अपनों के लिए जगह

 

Indian family embracing a young boy after giving him a place to study and build a better future


“सुनते हो जी… आज गाँव से चाचा जी का फोन आया था।”


सुबह का समय था। रसोई से चाय की खुशबू पूरे घर में फैल रही थी। बैठक में अखबार पढ़ते हुए अरुण ने पत्नी की आवाज सुनी तो अखबार मोड़कर उसकी तरफ देखा।


“अच्छा! क्या कह रहे थे?”


सीमा ने चाय का कप मेज पर रखते हुए कहा,

“कह रहे थे कि उनका बेटा सोनू इस बार आठवीं कक्षा में बहुत अच्छे नंबरों से पास हुआ है। गाँव में आगे की पढ़ाई के लिए ठीक स्कूल नहीं है। इसलिए चाहते हैं कि सोनू को कुछ साल हमारे पास रखकर शहर में पढ़ा दें।”


अरुण के चेहरे पर तुरंत खुशी आ गई।


“अरे वाह! सोनू इतना बड़ा हो गया? मुझे तो याद है, जब वह पैदा हुआ था तब मैं गाँव गया था। कितना छोटा सा था।”


वह कुछ पल चुप रहा, फिर मुस्कुराते हुए बोला,


“और चाचा जी ने मेरे लिए भी तो बहुत कुछ किया था। पिताजी के गुजर जाने के बाद उन्होंने ही मेरी पढ़ाई का खर्च उठाया था। अगर उन्होंने मदद न की होती तो शायद मैं आज इस नौकरी पर नहीं होता।”


पत्नी सीमा ने चाय का कप उसके सामने रखा और हल्की मुस्कान के साथ बोली,


“हाँ, हाँ… मुझे सब पता है।”


अरुण ने उत्साहित होकर कहा,

“तो फिर इसमें सोचने की क्या बात है? सोनू को बुला लो। अपना ही बच्चा है।”


सीमा ने कुर्सी खींचकर उसके पास बैठते हुए कहा,


“लेकिन घर में जगह कहाँ है?”


अरुण ने सहजता से कहा,


“जगह? अरे, हमारे घर में तीन कमरे हैं। एक कमरे में हम, दूसरे में बच्चे और तीसरे में सोनू रह लेगा।”


सीमा ने कुछ देर अरुण की ओर देखा। फिर थोड़े आश्चर्य से पूछा,


“वो तीसरा कमरा?”


अरुण ने सहजता से जवाब दिया,

“हाँ।”


सीमा ने फिर पूछा,

“जिसे आपने अपना ऑफिस बनाया है?”


अरुण थोड़ा चुप हुआ।


“हाँ… लेकिन उसमें सामान थोड़ा इधर-उधर करके जगह बन जाएगी।”


सीमा ने लंबी साँस लेते हुए कहा,


“इधर-उधर करके? वहाँ आपकी किताबें हैं, फाइलें हैं, कंप्यूटर है, अलमारी है… बच्चों का भी सामान रखा है।”


अरुण ने सहजता से जवाब दिया,

“तो क्या हुआ? सामान कहीं और रख देंगे।”


सीमा ने कुछ नहीं कहा।


अरुण ने पत्नी की ओर देखा।


“तुम्हें कोई परेशानी है क्या?”


सीमा ने थोड़ी देर चुप रहने के बाद जवाब दिया—

“परेशानी तो कुछ नहीं है…”


अरुण ने हैरानी से पूछा—

“फिर?”


सीमा ने सहज स्वर में कहा—

“बस, मैंने चाचा जी को कह दिया है कि अभी घर में जगह की थोड़ी दिक्कत है। सोनू को यहाँ रखना हमारे लिए मुश्किल होगा।”


अरुण का चेहरा अचानक उतर गया।


“तुमने… मना कर दिया?”


सीमा ने सहजता से जवाब दिया,

“हाँ।”


अरुण ने कुछ पल चुप रहने के बाद पूछा,

“लेकिन क्यों?”


सीमा ने बहुत सामान्य स्वर में कहा,


“क्योंकि घर चलाना सिर्फ भावनाओं से नहीं होता। बच्चों की पढ़ाई है, खर्चे हैं, घर की जिम्मेदारियाँ हैं। ऊपर से एक और बच्चे की जिम्मेदारी।”


अरुण कुछ देर तक चुप बैठा रहा।


फिर धीरे से बोला,


“एक बच्चे की जिम्मेदारी से घर छोटा हो जाता है क्या?”


सीमा ने कोई उत्तर नहीं दिया।


अरुण उठकर खिड़की के पास चला गया।


बाहर सड़क पर लोग अपने-अपने काम पर जा रहे थे।


उसके मन में अचानक बहुत पुरानी तस्वीरें घूमने लगीं।


वह छोटा था।


पिता नहीं रहे थे।


घर की हालत खराब थी।


माँ दूसरों के घरों में सिलाई करती थीं।


तब चाचा ही थे जिन्होंने उसे शहर के स्कूल में दाखिला दिलाया था।


फीस जमा की थी।


किताबें खरीदी थीं।


सर्दियों में स्वेटर दिया था।


और जब वह कॉलेज जाना चाहता था, तब भी चाचा ने कहा था,


“बेटा, पढ़ ले। जितना पढ़ना है पढ़। पैसे की चिंता मत करना।”


अरुण की आँखें नम हो गईं।


वह पलटकर पत्नी की तरफ देखने लगा।


“सीमा, तुम्हें पता है चाचा ने मेरे लिए क्या किया था?”


सीमा ने शांत स्वर में जवाब दिया—

“हाँ, आपने कई बार बताया है।”


अरुण ने पत्नी की आँखों में देखते हुए कहा—

“तो फिर आज उनके बेटे के लिए हमारे घर में जगह क्यों नहीं है?”


सीमा थोड़ी झुंझलाई।


“क्योंकि बात सिर्फ जगह की नहीं है। आज सोनू आएगा, कल उसके कपड़े होंगे, खाना होगा, स्कूल होगा, फीस होगी। फिर गाँव में कोई और समस्या आई तो हम क्या करेंगे?”


अरुण ने शांत स्वर में कहा,


“जिस दिन जरूरत होगी, उस दिन देख लेंगे।”


सीमा ने हल्की नाराज़गी से कहा—

“आप बहुत भावुक हो जाते हैं।”


अरुण ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

“शायद।”


अरुण मुस्कुराया।


“लेकिन जिस इंसान की वजह से मेरी जिंदगी बनी, उसके बेटे के लिए थोड़ा भावुक होना मुझे गलत नहीं लगता।”


सीमा उठकर रसोई में चली गई।


उसने बात वहीं खत्म कर दी।


लेकिन अरुण के मन में बात खत्म नहीं हुई।



कुछ दिनों बाद रविवार था।


सुबह-सुबह घर के बाहर एक ऑटो आकर रुका।


अरुण बाहर निकला तो देखा, उसका चचेरा भाई महेश अपनी पत्नी और बेटे सोनू के साथ खड़ा था।


साथ में एक पुराना सा बैग था।


अरुण उन्हें देखकर हैरान रह गया।


“अरे महेश! तुमने बताया क्यों नहीं कि आ रहे हो?”


महेश मुस्कुराया।


“सोचा था फोन पर बात करूँगा, लेकिन सोनू का एडमिशन देखना था। सोचा खुद ही आ जाता हूँ।”


सोनू थोड़ा झिझकते हुए अरुण के पैर छूने लगा।


“चाचा जी, प्रणाम।”


अरुण ने उसे गले लगा लिया।


“अरे वाह! अब तो बहुत बड़ा हो गया मेरा सोनू।”


सोनू मुस्कुराया।


महेश ने धीरे से कहा,


“भैया, अगर ज्यादा परेशानी हो तो मत कहना। हम सोनू को किसी हॉस्टल में भी रख देंगे। बस पढ़ाई खराब नहीं होनी चाहिए।”


अरुण ने उसकी आँखों में देखा।


वहाँ उम्मीद से ज्यादा संकोच था।


उसे समझते देर नहीं लगी कि महेश ने शायद सीमा से हुई फोन पर बातचीत सुन ली थी।


अरुण ने तुरंत कहा,


“तुम लोग अंदर चलो।”


महेश हिचकिचाया।


“भाभी को…”


अरुण ने उसकी बात पूरी करते हुए भरोसे से कहा,

“भाभी को मैं समझा लूँगा।”


वे अंदर आ गए।


सीमा बैठक में बैठी थी।


उन्हें देखते ही उसके चेहरे पर थोड़ी परेशानी दिखाई दी।


लेकिन उसने औपचारिक मुस्कान के साथ कहा,


“आइए।”


महेश ने हाथ जोड़ते हुए कहा,


“भाभी, अचानक आ गए। अगर आपको असुविधा हो तो…”


सीमा ने बात काटते हुए कहा,


“नहीं-नहीं, ऐसी कोई बात नहीं।”


सोनू चुपचाप खड़ा था।


अरुण ने उसका बैग उठाया।


“चल सोनू, तेरा कमरा दिखाता हूँ।”


सीमा ने तुरंत कहा,


“कौन सा कमरा?”


अरुण ने तीसरे कमरे की तरफ इशारा किया।


“मेरा ऑफिस वाला।”


सीमा ने उसे घूरकर देखा।


“लेकिन वहाँ तो…”


अरुण मुस्कुराया।


“मेरा ऑफिस आज से बैठक में होगा।”


सीमा ने थोड़ी नाराज़गी से पूछा—

“और मेरा सिलाई का सामान?”


अरुण ने सहजता से जवाब दिया—

“वह अलमारी के ऊपर रख देंगे।”


सीमा ने फिर पूछा—

“बच्चों की किताबें?”


अरुण ने शांत स्वर में कहा—

“दूसरे कमरे में रख देंगे।”


सीमा चुप हो गई।


महेश सब समझ रहा था।


उसने धीरे से कहा,


“भैया, रहने दीजिए। मैं सोनू को लेकर वापस चला जाता हूँ।”


अरुण ने उसके कंधे पर हाथ रखा।


“महेश, तूने कभी मुझसे हिसाब माँगा था?”


“नहीं।”


“फिर आज मुझे भी हिसाब मत देने दे।”


महेश की आँखें भर आईं।


“भैया…”


अरुण ने उसे गले लगा लिया।


“तूने मेरे लिए जो किया था, उसका हिसाब मैं आज भी नहीं चुका सकता। कम से कम कोशिश तो करने दे।”



सोनू शहर में रहने लगा।


शुरुआत में वह बहुत संकोची था।


सुबह जल्दी उठता।


अपना बिस्तर ठीक करता।


स्कूल जाता।


शाम को पढ़ाई करता।


घर के छोटे-मोटे कामों में हाथ बँटाता।


अरुण उसे देखकर खुश होता।


लेकिन सीमा के व्यवहार में कोई खास बदलाव नहीं आया।


वह सोनू से बुरा व्यवहार नहीं करती थी, लेकिन अपनापन भी नहीं दिखाती थी।


एक दिन सोनू स्कूल से लौटा तो उसके हाथ में एक कागज था।


वह बहुत उत्साहित था।


“चाचा जी!”


अरुण ने पूछा,


“क्या हुआ?”


“मेरी क्लास में मेरा पहला नंबर आया है।”


अरुण ने कागज देखा।


“अरे वाह!”


उसने सोनू को गले लगा लिया।


“आज मिठाई होगी।”


सोनू हँसते हुए बोला,


“लेकिन चाची जी कहती हैं कि बाहर की मिठाई महँगी आती है।”


अरुण ने सीमा की ओर देखा।


सीमा ने कहा,


“मैंने ऐसा कब कहा?”


सोनू तुरंत चुप हो गया।


अरुण ने माहौल हल्का करते हुए कहा,


“अच्छा, आज मिठाई घर पर बनेगी।”


उस रात सीमा ने हलवा बनाया।


सोनू ने पहली बार उसे देखकर कहा,


“चाची जी, बहुत अच्छा बना है।”


सीमा ने बस इतना कहा,


“खाना है तो खाओ।”


लेकिन उस रात जब सोनू सो गया, सीमा देर तक उसके कमरे के बाहर खड़ी रही।


कमरे की मेज पर सोनू की किताबें खुली थीं।


एक कॉपी में बड़े साफ अक्षरों में लिखा था—


“मैं बड़ा होकर अपने पापा जैसा मेहनती और चाचा जी जैसा अच्छा इंसान बनना चाहता हूँ।”


सीमा कुछ पल उस कॉपी को देखती रही।


फिर चुपचाप वापस चली गई।



समय बीतता गया।


सोनू की पढ़ाई अच्छी होती गई।


वह घर में सबका ध्यान रखने लगा।


अरुण की तबीयत कभी खराब होती तो पानी देकर दवा देता।


बच्चों की किताबें ढूँढ़ देता।


सीमा बाजार जाती तो सामान उठाकर अंदर रख देता।


एक दिन सीमा के पैर में चोट लग गई।


सोनू स्कूल से आया तो उसे पता चला।


उसने अपना बैग रखा और बोला,


“चाची जी, आप बैठिए। मैं खाना बना देता हूँ।”


सीमा ने आश्चर्य से पूछा,


“तुम्हें खाना बनाना आता है?”


“थोड़ा-बहुत। माँ ने सिखाया है।”


उस दिन सोनू ने दाल, चावल और सब्जी बनाई।


खाना साधारण था।


लेकिन सीमा ने पहली बार सोनू को अपने हाथ से खाना परोसा।


“तुम भी बैठकर खाओ।”


सोनू मुस्कुराया।


“जी चाची जी।”


उस रात सीमा ने अरुण से कहा,


“सोनू बहुत अच्छा बच्चा है।”


अरुण ने मुस्कुराकर कहा,


“मैंने तो पहले ही कहा था।”


सीमा कुछ देर चुप रही।


फिर बोली,


“शायद घर में जगह की कमी नहीं थी…”


अरुण ने उसकी ओर देखा।


सीमा की आँखों में पछतावा था।


“…हमारे मन में जगह कम थी।”


अरुण ने कुछ नहीं कहा।


बस पत्नी का हाथ पकड़ लिया।



कुछ महीने बाद सोनू की बोर्ड परीक्षा थी।


वह दिन-रात मेहनत करने लगा।


अरुण उसे पढ़ाई के लिए प्रेरित करता।


सीमा उसके लिए दूध रखती।


सुबह टिफिन बनाती।


परीक्षा वाले दिन उसने सोनू के माथे पर हाथ रखकर कहा,


“घबराना मत। जो पढ़ा है, वही लिखना।”


सोनू ने उसके पैर छुए।


“चाची जी, आशीर्वाद दीजिए।”


सीमा की आँखें भर आईं।


“बहुत आगे जाना।”


परीक्षा खत्म हुई।


कुछ सप्ताह बाद परिणाम आया।


सोनू पूरे जिले में प्रथम आया था।


घर में खुशी का माहौल था।


महेश को फोन किया गया।


वह रो पड़ा।


“भैया, आपने मेरे बेटे की जिंदगी बदल दी।”


अरुण ने हँसकर कहा,


“नहीं महेश, तुम्हारे बेटे ने अपनी जिंदगी खुद बदली है। हमने तो बस उसके लिए दरवाजा खोला था।”


तभी सीमा ने पास आकर कहा,


“दरवाजा ही नहीं… घर भी।”


अरुण ने उसकी तरफ देखा।


सीमा मुस्कुराई।



कई साल बाद वही सोनू एक बड़ी कंपनी में नौकरी करने लगा।


पहली तनख्वाह मिली तो उसने सबसे पहले गाँव जाकर अपने माता-पिता के पैर छुए।


फिर शहर आया।


हाथ में एक छोटा सा पैकेट था।


सीमा ने पूछा,


“ये क्या है?”


सोनू ने पैकेट खोलकर एक सुंदर सी साड़ी निकाली।


“चाची जी के लिए।”


सीमा ने कहा,


“मेरे लिए क्यों?”


सोनू मुस्कुराया।


“क्योंकि जब मैं इस घर में आया था, तब मुझे लगा था कि मैं किसी रिश्तेदार के घर आया हूँ।”


वह कुछ पल रुका।


“लेकिन आज लगता है कि मैं अपने घर आया था।”


सीमा की आँखों से आँसू निकल पड़े।


उसने सोनू को गले लगा लिया।


“बेटा…”


सोनू ने धीरे से कहा,


“और चाची जी, एक बात कहूँ?”


“हाँ।”


“जिस कमरे में मैं रहता था, उसे मत बदलना।”


सीमा ने हैरानी से पूछा,


“क्यों?”


सोनू मुस्कुराया।


“क्योंकि जब भी मैं थकूँगा, उस कमरे को देखकर याद करूँगा कि जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए कभी-कभी सिर्फ एक कमरे की नहीं… किसी के विश्वास की जरूरत होती है।”


अरुण दूर खड़ा मुस्कुरा रहा था।


उसने सीमा की ओर देखा।


सीमा ने भी उसकी तरफ देखा।


दोनों की आँखों में एक ही बात थी—


घर दीवारों से नहीं बनता।

घर तब बनता है, जब किसी अपने के लिए दिल में जगह बची हो।


और उस दिन उस घर में एक कमरा नहीं बढ़ा था।


बस दिल थोड़ा और बड़ा हो गया था।


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