माँ का सच्चा श्राद्ध

 

Indian man serving food to elderly women outside a hospital as a tribute to his late mother.


"सर, मुझे कल छुट्टी चाहिए।"


राकेश ने अपने बॉस निखिल से बहुत संकोच के साथ कहा।


निखिल ने कंप्यूटर स्क्रीन से नजर हटाकर राकेश की तरफ देखा।


"कल? लेकिन राकेश, तुम्हें पता है ना कि परसों बहुत जरूरी मीटिंग है। क्लाइंट के सामने पूरी रिपोर्ट रखनी है। इस समय छुट्टी कैसे दे दूँ?"


राकेश कुछ पल चुप रहा।


"सर, अगर बहुत जरूरी न होता तो मैं आपसे छुट्टी नहीं मांगता।"


निखिल ने कुर्सी पर पीठ टिकाई।


"ऐसी क्या बात है? घर में कोई बीमार है?"


राकेश ने धीरे से सिर हिलाया।


"नहीं सर।"


"फिर?"


राकेश की आवाज थोड़ी भारी हो गई।


"कल मेरी माँ की बरसी है।"


निखिल कुछ क्षण चुप रहा।


फिर बोला,


"अच्छा... ठीक है। तुम किसी पंडित को बुला लेना, पूजा करवा लेना। ऑफिस का काम मैं किसी और से संभालवा दूँगा।"


राकेश ने तुरंत कहा,


"नहीं सर, मैं पूजा नहीं करवाता।"


निखिल को थोड़ी हैरानी हुई।


"तो फिर क्या करते हो?"


राकेश ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,


"मैं शहर के सरकारी अस्पताल के बाहर बैठने वाले जरूरतमंद मरीजों और उनके साथ आए लोगों के लिए खाना बनवाकर ले जाता हूँ।"


निखिल ने भौंहें सिकोड़ लीं।


"माँ की बरसी पर?"


"जी सर।"


"लेकिन तुम्हारी माँ की आत्मा की शांति के लिए तो लोग पूजा-पाठ करवाते हैं, ब्राह्मणों को भोजन करवाते हैं।"


राकेश कुछ पल शांत रहा।


फिर बोला,


"सर, मेरी माँ ने मुझे कभी कर्मकांड से ज्यादा इंसान की मदद करना सिखाया था।"


निखिल ध्यान से उसकी बात सुनने लगा।


राकेश ने आगे कहा,


"मेरी माँ बहुत गरीब थी, सर। लेकिन दिल की बहुत अमीर थी।"


"जब मैं छोटा था, तब हमारे घर में कई बार खाने के लिए भी पर्याप्त सामान नहीं होता था।"


"लेकिन अगर दरवाजे पर कोई भूखा आ जाता था, तो माँ अपनी थाली में से भी आधा खाना उसे दे देती थी।"


निखिल ने पूछा,


"फिर तुम खुद क्या खाते थे?"


राकेश मुस्कुराया।


"मैं माँ से लड़ता था। कहता था, 'माँ, हमारे पास ही इतना कम खाना है, फिर तुम अपना खाना दूसरों को क्यों दे देती हो?'"


"माँ हँसकर कहती थी, 'बेटा, पेट आधा भर जाएगा तो भी इंसान जिंदा रह सकता है, लेकिन अगर दिल में किसी भूखे को देखकर दया न आए तो इंसान होकर भी क्या फायदा?'"


निखिल चुपचाप सुन रहा था।


राकेश की आँखें नम हो गईं।


"एक बार सर, मेरी माँ बहुत बीमार थी। डॉक्टर ने दवाई लिखी थी, लेकिन हमारे पास पैसे नहीं थे।"


"मैं रोते हुए माँ के पास गया और कहा कि अब दवाई कैसे आएगी?"


"माँ ने अपनी पुरानी संदूकची खोली। उसमें एक छोटी सी चाँदी की पायल रखी थी।"


"माँ ने वह पायल मुझे देते हुए कहा, 'इसे बेच देना और दवाई ले आना।'"


निखिल ने पूछा,


"फिर?"


राकेश ने गहरी साँस ली।


"मैं पायल बेचने बाजार जा रहा था। रास्ते में मैंने एक बूढ़े आदमी को सड़क किनारे बैठे देखा। वह भूखा था।"


"मेरे पास दवाई के पैसे के अलावा कुछ नहीं था। मैंने उसे देखकर नजरें फेर लीं।"


"लेकिन थोड़ी दूर जाकर मुझे माँ की बात याद आई।"


"'भूखे इंसान को देखकर नजर मत फेरना।'"


"मैं वापस गया और अपनी जेब में रखे कुछ पैसे से उसके लिए खाना खरीद दिया।"


"जब घर पहुँचा तो माँ ने पूछा कि पायल कितने में बिकी।"


"मैंने झूठ बोल दिया कि दुकानदार ने कम पैसे दिए।"


"माँ मेरी आँखों में देखकर समझ गई थी कि मैं झूठ बोल रहा हूँ।"


"उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस मेरे सिर पर हाथ रखकर बोलीं, 'तूने आज मेरा बेटा होने का हक निभाया है।'"


राकेश की आवाज भर्रा गई।


"कुछ दिनों बाद माँ की तबीयत बहुत बिगड़ गई। अस्पताल ले जाने से पहले उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर कहा था..."


राकेश कुछ पल के लिए रुक गया।


निखिल ने धीरे से पूछा,


"क्या कहा था उन्होंने?"


राकेश ने आँखें पोंछीं।


"कहा था, 'बेटा, मेरे जाने के बाद मेरे नाम पर बड़ा भोज मत करवाना। अगर कभी मेरी याद आए तो किसी भूखे को खाना खिला देना। किसी बूढ़े का हाथ पकड़ लेना। किसी अकेली माँ की बात सुन लेना। मुझे वही सबसे बड़ा श्राद्ध लगेगा।'"


कमरे में कुछ देर खामोशी छाई रही।


निखिल की नजरें नीचे झुक गईं।


राकेश ने कहा,


"सर, माँ को गए आठ साल हो गए हैं। हर साल उनकी बरसी पर मैं अस्पताल के बाहर खाना बाँटता हूँ।"


"वहाँ ऐसे लोग मिलते हैं जिनके पास इलाज कराने के पैसे नहीं होते। कई मरीजों के परिवार वाले खुद भूखे रहकर अपने मरीज का इलाज करवाते हैं।"


"मैं उनके बीच बैठता हूँ। किसी की दवाई लाने में मदद करता हूँ, किसी को खाना देता हूँ, किसी की बात सुन लेता हूँ।"


"और सर, सच कहूँ तो उस दिन मुझे लगता है कि मैं अपनी माँ के बहुत करीब हूँ।"


निखिल की आँखें भी नम हो चुकी थीं।


उसने पूछा,


"तुम्हें कभी नहीं लगा कि बाकी लोग क्या कहेंगे?"


राकेश मुस्कुराया।


"पहले लगता था सर।"


"लोग कहते थे कि तुम ठीक से श्राद्ध नहीं करते। कोई कहता था कि पंडित को खाना खिलाओ, कोई कहता था पूजा करवाओ।"


"लेकिन मेरी माँ ने जो सिखाया था, वह मेरे लिए लोगों की बातों से बड़ा था।"


निखिल कुर्सी से उठकर खिड़की के पास चला गया।


कुछ देर बाद उसने कहा,


"राकेश, तुम्हारी माँ बहुत अच्छी रही होंगी।"


राकेश ने मुस्कुराकर कहा,


"जी सर। उन्होंने गरीबी में भी मुझे सबसे अमीर चीज दी थी।"


"क्या?"


"इंसानियत।"


निखिल ने राकेश की तरफ देखा।


फिर बोला,


"तुम कल छुट्टी नहीं लोगे।"


राकेश चौंक गया।


"जी?"


निखिल मुस्कुराया।


"तुम कल ऑफिस की तरफ से भी खाना लेकर जाओगे।"


राकेश कुछ समझ नहीं पाया।


निखिल ने आगे कहा,


"कितने लोगों के लिए खाना ले जाते हो?"


"लगभग सौ लोगों के लिए, सर।"


"इस बार दो सौ लोगों के लिए ले जाना। आधा खर्च कंपनी का होगा और आधा मैं दूँगा।"


राकेश की आँखों से आँसू निकल पड़े।


"सर, इसकी जरूरत नहीं है।"


निखिल ने कहा,


"जरूरत है राकेश।"


"क्योंकि आज तुम्हारी माँ ने मुझे भी कुछ सिखाया है।"


राकेश चुप रहा।


निखिल ने अपनी मेज से चेकबुक उठाई।


"और हाँ, कल ऑफिस का कोई काम मत करना।"


"लेकिन सर रिपोर्ट..."


"रिपोर्ट हम संभाल लेंगे।"


निखिल मुस्कुराया।


"तुम अपनी माँ के पास जाओ।"


राकेश ने हाथ जोड़ते हुए कहा,


"धन्यवाद सर।"


निखिल ने उसका हाथ पकड़ लिया।


"धन्यवाद मुझे नहीं, अपनी माँ को कहना। उन्होंने तुम्हें ऐसा इंसान बनाया है कि आज मुझे भी अपने माता-पिता की याद आ गई।"


राकेश जाने लगा तो निखिल ने पीछे से आवाज दी।


"राकेश!"


"जी सर?"


"कल जब खाना बाँटो तो मेरी तरफ से भी एक थाली किसी ऐसी माँ को देना, जिसका बेटा उसके पास नहीं है।"


राकेश की आँखों में आँसू के साथ मुस्कान आ गई।


"जी सर, जरूर दूँगा।"


अगले दिन राकेश अस्पताल के बाहर खाना बाँट रहा था।


एक बूढ़ी महिला उसके पास आई।


उसने काँपते हाथों से खाना लिया और राकेश के सिर पर हाथ रख दिया।


"बेटा, भगवान तुम्हें हमेशा खुश रखे।"


राकेश कुछ बोल नहीं पाया।


उसने बस उस महिला के पैर छुए।


और उसी पल उसे लगा जैसे उसकी माँ उसके सिर पर हाथ रखकर कह रही हो—


"शाबाश बेटा... तूने आज फिर मेरा श्राद्ध कर दिया।"


राकेश ने आसमान की तरफ देखा।


आँखों में आँसू थे, लेकिन चेहरे पर गहरा सुकून था।


क्योंकि कुछ रिश्ते मृत्यु के बाद खत्म नहीं होते।


वे इंसान के अच्छे कर्मों में जिंदा रहते हैं।


सच्ची श्रद्धांजलि वही है, जिसमें किसी की याद किसी दूसरे के जीवन में मुस्कान बन जाए।



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