वहम की दीवार

 

Emotional Indian mother-in-law asking her daughter-in-law for forgiveness in a warm family home


कविता की शादी हुए अभी कुछ ही महीने हुए थे। शादी के बाद वह कुछ दिन अपने सास-ससुर के साथ रही। फिर पति अमित के साथ उस शहर में चली गई, जहां अमित की नौकरी थी।


कुछ साल बाद अमित के पिता श्यामलाल रिटायर हो गए। खेती-बाड़ी भी पहले जैसी नहीं रही और उम्र बढ़ने के साथ उन्हें अकेले रहने में परेशानी होने लगी।


अमित ने अपने माता-पिता से कहा, “बाबूजी, अब आप दोनों हमारे साथ ही रहिए। गांव में अकेले रहने की जरूरत नहीं है।”


श्यामलाल ने कहा, “बेटा, हम दोनों तुम्हें परेशान तो नहीं करेंगे?”


अमित ने मुस्कुराकर कहा, “आप मेरे माता-पिता हैं बाबूजी, बोझ नहीं।”


कविता भी खुशी से बोली, “हां बाबूजी, आप दोनों आ जाइए। घर में रौनक भी रहेगी और मुझे भी आपका साथ मिलेगा।”


कुछ ही दिनों में श्यामलाल और उनकी पत्नी कमला देवी शहर आ गए।


कविता ने उनके लिए घर का एक कमरा अच्छी तरह से तैयार किया। नए पर्दे लगाए, साफ बिस्तर लगाया और कमला देवी की पसंद की चादर भी बिछा दी।


कमला देवी ने कमरे को देखते हुए कहा, “बहू, तूने बहुत तैयारी कर रखी है।”


कविता मुस्कुराकर बोली, “मांजी, आप पहली बार थोड़े ही आई हैं। अब तो यही आपका घर है।”


कमला देवी ने कहा, “खुश रह बहू।”


कविता सचमुच अपनी सास-ससुर की सेवा मन से करती थी। उसे अपनी मां याद आती थी, जो अपने सास-ससुर की बहुत सेवा करती थी।


कविता रोज श्यामलाल की दवाइयां समय पर देती। कमला देवी को उनकी पसंद का खाना बनाकर खिलाती। उनके कपड़े अलग से धोती और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर के पास भी लेकर जाती।


एक दिन कविता ने सास के कमरे में दूध का गिलास रखते हुए कहा, “मांजी, दूध रख दिया है। पूरा पी लीजिएगा।”


कमला देवी ने कहा, “ठीक है बहू।”


कविता वहां से चली गई।


कविता के जाते ही कमला देवी ने पति श्यामलाल से कहा, “जी, मुझे लगता है बहू दूध में पानी मिलाकर देती है।”


श्यामलाल ने हैरानी से पूछा, “तुमने देखा है कमला?”


कमला देवी बोलीं, “नहीं देखा, लेकिन दूध कुछ पतला लगता है।”


श्यामलाल ने समझाते हुए कहा, “सिर्फ शक होने से कोई बात सच नहीं हो जाती।”


कमला देवी बोलीं, “मैं तो बस कह रही हूं। आखिर बहू है।”


श्यामलाल ने कहा, “बहू है तो क्या वह गलत ही करेगी?”


कमला देवी चुप हो गईं।


कविता ने उनकी पूरी बात नहीं सुनी थी, लेकिन कुछ शब्द उसके कानों तक पहुंच गए थे।


उसे बहुत दुख हुआ।


उसने मन में सोचा, “मैं तो मांजी को अपनी मां जैसा मानती हूं। फिर उन्हें मेरे ऊपर शक क्यों है?”


लेकिन उसने किसी से शिकायत नहीं की।


अगले दिन कविता ने दूध का पूरा भगोना निकाला और सास-ससुर के कमरे में ले गई।


कमला देवी ने पूछा, “बहू, इतना सारा दूध यहां क्यों ले आई?”


कविता ने मुस्कुराकर कहा, “मांजी, आप दोनों जब चाहें दूध पी लिया कीजिए। कई बार मैं काम में व्यस्त रहती हूं, इसलिए सोचा दूध आपके पास ही रख दूं।”


श्यामलाल ने कविता की ओर देखा।


उन्हें समझ आ गया कि कविता ने शायद कुछ सुन लिया है।


उन्होंने धीरे से कहा, “बहू, इसकी जरूरत नहीं थी।”


कविता मुस्कुराई और बोली, “बाबूजी, जरूरत नहीं थी, लेकिन अब आपको सुविधा रहेगी।”


कविता वहां से चली गई।


श्यामलाल ने पत्नी की ओर देखा।


उन्होंने कहा, “देखा कमला? उसने शिकायत करने की बजाय पूरा दूध तुम्हारे कमरे में रख दिया।”


कमला देवी बोलीं, “हां, लेकिन पता नहीं क्यों मुझे फिर भी लगता है कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है।”


श्यामलाल ने सिर हिलाया और कहा, “तुम्हारे इस शक का मैं क्या करूं?”


कमला देवी चुप रही।


उसे अभी पता नहीं था कि उसके शक की वजह से कविता आगे क्या करने वाली है।



कुछ दिन बीत गए।


कविता पहले की तरह सास-ससुर की सेवा करती रही।


एक दिन कमला देवी ने फोन पर अपनी बेटी राधा से बात करते हुए कहा, “राधा, बहू खाना तो ठीक बनाती है, लेकिन मुझे लगता है कि घी बहुत कम डालती है।”


राधा ने फोन पर पूछा, “मां, ऐसा क्यों लगता है?”


कमला देवी बोलीं, “दाल के ऊपर थोड़ा सा घी डाल देती है। ऊपर से देखकर लगता है कि बहुत डाला है, लेकिन अंदर पता नहीं कितना होता है।”


राधा ने कहा, “मां, अगर आपको लगता है कि कम घी देती है तो उससे कह देना।”


कमला देवी बोलीं, “नहीं, बहू से क्या कहना। उसे खुद समझना चाहिए।”


कविता पास के कमरे में थी। उसने सारी बात सुन ली।


उसका दिल फिर दुखी हो गया।


उसने सोचा, “मांजी को अगर लगता है कि मैं घी कम देती हूं तो सीधे मुझसे कह देतीं। मैं तो उनकी पसंद के हिसाब से ही खाना बनाती हूं।”


लेकिन कविता ने फिर भी कुछ नहीं कहा।


अगले दिन वह बाजार गई और एक बड़ा देसी घी का डिब्बा लेकर आई।


उसने वह डिब्बा सास-ससुर के कमरे में रख दिया।


कमला देवी ने पूछा, “बहू, यह घी यहां क्यों रख रही है?”


कविता ने कहा, “मांजी, आप दोनों जब चाहें अपनी दाल या सब्जी में डाल लिया कीजिए।”


कमला देवी ने कहा, “लेकिन घर में घी तो है।”


कविता बोली, “हां मांजी, है। लेकिन कई बार मैं घर पर नहीं होती। आपको किसी का इंतजार न करना पड़े, इसलिए यह आपके कमरे में रख दिया है।”


श्यामलाल सब समझ रहे थे।


उन्होंने कविता से कहा, “बहू, तू बहुत समझदार है।”


कविता मुस्कुराकर बोली, “बाबूजी, इसमें समझदारी की क्या बात है? आप दोनों को सुविधा होनी चाहिए।”


कविता वहां से चली गई।


श्यामलाल ने पत्नी से कहा, “अब तो तुम्हें यकीन हो गया होगा कि बहू घी कम नहीं देती।”


कमला देवी ने कहा, “घी तो रख दिया है, लेकिन पता नहीं कितना सही है।”


श्यामलाल ने कहा, “तुम्हारे शक की कोई सीमा नहीं है।”


कमला देवी बोलीं, “मैं मां हूं, मुझे अपने घर का पता होना चाहिए।”


श्यामलाल ने कहा, “और बहू भी तो इसी घर का हिस्सा है।”


कमला देवी चुप हो गईं।


कुछ दिन बाद अमित बहुत सारे फल लेकर घर आया।


उसने फल कविता को देते हुए कहा, “ये मां-बाबूजी के लिए अच्छे वाले फल लाया हूं।”


कविता ने कहा, “ठीक है, मैं काटकर उन्हें दे देती हूं।”


वह फल धोकर एक टोकरी में रखकर सास-ससुर के कमरे में ले गई।


कविता ने कहा, “मांजी, बाबूजी, फल रख दिए हैं। जब मन करे खा लीजिएगा।”


श्यामलाल ने कहा, “ठीक है बहू।”


कविता कमरे से बाहर चली गई।


कुछ देर बाद कमला देवी ने पति से कहा, “इतने सारे फल अमित लाता है, लेकिन हमें तो थोड़े ही मिलते हैं।”


श्यामलाल ने पूछा, “क्यों? अभी तो पूरी टोकरी रखकर गई है।”


कमला देवी बोलीं, “हां, लेकिन बाकी तो पता नहीं कहां चले जाते हैं।”


श्यामलाल ने कहा, “तुम फिर बहू पर शक कर रही हो?”


कमला देवी बोलीं, “मुझे लगता है वह सारे फल खुद ही खा जाती होगी।”


उसी समय कविता दरवाजे के पास आ गई थी।


उसने सब सुन लिया।


इस बार कविता की आंखों में आंसू आ गए।


उसने मन में कहा, “मांजी को मुझ पर इतना शक है कि मेरे अच्छे काम भी उन्हें गलत दिखाई देते हैं।”


उसने अमित से भी कुछ नहीं कहा।


अगले दिन उसने एक छोटा फ्रिज खरीद लिया।


अमित ने फ्रिज देखकर पूछा, “कविता, यह फ्रिज किसलिए?”


कविता ने कहा, “मांजी और बाबूजी के कमरे में रखवाऊंगी।”


अमित ने पूछा, “लेकिन रसोई में तो फ्रिज है।”


कविता ने मुस्कुराकर कहा, “है, लेकिन मांजी-बाबूजी को बार-बार रसोई तक आने में परेशानी होती है। उनके कमरे में दूध, फल और पानी रहेगा तो उन्हें सुविधा होगी।”


अमित ने कहा, “ठीक है, जैसा तुम्हें सही लगे।”


कविता ने फ्रिज सास-ससुर के कमरे में रखवा दिया।


उसने उसमें दूध, फल, दही और पानी रख दिया।


कविता ने कहा, “मांजी, अब आपको किसी चीज के लिए रसोई तक जाने की जरूरत नहीं है। जो चाहिए, यहीं से निकाल लीजिएगा।”


कमला देवी कुछ देर तक उसे देखती रहीं।


फिर बोलीं, “बहू, तू इतना सब क्यों करती है?”


कविता ने मुस्कुराकर कहा, “आप दोनों मेरे अपने हैं मांजी। आपके लिए इतना तो कर ही सकती हूं।”


कविता वहां से चली गई।


श्यामलाल ने पत्नी की ओर देखा।


उन्होंने कहा, “अब तो तुम्हारे शक का कोई कारण नहीं बचा।”


कमला देवी ने धीरे से कहा, “सब कुछ तो ठीक है जी।”


श्यामलाल ने पूछा, “फिर?”


कमला देवी बोलीं, “फिर भी मुझे लगता है कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ तो करती ही होगी।”


श्यामलाल ने गहरी सांस ली।


उन्होंने कहा, “कमला, गड़बड़ बहू के काम में नहीं, तुम्हारी सोच में है।”


कमला देवी ने उनकी ओर देखा, लेकिन कुछ नहीं बोलीं।



श्यामलाल ने पत्नी से कहा, “कमला, तुमने कविता को दूध में पानी मिलाते देखा?”


कमला देवी ने कहा, “नहीं।”


श्यामलाल ने पूछा, “उसे घी कम देते देखा?”


कमला देवी ने सिर हिलाकर कहा, “नहीं।”


श्यामलाल ने फिर पूछा, “क्या तुमने उसे फल छिपाकर खुद खाते देखा?”


कमला देवी बोलीं, “नहीं।”


श्यामलाल ने कहा, “फिर तुम्हारे पास सबूत क्या है?”


कमला देवी चुप हो गईं।


श्यामलाल ने कहा, “तुम्हारे पास सिर्फ शक है। और यही शक तुम्हें अपनी बहू की सारी अच्छाइयां देखने से रोक रहा है।”


कमला देवी ने धीमे स्वर में कहा, “लेकिन जी, मुझे डर लगता है।”


श्यामलाल ने पूछा, “किस बात का डर?”


कमला देवी बोलीं, “पता नहीं बहू आगे चलकर कैसी निकले।”


श्यामलाल मुस्कुराए और बोले, “तुमने भविष्य की चिंता में वर्तमान की अच्छी बहू को खो दिया है।”


कमला देवी की आंखें भर आईं।


श्यामलाल ने कहा, “याद है जब तुम नई बहू बनकर हमारे घर आई थीं? तब मेरी मां तुम्हारे ऊपर भी ऐसे ही शक करती थीं।”


कमला देवी को पुरानी बातें याद आ गईं।


वह बोलीं, “हां, मांजी मुझ पर भी शक करती थीं।”


श्यामलाल ने कहा, “तब तुम रोती थीं और मुझसे कहती थीं कि बिना गलती के किसी को दोष देना कितना दुख देता है।”


कमला देवी ने सिर झुका लिया।


श्यामलाल ने कहा, “आज तुम वही दुख अपनी बहू को दे रही हो।”


कमला देवी की आंखों से आंसू बहने लगे।


उन्होंने कहा, “मैंने कभी इस नजर से सोचा ही नहीं।”


श्यामलाल बोले, “क्योंकि वहम इंसान को सच देखने नहीं देता।”


कमला देवी तुरंत उठीं और कविता को ढूंढने लगीं।


कविता रसोई में सब्जी काट रही थी।


कमला देवी उसके पास जाकर चुपचाप खड़ी हो गईं।


कविता ने पूछा, “क्या हुआ मांजी?”


कमला देवी ने कविता का हाथ पकड़ लिया।


वह बोलीं, “बहू, मुझे माफ कर दे।”


कविता हैरान होकर बोली, “मांजी, आप ऐसा क्यों कह रही हैं?”


कमला देवी रोते हुए बोलीं, “तूने हमेशा मेरा ध्यान रखा। तूने कभी मुझे कोई कमी नहीं होने दी। लेकिन मैंने तेरे हर काम में कमी निकालने की कोशिश की।”


कविता की आंखों में भी आंसू आ गए।


कमला देवी बोलीं, “मैंने तुझ पर दूध में पानी मिलाने का शक किया। तूने पूरा दूध मेरे कमरे में रख दिया।”


“मैंने सोचा तू घी कम देती है। तूने पूरा घी का डिब्बा मेरे कमरे में रख दिया।”


“मैंने सोचा तू फल खुद खा जाती है। तूने हमारे कमरे में फ्रिज रखवा दिया।”


कमला देवी ने कहा, “बहू, फिर भी मैंने तुझ पर भरोसा नहीं किया।”


कविता ने उनका हाथ दबाते हुए कहा, “मांजी, अब पुरानी बातें छोड़ दीजिए।”


कमला देवी ने कहा, “नहीं बहू, आज मुझे अपनी गलती समझ आई है।”


कविता ने पूछा, “क्या समझ आया मांजी?”


कमला देवी ने कहा, “रिश्ते शक से नहीं, भरोसे से चलते हैं।”


कविता मुस्कुराई।


कमला देवी ने उसे गले लगाते हुए कहा, “आज से तू सिर्फ मेरी बहू नहीं है। तू मेरी बेटी जैसी है।”


कविता ने कहा, “मांजी, बेटी समझें या बहू, बस अपना समझिए।”


दरवाजे के पास खड़े श्यामलाल यह सब देख रहे थे।


उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “अब मेरी पत्नी को समझ आया कि असली गड़बड़ कहां थी?”


कमला देवी ने आंसू पोंछते हुए कहा, “हां जी, गड़बड़ कविता में नहीं थी।”


श्यामलाल ने पूछा, “फिर कहां थी?”


कमला देवी ने मुस्कुराकर कहा, “मेरे दिमाग में थी।”


श्यामलाल हंस पड़े।


उन्होंने कहा, “इसी को कहते हैं इलाज।”


कमला देवी बोलीं, “लेकिन मेरे इस वहम का इलाज कविता ने कर दिया।”


उस दिन के बाद कमला देवी का व्यवहार पूरी तरह बदल गया।


अब कविता उनके कमरे में दूध रखती तो कमला देवी कहतीं, “बहू, पहले तू भी एक गिलास पी ले।”


कविता फल काटती तो कमला देवी कहतीं, “अपने लिए भी रख लेना।”


कविता खाना बनाती तो कमला देवी रसोई में आकर कहतीं, “बहू, आज तू बैठ जा। खाना मैं बना देती हूं।”


धीरे-धीरे घर का माहौल बदल गया।


जिस घर में कभी शक की बातें होती थीं, उसी घर में अब हंसी की आवाजें सुनाई देने लगीं।


एक दिन कमला देवी ने कविता से कहा, “बहू, मुझे एक बात समझ आ गई।”


कविता ने पूछा, “क्या मांजी?”


कमला देवी बोलीं, “जिसे हम शक की नजर से देखते हैं, उसकी हजार अच्छाइयां भी हमें कम लगती हैं। लेकिन जिसे भरोसे की नजर से देखते हैं, उसकी छोटी सी कोशिश भी बहुत बड़ी लगती है।”


कविता मुस्कुराई और बोली, “मांजी, अब आप बस खुश रहा कीजिए।”


श्यामलाल ने पीछे से कहा, “और कमला, अब बहू पर शक करने से पहले मुझसे पूछ लेना।”


कमला देवी हंसते हुए बोलीं, “अब शक ही नहीं करूंगी।”


श्यामलाल ने कहा, “बहुत अच्छा। क्योंकि वहम का कोई इलाज नहीं होता।”


कमला देवी ने मुस्कुराकर कहा, “होता है जी।”


श्यामलाल ने पूछा, “क्या?”


कमला देवी ने कविता की ओर देखते हुए कहा—


“भरोसा।”


सीख:

किसी रिश्ते में शक पैदा करना बहुत आसान है, लेकिन उस शक को खत्म करने में वर्षों लग सकते हैं। इसलिए बिना प्रमाण किसी अपने पर आरोप लगाने से पहले एक बार उसके प्रेम और उसके किए हुए अच्छे कामों को जरूर याद कर लेना चाहिए। कई बार गलती सामने वाले की नहीं, हमारी सोच की होती है।



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