठोर नजरों से देखा।


“मैंने तेरा साथ दिया है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तू अपनी जिद में सबका घर खराब कर दे।”


रचना हैरान रह गई।


“मम्मी?”


सुरेश प्रसाद ने भी कहा,


“रचना, निखिल सही कह रहा है।”


रचना ने हैरानी से अपने पिता की तरफ देखते हुए कहा, “पापा, आप भी?”


सुरेश प्रसाद ने गंभीर स्वर में जवाब दिया, “हां बेटी, मैं भी।”


रचना की आंखों में आंसू आ गए। उसने दुखी होकर कहा, “लेकिन पापा, मैं वहां दुखी हूं।”


सुरेश प्रसाद ने प्यार से अपनी बेटी को समझाते हुए कहा, “अगर सच में तुम्हें कोई बड़ी परेशानी है तो हम हमेशा तुम्हारे साथ हैं। लेकिन हर छोटी-छोटी बात पर पति से झगड़कर मायके आ जाना भी सही नहीं है। इससे समस्या खत्म नहीं होगी, बल्कि तुम्हारा अपना घर और ज्यादा बिगड़ जाएगा।”


रचना की आंखों में आंसू आ गए।


“तो आप सब अब मुझे ही गलत कह रहे हैं?”


कमला देवी ने कहा,


“बेटी, गलत बात में साथ देना प्यार नहीं होता।”


रचना चुप हो गई।


पूजा वहीं खड़ी थी।


कमला देवी ने उसकी तरफ देखा।


उनके चेहरे पर शर्मिंदगी थी।


“बहू।”


पूजा ने सिर उठाया।


“जी।”


“मुझे माफ कर देना।”


पूजा कुछ समझ नहीं पाई।


कमला देवी बोलीं,


“मैंने तुझे बेवजह बहुत कुछ कहा।”


पूजा की आंखों से आंसू निकल पड़े।


“मम्मी जी…”


“नहीं बहू। आज मुझे बोलने दे।”


कमला देवी ने कहा,


“मैं अपनी बेटी के दुख में इतनी अंधी हो गई थी कि मुझे किसी और का दुख दिखाई ही नहीं दिया।”


रचना चुपचाप सब सुन रही थी।


कमला देवी ने बेटी की तरफ देखा।


“और तू भी सुन। अगर तुझे अपने पति से कोई बड़ी शिकायत है तो हम तेरे साथ हैं। लेकिन तू अपनी भाभी को सिर्फ इसलिए दुखी नहीं कर सकती क्योंकि तुझे अपने ससुराल में परेशानी है।”


रचना ने धीरे से पूछा,


“तो मैं क्या करूं?”


निखिल ने रचना को समझाते हुए कहा, “तुम पहले अपने पति विवेक से शांति से बात करो।”


रचना ने चिंता भरे स्वर में पूछा, “अगर वह मेरी बात नहीं माने तो?”


निखिल ने समझाते हुए कहा, “तो तुम दोनों बैठकर आराम से बात करो और कोई ऐसा रास्ता निकालो, जिससे तुम्हारा घर भी बना रहे और किसी के साथ अन्याय भी न हो।”


सुरेश प्रसाद बोले,


“शादी कोई मुकाबला नहीं है बेटी। इसमें जीतने वाला कोई एक नहीं होता। अगर दोनों हार गए तो घर हार जाता है।”


रचना पहली बार चुपचाप सुन रही थी।


लेकिन उसके मन में अभी भी एक सवाल था।


क्या विवेक सच में उसे समझेगा?


क्या वह उसके साथ अपनी जिंदगी नए तरीके से शुरू कर सकता है?


या फिर कुछ दिनों बाद फिर वही झगड़ा शुरू हो जाएगा?


उसका फैसला अभी बाकी था।


और इस बार कमला देवी ने साफ कह दिया था—


“बेटी, घर बसाना है तो समझदारी से बसाना। हर बार मायके आकर अपनी बात मनवाने की आदत छोड़नी होगी।”


रचना ने कोई जवाब नहीं दिया।


लेकिन उसके मन में पहली बार अपनी गलतियों को लेकर सवाल जरूर उठने लगे थे।



रचना अपने कमरे में चली गई।


वह काफी देर तक अकेली बैठी रही।


उसे बार-बार अपने पति विवेक की बातें याद आ रही थीं।


“मैं तुम्हें किसी चीज की कमी नहीं होने दूंगा, लेकिन मेरी मां और भाई भी मेरी जिम्मेदारी हैं।”


“कभी-कभी जानवी के साथ बाहर चला जाता हूं तो इसका मतलब यह नहीं कि तुम मेरे लिए महत्वपूर्ण नहीं हो।”


“मेरी बहन तुम्हारी दुश्मन नहीं है।”


उसे याद आया कि विवेक ने कभी उसके साथ गलत व्यवहार नहीं किया था।


वह गुस्से में जरूर होता था, लेकिन उसने कभी हाथ नहीं उठाया।


उसने कभी उसे घर से निकालने की धमकी नहीं दी।


हर बार जब रचना मायके आती, विवेक खुद उसे वापस लेने आता था।


लेकिन रचना अपनी हर बात मनवाने की जिद में यह सब भूल जाती थी।


उसे लगता था कि पति की कमाई पर पहला और आखिरी अधिकार सिर्फ उसका है।


उसे यह भी लगता था कि शादी के बाद पति का अपने परिवार के प्रति कोई अलग दायित्व नहीं होना चाहिए।


लेकिन आज जब वही बात उसके अपने भाई के सामने आई थी, तब उसे एहसास हुआ कि अगर पूजा के साथ भी वही व्यवहार किया जाए तो कैसा लगेगा।


कुछ देर बाद रचना कमरे से बाहर आई।


उसने मां से कहा,


“मम्मी।”


“हां बेटी?”


“अगर मैं विवेक से बात करूं तो क्या आप मेरा साथ देंगी?”


कमला देवी ने कहा,


“सही बात होगी तो जरूर।”


“और अगर गलती मेरी होगी?”


कमला देवी ने बेटी का हाथ पकड़ लिया।


“तो मैं तुम्हें समझाऊंगी।”


रचना की आंखें भर आईं।


“मम्मी, आपने पहले ऐसा क्यों नहीं किया?”


कमला देवी के पास कोई जवाब नहीं था।


उन्होंने बस बेटी को गले लगा लिया।


रचना ने विवेक को फोन किया।


“हेलो।”


दूसरी तरफ विवेक की आवाज आई,


“हां रचना।”


रचना ने थोड़ी झिझक के साथ कहा,

“मुझे आपसे कुछ बात करनी है।”


विवेक ने पूछा,

“हां, बताओ। क्या हुआ?”


रचना ने धीमे स्वर में कहा,

“मैं घर वापस आना चाहती हूं।”


रचना की बात सुनकर विवेक कुछ पल के लिए चुप हो गया। फिर उसने नरम आवाज में कहा,

“तुम सच में वापस आना चाहती हो?”


रचना ने भावुक होकर जवाब दिया,

“हां। लेकिन इस बार मैं लड़ाई करने के लिए नहीं, आपसे बात करने के लिए वापस आना चाहती हूं।”


रचना की आंखों से आंसू निकल आए।


विवेक ने राहत की सांस लेते हुए कहा,

“ठीक है रचना। तुम वापस आ जाओ। मैं तुम्हें लेने आऊंगा।”


रचना ने धीरे से कहा,

“एक बात और कहनी है।”


विवेक ने पूछा,

“क्या?”


रचना बोली,

“इस बार मैं सिर्फ अपनी बात नहीं रखूंगी। आपकी बात भी समझने की कोशिश करूंगी।”


विवेक ने राहत की सांस ली।


“मुझे तुमसे बस यही उम्मीद थी।”


रचना ने फोन रख दिया।


वह अपने माता-पिता के पास आई।


“मैं जा रही हूं।”


कमला देवी ने उसके सिर पर हाथ रखा।


“खुश रहना बेटी।”


सुरेश प्रसाद बोले,


“और याद रखना, पति से अलग होना बहुत आसान फैसला नहीं होता। अगर समस्या बात करके हल हो सकती है तो पहले बात करना।”


रचना ने सिर हिलाया।


फिर वह पूजा के पास गई।


कुछ पल दोनों एक-दूसरे को देखती रहीं।


रचना ने कहा,


“भाभी, मुझे माफ कर देना।”


पूजा ने मुस्कुराते हुए कहा,


“दीदी, आप बड़ी हैं।”


“नहीं। बड़ी होने से कोई हमेशा सही नहीं होता।”


पूजा की आंखें नम हो गईं।


रचना ने उसका हाथ पकड़ लिया।


“मैंने तुम्हें बहुत कुछ कहा। तुम्हारी कोई गलती नहीं थी।”


पूजा ने कहा,


“अब सब भूल जाइए।”


रचना की आंखें नम हो गईं। उसने पूजा को देखते हुए कहा, “तुम सच में बहुत अच्छी हो।”


पूजा ने प्यार से मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “और आप भी दीदी। बस अब हम दोनों मिलकर अपने-अपने घरों को खुश रखने की कोशिश करेंगे।”


यह कहते हुए दोनों एक-दूसरे से गले मिल गईं।


रचना के जाने के बाद कमला देवी काफी देर तक चुप बैठी रहीं।


निखिल उनके पास आया।


“मम्मी।”


कमला देवी ने कहा,


“आज मुझे समझ आया कि मां होना सिर्फ अपनी बेटी का साथ देना नहीं है।”


निखिल चुप रहा।


“मां होना यह भी है कि बेटी की गलती पर उसे रोकना।”


उन्होंने आगे कहा,


“अगर उस दिन तुम मुझे यह नहीं समझाते तो शायद मैं अपनी बेटी की जिद के कारण तुम्हारा और पूजा का घर भी तोड़ देती।”


निखिल ने मां के कंधे पर हाथ रखा।


“आपने देर से सही, लेकिन बात समझ ली।”


कुछ दिनों बाद रचना वापस अपने ससुराल चली गई।


शुरुआत आसान नहीं थी।


कई बार पुरानी बातें फिर सामने आईं।


लेकिन इस बार रचना चुपचाप लड़ने की बजाय विवेक से बात करती।


अगर उसे किसी बात से परेशानी होती तो वह कहती,


“मुझे यह बात अच्छी नहीं लगी।”


विवेक भी उसकी बात सुनता।


धीरे-धीरे दोनों के बीच समझ बढ़ने लगी।


रचना ने यह भी समझा कि पति का अपने माता-पिता और भाई-बहन के प्रति प्रेम उसके प्रति प्रेम को कम नहीं करता।


और विवेक ने भी समझा कि पत्नी को अपनेपन और महत्व का एहसास कराना जरूरी है।


कुछ समय बाद दोनों ने पास ही एक छोटा सा घर किराए पर लेने का फैसला किया।


लेकिन यह फैसला किसी लड़ाई का परिणाम नहीं था।


उन्होंने अपने माता-पिता की जिम्मेदारियां बांट लीं।


विवेक ने कहा,


“अलग घर में रहेंगे, लेकिन मां-बाप से रिश्ता अलग नहीं होगा।”


रचना ने मुस्कुराकर कहा,


“और मैं भी आपके परिवार से रिश्ता नहीं तोड़ूंगी।”


उधर पूजा और कमला देवी का रिश्ता भी पहले से ज्यादा मजबूत हो चुका था।


अब कमला देवी अक्सर पूजा से अपनी बातें साझा करतीं।


एक दिन उन्होंने पूजा से कहा,


“बहू, एक बात हमेशा याद रखना।”


“जी मम्मी जी।”


“किसी रिश्ते में अगर दूसरा इंसान गलत करे तो उसका जवाब गलत बनकर मत देना।”


पूजा मुस्कुराई।


कमला देवी बोलीं,


“मैंने खुद यह गलती की है। मुझे लगा था कि बेटी के दुख का बदला बहू से लेकर मैं अपनी बेटी का दर्द कम कर दूंगी।”


उन्होंने गहरी सांस ली।


“लेकिन किसी एक के दुख से दूसरे को दुखी करने पर पहला दुख कम नहीं होता। बस दुख बढ़ जाता है।”


पूजा ने कहा,


“मम्मी जी, हर गलती इंसान को कुछ न कुछ सिखाती है।”


कमला देवी मुस्कुराईं।


“हां। और मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी सीख यही है कि रिश्ते कोई हिसाब की किताब नहीं हैं।”


सुरेश प्रसाद ने पास बैठे हुए कहा,


“बिल्कुल। अगर बेटी दुखी है तो बहू को दुखी करके उसका घर नहीं बसाया जा सकता।”


निखिल भी मुस्कुराते हुए बोला,


“और अगर बहू खुश है तो इसका मतलब यह नहीं कि बेटी का दुख झूठा है।”


कमला देवी ने कहा,


“सही कहा।”


कुछ पल बाद वह बोलीं,


“अब हमारे घर में किसी के दुख का बदला किसी दूसरे के सुख से नहीं लिया जाएगा।”


पूजा ने उनकी तरफ देखा।


घर में पहली बार सबके चेहरे पर सुकून था।


रिश्तों में आई दरार पूरी तरह खत्म तो नहीं हुई थी, लेकिन अब हर कोई उसे भरने की कोशिश कर रहा था।


और यही किसी भी परिवार की असली जीत थी।


क्योंकि परिवार में किसी एक की खुशी दूसरे की सजा नहीं होनी चाहिए।

गलती करने वाले को समझाना जरूरी है, लेकिन किसी निर्दोष को उसकी गलती की सजा देना सबसे बड़ा अन्याय है।

रिश्ते हिसाब बराबर करने से नहीं, एक-दूसरे को समझने से मजबूत होते हैं।



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